मुझे कौन छू गया ये, इक सुकून दे गया
तन्हाइयों में मुझको, इक सिला दे गया
बेख़ुद हुआ सा मैं , फिरता हूँ दर ब दर
क्या हवा का झौंका बन ख़्वाब दे गया?
हर शाम आती है शब का पैग़ाम लेकर
बेख़ुदी को ओढ़ाने, नूरी मलबूस लेकर
कौन दरख़्तों से झाँकती चाँदनी दे गया?
हर आहट दर्द भरी झनझनाहट बन गई
कैसे झनझनाहट इक मुस्कुराहट बन गई
कोई बुलबुल को मेरे नाम पैग़ाम दे गया?
ये कौन छू गया , ये कौन मुस्कुरा गया
बिना कुछ कहे भी , बहुत कुछ कह गया
एक बेसहारा हुए को , सहारा दे गया ।
मेरे लिए भला, ये कौन इबादत कर गया
मुझ पे ये कौन , इतना करम कर गया
उसको क्या पता , वो क्या कुछ कर गया ।
हार और जीत के बीच का तलफ़्फ़ुज़ दे गया
मसाइब के दरमियाँ, एक मुस्कुराहट दे गया
अँधेरी रात में , एक दीप जला के दे गया ।
सुकून = चैन । सिला = इनाम । बेख़ुद = बेसुध ।
शब = रात । नूरी = रोशनी का । मलबूस = पेरहन ।
करम = कृपा।तलफ़्फ़ुज़ = उच्चारण।मसाइब = मुसीबतें ।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

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