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Saturday, May 2, 2026

फिर न आया सबेरा

बेचैनी मिटाने को  लिखने  बैठ  गया हूँ 
जानता हूँ मिटेगी नहीं, आदी हो गया हूँ। 

जब भी लमहात  गुज़ारे हें अपने  साथ
एक उम्मीद का दामन लगा  है मेरे हाथ।

हालात बदतरीन  हुए जाते हैं इस क़दर
सूरते तहम्मुल कहीं से नहीं आती नज़र।

गुज़र जायेगा, कुछ मुस्तक़िल तो है नहीं 
उम्र ज़ियादह होने से पकड़ बढती  नहीं। 

उनके जज़्बात को दाद दिया  करता हूँ 
ख़्वाबों में ही सही, मिल लिया करता हूँ।

 हमनवाओं के लिए क्या कर सकता हूँ? 
रब से सबके लिए  दुआ माँगा करता हूँ।

दिल में एक सूनापन है , बेबसी सी भी है
 सदम ए फ़िराक़ जैसी बेकसी सी भी है।

साँस की बख़्शीश से ही तो है ये ज़िन्दगी 
एक झोंके की हाँ से ही तो है ये ज़िन्दगी।

ज़िन्दगी तुझसे नाराज़ नहीं यक़ीन करना 
 तुझसे मुहब्बत है मगर मज़बूर न करना।

मैं  ख़ुदा था उसका , वो था  नाख़ुदा मेरा 
 रुक गया झोंका तो फ़िर न आया सबेरा।
 
लमहात = moments. दामन = पल्लू का छोर।
सूरते तहम्मुल = picture of endurance.
मुस्तक़िल = permanent. हमनवाओं = समान सोच वालों।
सदम ए फ़िराक़ = जुदाई का सदमा।
 बेकसी = लाचारी।नाख़ुदा =  नाव खेने वाला/ वाली।


अजित सम्बोधि।