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Tuesday, October 20, 2026

आज दशहरा है

हर तरफ़ भीड़ का  सैलाब है, क्या माजरा है?

वो देखिये रावण का पुतला, आज दशहरा है!

अच्छा रावण को जलता देखने भीड़ उमड़ी है?

दस सिरों के कटघरे में घिरा इकहरा चेहरा है!


काम क्रोध मद  छल-कपट  लोभ मोह मत्सर 

अहंकार अन्याय स्वार्थ  दर्शाते हैं ये दस सिर।

जो चीखे चिल्लाये रुलाये, उसे कहते हैं रावण 

 आओ देखें अपने में छिपे इनमें से कितने नंबर!


राम तो वह है न जो सब जगह रमण करता है 

आप में मुझ में रावण में सब में रमा करता है।

राम बेहद सुंदर हैं, ख़ुशी देना पसंदीदा काम है 

जो एकबार मिल लेता है, शागिर्द बना करता है।


राम से मिलते  ही रावण  छू मंतर हो  जाता है 

उनसे मिलने का हुनर सिर्फ़ इंसान को आता है 

बस आपको अपने ही अंतरतम में जाना होता है 

वहीं पर ही स्वयं का स्वयं से मिलन हो जाता है।


राम और रावण हम ख़ुद ही हैं, कोई और नहीं है 

दोनों अपने ही अन्दर हैं, कहीं दूर बाहर में नहीं हैं 

हमको चुनना है हमें कौन सा  किरदार निभाना है 

इसकी ज़िम्मेदारी हम पर है किसी और पे नहीं है।


मत्सर = envy. शागिर्द = disciple. किरदार = role.


सभी को दशहरा की शुभ कामनाएँ 

अजित सम्बोधि 


Sunday, October 18, 2026

सब ठीक है न?

मन नहीं लग रहा कुछ यादें दुहरा लूँ?

याकि फ़िर से कोई गीत गुनगुना लूँ?


बाहर चलता हूँ देखूँ, क्या गुज़रती है 

सुनते हैं, नेचर तबियत  बदल देती है।


बॉलकनी में आ बैठा हूँ अकेला बैठा हूँ 

धूप निकल रही है, पेड़ की छाया भी है।


अचानक से बारिश भी होने लग गई है 

धूप के साथ बादल हैं और ख़ला भी है।


एक फ़ाख़्ता आ गई है, कुड़कुड़ा रही है 

क़यास है, अपने साथी को बुला रही है।


साथी होना तो क़ुदरती ही होता है, है न?

जैसे धूप और छाया, रात और दिन, है न?


मेरे साथ है मेरा अकेलापन, कुदरती है न?

बात समझ आ गई? अब सब  ठीक है न?


ख़ला = अंतरिक्ष।फ़ाख्ता = dove.क़यास = अनुमान।


क़ुदरत को बन्दिगी 

अजित सम्बोधि 

Friday, October 16, 2026

हर अदा का रहता इन्तिज़ार है

 मैं हर दर्द में खुशी को ढूँढता हूँ 

हर आँसू में इक शबीह ढूँढता हूँ 

साथ पसन्द हो तो ले चलो मुझे 

मैं ना-समझी की समझ ढूँढता हूँ।


मुझको  हर  मंज़र  से मुहब्बत है 

मुझको हर  मक़दम  में  रग़बत है 

चाहे शीशा हो या फ़िर शोशा हो 

रब की बनाई हर शै पे मुरव्वत है।


सहरा में  सराब  का होता सहारा है 

शोर की बाम पे  सुकूत का बसेरा है 

हर सूनेपन में  इक  आवाज़  होती है 

हर  रात  के छोर पे सिमटा  सबेरा है।


वो बड़ा फ़नकार है, बड़ा अदाकार है 

उसकी फ़ितरत, वो रहता निराकार है 

मुझको उसकी जादुई जोत दरकार है 

उसकी हर अदा का रहता इन्तिज़ार है।


शबीह = छाया चित्र।मंज़र = दृश्य।

मक़दम = आगमन।रग़बत = रुचि।

शोशा = चुटकुला।रब = ईश। शै = चीज़।

मुरव्वत = बड़ा दिल।सहरा = रेगिस्तान।

सराब = मृगतृष्णा।बाम = अटारी।सुकूत = सन्नाटा।

फ़ितरत = स्वभाव।दरकार = ज़रूरत।


राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Wednesday, October 14, 2026

शारदीय नवरात्र

दुर्गा मैया खिवैया वस्तावैया 

महिषासुर  को  दे  दी  शैया

विनती  करता  तुमसे   मैया 

मेरी  भी  पार  लगादो  नैया।


काम क्रोध मद लोभ मत्सर

ये   सब  ही  तो   महिषासुर 

करदो निर्मल  तन  मन  मेरा   

बदल  दो  मैया  ये  सब  सुर।


मैया  तो   प्रेरित   करुणा  से 

क्या  होगा त्रिशूल तलवार से?

मेरा अंतर  भर दो  करुणा  से 

मुक़्त करो  मुझे  महिषासुर से।


महिषासुर  बाहर  नहीं, है भीतर 

मद  क्रोध मत्सर बन गये मंगेतर 

सदबुद्धि आई, लक्ष्मी आजायेगी 

ऐसे  मनाऊँ  मैं  अपना  नवरात्तर।


वस्तावैया = कब आ रही हो? (तमिल)


शारदीय नवरात्र सब के लिए मंगलमय हों 

अजित सम्बोधि 

Monday, October 12, 2026

है न उसी में उतरता जानेमन?

अर्श से फ़र्श, देखे मस्कन 

पकड़ के देखे सभी दामन 

दिल की बढ़ती धड़कन से 

बढ़ती चली सिर्फ़ उलझन।


 अब न पूछता चाँद तारों से 

न पूछता  पीर ओ मुर्शिद से 

मुझे जो जाननी हक़ीक़त है 

पूछ लेता हूँ  सूनी आँखों से।


इनमें कोई  बेकसी नहीं है 

इनमें कोई  बेबसी  नहीं है 

सूनापन  पसरा  मिलता है 

ज़रा सी उजलत भी नहीं है।


ये आँखें ही  मेरा नशेमन हैं 

ये आँखें ही  मेरा  मस्कन हैं 

मुझे अज़ीज़ इनका सूनापन 

है न उसी में उतरता जानेमन?


देर हो गई मुझको मिलने में 

हाँ ख़ुद को ख़ुद से मिलने में 

क्या मुराद पूरी हो गई है मेरी?

किससे रूबरू होता मैं, सूने में?


अर्श = आसमान।फ़र्श = बिछौना।मस्कन = घर।

पीर ओ मुर्शिद = धार्मिक गुरु।बेकसी = परवशता।

उजलत = उतावलापन।नशेमन = घोंसला।

अज़ीज़ = प्यारा।जानेमन = जान जैसा प्यारा।

मुराद = आरज़ू।रूबरू = आमने सामने।आमीन = तथास्तु।


आमीन 

अजित सम्बोधि 


Sunday, October 11, 2026

क़िस्मत बदल गई

एक सुबह  आ गई, एक शाम  ढल गई 

रोशन हुआ हूँ जब से क़िस्मत बदल गई।

कुछ सब्ज़ मिल गई

कुछ सुर्ख़  मिल गई 

तन्हा  हुए  थे  लमहे 

कुछ  शाद  मिल गई 

ऐसा बनाया किरदार 

तेरी रहमत मिल गई 

अर्क  के  साथ  साथ 

कुछ   बर्क़ मिल  गई 

नाशाद  दिल को मेरे 

दिल-शाद  मिल  गई 

रोशन हुआ हूँ जबसे क़िस्मत बदल गई।


हर सिम्त गुलरंग हो गई 

महकन   से  है  भर  गई 

कोयल की कूक आ गई 

सब ओर फ़िर से छा गई 

दुआओं में बरकत आ गई 

शुआओं में रौनक भर गई 

मन से चकल्लस मिट गई 

गो कि पगधूल मिल गई 

राधे की रहमत मिल गई 

चातक को  बूँद मिल गई 

 रोशन हुआ हूँ जबसे क़िस्मत बदल गई।


मुझे ख़बर नई मिल गई 

रहगुज़र आसान हो गई 

बचपन की याद आ गई 

फ़िक्र   छोड़  दिल   गई 

यादें यादों से  भर  गईं 

सिमट के गले लग गईं 

सपनों में समाअत आगई 

आबे चश्म ख़ुश्क हो गई

दास्तान  ख़त्म  नहीं  हुई 

दास्तान  आबाद  हो  गई

रोशन हुआ हूँ जबसे क़िस्मत बदल गई।


अब बस एक ही जुनून है 

कैसे  मिल जाये सुकून है 

ज़िन्दगी एक  दास्तान  है 

नज़रों के लिये आस्तान है 

हर सफ़र नियाज़ी सफ़र है 

चंद सवालात  का असर है 

एक दूजे के दिल में जाना है 

सोई क़िस्मत  को जगाना है 

हाँ  हाँ  मै  हूँ  पूरे  होश  में 

चले आओ मेरे  आग़ोश में 

रोशन हुआ हूँ जबसे क़िस्मत बदल गई।


सब्ज़ = हरी।सुर्ख़ = लाल।तन्हा = अकेले।

लमहे = क्षण।शाद = चैन।किरदार = role.

रहमत = कृपा।अर्क = पसीना।बर्क़ = दामिनी।

नाशाद = नाख़ुश।दिल शाद = दिल की ख़ुशी 

सिम्त = दिशा।गुल रंग = गुलाबी।बरकत = बढ़ोतरी।

शुआओं = किरणों।रहगुज़र = राह।समाअत= श्रवण शक्ति।

आबे चश्म = आँसू।दास्तान = क़िस्सा।जुनून = लगन।सुकून = चैन।

आस्तान = दहलीज़।नियाज़ी = निवेदित।आग़ोश = गले लगना।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Friday, October 9, 2026

लहन ओ निदा ही मिलतीं

फ़िज़ायें घुमड़ के मिलतीं, दुआयें गूँज कर मिलतीं 

जहाँ जाता वहाँ मुझको, लहन ओ निदा ही मिलतीं।


बहुत हैं चाहने वाले 

वक़्त पर थामने वाले 

आईना साफ़ करते हैं 

नई  पहिचान  देते  हैं

आशियाना बनाने की 

हिकमत यहीं मिलती 

कूचा साफ़ करने की 

फ़ुरसत यहीं मिलती 

अगर है राह में मिलना 

तो राहें भी यहीं मिलतीं 

जहाँ जाता वहाँ मुझको लहन ओ निदा ही मिलतीं।


चमन गुलज़ार होते हैं 

बहुत दिलदार होते हैं 

कहीं हर रोज़ होते हैं 

कहीं इमरोज़ होते हैं 

कहीं उलझन में है माली 

उलझती  हर  नई  डाली 

किसी के ख़ार भी नायाब 

किसी के गुल बड़े बेआब 

किसी के अश्क़ पहिचान ले 

उसे  फ़रादीस  यहीं  मिलतीं 

जहाँ जाता वहाँ मुझको लहन ओ निदा ही मिलतीं।


दिलज़दा हो रहीं शामें 

फ़रसूदा बन चुकीं रातें 

बना दुश्वार मौसम ही 

करें क्या उंस की बातें 

मुक़द्दम हो न जो राज़ी 

समझो खो चुके बाज़ी 

करें फ़रियाद फ़िर किससे 

बने बुनियाद फ़िर जिससे 

धड़कनें दिल की पहचाने 

नबूवत तो उसे ही मिलतीं 

जहाँ जाता वहाँ मुझको लहन ओ निदा ही मिलतीं।


सर्द रातें, गरम आहें 

भरभरी हो रहीं आँखें 

खो गईं जो बेख़ुदी में 

हो गईं पुरनम हैं आँखें 

तपते हुए दिल में पड़े 

टूटे   हुये  नग़में   पड़े 

मायूस हैं नाशाद भी ये 

दिलशाद हैं ये दिलजले 

बात को जो सही समझे 

फ़िरासत है वहीं मिलती 

नग़मे भी वहीं हैं मिलते 

समाअत भी वहीं मिलती

जज़्बा ए जाँनिसारी और 

बोसी   भी  वहीं  मिलतीं 

जहाँ जाता वहाँ मुझको लहन ओ निदा ही मिलती।


लहन ओ निदा = मीठी आवाज़ में पुकार।आशियाना = घर।

हिकमत = होशियारी।इमरोज़ = वर्तमान दिन।फ़रादीस = heavenly 

abodes. दिलज़दा = टूटा दिल।फ़रसूदा = उदास।दुश्वार = कठिन।

उंस = प्यार।मुक़द्दम = मुख्य।नबूवत = पैग़म्बरी।फ़िरासत = अंतर्ज्ञान।

समाअत = सुनवाई।जज़्बा ए जाँनिसारी = जान निछावरी का हौसला।

बोसी = kissing. आमीन = so be it!


आमीन 

अजित सम्बोधि