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Monday, September 14, 2026

एक वो ज़माना था

एक वो ज़माना था हाँ एक वो ज़माना था 

जो कभी  मेरी आँखों  में बसा परवाना था 

जिधर नज़र घुमाता उधर ही अफ़साना था 

आँखे बन्द कर लेता तो वो भी नज़राना था।


छोटी सी आँख में  समाया  सारा ज़माना था 

कभी तितलियाँ  पकड़ने  में  टकटकाना  था 

कभी खिसिया के आँख का मिचमिचाना था 

कभी दौड़ लगाते इंजिन का छुकछुकाना था।


कभी तमन्ना होती कि चाँद को पकड़ लूँ मैं

फ़िर उसको बाहों में भर के उससे ये पूछूँ मैं 

तुम इतने जमील हो मगर इतने दूर क्यों हो 

क्या ये मुमकिन नहीं तुम्हारे पास रह सकूँ मैं?


मैं उसे अपनी आँखों में भर लिया करता था 

आँखें बन्द करने पे वो मुझे दिखा करता था 

वो मुझको पसन्द था और मैं उसे पसन्द था 

वो मुझसे मेरी नींद में बातें किया करता था।


कभी बारिश बरसती तो मैं थिरकने लगता था 

काग़ज़ की कश्ती बरसते पानी में चलाता था 

क्या दिन थे ये खेल मेरी जागीर हुआ करते थे 

 यही वक़्त था जो मेरा बचपन हुआ करता था!


वो बचपन का ज़माना भी कैसा सुहाना होता था 

किसी फ़िक्र से कभी कहीं मिलना नहीं होता था 

परियों की किताबों में परियों से मिलना होता था 

फ़िर माँ की गोदी में आख़िरी  ठिकाना  होता था।


अफ़साना = क़िस्सा।नज़राना = gift.

तमन्ना = इच्छा।जमील = अति सुंदर।


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि 

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