एक वो ज़माना था हाँ एक वो ज़माना था
जो कभी मेरी इन आँखों में बसा करता था
जिधर नज़र घुमाता उधर ही अफ़साना था
आँखे बन्द कर लेता तो वो भी नज़राना था।
कभी तमन्ना होती कि चाँद को पकड़ लूँ मैं
फ़िर उसको बाहों में भर के उससे ये पूछूँ मैं
तुम इतने जमील हो मगर इतने दूर हो क्यों
क्या ये मुमकिन नहीं तुम्हारे पास रह सकूँ मैं?
मैं उसे अपनी आँखों में भर लिया करता था
आँखें बन्द करने पे वो मुझे दिखा करता था
वो मुझको पसन्द था और मैं उसे पसन्द था
वो मुझसे मेरी नींद में बातें किया करता था।
कभी बारिश बरसती तो मैं थिरकने लगता था
काग़ज़ की कश्ती बरसते पानी में चलाता था
क्या दिन थे ये खेल मेरी जागीर हुआ करते थे
यही वक़्त था जो मेरा बचपन हुआ करता था!
अफ़साना = क़िस्सा।नज़राना = gift.
तमन्ना = इच्छा।जमील = अति सुंदर।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि
