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Tuesday, August 18, 2026

महकती अरावली

ख़ुशनुमा यहाँ का जंगल है 

हर तरफ़ यहाँ पर मंगल है 

देखो देखो कितना सुन्दर है 

नहीं  यहाँ  कोई  दंगल   है।


इधर लोकियाँ लटक रहीं हैं 

उधर  शरीफ़े  महक   रहे  हैं 

केले नहीं अकेले, हैं अलबेले 

मन  को  हमारे  लुभा  रहे  हैं।


हर तरफ़ पहाड़ियाँ दिखती हैं 

देखो  आसमान  को  छूती  हैं 

दिलवाली हैं सबको बुलाती हैं 

कोई  भेद भाव  नहीं  करती  हैं।


करुणामय   धरती  दीप्त  यहाँ 

आकाश भी रहता सु-नील यहाँ  

मन को हर्षाती  हरियाली  यहाँ 

फ़िर क्यों न लगे  मन मेरा  यहाँ। 


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि

Friday, August 14, 2026

लख़्त ए जिगर

 जिससे दिल मिला था वो चला गया साहब 

अब बेदिली से यहाँ पे रहने का क्या मतलब?


क्या करूँगा मैं ज़माने भर की ख़ुशियाँ पाकर 

मुझे पता है वो न आयेगा अब कभी लौट कर।


हाँ, बख़ूबी जानता हूँ मैं होश में रहने का जुनून 

सब्र जब टूटता है होश रखना होता नामुमकिन।


क्या करूँगा इस दुनिया से मुख़ातिब होकर फ़िर 

उसका सलीक़ा तो न लौट के आयेगा कभी फ़िर।


बहुत कुछ दफ़्न है अंदर फ़िर भी मुस्कुरा देता हूँ 

आँसू बन के टपके, उससे पहिले मुस्कुरा देता हूँ।

 

हक़ीक़त को तो रेत की तरह उड़ा नहीं सकता हूँ

हाँ, ख़ामोशी की एक रिदा ज़रूर उढ़ा सकता हूँ।


मेरी खामोशी को समझना, मुश्किल बात नहीं है 

मेरी ज़ुबान में बोलिये, मुझे बोलने में उज़्र नहीं है।


मैं भी तो वक़्त का पाबंद हूँ, ढल जाऊँगा एक दिन 

ये हक़ीक़त है, इसे बख़ूबी याद रखता हूँ, हर दिन!


बेदिली = बेमन।जुनून = लगन।नामुमकिन = असंभव।

मुख़ातिब = मुँह सामने बात करना।रिदा = चादर।उज़्र = आपत्ति।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Wednesday, August 12, 2026

हरियाली अमावस्या।

ये  हरियाली  अमावस्या  है 

पीपल  पूजन ही  तपस्या है 

मत  घबराना  बिल्कुल  भी 

दूर  भागेगी  हर  समस्या  है!


ये सावन  की अति  प्यारी है 

और शिव की राज दुलारी है 

बीच  खड़ी   भरे   सावन   में 

चहुँ  और  छटा  में  न्यारी  है!


हर  ओर  झुकी  हरियाली  है 

हर  तरफ़   छटा  मतवाली  है 

सावन  की  फुहारें   झरती  हैं 

कोयल  की  गूँज  निराली  है!


घनघोर   घटा  घिर   आई  है 

मन-मोरनी   नाचने   आई   है

हर  शाख़   बनी  रक़्क़ासा  है 

क़िस्मत  की   देखो  दुहाई  है!


दिन बना   था आज सुरमई  है 

और  शाम  हो रही  कोकई  है 

मै  सुनता  गुंजन  मधुर   मधुर 

और  समाँ  हो  गया  गौनई  है।


रक़्क़ासा = dancer. दुहाई = पुकार।

सुरमई = सलेटी।कोकई = लालिमा मय।

गौनई = संगीत मय।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Tuesday, August 4, 2026

कुरजाँ

रिमझिम  की  बहारें  हैं 

पानी   की   फुहारें    हैं 

आसमान  में देखो देखो 

कुरजाँ  की   कतारें   हैं।


ये  दूर  देश  से  आईं  हैं 

पंखों   के  बल  आईं  हैं 

आसमान में उड़ उड़ कर 

खुशियाँ  लेकर  आईं  हैं!


खींचन गाँव खींच के लाया 

साइबेरिया से उनको लाया 

खींचन का ये  प्यारा रिश्ता 

कुरजाँ को भी ख़ूब सुहाया।


हर बरस यहाँ वो आती हैं 

छह महीने  रुक  जाती हैं 

उड़ उड़ कर गीत सुनाती हैं 

हँसती    और   हँसाती   हैं!


कुरजाँ = demoiselle cranes.

खींचन = राजस्थान में जैसलमेर जिले का गाँव।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Friday, July 31, 2026

क्यों ख़ुद को तुझ पे मिटा न दूँ?

ये ज़िन्दगी मुझे बख़्श दी 

मैं क्यों न रब को दाद दूँ?

कोई मुस्कुरा के बोल दे

मैं क्यों न खुशियाँ बाँट दूँ?

सावन की झड़ी देख के 

मन करता झूले डाल दूँ?

तुम झूलना झूला करो 

मैं क्यों न तुमको पेंग दूँ?

वो उड़ के आईं बुलबुलें 

मैं क्यों न इनको पनाह दूँ?

ये  अपनापन  दर्शा  रहीं 

दानों की कुछ सौगात दूँ।

पूनम का चाँद खिल उठा 

नौशाद हो, कहो बोल दूँ?

ऐ ज़िन्दगी, तूने सब कुछ दिया 

क्यों ख़ुदको तुझपे मिटा न दूँ?


रब = ईश।दाद = सराहना।नौशाद = सुन्दर।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Sunday, July 26, 2026

जुगलबंदी

                        ,  [1]


नफ़रत से अनजान बस, मोहब्बत का सुकून चाहिये 

न मज़हब, न जात, न वतन, एक अदद इंसान चाहिये।


जब परिन्दे सरहदें पार करते हैं, क्या वतन बताते हैं 

जब बादल गरजते आते हैं, क्या मज़हब बखानते है।


इन्सान को ही इतना नाकारा क्यों बना दिया गया है 

उसके ख़िलाफ़ नाइन्साफ़ी को जायज़ किया गया है।


क़ुदरत ने तो बख़्शी हें इतनी इनायतें वो भी मुफ़्त में 

इन्सान कैसे कंजूस हो गया, इतनी सारी इफ़रात में।


उसने तो हवा पानी ज़मीन सूरज सब मुफ्त में दिये हैं 

आपकी ग़लतफ़हमी ने सोचिये कितने उत्पात किये हैं? 


आपने क्या बनाया है जो हक़ की बात किया करते हैं 

सोचिये क्या आप घास का एक पत्ता भी बना सकते हैं? 

 

नाकारा = निकम्मा।इनायत= कृपा।. इफ़रात = बहुतायत।

 ग़लतफ़हमी = भ्रम।


                              .[2]


उम्मीद है कि फ़ासला कम कर देती है 

मगर ग़लतफ़हमी दूरियाँ बढ़ा देती है।


इस ज़ुबान को कभी हल्के में मत ले लेना 

कभी कभी इसमें पड़ जाता है लेने का देना।


ये हल्की है मगर कभी भारी पड़ सकती है 

क्योंकि कही बात वापस नहीं आ सकती है।


साथ निभाने के लिये सावधानियाँ दरकार है 

मगर जुदा होने में एक ग़लती भी असरदार है।


आप अपना किरदार बखूबी निभाते रहिये 

बस इस ज़ुबान को नजरंदाज मत करिये।


किरदार = role. नजरंदाज = ignore.


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Friday, July 24, 2026

ले चलो!

कहाँ से लाऊँ मैं प्यार ऐसा 
क़बूल जिसको तुम कर सको
क्या दिल में वितान है ऐसा 
बिठा के मुझको तुम ले चलो ।

मेरा जहाँ तो है बस तुम्हीं से 
तुम्हीं से बाँधा है डोर को 
अगर जो मेरी फ़िक्र है तुमको 
मुझे भी अपने संग ले चलो ।

दिखें कभी जो नम आँखें मेरी  
अर्क़ समझ लेना तुम नमी को
अगर जो आँखों में दर्द झलके 
अपना समझ के घर ले चलो ।

अगर जो कहना मुमकिन न हो
काफ़ी है जो होठों को हिला दो 
मैं मान लूँगा तुम कह रहे हो
तुम्हीं मुझे  अब घर  ले चलो ।

वितान = विस्तार।अर्क़ = पसीना।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।