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Tuesday, November 3, 2026

मगन मिलन

एक रोज़ था कि जब, मिल गये थे यूँ ही हम 

चल पड़े थे  साथ साथ, यूँ ही अपने ये क़दम।


दिन गुज़रने लग गये, राह बनने लग गई 

ज़िंदगी फ़िसल चली, बानगी बनती गई।


गुलज़ार चमन देख,कोयल की कूक आगई 

भँवरे गुनगुना उठे, पपीहे की  पुकार छा गई।


कलियाँ मुस्कुरा उठीं महक उठने लग गई

फूल  खिलने  लग  गये, रौनकें  बौरा  गईं।


ख़्वाब बने हक़ीक़त, फिर से आने लग गये 

 परवाज़ हुई ज़िंदगी, दिल चहकने लग गये।


ज़िन्दगी चलती रही, महफ़िलें सजती रहीं 

अफ़साने बनते रहे, दिलदारियाँ नपती रहीं।


तुम हमारे सहारे रहे, हम तुम्हारे सहारे रहे 

तूफानों के दरमियाँ, किनारे हमें मिलते रहे।


यादों के ज़ख़ीरे गुले गुलज़ार हो गये उम्र पर 

मशकूर ए रब हूँ, पहुँचा दिया इस मक़ाम पर।

 

पता भी चला नहीं और उम्र बदस्तूर ढल गईं 

यक़ीन नहीं आ रहा और शक्लें भी बदल गईं।


आज इस पड़ाव पे याद आया पहला मिलन 

कैसे दो अनजानों का, हुआ था  मगन मिलन।


इक ज़माना हुआ क़दम से मिले थे जब क़दम 

लगता है अभी मिले हैं, हम से तुम, तुम से हम।


बानगी = मिसाल।गुलज़ार = फूलों से भरा।बौरा = उन्माद।

परवाज़ = पंख लगना।अफ़साने = किस्से।दिलदारियाँ = उदारता।

ज़ख़ीरे = भंडार।गुले गुलज़ार = सुन्दरतम फूल।मशकूर ए रब = 

ईश्वर का शुक्र गुज़ार।मक़ाम = पड़ाव।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

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