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Saturday, March 7, 2026

जाऊँ कहाँ?

जाऊँ कहाँ, मिला न दर खुला
शाम हो चली, कोई ना मिला 
वक्त ने मुझे, क्यों दिया भुला 
कैसा सफ़र ,  कैसा ये सिला।

ख़्वाब थे कई, मिलने आ गये
भूली सी बातें, याद दिला गये
सोई थी आह , फ़िर जगा गये 
ख़ुश्क आँखें , मगर रुला गये।

सूरज ढल चला, पंछी उड़ चले
फूल थे कन्ज के , बन्द हो चले
रोशनी रुक गई, अँधेरे बढ़ चले 
रहगुज़र सभी , ओझल हो चले।

दिल को क्योंकर , समझाऊँ मैं 
मन को  क्योंकर , बतलाऊँ  मैं 
कितनी क़ीमत ,  चुकाई है मैंने 
हर बार ख़ुद से, मिला सिर्फ़ मैं।

सिला = इनाम।रहगुज़र = रास्ता/ रास्ते।

ओम् शिव
अजित सम्बोधि।

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