हर तरफ़ भीड़ का सैलाब है, क्या माजरा है?
वो देखिये रावण का पुतला, आज दशहरा है!
अच्छा रावण को जलता देखने भीड़ उमड़ी है?
दस सिरों के कटघरे में घिरा इकहरा चेहरा है!
काम क्रोध मद छल-कपट लोभ मोह मत्सर
अहंकार अन्याय स्वार्थ दर्शाते हैं ये दस सिर।
जो चीखे चिल्लाये रुलाये, उसे कहते हैं रावण
आओ देखें अपने में छिपे इनमें से कितने नंबर!
राम तो वह है न जो सब जगह रमण करता है
आप में मुझ में रावण में सब में रमा करता है।
राम बेहद सुंदर हैं, ख़ुशी देना पसंदीदा काम है
जो एकबार मिल लेता है, शागिर्द बना करता है।
राम से मिलते ही रावण छू मंतर हो जाता है
उनसे मिलने का हुनर सिर्फ़ इंसान को आता है
बस आपको अपने ही अंतरतम में जाना होता है
वहीं पर ही स्वयं का स्वयं से मिलन हो जाता है।
राम और रावण हम ख़ुद ही हैं, कोई और नहीं है
दोनों अपने ही अन्दर हैं, कहीं दूर बाहर में नहीं हैं
हमको चुनना है हमें कौन सा किरदार निभाना है
इसकी ज़िम्मेदारी हम पर है किसी और पे नहीं है।
मत्सर = envy. शागिर्द = disciple. किरदार = role.
सभी को दशहरा की शुभ कामनाएँ
अजित सम्बोधि

No comments:
Post a Comment