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नफ़रत से अनजान बस, मोहब्बत का सुकून चाहिये
न मज़हब, न जात, न वतन, एक अदद इंसान चाहिये।
जब परिन्दे सरहदें पार करते हैं, क्या वतन बताते हैं
जब बादल गरजते आते हैं, क्या मज़हब बखानते है।
इन्सान को ही इतना नाकारा क्यों बना दिया गया है
उसके ख़िलाफ़ नाइन्साफ़ी को जायज़ किया गया है।
क़ुदरत ने तो बख़्शी हें इतनी इनायतें वो भी मुफ़्त में
इन्सान कैसे कंजूस हो गया, इतनी सारी इफ़रात में।
उसने तो हवा पानी ज़मीन सूरज सब मुफ्त में दिये हैं
आपकी ग़लतफ़हमी ने सोचिये कितने उत्पात किये हैं?
आपने क्या बनाया है जो हक़ की बात किया करते हैं
सोचिये क्या आप घास का एक पत्ता भी बना सकते हैं?
नाकारा = निकम्मा।इनायत= कृपा।. इफ़रात = बहुतायत।
ग़लतफ़हमी = भ्रम।
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उम्मीद है कि फ़ासला कम कर देती है
मगर ग़लतफ़हमी दूरियाँ बढ़ा देती है।
इस ज़ुबान को कभी हल्के में मत ले लेना
कभी कभी इसमें पड़ जाता है लेने का देना।
ये हल्की है मगर कभी भारी पड़ सकती है
क्योंकि कही बात वापस नहीं आ सकती है।
साथ निभाने के लिये सावधानियाँ दरकार है
मगर जुदा होने में एक ग़लती भी असरदार है।
आप अपना किरदार बखूबी निभाते रहिये
बस इस ज़ुबान को नजरंदाज मत करिये।
किरदार = role. नजरंदाज = ignore.
जय राधे राधे
अजित सम्बोधि

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