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Friday, July 24, 2026

ले चलो!

कहाँ से लाऊँ मैं प्यार ऐसा 
क़बूल जिसको तुम कर सको
क्या दिल में वितान है ऐसा 
बिठा के मुझको तुम ले चलो ।

मेरा जहाँ तो है बस तुम्हीं से 
तुम्हीं से बाँधा है डोर को 
अगर जो मेरी फ़िक्र है तुमको 
मुझे भी अपने संग ले चलो ।

दिखें कभी जो नम आँखें मेरी  
अर्क़ समझ लेना तुम नमी को
अगर जो आँखों में दर्द झलके 
अपना समझ के घर ले चलो ।

अगर जो कहना मुमकिन न हो
काफ़ी है जो होठों को हिला दो 
मैं मान लूँगा तुम कह रहे हो
तुम्हीं मुझे  अब घर  ले चलो ।

वितान = विस्तार।अर्क़ = पसीना।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

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