चेहरे से चुस्त हो , सफ़ा-परस्त हो
नेक दिल हो, ख़ुश दिल हो, मस्त हो
इतनी ख़ूबियाँ लिए फिरते हो यार
क्यों न हर दिल घनश्याम-परस्त हो?
हाँ, सुना करता हूँ तुमको मैं अक्सर
तुम्हारी बातें होती हैं बड़ी पुर-असर
क्या ख़ूब ज़ेहानत पाई है बरख़ुरदार
मुख़्तसर भी नहीं होता है बे-असर!
रबने बख़्शी है बड़ी इनायत तुम पर
झोली भरके कर दी कृपा मयस्सर
प्यार को उड़ेला है मालिक ने तुम पे
दिल होता बाग़ बाग़ तुम को देखकर।
दिल से दुआऐं भेज रहा हूँ मैं तुमको
रब की रहमत मिले दायम तुमको
उम्र के आख़िरी पड़ाव पर बैठा हूँ मैं
देख ली इंसानियत, देख कर तुमको।
सफ़ा-परस्त = स्पष्ट वादी।पुर-असर = असरदार।
ज़ेहानत = प्रतिभा।मुख़्तसर = रत्ती मात्र।
दायम = हमेशा।दिलनशीं ए ताउम्र = उम्रभर का मित्र।
दिलनशीं ए ताउम्र
अजित सम्बोधि

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