अर्श से फ़र्श, देखे मस्कन
पकड़ के देखे सभी दामन
दिल की बढ़ती धड़कन से
बढ़ती चली सिर्फ़ उलझन।
अब न पूछता चाँद तारों से
न पूछता पीर ओ मुर्शिद से
मुझे जो जाननी हक़ीक़त है
पूछ लेता हूँ सूनी आँखों से।
इनमें कोई बेकसी नहीं है
इनमें कोई बेबसी नहीं है
सूनापन पसरा मिलता है
ज़रा सी उजलत भी नहीं है।
ये आँखें ही मेरा नशेमन हैं
ये आँखें ही मेरा मस्कन हैं
मुजे अज़ीज़ इनका सूनापन
उसी में उतरता मेरा जानेमन।
देर हो गई मुझको मिलने में
हाँ ख़ुद को ख़ुद से मिलने में
ख़ुश हूँ मुराद पूरी हुई है मेरी
रूबरू होने की उससे.. सूने में।
अर्श = आसमान।फ़र्श = बिछौना।मस्कन = घर।
पीर ओ मुर्शिद = धार्मिक गुरु।बेकसी = परवशता।
उजलत = उतावलापन।नशेमन = घोंसला।
अज़ीज़ = प्यारा।जानेमन = जान जैसा प्यारा।
मुराद = आरज़ू।आमीन = तथास्तु।
आमीन
अजित सम्बोधि

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