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Tuesday, October 20, 2026

आज दशहरा है

हर तरफ़ भीड़ का  सैलाब है, क्या माजरा है?

वो देखिये रावण का पुतला, आज दशहरा है!

अच्छा रावण को जलता देखने भीड़ उमड़ी है?

दस सिरों के कटघरे में घिरा इकहरा चेहरा है!


काम क्रोध मद  छल-कपट  लोभ मोह मत्सर 

अहंकार अन्याय स्वार्थ  दर्शाते हैं ये दस सिर।

जो चीखे चिल्लाये रुलाये, उसे कहते हैं रावण 

 आओ देखें अपने में छिपे इनमें से कितने नंबर!


राम तो वह है न जो सब जगह रमण करता है 

आप में मुझ में रावण में सब में रमा करता है।

राम बेहद सुंदर हैं, ख़ुशी देना पसंदीदा काम है 

जो एकबार मिल लेता है, शागिर्द बना करता है।


राम से मिलते  ही रावण  छू मंतर हो  जाता है 

उनसे मिलने का हुनर सिर्फ़ इंसान को आता है 

बस आपको अपने ही अंतरतम में जाना होता है 

वहीं पर ही स्वयं का स्वयं से मिलन हो जाता है।


राम और रावण हम ख़ुद ही हैं, कोई और नहीं है 

दोनों अपने ही अन्दर हैं, कहीं दूर बाहर में नहीं हैं 

हमको चुनना है हमें कौन सा  किरदार निभाना है 

इसकी ज़िम्मेदारी हम पर है किसी और पे नहीं है।


मत्सर = envy. शागिर्द = disciple. किरदार = role.


सभी को दशहरा की शुभ कामनाएँ 

अजित सम्बोधि 


Sunday, October 18, 2026

सब ठीक है न?

मन नहीं लग रहा कुछ यादें दुहरा लूँ?

याकि फ़िर से कोई गीत गुनगुना लूँ?


बाहर चलता हूँ देखूँ, क्या गुज़रती है 

सुनते हैं, नेचर तबियत  बदल देती है।


बॉलकनी में आ बैठा हूँ अकेला बैठा हूँ 

धूप निकल रही है, पेड़ की छाया भी है।


अचानक से बारिश भी होने लग गई है 

धूप के साथ बादल हैं और ख़ला भी है।


एक फ़ाख़्ता आ गई है, कुड़कुड़ा रही है 

क़यास है, अपने साथी को बुला रही है।


साथी होना तो क़ुदरती ही होता है, है न?

जैसे धूप और छाया, रात और दिन, है न?


मेरे साथ है मेरा अकेलापन, कुदरती है न?

बात समझ आ गई? अब सब  ठीक है न?


ख़ला = अंतरिक्ष।फ़ाख्ता = dove.क़यास = अनुमान।


क़ुदरत को बन्दिगी 

अजित सम्बोधि 

Friday, October 16, 2026

हर अदा का रहता इन्तिज़ार है

 मैं हर दर्द में खुशी को ढूँढता हूँ 

हर आँसू में इक शबीह ढूँढता हूँ 

साथ पसन्द हो तो ले चलो मुझे 

मैं ना-समझी की समझ ढूँढता हूँ।


मुझको  हर  मंज़र  से मुहब्बत है 

मुझको हर  मक़दम  में  रग़बत है 

चाहे शीशा हो या फ़िर शोशा हो 

रब की बनाई हर शै पे मुरव्वत है।


सहरा में  सराब  का होता सहारा है 

शोर की बाम पे  सुकूत का बसेरा है 

हर सूनेपन में  इक  आवाज़  होती है 

हर  रात  के छोर पे सिमटा  सबेरा है।


वो बड़ा फ़नकार है, बड़ा अदाकार है 

उसकी फ़ितरत, वो रहता निराकार है 

मुझको उसकी जादुई जोत दरकार है 

उसकी हर अदा का रहता इन्तिज़ार है।


शबीह = छाया चित्र।मंज़र = दृश्य।

मक़दम = आगमन।रग़बत = रुचि।

शोशा = चुटकुला।रब = ईश। शै = चीज़।

मुरव्वत = बड़ा दिल।सहरा = रेगिस्तान।

सराब = मृगतृष्णा।बाम = अटारी।सुकूत = सन्नाटा।

फ़ितरत = स्वभाव।दरकार = ज़रूरत।


राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Wednesday, October 14, 2026

शारदीय नवरात्र

दुर्गा मैया खिवैया वस्तावैया 

महिषासुर  को  दे  दी  शैया

विनती  करता  तुमसे   मैया 

मेरी  भी  पार  लगादो  नैया।


काम क्रोध मद लोभ मत्सर

ये   सब  ही  तो   महिषासुर 

करदो निर्मल  तन  मन  मेरा   

बदल  दो  मैया  ये  सब  सुर।


मैया  तो   प्रेरित   करुणा  से 

क्या  होगा त्रिशूल तलवार से?

मेरा अंतर  भर दो  करुणा  से 

मुक़्त करो  मुझे  महिषासुर से।


महिषासुर  बाहर  नहीं, है भीतर 

मद  क्रोध मत्सर बन गये मंगेतर 

सदबुद्धि आई, लक्ष्मी आजायेगी 

ऐसे  मनाऊँ  मैं  अपना  नवरात्तर।


वस्तावैया = कब आ रही हो? (तमिल)


शारदीय नवरात्र सब के लिए मंगलमय हों 

अजित सम्बोधि 

Monday, October 12, 2026

है न उसी में उतरता जानेमन?

अर्श से फ़र्श, देखे मस्कन 

पकड़ के देखे सभी दामन 

दिल की बढ़ती धड़कन से 

बढ़ती चली सिर्फ़ उलझन।


 अब न पूछता चाँद तारों से 

न पूछता  पीर ओ मुर्शिद से 

मुझे जो जाननी हक़ीक़त है 

पूछ लेता हूँ  सूनी आँखों से।


इनमें कोई  बेकसी नहीं है 

इनमें कोई  बेबसी  नहीं है 

सूनापन  पसरा  मिलता है 

ज़रा सी उजलत भी नहीं है।


ये आँखें ही  मेरा नशेमन हैं 

ये आँखें ही  मेरा  मस्कन हैं 

मुझे अज़ीज़ इनका सूनापन 

है न उसी में उतरता जानेमन?


देर हो गई मुझको मिलने में 

हाँ ख़ुद को ख़ुद से मिलने में 

क्या मुराद पूरी हो गई है मेरी?

किससे रूबरू होता मैं, सूने में?


अर्श = आसमान।फ़र्श = बिछौना।मस्कन = घर।

पीर ओ मुर्शिद = धार्मिक गुरु।बेकसी = परवशता।

उजलत = उतावलापन।नशेमन = घोंसला।

अज़ीज़ = प्यारा।जानेमन = जान जैसा प्यारा।

मुराद = आरज़ू।रूबरू = आमने सामने।आमीन = तथास्तु।


आमीन 

अजित सम्बोधि 


Sunday, October 11, 2026

क़िस्मत बदल गई

एक सुबह  आ गई, एक शाम  ढल गई 

रोशन हुआ हूँ जब से क़िस्मत बदल गई।

कुछ सब्ज़ मिल गई

कुछ सुर्ख़  मिल गई 

तन्हा  हुए  थे  लमहे 

कुछ  शाद  मिल गई 

ऐसा बनाया किरदार 

तेरी रहमत मिल गई 

अर्क  के  साथ  साथ 

कुछ   बर्क़ मिल  गई 

नाशाद  दिल को मेरे 

दिल-शाद  मिल  गई 

रोशन हुआ हूँ जबसे क़िस्मत बदल गई।


हर सिम्त गुलरंग हो गई 

महकन   से  है  भर  गई 

कोयल की कूक आ गई 

सब ओर फ़िर से छा गई 

दुआओं में बरकत आ गई 

शुआओं में रौनक भर गई 

मन से चकल्लस मिट गई 

गो कि पगधूल मिल गई 

राधे की रहमत मिल गई 

चातक को  बूँद मिल गई 

 रोशन हुआ हूँ जबसे क़िस्मत बदल गई।


मुझे ख़बर नई मिल गई 

रहगुज़र आसान हो गई 

बचपन की याद आ गई 

फ़िक्र   छोड़  दिल   गई 

यादें यादों से  भर  गईं 

सिमट के गले लग गईं 

सपनों में समाअत आगई 

आबे चश्म ख़ुश्क हो गई

दास्तान  ख़त्म  नहीं  हुई 

दास्तान  आबाद  हो  गई

रोशन हुआ हूँ जबसे क़िस्मत बदल गई।


अब बस एक ही जुनून है 

कैसे  मिल जाये सुकून है 

ज़िन्दगी एक  दास्तान  है 

नज़रों के लिये आस्तान है 

हर सफ़र नियाज़ी सफ़र है 

चंद सवालात  का असर है 

एक दूजे के दिल में जाना है 

सोई क़िस्मत  को जगाना है 

हाँ  हाँ  मै  हूँ  पूरे  होश  में 

चले आओ मेरे  आग़ोश में 

रोशन हुआ हूँ जबसे क़िस्मत बदल गई।


सब्ज़ = हरी।सुर्ख़ = लाल।तन्हा = अकेले।

लमहे = क्षण।शाद = चैन।किरदार = role.

रहमत = कृपा।अर्क = पसीना।बर्क़ = दामिनी।

नाशाद = नाख़ुश।दिल शाद = दिल की ख़ुशी 

सिम्त = दिशा।गुल रंग = गुलाबी।बरकत = बढ़ोतरी।

शुआओं = किरणों।रहगुज़र = राह।समाअत= श्रवण शक्ति।

आबे चश्म = आँसू।दास्तान = क़िस्सा।जुनून = लगन।सुकून = चैन।

आस्तान = दहलीज़।नियाज़ी = निवेदित।आग़ोश = गले लगना।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Friday, October 9, 2026

लहन ओ निदा ही मिलतीं

फ़िज़ायें घुमड़ के मिलतीं, दुआयें गूँज कर मिलतीं 

जहाँ जाता वहाँ मुझको, लहन ओ निदा ही मिलतीं।


बहुत हैं चाहने वाले 

वक़्त पर थामने वाले 

आईना साफ़ करते हैं 

नई  पहिचान  देते  हैं

आशियाना बनाने की 

हिकमत यहीं मिलती 

कूचा साफ़ करने की 

फ़ुरसत यहीं मिलती 

अगर है राह में मिलना 

तो राहें भी यहीं मिलतीं 

जहाँ जाता वहाँ मुझको लहन ओ निदा ही मिलतीं।


चमन गुलज़ार होते हैं 

बहुत दिलदार होते हैं 

कहीं हर रोज़ होते हैं 

कहीं इमरोज़ होते हैं 

कहीं उलझन में है माली 

उलझती  हर  नई  डाली 

किसी के ख़ार भी नायाब 

किसी के गुल बड़े बेआब 

किसी के अश्क़ पहिचान ले 

उसे  फ़रादीस  यहीं  मिलतीं 

जहाँ जाता वहाँ मुझको लहन ओ निदा ही मिलतीं।


दिलज़दा हो रहीं शामें 

फ़रसूदा बन चुकीं रातें 

बना दुश्वार मौसम ही 

करें क्या उंस की बातें 

मुक़द्दम हो न जो राज़ी 

समझो खो चुके बाज़ी 

करें फ़रियाद फ़िर किससे 

बने बुनियाद फ़िर जिससे 

धड़कनें दिल की पहचाने 

नबूवत तो उसे ही मिलतीं 

जहाँ जाता वहाँ मुझको लहन ओ निदा ही मिलतीं।


सर्द रातें, गरम आहें 

भरभरी हो रहीं आँखें 

खो गईं जो बेख़ुदी में 

हो गईं पुरनम हैं आँखें 

तपते हुए दिल में पड़े 

टूटे   हुये  नग़में   पड़े 

मायूस हैं नाशाद भी ये 

दिलशाद हैं ये दिलजले 

बात को जो सही समझे 

फ़िरासत है वहीं मिलती 

नग़मे भी वहीं हैं मिलते 

समाअत भी वहीं मिलती

जज़्बा ए जाँनिसारी और 

बोसी   भी  वहीं  मिलतीं 

जहाँ जाता वहाँ मुझको लहन ओ निदा ही मिलती।


लहन ओ निदा = मीठी आवाज़ में पुकार।आशियाना = घर।

हिकमत = होशियारी।इमरोज़ = वर्तमान दिन।फ़रादीस = heavenly 

abodes. दिलज़दा = टूटा दिल।फ़रसूदा = उदास।दुश्वार = कठिन।

उंस = प्यार।मुक़द्दम = मुख्य।नबूवत = पैग़म्बरी।फ़िरासत = अंतर्ज्ञान।

समाअत = सुनवाई।जज़्बा ए जाँनिसारी = जान निछावरी का हौसला।

बोसी = kissing. आमीन = so be it!


आमीन 

अजित सम्बोधि 

Monday, October 5, 2026

तुझे ढूँढना ही बस एक काम है

 तारीक मिटाता  हूँ, तस्वीर बनाता  हूँ 

तस्दीक़ कराता हूँ, तजवीज़ लगाता हूँ।


दिल एक समन्दर है 

नादाँ है, कलन्दर  है 

महबूब का दरपन है 

इंसाफ़ का मसकन है 

मन्सूर  का  मंज़र है 

सय्याद का खंजर है 

मैं उसका हक़ीक़ी हूँ 

अन्दर  से क़रीबी  हूँ 

ग़ैरों की बात  नहीं है 

अंदर की घात नहीं है 

तारीक मिटाता हूँ 

तस्वीर  बनाता हूँ 

तस्दीक़ कराता हूँ 

तजवीज़ लगाता हूँ।


ज़रे सफ़ेद सी राहें हैं 

माहे नौ की निगाहें हैं 

गुदाख़्त  अलमास है 

अलसाया ऐहसास है 

पिघला हुआ नगीना है 

नौशा  का  सफ़ीना  है 

मत कहो याद नहीं 

ये गुज़री बात नहीं 

शैदाई अंदाज़ यही 

सावन में भादों यही 

तारीक मिटाता हूँ 

तस्वीर बनाता हूँ 

तस्दीक़ कराता हूँ 

तजवीज़ लगाता हूँ 


रात भर सिकंदर की 

मानिंद घूमा किया 

दिन भर पिसंदर की 

तरह फ़ाक़ा किया 

तू चाहे फ़लक से पूँछ ले 

तू चाहे गुलदुम से पूँछ ले 

मुझे तेरा एतिबार है 

मुझे तेरा इंतिज़ार है 

तेरा कूँचा बड़ा  दरबार है 

तेरे ख़ुलूस से मुझे प्यार है 

तारीक़ मिटाता हूँ 

तस्वीर बनाता हूँ 

तस्दीक़ कराता हूँ 

तजवीज़ लगाता हूँ।


तुझसे सीखा प्यार मैंने 

सबको लगाया गले मैंने 

तूने किया बड़ा एहसान 

वरना रहता मैं पशेमान 

लमहात को बनाया लतीफ़ 

अलीफ़ को बनाया आलिफ़ 

मैंने क़सम खाई है 

तन्हाई की दुहाई है 

तेरा दामन पकड़े रखूँगा 

तुझसे  न  जुदा  होऊँगा 

तारीक़ मिटाता हूँ 

तस्वीर बनाता हूँ 

तस्दीक़ कराता हूँ 

तजवीज़ लगाता हूँ।


पर मुझे ये तो बता दे 

हाँ सिर पे हाथ रख दे 

मुझे  तूने  ख़ूब  भरमाया 

अब तक कुछ नहीं बताया 

लाख  मिन्नतें  कीं 

किल्लतें भी ख़ूब थीं 

ये तो बता देता तू है कौन 

क्यों बना रहता है तू मौन 

क्या ज़िन्दगी  तुझे ढूँढने का नाम है 

क्या तुझे ढूँढना ही बस एक काम है 

तारीक़ मिटाता हूँ 

तस्वीर बनाता हूँ 

तस्दीक़ कराता हूँ 

तजवीज़ लगाता हूँ।


देख मुझको और न सता 

जब तक न लगेगा ये पता 

कि आख़िर तू है कौन 

कैसे जानूँगा मैं हूँ कौन 

ख़ुद  को  जानने  के  लिये ही 

ख़ुद को पहिचानने के लिये ही 

ख़ाक  छानता  आ  रहा हूँ 

ख़ुदी को मिटाता आ रहा हूँ 

तुझको ढूँढता फिर रहा हूँ 

नाकारा बना  फिर रहा हूँ 

तारीक़ मिटाता हूँ 

तस्वीर बनाता हूँ 

तस्दीक़ कराता हूँ 

तजवीज़ लगाता हूँ।


तारीक = अँधेरा।तस्दीक़ = प्रमाण।तजवीज़ = तरीक़ा।

कलंदर = मस्ताना।महबूब = प्रिय।मसकन = घर।

मन्सूर = एक सूफ़ी संत।मंज़र = दृश्य।सय्याद = शिकारी।

खंजर = छुरा।हक़ीक़ी = सगा।ज़रे सफ़ेद = चाँदी सा सफ़ेद।

माहे नौ = नया चाँद।गुदाख़्त = पिघला हुआ।अलमास = हीरा।

नौशा = दूल्हा।सफ़ीना = कश्ती।शैदाई = प्रेम दिवाना।

पिसंदर = सौतेला बेटा।फ़ाका = भूख।फ़लक = आसमान।

गुलदुम = बुलबुल।एतवार = भरोसा।ख़ुलूस = सच्चाई।

पशेमान = शर्मिंदा।लमहात = moments.लतीफ़ = निर्दोष।

अलीफ़ = मित्र।आलिफ़ = स्नेहिल।तन्हाई = अकेलापन।

दामन = पल्लू।आमीन = एवमस्तु।


आमीन 

अजित सम्बोधि 

Monday, September 28, 2026

बिटियाओं का दिन

मालिक ने बिटिया बनाई, आँखों का तारा बनाई
करके करम उसने हम पर, सबका सहारा बनाई।

जिस दिन हुई थी बिदाई
जिस दिन हुईं तुम पराई
वो  दिन  नहीं  भूला हूँ मैं 
जिस दिन हुई थी जुदाई 
क्यों दुनिया ने ऐसी बनाई, ये रीत क्योंकर बनाई
लाड़ों से पाला था जिसको, क्योंकर वो ही गँवाई।

क्या ग़ज़ब तूने लाड़ली बनाई
जहाँ रहती , ख़ुशियाँ ही  लाई
पहिले   गोदी   हमारी  सजाई
अब रौनक  उनके यहाँ  है लाई
दुनिया ने रीत बनाई, पर लाड़ो से न जीत पाई
अनजान वादियों में जाके, बगिया उसने सजाई ।

जब मालिक ने बिटिया बनाई
सारी  चतुराई   उसमें   लगाई
ख़ुद को रखती है पीछे हरदम
आगे बढ़  कर  करती  भलाई
वाह मालिक तेरी करिश्माई, क्या ख़ूब तूने दिखाई 
ज़िन्दा हैं  सब  इसी  से,  तूने  जो  रहमत  दिखाई।

करम = रहमत = ईश्वरीय कृपा।

सब बिटियाओं को प्यार 
पापा

नाम ए लख़्त ए जिगर

गुले सुर्ख़ हो तुम, गुले जाफ़री 

मेरी गुंचा हो तुम, मेरी शायरी 

लख़्त ए जिगर हो मेरी लाड़ली 

तुम्हीं से सजी है मेरी फुलवारी 

अगर कोई तुमको हटाये डगर से 

अगर कोई तुमको गिराये नज़र से 

न आँसू बहाना न दिल को दुखाना 

चमनआरा  तेरा, मुझे याद  करना।


गुलूसोज़ हो, मेरी गुलरोज़ हो 

गुल्फ़िशाँ हो, सरफ़राज़ हो 

सहरा में सहारा, हमराज़ हो 

तुम ही तो मेरी इम्तियाज़ हो 

अगर कोई तुमसे हटा ले सिपर 

अपना कोई तुमसे जुदा हो जिगर 

न आँसू बहाना, न दिल को दुखाना 

नख़्लबंद हूँ तिरा, मुझे याद करना।


मेरी जुस्तजू हो, मेरी रग ए गुलू हो 

मेरी आरज़ू हो, मेरी ख़ुशगुलू हो 

तिशनगी बुझाने तिशनागुलू की 

गुलशन में बहती एक गुलूल हो

अगर कोई वादे से जाये मुकर 

अगर कोई अपने से छोड़े सफ़र 

न आँसू बहाना, न दिल को दुखाना 

गुलचीं हूँ तेरा, मुझे याद करना।


गोदी में तुमको खिलाया है मैंने 

कंधे से तुमको लगाया है मैंने 

लोरी सुनाके सुलाया है मैंने 

अश्कों को तेरे पोंछा है मैंने 

अगर कोई कभी भी तुमको रुलाये 

ज़रे जाफ़री की जमैयत मिटाये 

न अश्कों को पीना, न जी को दुखाना 

अब्बू हूँ तेरा, तू मुझको बताना।


गुले सुर्ख़ = गुलाब का फूल। गुले जाफ़री = केसर का फूल।

गुंचा = कलिका। लख़्त ए जिगर = जिगर का टुकड़ा।

चमनआरा = बाग़वान।गुलूसोज़ = गुलरोज़ = फुलझड़ी।

गुल्फ़िशाँ = रोशन झड़ी। सरफ़राज़ = ऊँचे सर वाली।

सहरा = desert devoid of oases. हमराज़ = राज़दार।

इम्तियाज़ = पहचान। सिपर = सुरक्षा।नख़्लबंद = बाग़वान।

जुस्तजू = तलाश।रग ए गुलू = सबसे मुख्य नाड़ी।

आरज़ू = मिन्नत। ख़ुशगुलू = dulcet throated.

तिशनगी = प्यास।तिशनागुलू = प्यासा।गुलशन = बाग़।

गुलूल = streamlet meandering through trees.

ग़ुलचीं = nursery man.अश्कों = आँसुओं।

ज़रे जाफ़री = खरा सोना।जमैयत = status.अब्बू = पिता।

आमीन = so be it! a prayer to the almighty!


आमीन

अजित सम्बोधि 

Saturday, September 26, 2026

प्रज्ञा का जन्म दिन

जनम दिन मुबारक हो तुमको प्रज्ञा 

एक बात  बता दूँ  मैं  तुमको  प्रज्ञा 

प्रज्ञा की कभी नहीं होती  है  अवज्ञा 

सबको प्रज्ञा से लेनी होती है अनुज्ञा।


बधाई  हो तुमको  तुम्हारे  नाम पर 

तुम्हें नहीं करना कोई काम डर कर 

तुम्हारा जो है वो सुन्दर आशियाना 

वही रहेगा तुम्हारा दिलकुशा उम्र भर।


नहीं भूल सकता वक़्त जो गुज़रा वहाँ 

मेरी खिड़की से चाँद दिखता था वहाँ 

कई घंटे का साथ देता था मुझको वो 

सटोरी होती थी उसकी चाँदनी में वहाँ।


मैपल का पेड़ भी था मेरा एक साथी वहाँ 

मैं उसकी छाँव में अक्सर बैठता था वहाँ 

रोबिन, रैन, फ़िंच, चिकेडी आती थीं वहाँ 

मैं उनको दाना पानी दिया करता था वहाँ।


प्रज्ञा = अंतर्दृष्टि।अवज्ञा = अवहेलना।

अनुज्ञा = अनुमति।आशियाना = घर।

दिलकुशा = दिल को ख़ुशी देने वाला।

सटोरी = समाधि की एक अवस्था।


जय राधे राधे 

पापा 

Monday, September 14, 2026

एक वो ज़माना था

एक वो ज़माना था हाँ एक वो ज़माना था 

जो कभी  मेरी आँखों  में बसा परवाना था 

जिधर नज़र घुमाता उधर ही अफ़साना था 

आँखे बन्द कर लेता तो वो भी नज़राना था।


छोटी सी आँख में  समाया  सारा ज़माना था 

कभी तितलियाँ  पकड़ने  में  टकटकाना  था 

कभी खिसिया के आँख का मिचमिचाना था 

कभी दौड़ लगाते इंजिन का छुकछुकाना था।


कभी तमन्ना होती कि चाँद को पकड़ लूँ मैं

फ़िर उसको बाहों में भर के उससे ये पूछूँ मैं 

तुम इतने जमील हो मगर इतने दूर क्यों हो 

क्या ये मुमकिन नहीं तुम्हारे पास रह सकूँ मैं?


मैं उसे अपनी आँखों में भर लिया करता था 

आँखें बन्द करने पे वो मुझे दिखा करता था 

वो मुझको पसन्द था और मैं उसे पसन्द था 

वो मुझसे मेरी नींद में बातें किया करता था।


कभी बारिश बरसती तो मैं थिरकने लगता था 

काग़ज़ की कश्ती बरसते पानी में चलाता था 

क्या दिन थे ये खेल मेरी जागीर हुआ करते थे 

 यही वक़्त था जो मेरा बचपन हुआ करता था!


वो बचपन का ज़माना भी कैसा सुहाना होता था 

किसी फ़िक्र से कभी कहीं मिलना नहीं होता था 

परियों की किताबों में परियों से मिलना होता था 

फ़िर माँ की गोदी में आख़िरी  ठिकाना  होता था।


अफ़साना = क़िस्सा।नज़राना = gift.

तमन्ना = इच्छा।जमील = अति सुंदर।


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि 

जिस दिन

 जिस दिन दिल भूल जाएगा नाम तेरा 

वो दिन आख़िरी होगा ज़िन्दगी का मेरा।


यूँ ही नहीं मैंने अब तक गुज़ारे हैं दिन 

नहीं लेता हूँ साँस तुझे याद किये बिन 

मेरी हर रात का तू ही बनता रहा सबेरा

मेरी हर रात का तू ही बनता रहा सबेरा 

                    जिस दिन दिल भूल जाएगा नाम तेरा 

                    वो दिन आख़िरी होगा ज़िन्दगी का मेरा।


रात भर दिया जला करता है तेरे लिए  

ओस बनके टपकती हैं आँखें तेरे लिए 

याद है तुझे कैसे गुज़ारता मैं अँधेरा?

याद है तुझे कैसे गुज़ारता मैं अँधेरा?

                     जिस दिन दिल भूल जाएगा नाम तेरा 

                     वो दिन आख़िरी होगा ज़िन्दगी का मेरा।


ये मेरी कश्ती है और ये जल की धारा 

नज़र आता नहीं है दूर तलक  किनारा 

पता नहीं कितनी बार लगाना है  फेरा?

पता नहीं कितनी बार लगाना है  फेरा ?             

                      जिस दिन दिल भूल जाएगा नाम तेरा 

                       वो दिन आख़िरी होगा ज़िन्दगी का मेरा।


देखो आसमान को छूती हुई पहाड़ियाँ 

और धीरे धीरे रेंगती हुई ये पगडण्डियाँ 

चढ़ने में उज़्र नहीं, ग़र मिले दीदार तेरा

चढ़ने में उज़्र नहीं, ग़र मिले दीदार तेरा 

                          जिस दिन दिल भूल जाएगा नाम तेरा 

                          वो दिन आख़िरी होगा ज़िन्दगी का मेरा।


उज़्र = एतिराज़। ग़र = यदि। दीदार = मुलाकात।

क़दमबोस = आदर पूर्वक चरण स्पर्श करने वाला।


क़दमबोस 

अजित सम्बोधि 

Tuesday, August 18, 2026

महकती अरावली

ख़ुशनुमा यहाँ का जंगल है 

हर तरफ़ यहाँ पर मंगल है 

सब कुछ  कितना सुन्दर है 

नहीं  यहाँ  कोई  दंगल   है।


इधर लोकियाँ लटक रहीं हैं 

उधर  शरीफ़े  महक   रहे  हैं 

केले नहीं अकेले, हैं अलबेले 

गुच्छे  बन  बन  ललक रहे  हैं।


हर तरफ़ पहाड़ियाँ  बिखरी हैं 

और   आसमान  में  छितरी हैं 

दिलवाली,  सबको बुलाती हैं 

प्यार में  ख़ुद भी  थिरकती  हैं।


करुणामय   धरती  दीप्त  यहाँ 

आकाश भी रहता सु-नील यहाँ  

मन को हर्षाती  हरियाली  यहाँ 

फ़िर क्यों न लगे  मन मेरा  यहाँ। 


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि

Friday, August 14, 2026

लख़्त ए जिगर

 जिससे दिल मिला था वो चला गया साहब 

अब बेदिली से यहाँ पे रहने का क्या मतलब?


क्या करूँगा मैं ज़माने भर की ख़ुशियाँ पाकर 

मुझे पता है वो न आयेगा अब कभी लौट कर।


हाँ, बख़ूबी जानता हूँ मैं होश में रहने का जुनून 

सब्र जब टूटता है होश रखना होता नामुमकिन।


क्या करूँगा इस दुनिया से मुख़ातिब होकर फ़िर 

उसका सलीक़ा तो न लौट के आयेगा कभी फ़िर।


बहुत कुछ दफ़्न है अंदर फ़िर भी मुस्कुरा देता हूँ 

आँसू बन के टपके, उससे पहिले मुस्कुरा देता हूँ।

 

हक़ीक़त को तो रेत की तरह उड़ा नहीं सकता हूँ

हाँ, ख़ामोशी की एक रिदा ज़रूर उढ़ा सकता हूँ।


मेरी खामोशी को समझना, मुश्किल बात नहीं है 

मेरी ज़ुबान में बोलिये, मुझे बोलने में उज़्र नहीं है।


मैं भी तो वक़्त का पाबंद हूँ, ढल जाऊँगा एक दिन 

ये हक़ीक़त है, इसे बख़ूबी याद रखता हूँ, हर दिन!


बेदिली = बेमन।जुनून = लगन।नामुमकिन = असंभव।

मुख़ातिब = मुँह सामने बात करना।रिदा = चादर।उज़्र = आपत्ति।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Wednesday, August 12, 2026

हरियाली अमावस्या।

ये  हरियाली  अमावस्या  है 

पीपल  पूजन ही  तपस्या है 

मत  घबराना  बिल्कुल  भी 

दूर  भागेगी  हर  समस्या  है!


ये सावन  की अति  प्यारी है 

और शिव की राज दुलारी है 

बीच  खड़ी   भरे   सावन   में 

चहुँ  और  छटा  में  न्यारी  है!


हर  ओर  झुकी  हरियाली  है 

हर  तरफ़   छटा  मतवाली  है 

सावन  की  फुहारें   झरती  हैं 

कोयल  की  गूँज  निराली  है!


घनघोर   घटा  घिर   आई  है 

मन-मोरनी   नाचने   आई   है

हर  शाख़   बनी  रक़्क़ासा  है 

क़िस्मत  की   देखो  दुहाई  है!


दिन बना   था आज सुरमई  है 

और  शाम  हो रही  कोकई  है 

मै  सुनता  गुंजन  मधुर   मधुर 

और  समाँ  हो  गया  गौनई  है।


रक़्क़ासा = dancer. दुहाई = पुकार।

सुरमई = सलेटी।कोकई = लालिमा मय।

गौनई = संगीत मय।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Tuesday, August 4, 2026

कुरजाँ

रिमझिम  की  बहारें  हैं 

पानी   की   फुहारें    हैं 

आसमान  में देखो देखो 

कुरजाँ  की   कतारें   हैं।


ये  दूर  देश  से  आईं  हैं 

पंखों   के  बल  आईं  हैं 

आसमान में उड़ उड़ कर 

खुशियाँ  लेकर  आईं  हैं!


खींचन गाँव खींच के लाया 

साइबेरिया से उनको लाया 

खींचन का ये  प्यारा रिश्ता 

कुरजाँ को भी ख़ूब सुहाया।


हर बरस  यहाँ वो आती हैं 

छह महीने रुक के जाती हैं 

उड़ उड़ कर पंख दिखाती हैं 

किलक किलक कर गाती हैं।


कुरजाँ = demoiselle cranes.

खींचन = राजस्थान में जैसलमेर जिले का गाँव।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Friday, July 31, 2026

क्यों ख़ुद को तुझ पे मिटा न दूँ?

ये ज़िन्दगी मुझे बख़्श दी 

मैं क्यों न रब को दाद दूँ?

कोई मुस्कुरा के बोल दे

मैं क्यों न खुशियाँ बाँट दूँ?

सावन की झड़ी देख के 

मन करता झूले डाल दूँ?

तुम झूलना झूला करो 

मैं क्यों न तुमको पेंग दूँ?

वो उड़ के आईं बुलबुलें 

मैं क्यों न इनको पनाह दूँ?

ये  अपनापन  दर्शा  रहीं 

दानों की कुछ सौगात दूँ।

पूनम का चाँद खिल उठा 

नौशाद हो, कहो बोल दूँ?

ऐ ज़िन्दगी, तूने सब कुछ दिया 

क्यों ख़ुदको तुझपे मिटा न दूँ?


रब = ईश।दाद = सराहना।नौशाद = सुन्दर।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Sunday, July 26, 2026

जुगलबंदी

                        ,  [1]


नफ़रत से अनजान बस, मोहब्बत का सुकून चाहिये 

न मज़हब, न जात, न वतन, एक अदद इंसान चाहिये।


जब परिन्दे सरहदें पार करते हैं, क्या वतन बताते हैं 

जब बादल गरजते आते हैं, क्या मज़हब बखानते है।


इन्सान को ही इतना नाकारा क्यों बना दिया गया है 

उसके ख़िलाफ़ नाइन्साफ़ी को जायज़ किया गया है।


क़ुदरत ने तो बख़्शी हें इतनी इनायतें वो भी मुफ़्त में 

इन्सान कैसे कंजूस हो गया, इतनी सारी इफ़रात में।


उसने तो हवा पानी ज़मीन सूरज सब मुफ्त में दिये हैं 

आपकी ग़लतफ़हमी ने सोचिये कितने उत्पात किये हैं? 


आपने क्या बनाया है जो हक़ की बात किया करते हैं 

सोचिये क्या आप घास का एक पत्ता भी बना सकते हैं? 

 

नाकारा = निकम्मा।इनायत= कृपा।. इफ़रात = बहुतायत।

 ग़लतफ़हमी = भ्रम।


                              .[2]


उम्मीद है कि फ़ासला कम कर देती है 

मगर ग़लतफ़हमी दूरियाँ बढ़ा देती है।


इस ज़ुबान को कभी हल्के में मत ले लेना 

कभी कभी इसमें पड़ जाता है लेने का देना।


ये हल्की है मगर कभी भारी पड़ सकती है 

क्योंकि कही बात वापस नहीं आ सकती है।


साथ निभाने के लिये सावधानियाँ दरकार है 

मगर जुदा होने में एक ग़लती भी असरदार है।


आप अपना किरदार बखूबी निभाते रहिये 

बस इस ज़ुबान को नजरंदाज मत करिये।


किरदार = role. नजरंदाज = ignore.


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Friday, July 24, 2026

ले चलो!

कहाँ से लाऊँ मैं प्यार ऐसा 
क़बूल जिसको तुम कर सको
क्या दिल में वितान है ऐसा 
बिठा के मुझको तुम ले चलो ।

मेरा जहाँ तो है बस तुम्हीं से 
तुम्हीं से बाँधा है डोर को 
अगर जो मेरी फ़िक्र है तुमको 
मुझे भी अपने संग ले चलो ।

दिखें कभी जो नम आँखें मेरी  
अर्क़ समझ लेना तुम नमी को
अगर जो आँखों में दर्द झलके 
अपना समझ के घर ले चलो ।

अगर जो कहना मुमकिन न हो
काफ़ी है जो होठों को हिला दो 
मैं मान लूँगा तुम कह रहे हो
तुम्हीं मुझे  अब घर  ले चलो ।

वितान = विस्तार।अर्क़ = पसीना।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।