ज़िन्दगी निकल गई चैन भी मिला नहीं
सोचा क्या है ज़िन्दगी, जान पाया मैं नहीं।
कभी इस राह पर
चल पड़ा था सब्र कर
दिल में कान्हा को लिया
बंद दरवाज़ा किया
आँख की किनार से
टपका था कुछ प्यार से
वक्त ने पुकार दी रुक न पाया मैं मगर
सूनी सूनी थी डगर नई नई थी डगर।
जिस सिम्त मैं था जा रहा
नज़र को था घुमा रहा
हमराज़ कोई बना नहीं
हमराह कोई दिखा नहीं
मुझको थी न कोई ख़बर
पहुँचूँगा मैं कब किधर
लो आँख बंद हो गईं
लो साँस बंद हो गई।
मैं सम्हल गया गिरता हुआ
मैं बैठ गया लुढ़का हुआ
आँख ऊपर चढ़ गईं
कमर सीधी हो गई
अँधेरा घुलने लग गया
रौशनी में धुल गया
मैं बैठा बैठा जम गया
और सबेरा हो गया!
फ़िर न कह पाया कभी चैन तो मिला नहीं
या कि ज़िन्दगी को पहिचान पाया मैं नहीं।
वाह कान्हा वाह
अजित सम्बोधि

No comments:
Post a Comment