नहीं चाहिए मुझको ये ऐसे पसरा अहद।
किसे पता, फ़िर आप से मुलाकात हो या न हो
कोई ऐसा बता दें जो वक़्त की गिरफ़्त में न हो।
किसी को चाहना क़तई गुनाह नहीं है
हाँ आगे बढ़कर लौटना आसान नहीं है।
जाने वाले को दुआ करते हैं, ख़ुश रहना
ख़्याल रखना, हो सके तो आज़ाद रहना।
जब आये थे तो कुछ भी न था तन पर
फिर कपड़े पहनाये, रखा इसे ढक कर।
कभी सुर्ख़ कभी नीला कभी ज़र्द कभी सफ़ा
क़सर न छोड़ी, हर दाँव लगाया, कफ़न पर।
गर सोचा होता महावीर और लालदेद को
तो दाँव लग जाता ज़िन्दगी की हक़ीक़त पर ।
जहाँ रोशनी के समन्दर हैं हर सिम्त में उमड़ते
हर राहगीर लौटता जहाँ से कलंदर बन कर।
जंगोजहद = लड़ाई झगड़ा।अहद = माहौल, वादा।
गिरफ़्त = पकड़।सुर्ख़ = लाल।ज़र्द = पीला।सफ़ा = सफ़ेद।
महावीर और लालदेद = दोनों दिगम्बरी थे।लालदेद
महिला संत थीं। सिम्त = दिशा। कलंदर = सूफ़ी।
ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि

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