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Sunday, May 10, 2026

A Bag of Mangoes

Yesterday I was offered a bag of mangoes 

Mango is the fruit of my choice, as it goes.

Not for nothing is mango, the king of fruits 

In its configuration, mellowness overflows!


As I picked up a mango, I thought of Thay 

Ya, Thich Nhat Hanh, lovingly called Thay.

He was Buddhist monk, Vietnamese, exiled 

Soulfully delivered mindfulness, all the way!


I saw the sun douse mango , in its warmth

And the wind rock it, within its bandwidth.

The rain drenched it with love; & the earth 

Nourished, whilst birds furnished all mirth!


It was picked, packed, and brought to me

How many hands had shared love for me?

It’s the manifestation of God’s love for all 

His magic runs the show, and it is all free!


Radhe Radhe 

Ajit Sambodhi 

Saturday, May 9, 2026

नीरज जी की याद में

 शाम ढल गई यूँ ही 

पंछी उड़ चले यूँ ही 

आख़िरी किरण मिली 

आँख मचल गईं यूँ ही 

और मैं थका थका 

वक़्त से झुका झुका 

शाम को समेट कर

बाहों में बटोर कर 

साथ तो मिला नहीं, राह देखता रहा 

सिमट रही शाम का सिंगार देखता रहा।


लो सुबह भी हो गई 

चाँदनी बिखर गई 

रात भर न सो सकी 

वो आँख भी खुल गई 

बादलों की ओट में 

धूप भी सिमट गई 

वक़्त सो गया, या कि 

फ़िर से वो खो गया 

बुलबुलों का गान भी सिमट सिमट रह गया 

और मैं खड़ा खड़ा 

आस्ताँ पे रुका रुका 

सूनी इक पतंग को, उड़ती देखता रहा l

सुबह में शाम की, झलक देखता रहा।


सहर गई सिहर गया 

सहरा में सरक गया 

आँख की किताब में 

फ़िर से मैं फ़िसल गया 

दर्द बने रहगुज़र 

राह के हमसफ़र 

वो कौन याद आ गई 

बार बार रुला गई 

दिल को थाम के मैं 

साँस को पकड़ के मैं 

दरख़्त के नाम से, फ़लक को देखता रहा 

सैलाबे अश्क़ को, मैं, अर्क़ बोलता रहा।


आस्ताँ = doorstep सहर = सुबह। सहरा = रेगिस्तान 

रहगुज़र = रास्ता।हमसफ़र = सह यात्री।फ़लक = आसमान।

सैलाबे अश्क = आँसुओं का दरिया।अर्क़ = पसीना।


नीरज जी की तर्ज़ पर 

अजित सम्बोधि 

Friday, May 8, 2026

शिव और शक्ति

 नारी शक्ति, पुरुष है शिव 

शक्ति के बिन शिव हैं शव 

शिव बिन शक्ति दिशाहीन 

दोनों के मिलन से है  वैभव।


शिव चेतन, शक्ति अवचेतन 

शिव कीर्तन, शक्ति संकीर्तन 

शिव  धारणा, शक्ति  प्रेरणा 

शिव नीलगगन, शक्ति आँगन।


शिव बादबान, शक्ति बाग़बान 

शिव आनबान, शक्ति मेहरबान 

शिव  परेशान , शक्ति  मुस्कान 

शिव निगहबान, शक्ति क़ुरबान।


ये जोड़ी अनूठी, अति आवश्यक 

ये जोड़ी स्वाभाविक और रोचक 

एक के बिना  यहाँ दूसरा अधूरा 

बनते हैं दोनों एक दूसरे के पूरक!


बादबान = नाव खेने वाली पाल 

बाग़बान = बगीचा सँभालने वाला/वाली 

निगहबान = सुरक्षा देखने वाला/वाली 


जय शिव शक्ति 

अजित सम्बोधि 

Thursday, May 7, 2026

बुद्ध का मार्ग

 जिस मार्ग पर चलते रहे थे बुद्ध 

वही मार्ग जाना जाता है  विशुद्ध 

मन को मिलती है शान्ति वहाँ पे 

भटकने पर मिलते हैं  सिर्फ़  युद्ध।


दुख अनिवार्य है, बुद्ध ने  कहा है 

निवारण सम्भव है, ये भी कहा है 

दुख जन्म लेता लालसा रखने से 

लालसा का गर्भ भूत भविष्य में है।


जब हम भूत या भविष्य में रहते हैं 

लालसा का निर्माण करते रहते हैं 

वर्तमान में  करिश्मा  हो  जाता  है 

लालसा के  पद चाप  रुके रहते हैं।


जब भी हम साँस उथली कर लेते हैं 

भय, लालसा, क्रोध को जन्म देते हैं 

साँस के गहरी होते ही, आप पायेंगे 

प्रेम व करुणा उत्पन्न होने लगते हैं!


इसे ही बुद्ध का मध्यम मार्ग कहते हैं 

क्रोध की जगह प्रेम करुणा ले लेते हैं 

लालसा मौन में परिवर्तित हो जाती है 

भंते एक निरापद जीवन जीने लगते हैं।


बुद्धम् शरणम् गच्छामि!

अजित सम्बोधि 

Sunday, May 3, 2026

जीवन बहती धारा है

यह  जीवन  बहती  धारा है 

कभी नदिया कभी सहारा है 

अहं ने जब जब छलाँग भरी 

तब तब  ही  ख़ुद से  हारा है!


हर दिन  दुल्हन सी  नवेली है 

हर  दिन  एक  नई  पहेली  है 

हर लम्हा रब की  अठखेली है 

न समझ पाओगे, अलबेली  है!


अपना  काम  बस  बहते  रहना 

जिधर बहे नदिया उधर ही बहना 

अपना केवट, रब  ही तो आख़िर 

उसी  के साथ  सदैव  बने  रहना!


जब  जब  साँसें  गहरी  होती  हैं 

देखना, तमन्नाएँ  कमतर होती हैं 

मन के मौन में हो जाता  इज़ाफ़ा 

रब  संग  पैठ  बढ़ने लग जाती है।


सहारा = रेगिस्तान।रब = ईश।केवट = नाविक।

कमतर = और कम।इज़ाफ़ा = बढ़ोतरी।पैठ = पहुँच।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Saturday, May 2, 2026

फिर न आया सबेरा

बेचैनी मिटाने को  लिखने  बैठ  गया हूँ 
जानता हूँ मिटेगी नहीं, आदी हो गया हूँ। 

जब भी लमहात  गुज़ारे हें अपने  साथ
एक उम्मीद का दामन लगा  है मेरे हाथ।

हालात बदतरीन  हुए जाते हैं इस क़दर
सूरते तहम्मुल कहीं से नहीं आती नज़र।

गुज़र जायेगा, कुछ मुस्तक़िल तो है नहीं 
उम्र ज़ियादह होने से पकड़ बढती  नहीं। 

उनके जज़्बात को दाद दिया  करता हूँ 
ख़्वाबों में ही सही, मिल लिया करता हूँ।

 हमनवाओं के लिए क्या कर सकता हूँ? 
रब से सबके लिए  दुआ माँगा करता हूँ।

दिल में एक सूनापन है , बेबसी सी भी है
 सदम ए फ़िराक़ जैसी बेकसी सी भी है।

साँस की बख़्शीश से ही तो है ये ज़िन्दगी 
एक झोंके की हाँ से ही तो है ये ज़िन्दगी।

ज़िन्दगी तुझसे नाराज़ नहीं यक़ीन करना 
 तुझसे मुहब्बत है मगर मज़बूर न करना।

मैं  ख़ुदा था उसका , वो था  नाख़ुदा मेरा 
 रुक गया झोंका तो फ़िर न आया सबेरा।
 
लमहात = moments. दामन = पल्लू का छोर।
सूरते तहम्मुल = picture of endurance.
मुस्तक़िल = permanent. हमनवाओं = समान सोच वालों।
सदम ए फ़िराक़ = जुदाई का सदमा।
 बेकसी = लाचारी।नाख़ुदा =  नाव खेने वाला/ वाली।


अजित सम्बोधि।

Thursday, April 30, 2026

बैसाख पूर्णिमा

 आज बैसाख पूर्णिमा है , बुद्ध पूर्णिमा है 

याद रहे, बुद्ध जयंती नहीं, बुद्ध पूर्णिमा है 

जयंती दर्शाती है जन्म मरण, मरण जन्म 

जब कि पूर्ण से पूर्णतम दर्शाती पूर्णिमा है!


बुद्ध अवतरित हुए, एकान्त में, लुम्बिनी में 

महामाया द्वारा, एक अति मनोरम उपवन में 

साल वन के वृक्षों की  सुगन्ध पूरित गोद में 

बैसाख की पूर्णिमा के  चन्द्रमा की आभा में!


३५ वर्ष की आयु में वे पूर्ण से पूर्णतर हो गए 

निरंजना यानी निर्मल नदी के तट पर हो गए 

सुजाता के लिए बोधिवृक्ष के देवता हो गए 

बैसाख पूर्णिमा को खीर खाके बुद्ध हो गए।


जब कुशीनगर में थे, वे अस्सी वर्ष के हो गए 

लगने लगा था ,  वापस जाने के दिन आ गए 

बैसाख का चिरपरिचत पूर्ण चंद्र चमकता था 

और तब वे अपने पूर्णतम परिवेश में समा गए!


बुद्ध से लोग पूँछते आप कौन? वे कहते तथागत 

जब कुछ बनना नहीं होता तभी तो हौंगे तथागत 

नदी समन्दर में समाती, खोती नहीं, होती पूर्णतम 

जब पूर्ण पूर्णतम में समाया बस तभी से तथागत!


बुद्धम् शरणम् गच्छामि 

अजित सम्बोधि