Popular Posts

Total Pageviews

Friday, June 4, 2021

रक्खा है

भला दुनियाँ में क्या रक्खा है
सब कुछ तो दिल में रक्खा है।

जोभी दुनियाँ से कह नहीं पाते
उसको दिल में छिपा रक्खा है।

दिल से बढ़ कर, दोस्त कौन है
सब कुछ इसे ही बता रक्खा है।

हर कोई अपना फ़ायदा ढूँढता है
सब को बताने में क्या रक्खा है?

आसमाँ से बड़ा निगहबाँ कौन
सभी कुछ उसे दिखा रक्खा है।

लोग मरने पर धोते हैं, सजाते हैं
मैंने ज़िंदा दिल में सजा रक्खा है।

आहोदर्द कहीं बाहर रिस न जाऐं
मुँह पे इक ढक्कन लगा रक्खा है।

निगाहबाँ = देखने वाला। आहोदर्द = आह 
और दर्द।


ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

No comments:

Post a Comment