ख़ुशनुमा यहाँ का जंगल है
हर तरफ़ यहाँ पर मंगल है
सब कुछ कितना सुन्दर है
नहीं यहाँ कोई दंगल है।
इधर लोकियाँ लटक रहीं हैं
उधर शरीफ़े महक रहे हैं
केले नहीं अकेले, हैं अलबेले
गुच्छे बन बन ललक रहे हैं।
हर तरफ़ पहाड़ियाँ बिखरी हैं
और आसमान में छितरी हैं
दिलवाली, सबको बुलाती हैं
प्यार में ख़ुद भी थिरकती हैं।
करुणामय धरती दीप्त यहाँ
आकाश भी रहता सु-नील यहाँ
मन को हर्षाती हरियाली यहाँ
फ़िर क्यों न लगे मन मेरा यहाँ।
जय राधे राधे
अजित सम्बोधि

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