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Friday, April 30, 2021

ये रिश्ता

मेरा उनका रिश्ता है क्या
दिलों के सिवा कोई जानेगा क्या
जन्मों से जो चला आ रहा
अब जाके वो बदलेगा क्या?

उन्होंने ही माना था सब कुछ मुझे
उन्होंने ही पहिचान दी थी मुझे
मैं तो अकेला गुमसुम सा था
उन्होंने ही मुस्कान दी थी मुझे।
अचानक ही अब ये क्या हो गया
ज़माने ने बदली है रफ़्तार क्या?

उनका जो साथ मुझको न मिलता
मुश्किल में हाथ मुझको न मिलता
अकेला कहाँ तक मैं ज़ुल्मत को सहता
उनका सहारा जो मुझको न मिलता।
लाकर यहाँ तक क्यों छोड़ा मुझको
मुझको बता दो मेरी ख़ता क्या?

सौंपूँ मैं ख़ुद को हाथों में तेरे
उनके ही अल्फ़ाज़ मैं कह रहा हूँ 
मुझको ज़रूरत है हरदम तुम्हारी
अपने ही अल्फ़ाज़ दुहरा रहा हूँ।
कहीं ऐसा ना हो रब ही ये पूँछे
रज़ा उससे पहले ले ली थी क्या?

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, April 29, 2021

दिखता नहीं है

वही सितारा, वही नज़ारा, पहले जैसा दिखता नहीं है
नज़र का फ़र्क़ है या कुछ और है वैसा दिखता नहीं है।

यह आँखों के आगे जो पर्दा रहता है एक, शबनमी
यह धुंधे गर्द है या कुछ और है, वैसा दिखता नहीं है।

चाँद तो अब भी चमकता है, अपने उसी हिसाब से
मगर कुछ था उसमें जो अब, वैसा दिखता नहीं है।

वो शाम, वो गुफ़्तगू, वो अफ़साने और सरगोशियाँ !
शाम तो अब भी आती है, बाकी वैसा दिखता नहीं है।

ज़िन्दगी तो अब भी गुज़र जाती है, अपनी रफ़्तार से
मगर ज़िन्दादिली का नुक़्ता, अब वैसा दिखता नहीं है।

शबनमी=जालीदार। गुफ़्तगू=बातचीत। अफ़साने=किस्से।
सरगोशियाँ = मुँह को कान के पास लाकर बात करना।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Tuesday, April 27, 2021

हुआ करे

आज बद्र का चाँद है, वह भी चैत का, हुआ करे
सभी कहते हैं, बड़ा ख़ूबसूरत होता है, हुआ करे।

कोई इससे मेरी क़ुर्ब निकाल के ख़ुश है, हुआ करे
बक़ौले नुजूमी ये मेरी यौम ए पैदाइश है, हुआ करे।

बहुत उड़ती थीं ख़्वाहिशें हवाओं में, आसमानों में
मैंने उनके पर कतर दिए हैं, नाराज़ हैं, हुआ करें।

बहुत कुछ होता रहता है यहाँ, हर वक्त, हुआ करे
रातें अगरचे  तवील वा ख़ुर्द  होती हैं , हुआ  करें।

हाथ की लकीरें भी बोलती हैं, ऐसा लोग कहते हैं
आँखें भी राज़ छुपाने में माहिर होती हैं, हुआ करें।

बेताब रहते थे सुनने सुनाने को, अफ़साने, हरदम
मुहब्बत करने में भी तक़लीफ़ होती है, हुआ करे।

रूठना ज़रूरी है शायद, मन तरसता है कई बार
मनाने वाला तो है नहीं, हश्र जो होगा, हुआ करे।

यहाँ तो अना की भी जंग न थी, मगर जुदाई हो गई
हाँ मौत ने यह बता दिया वो क्या चीज़ है, हुआ करे।

बद्र=पूनम का चाँद। क़ुर्ब=नज़दीकी रिश्ता।
बकौले नुजूमी=ज्योतिषी के मुताबिक।
यौम ए पैदाइश=सालगिरह। तवील वा ख़ुर्द= लम्बा या छोटा।
हश्र=परिणाम। अना=ego.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Friday, April 23, 2021

देखा करता हूँ!

सहर से शम्मा जलने तक मुसल्सल देखा करता हूँ 
कभी ख़ुद की, कभी उसकी, फ़िज़ा देखा करता हूँ।

है अजब, मगर यह दौर, भी, मैं, आज़माया करता हूँ 
मेरे ख़्वाबों को नया जामा, पहनाकर, देखा करता हूँ।

थोड़ी दूर तक, चलकर साथ, बराबर देखा करता हूँ 
वो नहीं,  अफ़वाह, चेहरों पे चिपकी, देखा करता हूँ ।

हर सिम्त की जानिब, वही तस्वीर, मैं, देखा करता हूँ 
हवा से पूछ कर, फ़िर उसको उड़ाकर, देखा करता हूँ ।

ऐ आसमाँ तू तो गवाह है, हर पहलू ए वाक़िआत का
क्या तू भी ऐसे देखता उसको, जैसे मैं, देखा करता हूँ ? 

सहर=सुबह।शम्मा=मोमबत्ती।मुसल्सल=लगातार।
सिम्त=दिशा।ज़ानिब=की ओर, की तरफ़।
पहलू ए वाक़ियात= घटनाक्रम का पहलू।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, April 22, 2021

सिरहाने से

तुमने कहा था, न छोड़ोगे अकेले उसे, अपने जाने से
अब क्यों हो रहे हो इतने लाचार, उसके चले जाने से।

देख, जाने से पहले उसने बहुत कुछ दे दिया है तुझको
वही सम्हालता रहेगा हरदम तुझको, हर नये फ़साने से।

न हो परीशाँ इतना तू, तौफ़ीक को मुसीबत न समझ तू
कोशिश तो कर, मान जायेगा एक दिन मन, मनाने से।

ख़ुदा ने करम कर के, बख़्शा है तुम को ऐसा नाख़ुदा
जो जाकर भी तेरे पास, आता रहता है, हर बहाने से।

कौन निभाता है साथ इतना, एक बार बिछड़ने पे ऐसे
जैसे वो तुझे हरदम, झाँकता रहता है, तेरे सिरहाने से।

तौफ़ीक= सामर्थ्य। नाख़ुदा= नाव खिवैया।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, April 19, 2021

फ़र्क़ होता नहीं है

बहुत कुछ होता यहाँ , मगर लगता कुछ होता नहीं है
दिल चाहता है बयाँ करना, ज़ुबाँ से बयाँ होता नहीं है।

सच लगता है जो यहाँ पर, वो सच मगर होता नहीं है
क्या ख़ूब खेल है ज़ुबाँ का, सच नुमाया होता नहीं है।

झूठ के पैबन्दों से रच जाता है सच्चाई का ऐसा जामा
जिसमें पैबन्दों का कोई ज़िक्र , कहीं पर होता नहीं है।

एक घर बनाने में कितनों की, सारी उम्र खप जाती है
बस्तियाँ जल जाती हैं, जलानेवाला कोई होता नहीं है।

लोग चलते पैदल हज़ार मील, कोई रोके, होता नहीं है
मंज़िल पहुचने से पहले गिरते, कोई रोदे, होता नहीं है।

भूख से तड़पते हैं लोग, मगर कहीं शोर, होता नहीं है
तस्वीरें दिखाती चमचमाता  सूरज, फ़ज्र होता नहीं है।

एक बेटे को जवान करने में एक माँ बूढ़ी हो जाती है 
बेटा ग़ायब हो जाता है, किसी को फ़र्क़ होता नहीं है।

 नुमाया = प्रकट। फ़ज्र =  अलस सुबह।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Friday, April 2, 2021

GOOD FRIDAY

"Father, forgive them", implored Jesus.
Nailed to the Cross, He thought of us;
"for they know not what they do", He
Continued in great compassion for us.

He bestowed upon us, inner awareness
By elevating our physical consciousness
To the heights of spiritual consciousness
At the crucial time of extreme hardness.

"Let thy will be done", He knelt on his knee
Knowing well, "one of you shall betray me".
He unveiled "the kingdom of God" within
Of which He happened to be the trustee.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Monday, March 29, 2021

एक किसान

एक किसान था बड़ा सरल ह्रदय
उसका घोड़ा था सुंदर हिरण्यमय
एक दिन उसका घोड़ा भाग गया
उसके पड़ोसी जो थे बड़े सहृदय।
आये जताने को उससे सहानुभूति
किसान था शान्त, बिना अनुभूति।

दूसरे दिन घोड़ा उसका लौट आया
साथ में एक घोड़ा भी लेकर आया
पड़ोसी भाग के आये, ख़ुशी जताने
बड़ा उम्दा घोड़ा है, साथी ले आया।
किसान के लिए जैसे कुछ हुआ नहीं
वह ख़ामोश रहा, कुछ बोला ही नहीं।

नया घोड़ा किसान के बेटे को भा गया
एक दिन वह उसकी पीठ पर चढ़ गया
घोड़ा उसको लेकर जंगल में भाग गया
वहाँ उसे गिरा दिया,बेटे का पैर टूट गया।
गाँव वाले फ़िर आये, भारी दुःख मनाया
किसान शाँत था,पैरपे मरहम लगा दिया।

अगले दिन कुछ सैनिक अधिकारी आये
हर घर से जवान लड़कों को उठा ले गये
किसान के बेटे का पैर टूटा हुआ देखकर
उसको वहीं छोड़कर अधिकारी चले गये।
गाँव वाले आये, बोले, तुम अच्छे बच गये
उसने कुछ न कहा और तब वो चले गये।

आगे क्या होगा, किसी को कुछ पता नहीं
अच्छा होगा अथवा बुरा, यह भी पता नहीं
वक़्त के हाथों में रहती है जीवन की चाबी
जैसे घुमाए, जो परोसे, उसको नकारें नहीं।
शान्त रहकर आगे ही आगे को चलते चलें
शान्ति से शान्ति  के सब्र को सँजोते  चलें।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, March 28, 2021

आँसू

ये जो आँखों में छलकता है पानी
न समझ लेना इसको, कोरा पानी
समझने के लिए कोई भी, कहानी
मिलेगा नहीं कहीं भी इसका सानी।
इसकी तासीर में जो होती है रवानी
सूखने पर भी बनती है एक कहानी।

हर आँसू में छिपा रहता कोई राज़ है
ज़िन्दगी से जुड़ा रहता , कोई राज़ है
ज़िन्दगी होती जो है इतनी ख़ूबसूरत
क्योंकि हर राज़ होता इसका साज़ है।
राज़ का जब टूटने लग जाता है साज़
ज़िन्दगी बनने लगती है फ़िर, नासाज़।

एक क़तरा आँसू में समन्दर , छिपा है
जहाँ की आग बुझाने का सामाँ छिपा है
जिसको कोई तूफ़ान हटा नहीं सकता
उसको बहा ले जाने का सैलाब छिपा है।
दर्द उठने पर जो आँसू छलक पड़ते हैं
वो यादों का समन्दर लिए फ़िरा करते हैं।

कुछ हैं जो आँसू बहाते नहीं,  पी जाते हैं
जब आँसू आते हैं वे होंठों से मुस्कुराते हैं
आँसू खोलते हैं राज़, वो छुपाया करते हैं
मुझको तरस आता है, वो सो नहीं पाते हैं।
आँखों में लिए फिरता हूँ मैं हर दम दरिया
प्यासा न लौटे कोई , क़िस्मत का सताया।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।





Wednesday, March 24, 2021

कश्ती

मुझको मिली थी कश्ती सुहानी
जिसकी है सुन्दर सी एक कहानी
गाँव था छोटा सा गुमसुम सा एक
जिसमें मिली थी मुझको निशानी
बाक़रीना सब होता गया, घर मेरा सफ़ीना बनता गया
ऐसा रहा कुछ तेरा करम, सफ़ीना नगीना बनता गया।

बग़ीचा था फ़िर एक हमने लगाया
खिला फूल जो भी दिल से लगाया
बख़्शीश तेरी झड़ी बन गई
भर के जी सब कोई उसमें नहाया
सहारा जो तेरा मिलता गया, तेरा नाम बहाना बनता गया
तेरे साये में मैं चलता गया, रास्ता ख़ुद ब ख़ुद बनता गया।

सरहदें पार करते चलते गये
सफ़र में आगे को बढ़ते गये
हम तो रहे बेख़बर ख़ुद से लेकिन
तेरी ख़बर उसूलन रखते गये
किनारा नज़र से दिखता रहा, सफ़र ये बराबर चलता गया
रहम था तेरा, करम था तेरा, दरिया भी साथ चलता गया।

सब कुछ सदा यकसाँ रहता नहीं
जो आज है वो कल रहता नहीं
ये दस्तूर अज़ल से चलता रहा है
यहाँ मुस्तकिल कोई रहता नहीं
कश्ती में मेरी छेद हो गया , नगीना मेरा जुदा हो गया
कश्ती यहीं पे पड़ी रह गई , नाख़ुदा मेरा बिदा हो गया।

बाक़रीना = सलीक़े से।सफ़ीना = कश्ती।बख़्शीश = gift.
उसूलन = as a rule. करम = कृपा।यकसाँ = एक जैसा।
दस्तूर = रिवाज़।अज़ल = प्रारंभ।मुस्तक़िल = स्थायी।
नाख़ुदा = कश्ती चलाने वाला।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, March 20, 2021

वादा

मिलते रहे हैं, और मिलते रहेंगे , हम आप , बार बार
मिलने बिछड़ने का सिलसिला चलता रहेगा बार बार।

हम जब मिलेंगे तो आमने सामने होंगे हम, बहुत बार 
पहिचान न सकेंगे, क़बा ए जिस्म होगा अलग हर बार 

दिल की धड़कनें खींच कर ले आयेंगी पास, बार बार
एहसास हुआ करेगा, पहिले भी मिले चुके हैं, कई बार।

बहार आती है ख़ुशी लाती है, मगर जाती भी है हर बार
आख़िरकार जो आएगा बारबार,तो जाएगा भी बार बार।

ग़म की अंधेरी रातें आती हैं तो आया करें, मर्ज़ी उनकी
रात के बाद दिन तो बिला नागा आया करेगा, हर बार।

आपकी आवाज़ सुनाई पड़ेगी मुझको, जितनी भी बार
ये वादा है मिलने की जुस्तजू करूँगा मैं, उतनी ही बार।

क़बा ए जिस्म = जिस्म की ओढ़नी।
जुस्तजू = तलाश।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, March 15, 2021

फुटकर!

जो है ना-काफ़ी, वही है काफ़ी, मेरे लिए
जो है प्राप्त, वही सब है पर्याप्त मेरे लिए
और-और बढ़ाता है कीमत बेचने के लिए
जबकि ज़ब्त बढ़ाता है सब्र, ख़ुशी के लिए।

दरख़्त ने पत्ते से कहा, मेरी बात को ग़ौर से सुनना
यहाँ एक आता एक जाता, ये हक़ीक़त पहिचानना।

पेड़ कहत है पात से , तू सुनले मेरी  बात
इस घर की रीति ये, इक आवत इक जात।

ज़िद्दी है वो , बिना बुलाए भी आएगी
आख़िर वफ़ात है, वफ़ा तो दिखाएगी।

जिस्म को तो मौत से हार जाऊँगा, अब नहीं तो फ़िर सही
ख़ुशबू के मानिंद बिखरा मिल जाऊँगा मैं , कहीं ना कहीं।

ग़म नहीं ग़र कोई मुझको दग़ा दे दे
मैं ना करूँ दगा, ऐसा करम कर दे।

वक्त को वो सभी कुछ याद है
जो कभी रही तेरी फ़रियाद है
तू फ़िक्र ना कर , रख भरोसा
काम होने की होती, मियाद है।

मैंने कहा मौत से , मैं तैयार हूं , क्या तुम भी तैयार हो?
चुप मत रहो,ये तुम्हारा इख़्तियार है,तुम मेरी मैयार हो
मुझे तुम्हारे जवाब का इंतिज़ार है , हर रोज़ , हर पहर
ताकि तुम्हारे इस्तक़बाल को मेरा , रेज़ा रेज़ा तैयार हो।

भोजन नहीं है कोई ज़रूरी
मगर है ज़रूर इक मज़बूरी
चाहता हूँ इसी जिस्म से मैं
पा जाऊँ वह जो है ज़रूरी।

सुनो मेरी ये जो अहलिया है
जिसका सादा सा हुलिया है
मैं सबको बाख़बर कर दूँ कि
वह अस्ल में एक औलिया है।

कहते हैं , हद हद चले सो औलिया
और ये कि जो अनहद चले सो पीर
हद अनहद दोऊ चले,एकल रंग रचे
सब कोई बोले कि होगा कोई फ़क़ीर।

इस मीज़ान से नापलें वो औलिया हैं, हद जो लाँघी नहीं
हद अनहद के परे का फ़क़ीर हूँ मैं , मगर लकीर का नहीं।

उठने के लिए पहिले बैठना ज़रूरी है
जैसे भरने के लिए ख़ालीपन ज़रूरी है
यह सब लाओत्से ने सिखाया था कि
आने की ख़ातिर जाना होता ज़रूरी है।

जाना लाज़िमी है, इसको मुकर्रम बनाएं
मुलाकात ए मर्ग को क्यों न ख़ुर्रम बनाएं
जिस्म के परे में जो पोशीदा बनी रहती है
उस ग़ैबी तवानाई से मौका,मुकर्रम बनाएं।

जीवन नदिया बहती जाइ, छूटे कितने पाट
एकहि रट मन में लगी, कब पाये निज घाट।

हक़ीक़त की फ़ितरत पोशीदा हुआ करती है
जैसी वह दिखती है, वैसी हुआ नहीं करती है
वह तो बोई हुई है ज़िन्दगी के हर इक धागे में
जब फ़सल कटती है,तो मालूम हुआ करती है।

हक़ीक़त के कई नाम हैं जैसे हक़,माबूद,बख़्त
एक नाम जो अक्सर सुना जाता है,वह है वक्त
वक्त आहट नहीं करता पर हुक्म देता हर वक्त
अपील नहीं है, होता कभी मीठा कभी करख़्त।

ज़िन्दगी तो गुज़ार दूँगा पर तुम होते तो कुछ ऐसा होता
जैसे तड़पती धरती पे बारिश होने से हाल उसका होता।

तुम अगर जाते हो, ठीक है, पर इतना तो करना
साँस के मानिंद जा कर, फ़िर लौट आया करना।

मुझे क्या चाहिए तुम्हारी याद के सिवा
एक एक लफ़्ज़ याद है जो बना सिला।

क्यों ग़म करूँ अगर छोड़ते हो मुझको ?
जो दे दिया है वही सम्हाल लेगा मुझको।

वफ़ात= मौत। मैयार= कसौटी।
इस्तक़बाल= स्वागत।रेज़ा रेज़ा= कण कण।
अहलिया= जीवन संगिनी।मीज़ान= तराज़ू।
मुकर्रम= पूज्य।मर्ग = मौत।ख़ुर्रम= ख़ुश।
ग़ैबी= पार लौकिक।तवानाई= ताक़त।
पोशीदा= छिपी हुई।हक़=रब।माबूद= पूज्य।
बख़्त= भाग्य।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, March 8, 2021

मुसाफ़िरख़ाना

जो मुसाफ़रत करता है, उसको मुसाफ़िर कहते हैं
जो सफ़र में साथ रहता है, उसे हमसफ़र कहते हैं
जो रहगुज़र पे मिलता है, उसको राहगीर कहते हैं
मगर जिससे दिल मिलता, उसे हमसफ़ीर कहते हैं।

दानिशमंद इस जहान को, मुसाफ़िरख़ाना कहते हैं
मुसाफ़िरान का ये ख़ानाख़्वाह है, इसलिए कहते हैं
यहाँ पर हर किस्म के मुसाफ़िरों की आमद होती है
कोई मुस्तक़िल होकर नहीं रहता, ऐसा सब कहते हैं।

कुछ लोग यहाँ मुसाफ़ात तो कुछ मुसारअत करते हैं
वहीं , कुछ मुसाअदत तो कुछ मुसादमत भी करते हैं
मगर कुछ ऐसे भी हुआ करते, जो मुसाबरत करते हैं
और, मुसाफ़िरख़ाने के ख़ालिक का, दीदार करते हैं।

और तब ये मुसाफ़िरख़ाना एक दौलतख़ाना बनता है
जहाँ पे जुस्तजू ख़त्म होती और फ़िर क़स्द मिलता है
ज़र्रा ज़र्रा इस ख़िल्कत का रौशनी से लबरेज़ होता है
सफ़र बन्द होता जब सुकूत ओ सुकून भरपूर होता है।

मुसाफ़रत= यात्रा। रहगुज़र= रास्ता। दानिशमंद= ज्ञानी।
खानाख़्वाह= पड़ाव। मुसाफ़ात= दोस्ती।मुसारअत= रंजिश।
मुसाअदत= मदद। मुसादमत= कष्ट। मुसाबरत= सब्र।
ख़ालिक़= स्रष्टा। जुस्तजू= तलाश। क़स्द= संकल्प। 
ख़िल्कत= स्रष्टि। लबरेज़= लबालब। 
सुकूत ओ सुकून= सन्नाटा और शान्ति।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, March 4, 2021

मुंतज़िर

मेरी आंखों में जो लिखा है, सभी पढ़ नहीं पाते
वो मुह को ताकते हैं, ख़ामोशी समझ नहीं पाते
यह जो इबारत है, ग़ैबी मनकों से बना करती है
जो जुनूनी नहीं हें, वो मनकों को पिरो नहीं पाते।

कोई लम्हा होता है , आँखों में नक्श हो जाता है
कोई होता है , जो आँसू बनकर छलक जाता  है
दामन से पोंछने से वह , कोई पुछ नहीं जाता  है
हक़ीक़त में  वो नक्श ए फ़िल हजर बन जाता है।

धूप और चांदनी एक हैं , बस सीरत का फ़र्क़  है
आबो यख़ भी एक ही हें , बस सूरत का फ़र्क़ है
सिक्का एक होता है, गोकि पहलू दो हुआ करते 
वफ़ात और हयात में,सिर्फ़ एक साँस का फ़र्क़ है।

इस ख़िलक़त में हरदम, बहुत कुछ हुआ करता है
कुछ माक़ूल तो कुछ नामाक़ूल भी हुआ करता  है
जो हुआ करता है उससे बेख़बर रहें तो कैसा रहे ?
लगता नहीं हमारे न होने से , फ़र्क़ हुआ करता है।

मुन्तज़िर= इंतिज़ार करने वाला। ग़ैबी= supernatural
नक्श= print. आबो यख़= पानी और बर्फ़।
नक्श ए फ़िल हजर= engraved in stone.
वफ़ात और हयात= मृत्यु और जीवन।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, February 27, 2021

एक दिन

वीराना, महक से तुम्हारी, चमन बनता गया हर दिन
साथ की ज़िद न थी मेरी, कारवाँ बनता गया हर दिन
रहनुमाई थी तेरी, तेरे साये में मैं, चलता गया हर दिन
दुआ मिलती गई सबकी, मुकद्दर बनता गया हर दिन।

शम्स खिलता रहा हर दिन, ऐजाज़ बनता गया हर दिन
हम थे बेख़बर मगर जीना, ख़ुशरंग बनता गया हर दिन
वक्त चलता रहा, रास्ता ख़ुद ब ख़ुद बनता गया हर दिन
हदफ़ को न ढूँढा , मगर ख़ुद ब ख़ुद आता गया हर दिन।

हमने माँगा नहीं, दूरियाँ थीं,बनगईं नज़दीकियाँ हर दिन
ख़ुद से जब हुए रूबरू हम,हमसाया बनते गए हर दिन
सुबह जो उठता हूँ बुलबुल का बुलावा मिलता, हर दिन
कुछ तो ऐसा है ख़ुद को सम्हालता जाता हूँ मैं, हर दिन।

मुकद्दस हों इरादे तो गिर कर सम्हलते रहते हैं, हर दिन
तन्हा नहीं मगर तन्हाइयों में पैवस्त रहे आते हैं हर दिन
जहाँ से आगे और भी हैं जहाँ,नहीं होती है कभी इंतिहा
गुलशन महकते रहते हैं आपकी ख़ातिर ही तो, हर दिन।

सुनिए यह जो हमारा इत्तिफ़ाक़ चला करता है, हर दिन
कोई तो है ही जो करम करता रहता है हम पर, हर दिन
जो आपको यों वो रिफ़ाह मुसल्सल देता रहा , हर दिन
वो ही तो मुझको भी बिना माँगे शिफ़ा देता रहा हर दिन।

वक्त की तौहीन न कर बैठना कभी भी, किसी भी दिन
मिलने से पेशतर बिछड़ जाते हैं, ऐसे होते हैं कई दिन
ज़रा यह भी सुनलें अगर जो सुनना वाजिब समझते हैं
अपना साया भी पहिचानना मुश्किल होता है एक दिन।

दुनिया का रवाज है, कूच करना होता है सबको एक दिन
सभी हार जाते हैं, ज़िंदगी की बाज़ी तो मौत से एक दिन
हारी हुई बाज़ी को पलट दिया करता है कभी कोई बशर
ख़ुशबू बिखरी हुई पा लेता है जब वह कहीं पर एक दिन।

शम्स=सूर्य।ऐजाज़=चमत्कार। हदफ़=target.
हमसाया=क़रीबी। मुकद्दस=पवित्र। पैवस्त=संलग्न।
रिफ़ाह=हितकारिता। मुसल्सल=लगातार। शिफ़ा=दवा।
बशर=इन्सान।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, February 8, 2021

एहसास

मुझको भरोसा है पूरा , अपने एहसास पर
क्योंकि मेरा हक जो है, अपने एहसास पर।
ये एहसास कोई छीन नहीं सकता है मुझसे
न तुम्हारा न किसी और का हक है इस पर।

तुम सामने नहीं आते , ठीक है तुम्हारी मर्ज़ी
मैं बुरा मानू या न मानू, यह भी तो मेरी मर्ज़ी।
तुम्हारे एहसास से चेहरे पर जो आती रौनक
तुम चाहो तंज कस दो , यह मेरी है ख़ुदग़र्ज़ी।

सच तो यह है तुम बिन बोले मुझसे बोलते हो
और बिना छुए भी मुझे हरदम छुआ करते हो।
अब मुझे ख़ौफ़ नहीं लगता है इन तन्हाइयों से
तुम दूर रह करके भी मेरे पास जो बने रहते हो।

पहले ख़ौफ़ था मुझे, तुम्हें कोई चुरा ले जाएगा
धड़कनें बढ़ जातीं, लगता कि दिल टूट जाएगा।
अब मुझे डर नहीं सताता, तुम्हारी बेवफ़ाई का
मेरा एहसास शदीद है, मुझे छोड़ के न जाएगा।

शदीद = प्रबल।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, January 30, 2021

CAVE MEN

Some say we are all cave men
living on a different time scale,
assembled here on purpose
to release an urge against obscurity.

if what they say is true,
true too, here is where,
the mind commits suicide
to recoil from tyranny of thought.

looking back over the shoulder
progress appears a sad affair---
past catches up with us to reveal
a false front--- surely we believe

living on underbellies and bosoms,
sucklings ever, getting sucked
incessantly into the womb, seeking
vomit of eternity in endless embrace.

we move on knees, head buried
populate the planet, driving god
into backwoods, scare him
shouting messages into the moon.

we have made up our mind
to shove what is left of sanity
into the void, words conspiring
with thought to frame half-echoes.

Reprinted from YOUTH TIMES (defunct)1978 January 20-- February 2.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Wednesday, January 27, 2021

लौ !

जो बीत गया, वह गत है
जो बचा, वह अनागत है।
दोनों के मध्य में गमत है
उसे पा लेना, अज़मत है।
वहीं पर गति को विराम
मन को अविरत विश्राम।
इंसान की जो हिक्मत है
उसी से , ख़ुशकिस्मत है।

मध्य में मख़्फ़ी ख़ते अमूद
उसी में मौजूद है वो ख़ुलूद
उस ख़त के सहारे उतरें तो 
मिला करेगी मंज़िले मक़्सूद
वहाँ न तेल न बाती न दीपक
बस 'लौ' है , देखिए अपलक !
'लौ' से जैसी होएगी , निस्बत
वैसी रब से हो जाएगी रग़बत।

गमत= रास्ता। अज़मत= गौरव।अविरत = nonstop.
हिक्मत = कौशल।मख़्फ़ी= अद्रष्य। ख़ते अमूद= खड़ी रेखा।
ख़ुलूद= नित्यता।ख़त = रेखा।मंज़िले मक़्सूद= goal.
निस्बत= निकटता।रग़बत= लगाव। 

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, January 24, 2021

इज़हार ए तौफ़ीक़

तुझे अपने दिल में बसाए चला हूँ
तुझी से ये दुनिया सजाए चला हूँ।
जो दिल में सदा ही छिपाए रहा हूँ
ख़ुद अपनी ज़िद से बताने चला हूँ।

तेरी याद जब से , लेकर  चला हूँ
हरदम नया कुछ , पाता चला हूँ
रिश्ता जो तुमसे , पुराना रहा है
उसे जग में ज़ाहिर करने चला हूँ।

मैं मरज़ी से तेरे , माफ़िक चला हूँ
जो तूने है चाहा वो करता चला हूँ।
जो तेरी रज़ा थी , वो मेरी रही है
यही बात सबको , बताने चला हूँ।

घबरा के मैं महफ़िलों से चला हूँ
दुनियावी बातें बिदा कर चला हूँ।
मेरे हाल पर ही मुझे छोड़ दें सब
गुज़रा हुआ छोड़ कर के चला हूँ।

इज़हार ए तौफ़ीक़=ईश्वर की इच्छा
और उसके हिसाब से चलना।



ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Wednesday, January 6, 2021

तिलोपा ने कहा था

तिलोपा ने नरोपा से कहा था, तुम  बाँस हो जाओ 
जैसे  बाँस खोखला होता है,तुम खोखले हो जाओ।
तुम उसे पा नहीं सकते हो, कभी अपने प्रयासों से
वही आयेगा तुम तक, तुम तो बस तैयार हो जाओ।

तुम एक कण मात्र हो उस पूर्ण के, उस अनन्त के
कुछ नहीं मिलेगा तुमको, नाहक दुस्साहस करके।
तुम से बस अपेक्षित है,तुम स्वयं को खाली कर दो
ताकि वह उतर सके, तुम में, बिना किसी बाधा के।

जब वह अनन्त चैतन्य तुम्हारे अन्दर उतर आयेगा
तुम्हारा हर विचार तुमको त्याग कर, चला जायेगा।
विचार ही से क्रोध, लालसा, मत्सर उपजा करते हैं
विचार बिना तुम कहाँ, सब चैतन्य मय हो जाएगा।

आँखें जब बन्द करोगे, उधर दरवाज़ा खुल जायेगा
चैतन्य प्रकाश रूप में , प्रवाहित करने लग जायेगा।
तुम बनोगे खोखली बाँसुरी, वह बजाने लग जायेगा
स्वर्गिक संगीतमय लहरी तुम्हें , सुनाने लग जायेगा।

कौन बहाता है नदी को, कौन सागर में गिरा रहा है?
कौन चलाता है चाँद को, कौन तारों को घुमा रहा है?
वह करता है इसीलिए चाँद तारे नदी सागर सुंदर हैं
फूल भी सुन्दर हैं क्योंकि वह ही उन्हें खिला रहा है।

जब तुम करते हो तो, संत्रास का उद्घाटन हो जाता है
मन भय ईर्षा मद स्पर्धा क्रोध से आक्रान्त हो जाता है।
हर वक्त मन रहता काँपता, अनिष्ट का डर लगा रहता
उसकी सुन्दर सी बगिया का,कैसा रूप बदल जाता है।

तुम हो लेशमात्र और संपूर्णत्व की करते हो अवहेलना
स्वयं को ही समझने लगे नियंता, ये कैसी है विडम्बना?
उसका जगत कितना सुन्दर है, शून्य बनकर समझना
वह कितना मधुर गाता है, बाधा न बनना, फ़िर सुनना।

जीवन जैसा है अति सुन्दर है, वह नहीं कोई समस्या है
समस्या है तो तुम्हारी हल करने की कोशिश समस्या है।
जीवन धारा बह रही है, बहाने वाला बहाता जा रहा है
तुम  बाँस बनकर बहते रहो, फ़िर नहीं कोई समस्या है।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।