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Wednesday, July 30, 2025

अरावली की वादियाँ

 ये अरावली की वादियाँ हैं 

 यहाँ वीथियाँ हैं कुंजगलियाँ हैं 

लहराती पगडंडियाँ हैं 

भूलभुलइयाँ नहीं है।

 

ऊँची ऊँची चोटियाँ हैं 

भेड़ें हैं भेड़वालियाँ हैं 

छोटी छोटी मींगड़ियाँ हैं 

पेस्टिसाइड वाली नहीं हैं।


 ग़ुलज़मीं है रानाइयाँ हैं 

 कलियाँ हैं फुलझड़ियाँ हैं 

 अन्ना हैं पॉलीअन्ना हैं 

दोनों की गलबहियाँ हैं।


 ये सावन की फुहारें हैं 

कुछ मचलती बहारें हैं 

मेरी नज़रों के नज़ारे हैं 

पसन्द आयें तो सबके हैं।


 ग़ुलज़मीं = फूलों की क्यारियाँ।

रानाइयाँ = सजावटें।अन्ना = शालीनता।

 पॉलीअन्ना = ख़ुशमिजाज़  वाली।


 ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Sunday, July 20, 2025

अरावली की वादियों में फ़िर से दस्तक

पहले भी यहाँ आया, कुछ  ख़्वाब यहीं  भूल  गया 

आज उनसे रूबरू होने  को, मैं  फ़िर  से  आ गया।

 

ये कचनार का पेड़, मेरा गवाह 

ये वहीं खड़ा है, रस्ते पे निगाह 

  मानता है मुझको  अपना ही 

इसीलिए  रखता है  मेरी चाह।


ये वादियाँ हैं या कोई साज़ है 

इन वादियों में मेरी आवाज़ है 

 मैं प्यार से आवाज़ लगाता हूँ 

ये  करने  लगती  रियाज़  है।


वो आसमान देखिए क्या कर रहा 

मुझे अपने आगोश में लिए ले रहा 

इतना प्यार तो किसी ने नहीं दिया 

जितना  ये  बयाबान मुझे   दे रहा।


आज क्या आगया मैं यहाँ फ़िर से 

 लगता है सारे सावन लौटे फ़िर से 

 सोचिए ज़िन्दगी में ग़र सावन न हो 

क्या मतलब है जनम  लूँ मैं फ़िर से।


मैं बरबख़्त हूँ मेरा ख़ैरख़्वाह मुझे लेके यहाँ आ गया 

रब का ममनून हूँ वो मेरा हमदम बनके यहाँ आ गया।


 रूबरू = आमने सामने।रियाज़ = practice. 

आग़ोश = embrace. बयाबान = जंगल। 

बरबख्त = fortunate.ख़ैरख़्वाह = भला चाहने वाला।

 रब = ईश्वर।ममनून = thankful. हमदम =दोस्त।


ओम शान्ति: 

अजित सम्बोधि 

Friday, July 18, 2025

मनभावन है ये सावन

सावन  को दिल दे दिया, सावन ने दिल दे दिया 

 मौका मुहब्बत का हमें, फ़िर मौसम ने दे दिया।


ये सौदा बुरा नहीं है 

कोई ख़फ़ा नहीं है 

बेहद तपिश थी गो 

नतीजा बुरा नहीं है 

ये राज़े मुहब्बत है आ आ के बचा दिया 

 दस्तूरे फ़लसफ़ा ने किरदार निभा दिया।


 बैठा था कब से ग़मगीन  

अश्कों के  सागर में लीन 

 बारिश की झड़ी लगाकर 

  आब ए चश्म उठा लिया 

मनभावन है ये सावन, मैंने दीदार कर लिया 

जो तसव्वुर में था  मेरे, रूबरू  कर  लिया।


 ये सावन बड़ा आला 

जैसे पूरा भरा प्याला 

गरमी से  देता राहत 

जैसे भूखे को निवाला 

बादल को मुहब्बत है, ज़मीं को भिगो गया 

सावन को मुहब्बत है, फ़िर मिलने आ गया।

  

गो = यद्यपि। किरदार = role. आब ए चश्म = आँसू।

  दीदार = दर्शन। तसव्वुर = कल्पना। रूबरू = सामने।


 ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Saturday, July 12, 2025

सावन आ गया

सावन का महीना आगया, झूलों का मौसम आगया 

ज़मींन महकने लग गई, आसमान चहकने लग गया।


सावन की बहारें आ गईं 

 गुमनाम बहारें  छा गई 

 बौछारों की झड़ियाँ लग गईं 

 फुहारों की लड़ियाँ झूल गईं 

पेड़ों पे निखार आ गया, रंगत में उछाल आ गया 

 पत्तों में खुमार आ गया, फूलों पे शबाब आ गया।


शम्स का तेवर  पलट गया 

हवा का मिज़ाज बदल गया 

गुलशन जो सूख चला था 

दुलहन के जैसा सज गया 

 बादल का ढंग बदल गया, घटा बनके आ गया 

मौसम जो बदरंग था, रूमानी बन के आ गया।


 अम्बर में परिन्दे छा गये 

 फ़िज़ाएँ बदलने आ गये 

सुनसान  पड़ी हवाओं में 

चहचहाहट ले के आ गये 

 सावन क्या आ गया,  नया मज़मून लेके आ गया 

 हर इन्सान के चेहरे की, इबारत बदलने आ गया।


 गुमनाम = unknown. ख़ुमार = intoxication.

 शबाब = तरुणाई। शम्स =  सूरज। गुलशन = चमन।

रूमानी = romantic.  मज़मून = मूल लेख, मुख्य बात।

इबारत = इमला, script.


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Thursday, July 10, 2025

गुरु पूर्णिमा 2025

मैं सोया करा रात भर, तुम साँस ढोया करे रात भर 

कौन करेगा प्यार इतना तुमने किया है जैसा उम्र भर।

तुम्ही मेरा दाता 

तुम्ही हो नियंता 

तुम्ही मेरे करता 

 तुम्ही भवितव्यता 

हर सुबह सूरज बनके उठाते रहे, अपने अंक में भर 

 कौन है सिवाय तुम्हारे ऐसा मददगार , हे विश्वम्भर।


तुम्ही हो मेरे रहबर 

तुम्ही हो मेरे दिलबर 

मैं रहता रहा बेख़बर 

तुम रहे सदा ही मोतबर 

मैं जो फ़क़ीर हूँ, क्या करूँ तुम पर  मैं निछावर 

एक तेरे नाम के सिवा कुछ नहीं पास, हे गुरुवर।


बना  दो मुझे बे-ज़रर 

करदो मुझे मुक़र्रर 

अपना नामाबर 

भेज  दो मुझे दिसावर  

ये जिस्म तुमने दिया, बना दो इसे  यायावर 

बख़्श दो ऐसा हुनर, गूँजता फिरूँ बनके भँवर।


रहबर = राह दिखाने वाला।दिलबर = प्रिय।

मोतबर = भरोसेमंद।बे-ज़रर = बुरा करने में अक्षम।

 मुकर्रर = नियुक्त।नामाबर = डाकिया।

दिसावर =  परदेस।यायावर = ख़ानाबदोश।


ओम  जगतगुरूं नमामि 

अजित सम्बोधि 

Saturday, June 21, 2025

योग दिवस 2025

कहते हैं  आज योग दिवस है 

भला इसमें क्या असमंजस है 

योग एक ऐसा पूर्ण  विधान है

जो दायमी है, बेहद मुकद्दस है।


योग तो एक शाश्वत विधा है 

जो दूर कर देती हर दुविधा है 

जिस्म को  रूह से मिलाने की 

सभी को उपलब्ध ये सुविधा है।


हर दिवस ही योग दिवस है 

सबके लिए ही ये सरबस है 

जिन्हें रूह से रूबरू होना है 

उनके लिए  अहम ढाढ़स है।


योग का अर्थ  होता है  जोड़ना 

ज़रूरी है इस बात को समझना 

एक रास्ता जो रूह तक जाता है 

योग से है उस रास्ते को खोजना।


दायम = eternal. मुकद्दस = पवित्र।

सरबस = सर्वस्व। रूबरू = सन्मुख।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 


Thursday, June 12, 2025

मेरा चाँद और मैं

आसमान साफ़ था 

सामने चाँद था 

मध्य रात्रि का वक़्त था 

शायद दूसरा पहर था 

 चाँद में सुहास था 

मौसम में सुवास था 

 कुछ ऐसा एहसास था 

बल्कि पूरा विश्वास था 

पक्षी का परिहास था 

 श्वास निश्वास था 

हवा बह रही थी 

और कह रही थी 

मिलने का यही 

तो वक़्त है सही 

चलो एक गीत गुनगुना लें

कुछ पुरानी यादें दुहरा लें 

जब भी हम मिले थे 

हम दोनो अकेले थे 

भीड़ भाड़ से अलग 

उखाड़ पछाड़ से अलग 

 चाहे भीड़ हो 

या भाड़ हो 

दोनों में क्या फ़र्क़ है 

दोनों ही ज़र्कबर्क हें 

भाड़ में भभकते हें 

भीड़ में  भोंकते हें 

यहाँ सुकूत था 

आसमाँ अभिभूत था 

मौसम का मज़मून था 

चाँद का जुनून था 

शोशा अफ़लातून था ?

 नहीं, सब पुरसुकून था!

 चाँद गोलमोल था 

पूरा सुडोल था 

करता कलोल था 

अमोल था अनमोल था।


ज़र्कबर्क = तड़क भड़क। सुकूत = शान्त।

मज़मून = लेख। जुनून = गहरी रुचि।

 शोशा = चुटकुला। अफ़लातून = Plato.

 पुर सुकून = चैन से भरपूर।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि।

Tuesday, June 3, 2025

दिखते हो तुम

 ये ना समझना मैं चला जाऊँगा 

मैं  तुमको  तुम्हीं  से ले के रहूँगा 

चला हूँ मैं अब तक जितने क़दम

आसमाँ ने देखा किया दम ब दम

पर आसमाँ से अलग हो क्या तुम?

 जिधर देखो उधर दिखते हो तुम!


तुम्हारे  जैसा अलबेला  तो  हूँ नहीं 

सबको पसन्द आऊँ नवेला भी नहीं 

दिखने  में तो अकेला ही दिखता हूँ 

 लुकाछिपी में  ऐसा ही  दिखता हूँ 

 किसी को कैसे बताऊँ कैसे हो तुम 

हर पल निराले रंग में दिखते हो तुम!


पूछते हो कि मैं क्या किया करता हूँ?

तो मैं बताऊँ कि मैं इबादत करता हूँ 

अक्सर तो फ़रियाद किया करता हूँ 

कभी कभी मैं रोने भी लगा करता हूँ 

मैं कहता हूँ कि मैं रो रहा हूँ और तुम 

सिर्फ़ सिर्फ़ मुस्कराते दिखते हो तुम।


 ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Thursday, May 29, 2025

I say be a songster!

You are a  prankster 

You   are   a  funster 

Sometimes a punster 

I  say  be  a  songster!


I wish I were merry 

But  I  am  so  sorry.

You  Humpty Dumpty

Please be  hunky dory!


Why  are  we   here?

Who  is  happy here?

Do you hear our sighs?

Have you  ears to hear?


Why are you in hiding?

Our time we are biding 

& what  are you  doing?

You  keep   on   chiding!


I have been to whirls

I have been  to twirls 

But I am just helpless 

After all those  swirls!


Yes I mean  luminous

Lambent and lustrous. 

All tunnels & channels

Glorious  and obvious!


I  am  at  the  fag  end 

With nil on each hand.

Can you  come  to  me 

For    a    shake    hand?


every moment yours

ajit sambodhi 

Saturday, May 17, 2025

All happens with his nod!

Whether  it is good  or bad 

Whether one is jolly or sad

Whether  it is  hot or cold 

Whether it’s silver or gold 

Whether it is odd or mod 

All happens with his nod!


Whether it is  right or wrong

Whether it’s jingle or a song

Whether it’s soulful or doleful

Whether it is cupful or half full 

Whether it’s awed or lot of sod

All   happens    with   his   nod!


Nothing ever  goes  against you

Good & bad happen to help you 

It mayn’t look immediately good 

It’s going  to be  ultimately good

Didn’t you fall while you trod?

All   happens   with   his   nod!


Always be  full of gratitude

Gratitude is just pulchritude

Even in  times  of  turpitude 

Gratitude is full of beatitude

Whatever comes, learn to nod

All   happens   with   his   nod!


Om Shantih 

ajit sambodhi 

Tuesday, May 13, 2025

शामे ग़म

 देख  कर के  ये हालत मेरी 

कहीं तेरा दिल न दुखने लगे

 मुझे डर है ए आसमाँ ये कि 

किसी दिन तू भी रोने न लगे।

          अब कैसे सम्हालूँ ख़ुद को कोई तो ये बता दे 

           इन ग़मों के दरमियाँ मुझे मुस्कुराना सिखा दे।


अब देखो न किस  तरह से ये 

शाम ए ग़म सिमटता  ही नहीं 

हर  तरफ़  छाया  अँधेरा घना 

दिया जलता कहीं दिखता नहीं।

          क्या कुछ जियादह माँग रहा हूँ तू ये बता दे 

          यही तो कह रहा हूँ मुझे कुछ रोशनी दिला दे।


मेरे  ऊपर  थोड़ा ये  करम करदे 

ग़म से ग़म को मिटाना सिखा दे 

या लपेट के मुझे अपने दामन में 

इन ग़मों को  मुस्कुराना सिखा दे

          मैं जानता हूँ तेरी फ़ितरत तू कुछ भी कर दे 

          तो फ़िर पहिले मेरी ख़ुदी को ही तू मिटा दे।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Sunday, May 4, 2025

मैंने तुमको पहचान लिया है

मैं गिर रहा था किसने थामा था मुझे?

अपना समझ किसने उठाया था मुझे?

मानोगे नहीं कि तुम थे वहाँ पे, पर मैं 

अजनबी था तो कैसे पहचाना था मुझे?


वो कैसी आतिशबाज़ियाँ हो रही थीं?

वो कैसी  फुलझड़ियाँ  बरस रहीं थीं?

कभी सब्झ, गुलरू तो कभी नीलफ़ाम 

सब मुझ से  लिपटे  चली जा रहीं थीं?


हाँ अब  मैंने  तुमको  समझ  लिया है 

सच कहूँ तो मैंने तुमको  देख लिया है 

तुम कितना भी भरमाया करो मुझको 

मैंने तुमको  बख़ूबी  पहचान लिया है!


सब्ज़ = हरी। गुलरू = पुष्पमुखी।नीलफ़ाम = नील वर्ण।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Tuesday, April 29, 2025

रोशन करता चलूँ!

 मैं अँधेरों को  रोशन करता चलूँ 

मुश्किलों को हरदम थकाता चलूँ 

 ज़िद है मेरी कि मैं सम्हल के चलूँ 

ख़ुद ब ख़ुद ख़ुदको, मिटाता  चलूँ!


 सितारों से  कदम  मिलाता चलूँ 

 शाख़ को गुलों  से सजाता  चलूँ 

हर  शै  को  हरदम  निभाता  चलूँ 

हर आह को  इबादत  बनाता चलूँ!


 ख्वाबों को ख्वाबों से जुटाता चलूँ 

 ठोकरों को लबों से पुचकारता चलूँ 

इसको किस्मत कहूँ या तेरी क़ुर्बत 

तेरे ही सपनों से सपने  बुनता चलूँ!


 खुदको = अहं को।  गुल = फूल।

शै = चीज़, स्थिति। इबादत = पूजा।

लबों = होठों। क़ुर्बत = निकटता।


 ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Saturday, April 26, 2025

welcome to the rising sun!

Ever  welcomed  the rising  sun?

It’s not only early morning  fun!

It’s an extravaganza, to observe 

Fear, stress & anger, on the run! 


When the  sun pours  its treasure

Into you, in such  great  measure!

Every pilferer receives a  big jolt 

Rushes pell-mell, quitting leisure!


Your body gleams, sterling  pure!

Full of  all the  things that assure!

Body attains to highest vibrations!

Love compassion gratitude endure!


Om Shantih 

ajit sambodhi 

Monday, April 21, 2025

God Nods!

          GOD  NODS

You breathe in  when  he nods

You breathe out when he nods

You go to sleep when you will 

But he doesn’t  forget his nods!


Raise your hand to drink water 

Or to wipe  when you  perspire 

Don’t forget,  without his  nods

Nothing  is  going   to  transpire!


Things  happen  when  he   nods

Things  happen  when  god  nods

Never  forget  to  offer  gratitude 

You are alive because of his nods!


Om Shantih 

ajit sambodhi 

Saturday, April 12, 2025

मुझे ऐसी रूखसती चाहिए

 मेरे  जाने  पे  न  मातम  मनाना 

कुदरत का दस्तूर है आना जाना।

ये हक़ीक़त है इसे भूल मत जाना 

जाये बिना फ़िर कैसे होगा आना?


 मेरा  मज़हब  है  गले  से  लगाना 

 मेरी  फ़ितरत  है  तस्लीम  करना।

मैं बादल हूँ, मेरा निशाँ  मत ढूँढना 

हो  सके  तो  बस  ख़ामोश  रहना।


मेरे  जाने  पे   न   मरसिया   गाना 

 न  अपनों   को  नाहक  में रुलाना।

 ये   कारवाँ   यूँ  ही  चलता  रहेगा 

न   गुज़रे  ज़माने  पे  आँसू   बहाना।


मेरे  जाने  को   मुक़द्दस  ही   रखना 

 मुझे   हुज्जूम   से   दूर   ही   रखना।

मैं    भीड़    का    इन्सान    नहीं    हूँ 

चुनिन्दा  नज़रों   से  रुख़सत   करना।


 मेरी  राख   को   न  दरिया  में  बहाना 

बहर ए नूर में नहाता हूँ  ये  याद  रखना।

 ये  जिस्म  क्या  है?  ख़ाक  ही  तो  है? 

जब  ख़ाक  है तो  सुपुर्द ए ख़ाक करना।


मुझे रस्मों, रवाज़ों की, आवाज़ न बनाना 

ये तीया, बारवाँ जैसी रूढ़ियाँ, न निभाना।

मेरी बारात में मेरे समेत कुल नौ इन्सान थे 

आख़िरी दफ़ा भी मुझे मेरे माफ़िक़, रखना।


 सफ़र   पे  निकलना   है,  तय्यार  हूँ  मैं 

वक़्त  की  पेशगोई  को,  पहचानता हूँ मैं।

 सभी  को  गुज़रना  है   इस  रहगुज़र  से 

है  ये कुदरत  का  दस्तूर,  वाक़िफ़  हूँ  मैं।


 सभी   को   अलविदा   कह   रहा  हूँ   मैं 

तहे दिल से शुकराना  अता कर  रहा हूँ मैं 

ये   ज़िन्दगानी   तो   नेमत   है    रब   की 

रब   को  भी   तस्लीम   कर   रहा   हूँ  मैं।


फ़ितरत = प्रकृति। तस्लीम = प्रणाम।

मरसिया = शोक गीत। मुक़द्दस = पवित्र।

हुज्जूम = भीड़। चुनिन्दा = चुनी हुई।

बहर ए नूर = प्रकाश का समुद्र।प्रकाश की गंगा

में रोज़ नहाता हूँ ।गंगा में राख बहाने मत जाना।

मुझे कर्म कांड बिल्कुल नहीं भाते।

सुपुर्द ए ख़ाक = मेरी राख़ तुलसी में डाल देना।

पेशगोई = क्या होना है उसे पहचान लेना।

रहगुज़र = रास्ता। अता = देना। नेमत = gift.

ये आख़िरी ख्वाहिशें हैं। पूरा करना फ़र्ज़ बनता है।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि।

Friday, March 28, 2025

वही 22 मार्च

 हाँ वही 22 मार्च 

जब मेरा रहबर  चला गया 

रहगुज़र   सूना   रह   गया।


 तुम जो न मिलते गीत न मिलते 

फूल  ये  मन  के, कैसे  खिलते 

बिन   गाये   ही   मैं   रह   जाता 

तुम  जो  न  आके  यूँ  मुसकाते।

 

तुम जो न मिलते ख़्वाब न मिलते 

तन्हा   दिन   मेरे,    कैसे    कटते 

आँखे      सूनी      सूनी      रहतीं

तुम    जो   मेरे    पास   न    होते।


 तुम जो  न  मिलते  दर्द न  खुलते 

अनजाने      में      अन्दर     घुटते 

जीवन      मेरा      बंजर      रहता 

अपना सलीका न तुम जो सिखाते।


रहबर = रास्ता दिखाने वाला।

रहगुज़र = रास्ता।


भूली बिसरी यादें 

अजित सम्बोधि

Friday, March 14, 2025

Holi is Holy

 Holi is just another name for fun

No festival displays  so much fun

It’s  open  for  all, young  and  old

Even a child  enjoys  the  holi  gun.


People open their arms ‘n’ embrace 

They bury dead past, leave no trace. 

A   pinch  of   red  is  all  the  charm

They anoint the other  with so grace.


I wish  everybody, the  funniest  Holi

Holi is, as the name sings, really holy

Play it with  bright and fragrant abeer

Its aroma is lilting, shall make ye jolly!


Wish everyone happy and aromatic Holi

Ajit Sambodhi

होली मिलन

 मौसम ने लेली करवट, खुशियाँ मना रहे हें 

जिसको हें कहते होली, वो  हम  मना  रहे हें।


कलियाँ हें मुस्कुराती, भँवर  गीत  गा  रहे  हें 

किलकारियाँ जम गई थीं, अब सुन पा रहे हें।


आसमाँ झुकने लगा है, तारे खिलखिला रहे हैं 

 रातों की ये मुसालमत, फ़िर से देख  पा रहे हें।


किसलय हें फूटते जब, होली का  होता  आना 

अंकुर उकरते  मन में, अपनों  का  होता  आना।


होली मिलन का सपना, हर  कोई  देखा  करता 

मिलते  हैं  रूँठे  कैसे, नज़ारा  भी  देखा  करता।


तासीर ए गुलाल ऐसी, हर कोई  हँसने  लगता 

खुशबू ए अबीर ऐसी, हर कोई महकने लगता।


सुनसान फ़लक के नीचे, हूँ  रहता  तन्हाई में मैं 

मन  के  इक  कोने  में बसाके, रखता  होली  मैं।


मुसालमत = सन्धि करना जैसे तारों ने करी हुई है।

किसलय = नये पत्ते। तासीर ए गुलाल = गुलाल 

की प्रक्रति। ख़ुशबू ए अबीर = अबीर की ख़ुशबू।

फ़लक = आसमान। तन्हाई = अकेलापन।


सभी को होली की शुभकामनाएँ 

अजित सम्बोधि 

Wednesday, March 5, 2025

A Cascade of Colours!

When you close your eyes, what do you see?

Most likely it’s a dark curtain that you’ll see.

Dark is black and  black has  zero  frequency 

Yes black is dead. It possesses  zero vibrancy.


Black is wed to dead and dead to  being glad

Got to pull back the curtain, if you aren’t mad.

The only  way out is to work  on your chakras

Turn on the chakras if you don’t want to be sad.


The first chakra is red like it is  the rising sun

It sits at the bottom with lot of strength to stun!

When you need an extra force it stands by you

It is called muladhar and helps in the long run.


The second chakra is orange like it’s orange sun

It helps in extending  your presence, just for fun!

It’s called swadisthan that translates established

In the self. Yes, self not Self! Remember the pun!


The third chakra is yellowish like the fading moon 

It fosters haste, doing everything speedily and soon.

It’s manipur sitting  at the top  of the  lowest  region

In matters of nagmani, bullies make two-bits  croon.


We are at the limits of the familiar, the physical region

Hardly anyone tries to peep into the adjoining domain 

Some day you do come across a soul straining its neck.

The lucky one is stunned locating the lush green region!


This is the terrain of anahat, the heart of unstruck sound 

The physical is ended; the metaphysical takes the ground. 

Now the rules of the game change to navigate you further 

So that one morn you might coo with the soundless sound!


Yes you have reached the vishudh chakra to get purified 

Its krishna blue enjoins on ajna chakra you aren’t denied 

Assent to enter into the  realms of your  loved destination 

Wherein, oceans of lights wait for you  to  get  sanctified!


Ya, this is sahasrar where blaze lights of the thousand suns

The blaze allows no colouration. Pure white is what it guns.

It’s not hot, dazzling it is, your ego gets dissolved for good.

When you come out you are a different breed: son  of  suns!


self = common notation for ego.

Self = it’s used for soul.

nagmani = it’s symbolic of dubious desires.


Om Shantih 

Ajit Sambodhi