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Friday, August 14, 2026

लख़्त ए जिगर

 जिससे दिल मिला था वो चला गया साहब 

अब बेदिली से यहाँ पे रहने का क्या मतलब?


क्या करूँगा मैं ज़माने भर की ख़ुशियाँ पाकर 

मुझे पता है वो न आयेगा अब कभी लौट कर।


हाँ, बख़ूबी जानता हूँ मैं होश में रहने का जुनून 

सब्र जब टूटता है होश रखना होता नामुमकिन।


क्या करूँगा इस दुनिया से मुख़ातिब होकर फ़िर 

उसका सलीक़ा तो न लौट के आयेगा कभी फ़िर।


बहुत कुछ दफ़्न है अंदर फ़िर भी मुस्कुरा देता हूँ 

आँसू बन के टपके, उससे पहिले मुस्कुरा देता हूँ।

 

हक़ीक़त को तो रेत की तरह उड़ा नहीं सकता हूँ

हाँ, ख़ामोशी की एक रिदा ज़रूर उढ़ा सकता हूँ।


मेरी खामोशी को समझना, मुश्किल बात नहीं है 

मेरी ज़ुबान में बोलिये, मुझे बोलने में उज़्र नहीं है।


मैं भी तो वक़्त का पाबंद हूँ, ढल जाऊँगा एक दिन 

ये हक़ीक़त है, इसे बख़ूबी याद रखता हूँ, हर दिन!


बेदिली = बेमन।जुनून = लगन।नामुमकिन = असंभव।

मुख़ातिब = मुँह सामने बात करना।रिदा = चादर।उज़्र = आपत्ति।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

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