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Friday, October 16, 2026

हर अदा का रहता इन्तिज़ार है

 मैं हर दर्द में खुशी को ढूँढता हूँ 

हर आँसू में इक शबीह ढूँढता हूँ 

साथ पसन्द हो तो ले चलो मुझे 

मैं ना-समझी की समझ ढूँढता हूँ।


मुझको  हर  मंज़र  से मुहब्बत है 

मुझको हर  मक़दम  में  रग़बत है 

चाहे शीशा हो या फ़िर शोशा हो 

रब की बनाई हर शै पे मुरव्वत है।


सहरा में  सराब  का होता सहारा है 

शोर की बाम पे  सुकूत का बसेरा है 

हर सूनेपन में  इक  आवाज़  होती है 

हर  रात  के छोर पे सिमटा  सबेरा है।


वो बड़ा फ़नकार है, बड़ा अदाकार है 

उसकी फ़ितरत, वो रहता निराकार है 

मुझको उसकी जादुई जोत दरकार है 

उसकी हर अदा का रहता इन्तिज़ार है।


शबीह = छाया चित्र।मंज़र = दृश्य।

मक़दम = आगमन।रग़बत = रुचि।

शोशा = चुटकुला।रब = ईश। शै = चीज़।

मुरव्वत = बड़ा दिल।सहरा = रेगिस्तान।

सराब = मृगतृष्णा।बाम = अटारी।सुकूत = सन्नाटा।

फ़ितरत = स्वभाव।दरकार = ज़रूरत।


राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

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