शाम ढल गई यूँ ही
पंछी उड़ चले यूँ ही
आख़िरी किरण मिली
आँख मचल गईं यूँ ही
और मैं थका थका
वक़्त से झुका झुका
शाम को समेट कर
बाहों में बटोर कर
साथ तो मिला नहीं, राह देखता रहा
सिमट रही शाम का सिंगार देखता रहा।
लो सुबह भी हो गई
चाँदनी बिखर गई
रात भर न सो सकी
वो आँख भी खुल गई
बादलों की ओट में
धूप भी सिमट गई
वक़्त सो गया, या कि
फ़िर से वो खो गया
बुलबुलों का गान भी सिमट सिमट रह गया
और मैं खड़ा खड़ा
आस्ताँ पे रुका रुका
सूनी इक पतंग को, उड़ती देखता रहा l
सुबह में शाम की, झलक देखता रहा।
सहर गई सिहर गया
सहरा में सरक गया
आँख की किताब में
फ़िर से मैं फ़िसल गया
दर्द बने रहगुज़र
राह के हमसफ़र
वो कौन याद आ गई
बार बार रुला गई
दिल को थाम के मैं
साँस को पकड़ के मैं
दरख़्त के नाम से, फ़लक को देखता रहा
सैलाबे अश्क़ को, मैं, अर्क़ बोलता रहा।
आस्ताँ = doorstep सहर = सुबह। सहरा = रेगिस्तान
रहगुज़र = रास्ता।हमसफ़र = सह यात्री।फ़लक = आसमान।
सैलाबे अश्क = आँसुओं का दरिया।अर्क़ = पसीना।
नीरज जी की तर्ज़ पर
अजित सम्बोधि

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