फ़िज़ायें घुमड़ के मिलतीं, दुआयें गूँज कर मिलतीं
जहाँ जाता वहाँ मुझको, लहन ओ निदा ही मिलतीं।
बहुत हैं चाहने वाले
वक़्त पर थामने वाले
आईना साफ़ करते हैं
नई पहिचान देते हैं
आशियाना बनाने की
हिकमत यहीं मिलती
कूचा साफ़ करने की
फ़ुरसत यहीं मिलती
अगर है राह में मिलना
तो राहें भी यहीं मिलतीं
जहाँ जाता वहाँ मुझको लहन ओ निदा ही मिलतीं।
चमन गुलज़ार होते हैं
बहुत दिलदार होते हैं
कहीं हर रोज़ होते हैं
कहीं इमरोज़ होते हैं
कहीं उलझन में है माली
उलझती हर नई डाली
किसी के ख़ार भी नायाब
किसी के गुल बड़े बेआब
किसी के अश्क़ पहिचान ले
उसे फ़रादीस यहीं मिलतीं
जहाँ जाता वहाँ मुझको लहन ओ निदा ही मिलतीं।
दिलज़दा हो रहीं शामें
फ़रसूदा बन चुकीं रातें
बना दुश्वार मौसम ही
करें क्या उंस की बातें
मुक़द्दम हो न जो राज़ी
समझो खो चुके बाज़ी
करें फ़रियाद फ़िर किससे
बने बुनियाद फ़िर जिससे
धड़कनें दिल की पहचाने
नबूवत तो उसे ही मिलतीं
जहाँ जाता वहाँ मुझको लहन ओ निदा ही मिलतीं।
सर्द रातें, गरम आहें
भरभरी हो रहीं आँखें
खो गईं जो बेख़ुदी में
हो गईं पुरनम हैं आँखें
तपते हुए दिल में पड़े
टूटे हुये नग़में पड़े
मायूस हैं नाशाद भी ये
दिलशाद हैं ये दिलजले
बात को जो सही समझे
फ़िरासत है वहीं मिलती
नग़मे भी वहीं हैं मिलते
समाअत भी वहीं मिलती
जज़्बा ए जाँनिसारी और
बोसी भी वहीं मिलतीं
जहाँ जाता वहाँ मुझको लहन ओ निदा ही मिलती।
लहन ओ निदा = मीठी आवाज़ में पुकार।आशियाना = घर।
हिकमत = होशियारी।इमरोज़ = वर्तमान दिन।फ़रादीस = heavenly
abodes. दिलज़दा = टूटा दिल।फ़रसूदा = उदास।दुश्वार = कठिन।
उंस = प्यार।मुक़द्दम = मुख्य।नबूवत = पैग़म्बरी।फ़िरासत = अंतर्ज्ञान।
समाअत = सुनवाई।जज़्बा ए जाँनिसारी = जान निछावरी का हौसला।
बोसी = kissing. आमीन = so be it!
आमीन
अजित सम्बोधि
