यह जीवन बहती धारा है
कभी नदिया कभी सहारा है
अहं ने जब जब छलाँग भरी
तब तब ही ख़ुद से हारा है!
हर दिन दुल्हन सी नवेली है
हर दिन एक नई पहेली है
हर लम्हा रब की अठखेली है
न समझ पाओगे, अलबेली है!
अपना काम बस बहते रहना
जिधर बहे नदिया उधर ही बहना
अपना केवट, रब ही तो आख़िर
उसी के साथ सदैव बने रहना!
जब जब साँसें गहरी होती हैं
देखना, तमन्नाएँ कमतर होती हैं
मन के मौन में हो जाता इज़ाफ़ा
रब संग पैठ बढ़ने लग जाती है।
सहारा = रेगिस्तान।रब = ईश।केवट = नाविक।
कमतर = और कम।इज़ाफ़ा = बढ़ोतरी।पैठ = पहुँच।
जय राधे राधे
अजित सम्बोधि

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