कहाँ से लाऊँ मैं प्यार ऐसा
क़बूल जिसको तुम कर सको
क्या दिल में वितान है ऐसा
बिठा के मुझको तुम ले चलो ।
मेरा जहाँ तो है बस तुम्हीं से
तुम्हीं से बाँधा है डोर को
अगर जो मेरी फ़िक्र है तुमको
मुझे भी अपने संग ले चलो ।
दिखें कभी जो नम आँखें मेरी
अर्क़ समझ लेना तुम नमी को
अगर जो आँखों में दर्द झलके
अपना समझ के घर ले चलो ।
अगर जो कहना मुमकिन न हो
काफ़ी है जो होठों को हिला दो
मैं मान लूँगा तुम कह रहे हो
तुम्हीं मुझे अब घर ले चलो ।
वितान = विस्तार।अर्क़ = पसीना।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

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