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Tuesday, August 18, 2026

महकती अरावली

ख़ुशनुमा यहाँ का जंगल है 

हर तरफ़ यहाँ पर मंगल है 

देखो देखो कितना सुन्दर है 

नहीं  यहाँ  कोई  दंगल   है।


इधर लोकियाँ लटक रहीं हैं 

उधर  शरीफ़े  महक   रहे  हैं 

केले नहीं अकेले, हैं अलबेले 

गुच्छे  बन  बन  लुभा  रहे  हैं।


हर तरफ़ पहाड़ियाँ दिखती हैं 

देखो  आसमान  को  छूती  हैं 

दिलवाली हैं सबको बुलाती हैं 

कोई  भेद भाव  नहीं  करती  हैं।


करुणामय   धरती  दीप्त  यहाँ 

आकाश भी रहता सु-नील यहाँ  

मन को हर्षाती  हरियाली  यहाँ 

फ़िर क्यों न लगे  मन मेरा  यहाँ। 


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि

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