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Friday, March 28, 2025

वही 22 मार्च

 हाँ वही 22 मार्च 

जब मेरा रहबर  चला गया 

रहगुज़र   सूना   रह   गया।


 तुम जो न मिलते गीत न मिलते 

फूल  ये  मन  के, कैसे  खिलते 

बिन   गाये   ही   मैं   रह   जाता 

तुम  जो  न  आके  यूँ  मुसकाते।

 

तुम जो न मिलते ख़्वाब न मिलते 

तन्हा   दिन   मेरे,    कैसे    कटते 

आँखे      सूनी      सूनी      रहतीं

तुम    जो   मेरे    पास   न    होते।


 तुम जो  न  मिलते  दर्द न  खुलते 

अनजाने      में      अन्दर     घुटते 

जीवन      मेरा      बंजर      रहता 

अपना सलीका न तुम जो सिखाते।


रहबर = रास्ता दिखाने वाला।

रहगुज़र = रास्ता।


भूली बिसरी यादें 

अजित सम्बोधि

Friday, March 14, 2025

Holi is Holy

 Holi is just another name for fun

No festival displays  so much fun

It’s  open  for  all, young  and  old

Even a child  enjoys  the  holi  gun.


People open their arms ‘n’ embrace 

They bury dead past, leave no trace. 

A   pinch  of   red  is  all  the  charm

They anoint the other  with so grace.


I wish  everybody, the  funniest  Holi

Holi is, as the name sings, really holy

Play it with  bright and fragrant abeer

Its aroma is lilting, shall make ye jolly!


Wish everyone happy and aromatic Holi

Ajit Sambodhi

होली मिलन

 मौसम ने लेली करवट, खुशियाँ मना रहे हें 

जिसको हें कहते होली, वो  हम  मना  रहे हें।


कलियाँ हें मुस्कुराती, भँवर  गीत  गा  रहे  हें 

किलकारियाँ जम गई थीं, अब सुन पा रहे हें।


आसमाँ झुकने लगा है, तारे खिलखिला रहे हैं 

 रातों की ये मुसालमत, फ़िर से देख  पा रहे हें।


किसलय हें फूटते जब, होली का  होता  आना 

अंकुर उकरते  मन में, अपनों  का  होता  आना।


होली मिलन का सपना, हर  कोई  देखा  करता 

मिलते  हैं  रूँठे  कैसे, नज़ारा  भी  देखा  करता।


तासीर ए गुलाल ऐसी, हर कोई  हँसने  लगता 

खुशबू ए अबीर ऐसी, हर कोई महकने लगता।


सुनसान फ़लक के नीचे, हूँ  रहता  तन्हाई में मैं 

मन  के  इक  कोने  में बसाके, रखता  होली  मैं।


मुसालमत = सन्धि करना जैसे तारों ने करी हुई है।

किसलय = नये पत्ते। तासीर ए गुलाल = गुलाल 

की प्रक्रति। ख़ुशबू ए अबीर = अबीर की ख़ुशबू।

फ़लक = आसमान। तन्हाई = अकेलापन।


सभी को होली की शुभकामनाएँ 

अजित सम्बोधि 

Wednesday, March 5, 2025

A Cascade of Colours!

When you close your eyes, what do you see?

Most likely it’s a dark curtain that you’ll see.

Dark is black and  black has  zero  frequency 

Yes black is dead. It possesses  zero vibrancy.


Black is wed to dead and dead to  being glad

Got to pull back the curtain, if you aren’t mad.

The only  way out is to work  on your chakras

Turn on the chakras if you don’t want to be sad.


The first chakra is red like it is  the rising sun

It sits at the bottom with lot of strength to stun!

When you need an extra force it stands by you

It is called muladhar and helps in the long run.


The second chakra is orange like it’s orange sun

It helps in extending  your presence, just for fun!

It’s called swadisthan that translates established

In the self. Yes, self not Self! Remember the pun!


The third chakra is yellowish like the fading moon 

It fosters haste, doing everything speedily and soon.

It’s manipur sitting  at the top  of the  lowest  region

In matters of nagmani, bullies make two-bits  croon.


We are at the limits of the familiar, the physical region

Hardly anyone tries to peep into the adjoining domain 

Some day you do come across a soul straining its neck.

The lucky one is stunned locating the lush green region!


This is the terrain of anahat, the heart of unstruck sound 

The physical is ended; the metaphysical takes the ground. 

Now the rules of the game change to navigate you further 

So that one morn you might coo with the soundless sound!


Yes you have reached the vishudh chakra to get purified 

Its krishna blue enjoins on ajna chakra you aren’t denied 

Assent to enter into the  realms of your  loved destination 

Wherein, oceans of lights wait for you  to  get  sanctified!


Ya, this is sahasrar where blaze lights of the thousand suns

The blaze allows no colouration. Pure white is what it guns.

It’s not hot, dazzling it is, your ego gets dissolved for good.

When you come out you are a different breed: son  of  suns!


self = common notation for ego.

Self = it’s used for soul.

nagmani = it’s symbolic of dubious desires.


Om Shantih 

Ajit Sambodhi

Tuesday, March 4, 2025

दुआ दे रहा हूँ

 मैं भूल भी जाऊँ तो क्या होगा 

रब को तो  सब कुछ याद है न 

मेरी   भला   क्या  औक़ात   है 

रब की  रज़ा  तो  क़ायम  है  न।


ये जो रिश्ते हैं अभी के तो नहीं हैं 

ये रिश्ते तो जन्मों से चले  आ रहे 

हम भूलते  रहे हें  तो क्या हो गया 

रूहें   नहीं   भूलतीं   ये   याद  रहे।


तुम दोनों के रिश्ते भी पुराने रहे हें 

रुहों  से  ये  जिस्म  सजते  रहे  हें 

न   तुम   थे  जुदा  न   होगे  जुदा 

बस जिस्मानी  चोगे बदलते रहे हें।


जीवन  की  नदिया  बहती  रही  है 

दो  किनारे  हमेशा  से  चलते रहे हें 

तुम्हारी  ये   नाव   चलती   रही   है 

रब के इशारे से हर काम होते रहे हें।


तहे दिल  से दोनों  को दुआ दे रहा हूँ 

बहारों   को   ये   पैग़ाम  दे   रहा   हूँ 

ख्वाबों   को    तुम्हारे    सजाते    रहें 

रब  से  भी  ये  ही  दुआ  कर  रहा  हूँ।


तुम दोनों को मुबारकबाद 

पापा 

Wednesday, February 26, 2025

शिव रात्रि 2025

 तुम अगर अपने शिव को पहचान लो 

शिव को मनाना ज़रा भी मुश्किल नहीं।

तुम अगर अपनी साँसों को पहचान लो 

शिव तक का सफ़र क़तई मुश्किल नहीं।


तुम अगर मानो तो उपवास  ज़रूरी नहीं 

तुम अगर जानो तो व्रत की  हुज्जत नहीं।

लम्बी दूरियाँ तय करना भी लाज़मी नहीं 

सच तो ये है वो तुम से, अलग है ही नहीं।


अपनी साँसों को समझने की कोशिश करो 

हाँ इनको पढ़ पढ़ कर आज़माइश तो करो।

साँसो की इबारत में एक अजब सा जादू है 

जब साँस थिर हो जाए, उसकी आस  करो।


शिव थिर हुआ शून्य बन गया, शुभ बन गया 

ख़ुद को मिटा दिया और वो शक्ति बन गया!

ख़ुद को मिटा लेना, समझ जाओगे कैसे वो 

शिव से शम्भो, तत्पश्चात, शाम्भवी बन गया!


शाम्भवी, अर्थात, सभी कुछ सम्भव हो गया 

जो असम्भव सा था वह भी सम्भव हो गया।

इस सृष्टि और स्रष्टा का दृश्य बदल गया 

जो ख़ुद को कर्ता कहता रहा, दर्शक हो गया!


 जय शिव शम्भो!

अजित सम्बोधि 

Friday, February 14, 2025

14 Feb 2025

 क्यों याद आती है 14 फ़रवरी 

हाँ जो हुआ करती थी रस भरी।

आज भी तो आगई है वो  मगर 

ये आँखें  क्यों हें यूँ, आँसू  भरी।


कैसे बीतते  हें ख़ुशबख्शी के दिन 

हज़ारहा दिन भी लगते हें एक दिन।

अब क्या बेड़ियाँ  पड़ गई  हें इनके 

बमुश्किल गुज़रता है एक एक दिन।


क्या दुनिया बनाई है ऐ मालिक तूने 

क्या है ऐसा जो न बनाया इसमें तूने।

क्या इतना हक़  नहीं हमें  जानने का 

क्यो छुपा के रख  लिया ख़ुद को तूने?


तू दिखता तो तुझसे फ़रियाद तो करते 

तेरे रूबरू दिल की  बातें तो बयाँ करते।

तुम तो ग़मख़्वार हो, हमे पूरा एतिबार है 

तेरे दरपेश  होते, हमें तग़ाफ़ुल  न करते।


ख़ुशबख्शी = ख़ुश क़िस्मती। हज़ारहा = हज़ारों।

बमुश्किल = मुश्किल से। ग़मख़्वार = हमदर्द।

दरपेश = रूबरू = सामने।तग़ाफ़ुल = ignore.


ॐ शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Saturday, February 8, 2025

Happy Birthday Arunima!

 One more  year, one  year  more

We are again here, for to be sure!

Nice to hear the ringing bells again

I only blinked and found I was here!

Happy birthday to you Arunima!

Happy birthday to you Arunima!


We move on but what’s that moves on?

Put the finger on whatsoever moves on!

Can we do so? Is it at all possible to do?

As we age, don’t we say we’ve moved on?

Happy birthday to you Arunima!

Happy birthday to you Arunima!


Yes that which  moves on is  called our  age

We keep on gazing while all we do is to age!

You can count your age like rings on the tree

We are useful like a tree,  doubling as a sage!

Happy birthday to you Arunima!

Happy birthday to you Arunima!


Let’s  make  merry  and  dance  our  way 

Don’t curse or regret, just blink your way!

Whatsoever happens, happens for our good 

Just flow with the flow and sway and sway!

Happy birthday to you Arunima!

Happy birthday to you Arunima!


Bless you Arunima 

Nana