वक्त ने मुझे, क्यों दिया भुला
शाम हो चली, कोई ना मिला
कैसा सफ़र , कैसा ये सिला।
ख़्वाब थे कई, मिलने आ गये
भूली सी बातें, याद दिला गये
सोई थी आह , फ़िर जगा गये
ख़ुश्क आँखें , मगर रुला गये।
शाम हो चली , पंछी उड़ चले
फूल कन्ज के , बन्द हो चले
रौशनी खो गई, अँधेरे बढ़ चले
जानते थे जो , अलग हो चले।
दिल को क्योंकर, समझाऊँ मैं
मन को क्योंकर , बहलाऊँ मैं
थक गई ज़िन्दगी, थक गया मैं
हर बार ख़ुदको, मिला सिर्फ़ मैं।
ओम् शिव
अजित सम्बोधि।

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