मुश्किल है बहुत मुश्किल यादों को भुला देना
आसान नहीं है जुदाई को दिल से बिदाई देना
जन्मों की मुरव्वत से, मिल पाती है ऐसी निस्बत
आसान नहीं है कुदरत की बेरुख़ी को भुला देना।
घर तो वही है न, जहाँ कोई इंतिज़ार में बैठा हो
तभी न पैर मुड़ते घरको, जब यादमें कोई बैठा हो
पड़ते हैं क़दम मेरे अब जहाँ वो घर नहीं मकान है
कैसा लगेगा वो सूना मंज़र जहाँ सन्नाटा बैठा हो?
एक वो भी दिन था जब माँ इन्तिज़ार कर रही थीं
और मैंने बाअदब, उनके हुक्म की तामील की थी
एक घूँघट ने उनके आँगन का, सूनापन समेटा था
और हवा की सरसराहट में स्वर लहरी तैर गई थी।
मुरव्वत = लगाव।निस्बत = relationship.मंज़र = दृश्य।
बाअदब = आदरपूर्वक।तामील = अनुपालन।
ये सूना मंज़र और मैं
अजित सम्बोधि
