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Sunday, May 3, 2026

जीवन बहती धारा है

यह  जीवन  बहती  धारा है 

कभी नदिया कभी सहारा है 

अहं ने जब जब छलाँग भरी 

तब तब  ही  ख़ुद से  हारा है!


हर दिन  दुल्हन सी  नवेली है 

हर  दिन  एक  नई  पहेली  है 

हर लम्हा रब की  अठखेली है 

न समझ पाओगे, अलबेली  है!


अपना  काम  बस  बहते  रहना 

जिधर बहे नदिया उधर ही बहना 

अपना केवट, रब  ही तो आख़िर 

उसी  के साथ  सदैव  बने  रहना!


जब  जब  साँसें  गहरी  होती  हैं 

देखना, तमन्नाएँ  कमतर होती हैं 

मन के मौन में हो जाता  इज़ाफ़ा 

रब  संग  पैठ  बढ़ने लग जाती है।


सहारा = रेगिस्तान।रब = ईश।केवट = नाविक।

कमतर = और कम।इज़ाफ़ा = बढ़ोतरी।पैठ = पहुँच।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

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