मन नहीं लग रहा कुछ यादें दुहरा लूँ?
याकि फ़िर से कोई गीत गुनगुना लूँ?
बाहर चलता हूँ देखूँ, क्या गुज़रती है
सुनते हैं, नेचर तबियत बदल देती है।
बॉलकनी में आ बैठा हूँ अकेला बैठा हूँ
धूप निकल रही है, पेड़ की छाया भी है।
अचानक से बारिश भी होने लग गई है
धूप के साथ बादल हैं और ख़ला भी है।
एक फ़ाख़्ता आ गई है, कुड़कुड़ा रही है
क़यास है, अपने साथी को बुला रही है।
साथी होना तो क़ुदरती ही होता है, है न?
जैसे धूप और छाया, रात और दिन, है न?
मेरे साथ है मेरा अकेलापन, कुदरती है न?
बात समझ आ गई? अब सब ठीक है न?
ख़ला = अंतरिक्ष।फ़ाख्ता = dove.क़यास = अनुमान।
क़ुदरत को बन्दिगी
अजित सम्बोधि

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