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Tuesday, February 24, 2026

कभी ऐसे चल पड़ा था मैं

 ज़िन्दगी निकल गई चैन भी  मिला  नहीं 

सोचा क्या है ज़िन्दगी, जान पाया मैं नहीं।


कभी इस राह पर 

चल पड़ा था सब्र कर 

दिल में कान्हा को लिया 

बंद दरवाज़ा किया 

आँख की किनार से 

टपका था कुछ प्यार से 

वक्त ने पुकार दी रुक न पाया मैं मगर 

सूनी सूनी थी डगर नई नई थी डगर।


जिस सिम्त मैं था जा रहा 

नज़र को था घुमा रहा 

हमराज़ कोई बना नहीं 

हमराह कोई दिखा नहीं 

मुझको थी न कोई ख़बर 

पहुँचूँगा मैं कब किधर

लो आँख बंद  हो गईं

लो साँस बंद  हो गई।


मैं सम्हल गया गिरता हुआ 

मैं बैठ गया लुढ़का हुआ 

आँख ऊपर चढ़ गईं 

 कमर सीधी हो गई 

अँधेरा घुलने लग गया 

रौशनी में धुल गया 

मैं बैठा बैठा जम गया 

और सबेरा हो गया!


फ़िर न कह पाया कभी चैन तो मिला नहीं 

या कि ज़िन्दगी को पहिचान पाया मैं नहीं।


वाह कान्हा वाह 

अजित सम्बोधि 

Friday, February 20, 2026

कैसे भुला दूँ तुझे मैं भला

 मैं  सोता  रहा , तू  जगता  रहा

तू हर दम  मुझे  लाड़ करता  रहा 

अब कैसे  भुला दूँ, तुझे  मैं  भला

साँस बनकर  मेरी,  तू बहता  रहा।l


मैं लड़ता  रहा और झगड़ता  रहा 

ख़िलक़त की दौड़ में दौड़ता  रहा 

तू हर वक़्त ख़ैरख़्वाह बन कर  रहा   

दिल की धड़कन बन धड़कता रहा।


क्या कुछ नहीं दे दिया तूने मुझे

सूरज आता रोज़ जगाने को मुझे 

यामिनी आती है सुलाने  को मुझे 

मुफ़्त में मिलतीं ये ख़िदमात मुझे।


पेड़ों को देखो खड़े रहते उम्र भर 

धूप हो सर्दी हो बरखा हो जी भर 

देते छाया, फूल, फल  झोली भर 

और रूह ए रवाँ संजीवनी उम्र भर।


तू हयात बख़्श, सब बख़्शा  रहा है 

बिना माँगे ख़ुद ही अता कर रहा है 

कैसे कोई भुला सकता  है  तुझको 

नक़द दम उदर, परवरिश कर रहा है।


ख़िलक़त = दुनियाँ।ख़ैरख़्वाह = भला चाहने वाला।

यामिनी = रात।ख़िदमात = सेवायें।रूह ए रवाँ = प्राणवायु, O2. 

संजीवनी = जीवन देने वाली। हयात बख़्श = जीवनदाता।

अता = देना।नक़द दम = अकेला।उदर = पेट।परवरिश = nourish.

मुरीद ए ताउम्र = सारी उम्र का follower.


मुरीद ए ताउम्र 

अजित सम्बोधि 

Monday, February 16, 2026

मेरा दोस्त घनश्याम!

चेहरे से चुस्त हो ,  सफ़ा-परस्त   हो
नेक दिल हो, ख़ुश दिल हो, मस्त हो
इतनी ख़ूबियाँ  लिए  फिरते हो  यार 
क्यों न हर दिल  घनश्याम-परस्त हो?

हाँ, सुना करता हूँ तुमको  मैं अक्सर 
तुम्हारी बातें होती हैं  बड़ी पुर-असर
क्या ख़ूब ज़ेहानत पाई है  बरख़ुरदार
मुख़्तसर भी  नहीं  होता है  बे-असर!

रबने बख़्शी है बड़ी इनायत तुम  पर 
झोली भरके  कर  दी कृपा  मयस्सर
प्यार को उड़ेला है मालिक ने तुम  पे
दिल होता बाग़ बाग़ तुम को देखकर।

दिल से दुआऐं भेज रहा हूँ मैं  तुमको 
रब  की रहमत  मिले  दायम  तुमको 
उम्र के आख़िरी पड़ाव  पर बैठा  हूँ मैं 
देख ली  इंसानियत, देख कर  तुमको।

सफ़ा-परस्त = स्पष्ट वादी।पुर-असर = असरदार।
ज़ेहानत = प्रतिभा।मुख़्तसर = रत्ती मात्र।
दायम = हमेशा।दिलनशीं ए ताउम्र = उम्रभर का मित्र।

दिलनशीं ए ताउम्र 
अजित सम्बोधि

Sunday, February 8, 2026

Happy Birthday Arunima!

you are the rosiness of the  rising sun

the sun that gives life to all, bars none 

i wish happy birthday to you arunima 

let rosiness touch the lives of everyone!


life is an invaluable gift given by god

some become uneasy if i mention god!

i don’t know what’s your take on god

but i am sure he has bestowed his nod!


there’s an intelligence that runs the show 

your yen word for it out of the long row?

we are indebted to it, you subscribe to it?

do untold trips round the sun! flow, flow!


wish you a happy birthday again, arunima 

nana 

Saturday, January 31, 2026

Happy Birthday Pollyanna!

Hi! Happy birthday to you Pollyanna 

Yes, Pollyanna dressed in a bondanna!

So everyone gets much too overjoyed  

& feels like crying Hosanna! Hosanna!


Last year also you made it to the States

This year also you happen in the States!

Coincidence! Yes, but I miss hailing you 

Face to face according to heart’s dictates!


We have known each other only for a year 

I can’t think if there is anything to forbear 

Instead I find it has been too fruitful to me 

I recall the time you sat with my daughter!


Happy Birthday Pollyanna 

Ajit Sambodhi 

Friday, January 30, 2026

Jolly Infinity!

 Whose sky this is, I need not to know 

I am lying supine while I watch it grow 

It grows and grows, and turns quite big 

It doesn’t seem to know, it’s high or low.


It wraps me all around, and enters me 

The world goes out and I become free

Anon, I happen to forget, who is who?

Whether I’m inside it or it’s inside me.


The sky is too very vast but vaster here

A space is inside me, brighter and clear 

Where heart seems to melt, at each beat

How strange, no one seems to be aware!


Friends, as you lie under the infinite sky

Go on watching it, till tear drops  roll by  

Don’t forget to forget each & everything 

& don’t be surprised when joy comes by!


Jolly Infinity!

Ajit Sambodhi

Friday, January 23, 2026

आगया बसन्त

आगया बसन्त छाई मौसमे बहार है 

बुलबुल ने फ़िर से लगा दी गुहार है 

सर्द हवाओं से  मिल गई  निजात है 

रवि बरसा रहा किरणों की फुहार है।


कलियाँ मुस्कुराने लगीं रौनक़े बहार है 

देखो बसंत आ गया हर तरफ़ पुकार है 

हर चेहरा खिल उठा  नज़रों में सिंगार है 

ये है ऐसी ताज़गी जो सबको दरकार है।


खेतों में पीली सरसों का लग रहा अंबार है 

लगता है जैसे हो रही हो सौने की बौछार है 

मन सभी के पुलकित हैं पाके नया संसार है 

सर्दी की बिदाई पे हर ओर जय जय कार है।


सबको बसंत पंचमी की बधाई 

अजित सम्बोधि 

Wednesday, January 21, 2026

जनम दिन मुबारक हो

 जन्म दिन  मुबारक  हो दिव्या तुमको 

ख़ुशियों का अम्बार मिल जाये तुमको 

वक़्त की मेहरबानियाँ ऐसी हों तुम पर 

बख़्शिश ए रब सब मिल जाँय तुमको!


 ये जो ज़िन्दगी मिली है, है बड़ी सौगात 

हर रोज़ सूरज की किरणें लातीं हैं प्रभात 

हर रोज़ एक नई ज़िन्दगी मिलती है हमको 

ये प्रभात है याकि तवील ए उम्र की बारात?


ख़ुशियाँ तुम्हारी होती हैं ख़ुशियाँ हमारी भी 

टकराके तुमसे, वो आतीं जानिब हमारी भी 

ये प्रभात की खुशियाँ तुमको सजाया करें 

ताकि चेहरा तुम्हारा मुस्कुराना न भूले कभी!


बख्शिश ए रब = god’s gift. सौगात = gift.

तवील ए उम्र = उम्र की लम्बाई।जानिब = दिशा में।


सदा मुस्कुराती रहो बिटिया 

पापा 

Thursday, January 1, 2026

नये साल का गीत

 नया साल आ रहा हैं नए सपने ला रहा है 

नई उड़ानें भरने को, नया जज़्बा ला रहा है।


मालिक ने है बख्शा हमको, इतना बड़ा जहाँ 

ज़मीं से लेके फ़लक तक क्या कुछ नहीं यहाँ 

सुबह कली मुस्कुराती, शाम में तारे जगमगाते 

क्यों ना कर लें हम इबादत, मेरा मन कह रहा है।


कभी चाँद झुरमुट की ओट से, कैसा झाँकता है 

कभी सूरज बादलों में से, अकस्मात  झाँकता है 

सब कुछ जो हो रहा है, कितना सुहाना लगता है 

हम पर रब कितनी रहनुमाई, हरदम  कर  रहा है।


जो कुछ बाहर हम देखते वो अंदर का अक्स है 

कभी अंदर में तो झाँकना, कैसा हो रहा रक़्स है 

 अब के नये दिन पर पलकों को गिरा के रखना 

फ़िर देखना पर्दे के पीछे कैसा कमाल हो रहा है।


फलक = आसमान।जज़्बा = कुछ कर गुज़रने का जोश।

रब = ईश्वर। अक्स = reflection. रक़्स = dance.


सब को नये साल की शुभ कामनायें 

अजित सम्बोधि 

Friday, December 26, 2025

वृंदावन की गलियों में

 ये जो मैं आज यहाँ चल रहा हूँ, ये जादू से भरी गलियाँ हैं 

ज़र्रे ज़र्रे में लिपटी हुई, यहाँ पर मुरलीधर की पगथलियाँ हैं।


ये वृन्दावन की गलियाँ हैं जहाँ जुटा करतीं थीं सहेलियाँ हैं 

कान्हा की बाँसुरी की धुन पर यहाँ, थिरकतीं थीं गोपियाँ हैं।


ये जो कदम्ब का पेड़ है, इस पर झूला करते थे, कन्हैया हैं 

साथ में उनके झूलती थीं राधा जी, होती थीं गल बहियाँ हैं।


आज हम पहुँच गये हैं रमण रेती में, लेते हैं इसकी बलैयाँ हैं 

हाँ हाँ यही तो वो रेती है जहाँ कभी करते थे रमण कन्हैया हैं।


यहाँ जमुना बह रही हैं, किनारे पर जो दिख रहीं चमेलियाँ हैं 

वो तुम्हारी याद में गोपाल, अब भी सिसकती कुंज गलियाँ हैं।


तुम जो गये लौट के न आये श्याम, राह देखती रहीं अखियाँ हैं 

तुम्हारे गीता के वायदे को याद कर कर, गुज़ारतीं  तन्हाईयाँ हैं।


यहाँ पर आने पर पाया मैंने, हर सिम्त, यादों की परछाइयाँ हैं 

हर तरुवर की कलियों की ज़ुबाँ पर, बस तुम्हारी कहानियाँ हैं।


हर एक ज़ुबाँ पर तुम हो, तुम्हें देखने को तरस रहीं पुतलियाँ हैं 

घनश्याम बहुत देर हो चुकी है, अब और न बुझाना पहेलियाँ हैं।


पर कैसे भूलूँ कि घनश्याम से तुम ही कराते हो मेरी गलबहियाँ हैं 

तुमने अपना नाम-रूप मुझे दे कर, शुरू से किया करम कन्हैया है।


ये  जो मैं  आज  यहाँ  चल  रहा  हूँ, ये  जादू  से  भरी  गलियाँ  हैं 

ज़र्रे  ज़र्रे  में  लिपटी  हुई, यहाँ  पर  मुरलीधर  की  पगथलियाँ  हैं।


मुरीद ए मुरारी 

अजित सम्बोधि 

Friday, December 5, 2025

एक गुज़ारिश है

 मुझे कुछ कर तो लेने दो 

मुझे यूँ लुटने भी तो दो 

तुम तो हो ग़ैबी हाँ 

हाँ तुम तो हो ग़ैबी हाँ 

हाँ हाँ तुम तो हो ग़ैबी कन्हाई 

मुझे भी रूह बनने दो।

मुझे कुछ कर तो लेने दो 

मुझे कुछ लुट तो लेने दो।


 तुम्हें पाने की हसरत में 

मुझे कुछ खो तो लेने दो 

हाँ मुझे कुछ खो तो लेने दो 

ये जिस्म ले लो वापस 

हाँ हाँ इसे ले लो वापस 

मुझे भी रूह बनने दो 

या तो तुम जिस्म लेके आओ 

वरना मुझे भी रूह बनने दो।

मुझे कुछ कर तो लेने दो 

मुझे यूँ लुटने भी तो दो 

तुम तो हो ग़ैबी कन्हाई 

मुझे भी रूह बनने दो।


कितने सावन बीत गये 

पर तुम फ़िर भी नहीं आये 

आँखें सावन बन बन हारीं 

झूले सूने सूने रह गये 

मैं बन गया यायावर 

तुम तो रहे ग़ैबी 

मुझे आश्कारा बना दिया 

हटा लो ये जिस्मानी चादर 

मुझे अब रूह बनने दो 

मुझे अब रूह बनने दो।


ग़ैबी = invisible. यायावर = फक्कड़।

आश्कारा = visible, जिस्मानी।


रहनशीं रहरौ 

अजित सम्बोधि 

Thursday, December 4, 2025

यहाँ सब क़ुदरती, नहीं कुछ कीमियाई

 मुझे मत रोको मुझे बोलने दो 

बन्द थी ज़ुबाँ आज खोलने दो 

रहम खाओ मुझ पर, ख़ुद पर 

सारे जहान पर, इज़ाज़त दे दो।

सच कह रहा हूँ मैंने देखी हैं 

अपनी इन आँखों से देखी हैं 

वो हरी भरी वादियाँ अंतहीन 

उनमें विचरती गौऐं मैंने देखी हैं।

मैंने देखा है वो जो प्यार देती हैं 

हाँ वो माँ के जैसा लाड़ देती हैं 

भूल जाओगे ख़ुद को यक़ीनन 

जब जीभ से तुम्हें लपेट लेती हैं।


मैंने देखा है बतख़ों को नज़दीक में 

मैंने देखा कैसे सिमटती हैं वो घेरे में 

न पैर हिलते हैं न गर्दन और न पंख 

कैसा इज़ाफ़ा करतीं आपकी शान में।

कहीं पे डोर से झूलती गौरैया दिखेगी 

कहीं शाख़ से लटकती तोरई मिलेगी 

कहीं कचनार के खिलते फूल महकेंगे 

कहीं गोभी के फूलों की क़तार मिलेगी।

यहाँ सब है कुदरती, नहीं कुछ कीमियाई 

हर तरफ़ से फैली हुई है रब की रहनुमाई 

आफ़ताब है दीप्त है, माहताब है दीप्ति है 

इसलिए पसरी है हर सिम्त में ख़ुशनुमाई।


कुदरती = जैविक। कीमियाई = गैर जैविक।

आफ़ताब = सूरज जो दीप्त है, रौशन है।

माहताब = चाँद जो दीप्ति है, काम रोशनी बखेरना।

सिम्त = दिशा। रहनशीं रहरौ = रास्ते में बैठा पथिक।


एक रहनशीं रहरौ 

अजित सम्बोधि 

Monday, November 24, 2025

बधाई हो 24 नवम्बर !

 बधाई हो आज 24  नवम्बर है 

आज भी कुछ वैसा ही अम्बर है 

जैसा था  बत्तीस   साल  पहिले 

ज़हन में  रखने  वाला  नम्बर  है!


हर मिलन के पीछे एक कहानी है  

न सोचना इक बार की कहानी है 

जन्मों जन्मों से चलती आ रही है

मिलना  निरंतरता  की निशानी है।


हर बार चोगे बदलते  रहा  करते हैं 

हर बार किस्से बदलते रहा करते हैं 

मगर रूहें  कभी भी  नहीं बदलती हैं 

  सिर्फ़ बाब  हैं जो  बदला  करते हैं।


 आप दोनों ख़ुश रहें, दुआ करता हूँ 

वक़्त  तामील  करे, दुआ  करता  हूँ 

बच्चे सभी ख़ुश  रहें, दुआ  करता  हूँ 

रब का करम रहे, यही दुआ करता हूँ।


बाब = chapter.  तामील = आज्ञापालन।

रब = ईश्वर। करम = कृपा।


शुभचिन्तक 

पापा 

Monday, October 20, 2025

दिवाली आ गई है

 तीरगी टूटने लगी है 

शमा जलने लगी है 

रात मह-जबीं होने लगी है 

कहाँ छिपी थी अभी तक 

ए दिवाली बता तू 

फ़लक को बाहों में लिए 

लो दिवाली आने लगी है।

                    हवा बदल सी रही है 

                    फ़िज़ा बदल सी रही है 

                     पस ए मंज़र ही बदल रही है 

                      किसको करूँ मैं नज़राना पेश 

                      खुशियाँ करने लगीं बेहोश 

                      शाम गुलज़ार होने लगी है

                      दिवाली आने लगी है।

मौसम ने करवट लेली 

सपनों ने करवट  लेली 

बंधनों की गहराइयों में 

ज़मीं ने भी करवट है ले ली 

रंगत बदलने लगी है 

सीरत बदलने लगी है 

दिवाली आने लगी है।

                            राहत आ रही है 

                             पर्दा हटा के आ रही है 

                              नई सौगात ला रही है 

                              ज़िंदगी परवाज़ होने लगी है 

                             कोई न हारा, सब जीते 

                              दिल की आवाज़ आ रही है 

                              दिवाली आने लगी है।

पेड़ों का लिबास बदल गया 

फूलों का सलीका बदल गया 

नई सुवास आ रही है 

मन में हुलास आ रही है 

दिवाली आने लगी है 

दिवाली आ रही है

दिवाली आ गई है

क्या दिवाली है जैसे रंगो ने ली अँगड़ाई है?

बल खाती शम्माओं  की कैसी रहनुमाई है?


तीरगी = अंधकार। शमा = light.

मह-जबीं = चाँद जैसी। फ़लक = आसमाँ।

पस ए मंज़र = backdrop.परवाज़ = उड़ने।


सभी को दिवाली की बधाइयाँ 

एवम् शुभ कामनाएँ!


शुभेच्छु 

अजित सम्बोधि 

Monday, October 13, 2025

HPB speaks !

 HPB had  predicted 140  years ago 

European  science  is going  to  sow

Two seeds for  death of  human race

Consumerism with Militarism, Halo!


This science is clueless about the soul 

To work only for  the outer, is  its goal

It will  boomerang upon itself  one day 

So HPB chastised fawning over its role!


Aren’t we all at the brink of annihilation?

Casually  press the trigger of decimation!

HPB was for  the ancient science  of soul

As taught  in India from  times  unknown!


For one to behave like a human being

One must be linked to the inner being

Humans become  human beings  only

When they align to their  inner  being!


Only humans possess this capability 

To connect to their own inner ability 

To escape behaving like  humanoids

Should give up love of superficiality!


HPB = Helena Petrovna Blavatsky, a Russian 

noble woman in Czarist Russia. To know more

about her please refer to my blog piece The 

Tipping Point.


Om Shantih

Ajit Sambodhi

Monday, October 6, 2025

आज शरद पूनम है

  आज शरद पूनम है 

ये अनुभव अति अनुपम है 

लगती जैसे नज़्म है कोई 

ये अद्भुत पूनम है 

आज शरद पूनम है। 


                               वर्षा जाती शरद है आती 

                                नई छटा लेकर है आती 

                                सब के मन को खूब लुभाती 

                                जैसे कोई सरगम है 

                                आज शरद पूनम है।

धुले धुले सब पेड़ खड़े हैं 

रंग बिरंगे फूल खिले हैं 

पंछी भी सब चहक रहे हैं 

ऊपर को सब झाँक रहे हैं 

आज का चाँद चमाचम है 

आज शरद पूनम है।

                                   अभी चाँद निकला ही है 

                                    पूरा गोल ही निकला है 

                                    साम्राज्य बड़ा है उसका 

                                     कितना मगर सुगम है 

                                    आज शरद पूनम है।

वो पूर्ण है, परिपूर्ण है 

सम्पूर्ण है, शान्तिपूर्ण है 

आसमान का परचम है 

कैसा अजब समागम है 

आज शरद पूनम है।


सभी को शरद पूर्णिमा की बधाइयाँ 

एवम् शुभ कामनाएँ।


शुभेच्छु 

अजित सम्बोधि।

Wednesday, October 1, 2025

मैंने वादा कर लिया है

 मैंने वादा कर लिया है 

मुठ्ठियों को खोल दिया है 


मैं पलकें बिछाऊँगा 

मैं नज़रें बिछाऊँगा 

मैं तुम्हें ना भुलाऊँगा 

मैं वादे निभाऊँगा 

कैसा  करम है तेरा 

कैसा रहम है तेरा 

मैंने वादा कर लिया है 

मैंने दिल खोल दिया है 

                   सब रानाइयाँ सजाऊँगा 

                   तनहाइयाँ मिटाऊँगा 

                    रोने न दूँगा अकेले में 

                     रोने न दूँगा मेले में 

                     आँखों में जो नमी है तेरी 

                      पलकें जो झुकी हैं तेरी 

                      क़सम है ये अब मेरी 

                       हर शमा जलाऊँगा 

                       मैंने वादा कर लिया है 

                        ख़ुद को तैयार कर लिया है 

कभी था जो सरताज 

किसने दिया था वो ताज 

तूने ही दिया था साज़ 

तूने ही बख्शा था ताज 

कैसे हो गया मोहताज 

मैं दिल नवाज़ बनाऊँगा 

फ़िर से नाज़ करवाऊँगा 

मैंने वादा कर लिया है 

शुआओं को खोल दिया है 

               फ़लक से ज़मीं तक सभी 

                सूना पड़ा है जो अभी 

                 नामुमकिन दिखे, था जो मुमकिन 

                  मैं उसको बनाऊँगा मुमकिन 

                  मैं ख़ुदी को मनाऊँगा 

                   मैं तुमको मनाऊँगा 

                   मैंने वादा कर लिया है 

                    जो सोया था जगा दिया है 

कैसी झिलमिल सी झलकती हैं 

कैसी रिमझिम सी बरसती हैं 

ये बे इन्तिहा इनायतें तेरी 

 ये दिलाराइयाँ तेरी 

ये चाँद की शुआऐं 

ये मुस्कुराती रानाइऐं

मैं इन्हें सब तक पहुँचाऊँगा 

सब को दिल से लगाऊँगा 

मैंने वादा कर लिया है 

मैंने वादा कर लिया है 


 रानाइयाँ = सजावटें।शमा = दिया।

दिल नवाज़ = दिल को ख़ुशी देने वाला।

शुआओं/ऐं = किरणें। फ़लक = आसमान।

दिलाराइयाँ = दिल में छुपी ख्वाहिशें/ ख़ुशियाँ।


क़दम बोस 

अजित सम्बोधि 

Friday, September 26, 2025

परिन्दा बना दे।

 परिंदों के लिए तो नहीं कोई बंदिश 
उड़ जाते हैं जहाँ की होती ख़्वाहिश 
कोई सरहद उनको  रोक नहीं पाती 
कोई मज़हब  बना  न पाता  दबिश।

 कैसे उड़ते हैं पंख  फैला कर 
कैसे ख़ुश होते हैं  गीत गाकर 
सारा आसमाँ  बना  ख़ैरख़्वाह 
सब चहकते हैं उनको देख कर।

कितनी ख़ुशनुमा है उनकी ज़िंदगी 
हर दरख़्त करता है उनकी बन्दिगी 
जहाँ चाहते हैं  बना लेते हैं नशेमन 
हर मोड़ पे पलकें बिछाती ज़िन्दगी।

मैं तो थक गया हूँ इस ज़िन्दगी से मालिक 
इन नफ़रतों से, इन दरिंदगीयों से  मालिक 
क्या हो गया है तेरे  इन्सान को ऐ मालिक 
अच्छा हो मुझे  भी परिंदा बना दे  मालिक।

ख़ैरख़्वाह = भला चाहने वाला।नशेमन = बसेरा।

ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि 

Tuesday, September 23, 2025

Ever thought?

 Ever thought why people keep fighting 

Even in sleep they don’t forget fighting!


Be it any religion, you see them fighting 

Be it any nation, you find them fighting!


Every nation spends 80% gdp on fighting 

Asks people to live on 20% sans fighting!


Aristotle wanted a philosopher to be a ruler

But Harishchandr only was such a one ruler!


We have reached a  cul de sac,  haven’t we?

Let’s look inside ourselves,  shouldn’t  we?


A wise guy pointed out that ‘I’ is an illness

It creates 80K thoughts/day in the process!


Let’s swap ‘I’ with ‘We’ that denotes wellness

Each thought will be for ‘We’for real progress!


Shouldn’t we try it, though it looks trifling?

Let’s hope it ends, endless rage for fighting!


sans = without. cul de sac = dead end of a street 

in the form of a circle, for turning back.


Om Shantih

ajit sambodhi 


Thursday, September 18, 2025

बस एक मुस्कान चाहिये

वो पूछने लगे आपको क्या चाहिए 

मैंने पूछा किस बाबत क्या चाहिए?

कहने लगे कि ख़ुश  रहने  के लिए 

मैंने कहा सिर्फ़ एक मुस्कान चाहिए।


 तारीकी मिटाने को भला क्या चाहिए 

बस एक  जलता  हुआ  दिया  चाहिए 

 दिल की मायूसियत मिटाने के लिये 

बस  एक  नन्ही  सी  मुस्कान  चाहिए।


ख़ुश होने के लिए न बड़ी दौलत चाहिए 

और ना ही बहुत सी शोहरत ही चाहिए 

 दिल की ख़ुशी के लिए बस नक़द-दम 

 तहे दिल से निकली एक मुस्कान चाहिए!

 

तारीकी = अन्धकार। मायूसियत = उदासी।

 नक़द-दम = सिर्फ़।तहे दिल = अन्तरतम।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि