Tuesday, November 1, 2022
and shells we gather!
Monday, October 24, 2022
दीपावली
Sunday, October 23, 2022
dipawali
Friday, October 14, 2022
यही बेबसी है
Sunday, October 9, 2022
शरद पूर्णिमा
Monday, October 3, 2022
मुझे उसकी तलाश है
हर किसी को किसी ना किसी की तलाश है
पास है, दिखता नहीं, मुझे उसकी तलाश है।
गुरूर में रहने वाले तो बहुत मिलते रहते हैं
जो दिल में रहता है, मुझे उसकी तलाश है।
निगाहें चुराने वाले बे वजह मिला करते हैं
जो ग़म को चुराले , मुझे उसकी तलाश है।
दुनिया में दौलतमंद सब कुछ ख़रीद लेते हैं
जो सन्नाटा ख़रीद ले, मुझे उसकी तलाश है।
काँटे भी मंज़ूर हैं गुलाब को , साथ के लिए
बेलौस का साथ दे दे, मुझे उसकी तलाश है।
काँच टूट ही जाता है कभी न कभी साहिब
शफ़्फ़ाफ़ हो, टूटे न , मुझे उसकी तलाश है।
रूँठना और नाराज़ होना, मुख़्तलिफ़ होते हैं
रूँठे को मनाना पसंद, मुझे उसकी तलाश है।
जिस्म को चाहने वालों की कमी नहीं साहिब
जो रूह का मुरीद हो , मुझे उसकी तलाश है।
कभी किसी ने पूछ लिया था 'आप कौन हैं?'
कौन हूँ मैं? अभी भी मुझे उसकी तलाश है।
बेलौस=खरा, निष्पक्ष।शफ़्फ़ाफ़=transparent.
मुख़्तलिफ़ = different. मुरीद=अनुगामी।
वाह ज़िन्दगी !
अजित सम्बोधि
Monday, September 26, 2022
come, come, september!
Sunday, September 25, 2022
happy daughters day!
Sunday, September 18, 2022
respect Nature honestly.
Monday, September 12, 2022
मिलना चाहता हूँ
सारी दुनियाँ से मिल लिया, ख़ुद से मिलना चाहता हूँ
ढूँढता रहा जिसको हर दम, उसी से मिलना चाहता हूँ ।
तवारीख़ तो नगर वधू है, फ़ातेह की संगिनी जो ठहरी
जिस चेहरे पे दर्ज हो इबारत, उससे मिलना चाहता हूँ ।
लगता है जैसे ज़िन्दगी फ़ज़ीहत ए फ़ज़ूल में चली गई
जिसकी क़ुर्बत में वज़ाहत हो, उससे मिलना चाहता हूँ ।
क़िस्सा वही, किस्सा गो भी वही, इसमें ख़ास क्या है
बयान ए रसूल है जिसका , उसको मिलना चाहता हूँ ।
सबक़ सिखाने वाले मुझको, अक्सर ही मिला करते हें
जो गया वक़्त लाना सिखा दे, उससे मिलना चाहता हूँ ।
ज़िन्दगी मेहरबान है , जो नहीं माँगा था वो भी दे दिया
मुझे मेरी मुस्कुराहट दिला दे , उससे मिलना चाहता हूँ ।
मिलने पर सभी मुस्कुराते हें , हमें भी मालूम है ये बात
मुस्कुराहट हमनवाई से सजाए, उससे मिलना चाहता हूँ ।
रास्तों में ही नहीं , दिलों में भी संग मिल जाया करते हें
जो उस संग को मोम बना दे , उससे मिलना चाहता हूँ ।
मन्दिर बहुत दिखते हें, नामदार भी और शानदार भी
दीप जो जलाए सूने मंदिर में , उससे मिलना चाहता हूँ ।
चाहत दोनो तरफ़ है , हमको मालूम है बख़ूबी ये बात
मगर पहिले शुरुआत करे , मैं उससे मिलना चाहता हूँ ।
हर तरफ़ नफ़रत के काँटे चुभते, जीना मुहाल हो गया
इन काँटों पर फूल खिला दे , उससे मिलना चाहता हूँ ।
धड़कन हर दिल में क़ाबिज़ है , मगर जो समझ पाए
धड़कन का धड़कन से रब्त, उससे मिलना चाहता हूँ ।
जब कोई बोलता है तो, मैं मुँह नहीं आँखें देखता हूँ
जिन आँखों में पज़ीराई हो , उनसे मिलना चाहता हूँ ।
नफ़रत तो इतनी देख ली , कि सारे ख़्वाब बिखर गए
कोई आजाए बरादर बनकर, उससे मिलना चाहता हूँ ।
ज़िन्दगी बेहाल हो गई , किरदार देख देख दुश्मनी के
जो दुश्मन हो दुश्मनी का, उससे मिलना चाहता हूँ ।
वो रूँठा बैठा है वहाँ , मैं उसका वादा लेकर बैठा यहाँ
उस सिरफ़िरे से कोई कह दे , उससे मिलना चाहता हूँ ।
ख़ामोश है समन्दर भी, वादियाँ भी , और वो ख़ामोशी
मेरी रूह सुनती है , लिहाज़ा उससे मिलना चाहता हूँ ।
फातेह= विजेता। क़ुर्बत= नज़दीकी। वज़ाहत= भव्यता।
किस्सा गो= story teller. बयान ए रसूल= word of prophet.
हमनवाई= हमख़्याली। संग= पत्थर। मुहाल= असम्भव।
रब्त= मेलजोल। पज़ीराई=अपनापन।
ओम् शान्तिः
अजित सम्बोधि।
Wednesday, September 7, 2022
so they say!
Monday, August 29, 2022
need return of retreats?
Wednesday, August 24, 2022
anvi joins uf, gainesville!
Monday, August 22, 2022
dance
Friday, August 19, 2022
Janmashtmi 2022
Saturday, August 13, 2022
Willing To Meditate?
Thursday, August 11, 2022
बंधन भी रंजन भी
Tuesday, August 9, 2022
hitting half century, well done!
Sunday, August 7, 2022
तज़मीन
Thursday, August 4, 2022
करिष्ये वचनं तव
Monday, August 1, 2022
मम माया दुरत्यया
Friday, July 29, 2022
योगक्षेमं वहाम्यहम्।
Tuesday, July 26, 2022
निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन् ।
Saturday, July 23, 2022
I tell myself, learn !
Wednesday, July 20, 2022
क्या इसे भुला सकता हूँ?
Monday, July 18, 2022
बाहर vs अन्दर
Thursday, July 14, 2022
हुस्न ए समाअत
Wednesday, July 13, 2022
Who...if not HE?
Monday, July 11, 2022
look, look
A northerly breeze is brewing
As a flock of flickers is flying.
I sit enchanted on the deck
And watch the trees swaying.
I hear a thunder somewhere
It’s drawing nearer and nearer.
It may start raining , I surmise
The clouds are turning thicker.
Suddenly a streak of lightning!
A kinky dazzle perambulating!
I wonder what it thinks of me
As I sit uncovered, ruminating!
There's a power so benevolent
That makes even me, relevant.
It made me an instrument who
Would record this elfin event!
It has made each 'n' everything
Including me 'n' the lightening.
Its space holds both of us and
All else , in a bond unswerving!
Om Shantih
Ajit Sambodhi.
Friday, July 8, 2022
पलकों को अच्छे से बंद रखना।
ख़ुद से ही ख़ुद को चुरा लेना
मुझसे न कहना , भुला देना ।
अपनी मायूस निगाहों से फ़िर
मुझसे शिकायत ना करना।
इस जहाँ से अलग भी जहाँ है
रगे जाँ से क़रीबतर जहाँ है ।
तुमको करना पड़ेगा ये यकीन
निस्बत में एक और भी जहाँ है ।
चाहत से गिला मत करना
राहत को मना मत करना
सपने तो अपने हें, आया करेंगे
पलकों को अच्छे से बंद रखना ।
कुछ वक़्त गुज़र जाने देना
नज़रों को मुसल्लस में रखना
वहीं पर मिलते रहेंगे हम तुम
पलकों को अच्छे से बंद रखना।
रगे जाँ=jugular vein. क़रीबतर= अधिक क़रीब।
निस्बत = relation. मुसल्लस= triangle.
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।
Tuesday, July 5, 2022
हम्द ओ सना
वो ग़म से मुझे आबाद करें
हम ग़म के सहारे जीते हें
हम दर्द के मारों को अपने
दिल में ही मुकम्मल करते हें ।
वो हवा चले चाहे बासन्ती
या फ़िर लूओं की हो रानी
हमको तो दोनों लगतीं हैं
अपनी सी जानी पहचानी ।
कई दर्द तो होते दर्द भरे
कई दर्द भी मीठे होते हैं
जो दर्द हमें दमसाज़ करें
वो दर्द सुनहरे होते हैं ।
कोई आवाज़ कभी दे देता है
यूँ ही से मगर, बाबत में नहीं
फ़िर कितना अच्छा लगता है
उसको भी पूछो, है कि नहीं?
बेपर्दा रहूँ मैं या दर पर्दा
मुझको नहीं है ग़म ए फ़र्दा
मैं हूँ ही नहीं आमिल कब से
सिवा हम्दो सना नहीं कोई कर्दा।
मन में जो भी तुम को भाए
करलो तुमतो जी भर राम
मेरा मन तो हरदम पाए
केवल तुम में ही विश्राम ।
दमसाज़= हमरंग। दरपर्दा = पर्दे में।
ग़म ए फ़र्दा = कल का डर। आमिल= doer.
हम्दो सना= prayer. कर्दा = किया हुआ।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।
Saturday, July 2, 2022
कलंदर
Thursday, June 30, 2022
मुहब्बत के सिवा
Monday, June 27, 2022
दौलत ए मुहब्बत
Friday, June 24, 2022
exuberence algorithm
Tuesday, June 21, 2022
The sprinklers
Sunday, June 19, 2022
Father’s Day
फ़ादर्स डे
Saturday, June 18, 2022
Maple tree
I’m now sitting under the maple tree
He gives me shade from sun for free.
We’ve been chums since his boyhood
Now he has become a handsome tree!
He stands up by the corner of the deck
That’s my favourite place on the deck.
Whenever I stand up my full length up
His leafy branches half cover my back!
His leafy branches look like leafy arms
And caress me as did my mom's arms.
I am deeply touched by his love for me
And in return, embrace him in my arms!
Om Shantih
Ajit Sambodhi.
Wednesday, June 15, 2022
Madison Backyard
Sunday, June 12, 2022
झंडा
Thursday, June 9, 2022
GRACE
Monday, June 6, 2022
my god
I think I see my god all day
How else I tell my night from day?
I see his sky blue in hue
It stays alive, it's truly true.
He made the trees that look to him
And falter not as they pray to him.
His birds sing songs all the time
I don't hear elsewhere such a rhyme.
He transits me while I'm asleep
And keeps me awake in my sleep!
To know fairly well what I say
While in sleep, awake you stay!
Om Shantih
Ajit Sambodhi
Saturday, June 4, 2022
आफ़ताब ए फ़लक
Friday, June 3, 2022
समझ ले
एतिराफ़ ए मुहब्बत
Saturday, May 28, 2022
आबशार
Wednesday, May 25, 2022
शासकीय दोहे
Sunday, May 22, 2022
दोहे विज्ञानी
देखि दिनन कौ फेर रे, मति घबरावे तू
कहिके कान्हा सूँ व्यथा, बन बेफिकरा तू ।
दुनियाँ जाने है रची , वा ही वा को पीर
अपनो तो बस काम यो, जी भर खाओ खीर ।
होवे तो वाई सदा, जो चाहें रघुवीर
अपने तो बस में यही, चिंता भजें कि धीर।
सूरज उगताँ ही करो, दर्शन राजी होइ
दिन बीते सुख सूँ घँड़ो, व्यथा न होवे कोइ।
दिन में जब अवसर मिले, देखि लेउ आकाश
श्रद्धा सूँ करिलो नमन, कटि हें सिगरे पाश।
धरती कूँ करिके नमन, तब ही धरिओ पैर
वा ही माता आपणी, वा ही राखे खैर।
जिसको कहते शून्य सब, उसमें ही सब सार
सब कुछ उपजा शून्य से , ये ही सच्चा सार।
जानन कूँ इस जगत में, मात्र शून्य विज्ञान
शून्य बनन के वास्ते , धरो शाम्भवी ध्यान ।
चलते, फिरते, उठते, गिरते, दुश्कर नहीं यह काम
शम्भु जी की यह क्रिया , साधे सिगरे काम।
पँच तत्व को नमन करि, अपने ह्रदय सजाय
प्राप्य हेतु निवृत्ति को , सबसे सरल उपाय ।
चैस्ट ब्रीदिंग छोड़ के , बैली ब्रीदिंग कर
पूरी उम्र पाने को , ब्रीदिंग रेट कम कर ।
ॐ ॐ ॐ
पीर = master guide . धीर = धैर्य , धैर्यवान ।
बैली ब्रीदिंग = diaphragmatic breathing.
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।
Thursday, May 19, 2022
दोहों में फैशन
फैशन के बाजार में , फैशन के परिधान
फैशन सिर पै चढ़ि रही, नहि फैशन सो ज्ञान ।
फैशन को समझे नहीं, वा सो मूरख कौन
सब कोई गिट पिट करे, वा ठाड़ो है मौन ।
पीज़ा बरगर कोला , ब्रेड बटर सब जानें
फैशन के मारे परि , छाछ नहीं पहिचानें।
अल्थी पल्थी मार के, जीवण करो न जाइ
फैशन के काँटे बिना, मुख में ग्रास न जाइ ।
पैर छुअत में कऊॅ, रीढ़ न टूट ई जाइ
फैशन की बारात में, सब करें हाइ हाइ ।
नेता या फिर अभिनेता, फैशन सबको भाइ
कोट, पेंट, टाई, बिना , छात्र क्योंकर जाइ ?
फैशन के बाजार में, ढूँढत अपनी जात
फटी पेंट, टैटू बिना , बने न कोई बात।
जब तक फैशन ना करो, कोई पूछत नाँहि
सब सोचत या अनपढ़ो , जाकूँ देउ भगाहि ।
फैशन में फैशन रहे, फैशन कहूँ न जाइ
कोई जो चाहे कहो , फैशन खूब सुहाइ।
जैसे पूड़ी नहि बने, बिन गेहूँ के चून
तैसे फैशन के बिना, सब लागे है सून।
हाइ= Hi!
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि ।
Monday, May 16, 2022
Buddha Poornima
Today is Buddha Poornima, the full moon day
It’s said Buddha got enlightenment on this day.
He is held the tenth embodiment of the Divine
The only one who isn’t mythological, so to say.
Enlightenment, well, is recklessly tossed about
It’s everywhere, from coffee table to self doubt.
It is not entanglement or its copy or its travesty
Nonchalantly, it’s a distant cry for any gadabout.
It’s beyond the realm of the physical and mental
It is also beyond what revs the duo, their mantle.
Enlightenment is an alignment with the creation
In which the seeker & creation are complemental.
The job of the moon is that of a catalytic mentor
The moon factors in, whatever may be the factor.
Full moon fast forwards on full throttle, & hence
Whoever needs last ditch effort, is the benefactor!
Buddha had worked on himself for six years, and
He was immediately in need of the last push, and
It happened, in totality. Everybody stood blessed:
Moon, river, pipal, virgin, kheer!What a Godsend!
Om Shantih
Ajit Sambodhi.
Friday, May 13, 2022
किधर गई ?
अभी हवा जो आई थी, वो किधर गई
एक महक सी आई थी, वो किधर गई ?
यहाँ पर एक बस्ती सी हुआ करती थी
आँखों को धोखा हुआ क्या, किधर गई ?
आईने में देखा था एक अक्स हसीन सा
वो तस्वीर जो नक़्श हुई थी, किधर गई ?
पाया भी, खोया भी, फ़िर क्या हुआ था
कुछ यादें तसव्वुर में थीं, वो किधर गईं?
लिखा, याद है, बहुत लिखा, पै एक दिन
लिखा मिटा दिया, शगुफ़्तगी किधर गई ?
कुछ दिल में कुछ आँखों में रखा करते हें
वो सलीका रखने की बसीरत किधर गई ?
दरीचे में क़दम से चिलमन खिसकती थी
आहट पहचानने की वो ज़र्फ, किधर गई ?
रहबर बिन कैसे बढ़े राह, जब से फँस गई
क़िस्मत के पासे में, राह न जाने किधर गई ?
सब कुछ सीखा था पट्टी पर, अब दिखता
नहीं गेरू कहीं , खड़िया जाने किधर गई ?
जो सुना करता था रबाबो बरबत की धुनें
पैहम अब वो सज्जादे समाअत किधर गई ?
खनकती आवाज़ में तैरती सरेशाम की वो
सुरमई शरमाहट ओ मुस्कुराहट किधर गई ?
कभी क़ाबिल थे हम, पै अब क़ाबिल न रहे
सब्र करने की हमारी दरख़्वास्त किधर गई ?
रौशन थी ज़िंदगी और, मुझको ख़बर न थी
अँधेरों से क्या पूँछूँ, मेरी परछाईं किधर गई ?
लड़ते थे बिना अस्लहा, वो सादगी चली गई
किससे पूँछूँ जाकर , मेरी इबादत किधर गई ?
बहुत देर लगी समझने में क्या खो दिया मेंने
वो जो आजाती थी देखके रौनक़ किधर गई ?
अभी चूँ चूँ करती चिकेडी आई थी मेरे पास
मेंने पूँछा, क्या हुआ, बसँती निदा किधर गई ?
कहने लगी, मैं बच गई, समझो ये ग़नीमत है
मई का महीना है, गर्मी लेगई, और किधर गई ?
अक्स = image. नक़्श = imprint. तसव्वुर=कल्पना।
शगुफ़्तगी = आह्लाद । बसीरत = insight. ज़र्फ़ = skill.
रबाबो बरबत = lyres. पैहम = लगातार ।निदा = call.
चिकेडी=chickadee.Its spring call is chickadee dee dee.
सज्जादे समाअत = सुनने की/का उपासक ।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि ।
Tuesday, May 10, 2022
बंजर का मंज़र।
वो शोर से शोर को मिटाया करते हें
दीवारें उठा के, प्यार बढ़ाया करते हें
मेरी समझ में नहीं आ रही है ये बात
वो बन्दूक से बात समझाया करते हें ।
प्यार मर गया तो नफ़रतें रह जाँऐंगी
इन्सान न रहेगा , सरहदें रह जाँऐंगी
बारूद के ढेर पर बैठ के हम लड़ रहे
कुछ न बचेगा वीरानियाँ बच जाँऐंगी।
वो लड़ाई को लड़ के मारना चाहते हें
वो बैरी को बैरी बनके मारना चाहते हें
मालिक ने सब कुछ बख़्शा है मुफ़्त में
वो उसको हटा के अपना नाम चाहते हें ।
हम तरक़्क़ी पसन्द हें, वे बताया करते हें
हम एक धरती, हज़ार देश हुआ करते हें
पहले एक गाँव एक घर, हुआ करता था
अब एक गाँव एक सौ घर हुआ करते हें ।
कभी एक घर में इतने लोग हुआ करते थे
बातों के सिलसिले ख़त्म, न हुआ करते थे
अब बुज़ुर्ग व्रद्धाश्रम में, बच्चे बाहर जाते हें
पा सकेंगे वो दिन, जो पहिले हुआ करते थे ?
अब तो प्यार जैसे चिल्लर में मिला करता है
कुछ अभी कुछ फ़िर, पुर्ज़ों में मिला करता है
बहुत चाहते हें, कभी कोई सिल्ली मिल ज़ाइ
आख़िर उम्मीद पे ही हर ख़्वाब टिका करता है ।
बंजर ज़मीन है, इसको बारिश की ज़रूरत है
सोच में खोट है, इसे सूझ बूझ की ज़रूरत है
इन सूखे सूखे चेहरों पे, मुस्कान आने दीजिए
मुस्कान लाने के लिए, मुहब्बत की ज़रूरत है ।
मुहब्बत माँगी नहीं जाती , बस बाँटी जाती है
किश्तों में नहीं दिया करते, ये उँडेली जाती है
सूरज चाँद तारे, और न जाने क्या क्या है वहाँ
सारे रिश्तों में बस , मुहब्बत ही आती जाती है ।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि ।
Saturday, May 7, 2022
चाचा की चौपाल !
ये यहाँ की चाचा की चौपाल है
यहाँ मिलते हर रँग के कव्वाल हें
मिलता सब को, सब का हाल है
यहाँ रहता क़िस्सों का धमाल है ।
I
मिट्टी के चूल्हे में हो लकड़ी की आग
धीमे से खदकता हो सरसों का साग
सिल बट्टे पे पिसी हरी मिर्ची के साथ
कुरकुरी मक्की रोटी, लगती है स्वाद ।
ये तो वहीं पड़े रहेंगे, जहाँ पे पुरखे थे
ज़माना आगे गया, वहाँ से जहाँ वे थे
अब तो माइक्रो वेव पकाता है झट से
हड्डी गला दे, इतने ग़र्म कभी अँगारे थे ?
II
मकान की छत पे , रहता है मेरा मचान
रात में सोता मैं, तान के पूरा आसमान
मत समझ लेना, मैं सोता हूँ अकेले वहाँ
तारे भी आ जाते हें, ले के अपना सामान !
सूरज उगने से पहिले, बुलबुल बोलती है
बड़ी समझदारी से, इस्तक़बाल करती है
आख़िर सूरज से ही तो , दुनियाँ चलती है
मुझको जगाने का भी वही काम करती है ।
वो होशियार लोग हें, फ्रिज में से खाते हें
आधी रात को भी उठ कर, पीज़ा खाते हें
सुबह उठते ही पहिले, सब बरगर खाते हें
बड़े ठाठ हें उनके दिन में मैकरोनी खाते हें ।
सब के सब गद्दे जैसे गुदगुदे हो रहे हें
सूरज सर पे चढ़ गया, अभी सो रहे हें
दुगने मोटे गद्दों पे, ए.सी. में सो रहे हें
पता नहीं पड़ोसी क्यों परेशाँ हो रहे हें ?
ॐ ॐ ॐ
बाई कह रही थी , किसी को बताना नहीं
हर महीने बिल आता है, बात बताना नहीं
डाक्टर का, मेरी साल की पगार जितना
कमाते किसके लिए हें? बात बताना नहीं ।
III
“मारो मारो”, झण्डे पर यही निशान था
ताक़त दिखाने का , एक यही पैमाना था
बचाने का ज़िक्र तो कहीं पे, कभी न था
बचाना कभी भी, कोई मुद्दा रहा ही न था ।
हर ओर एक नारा है, दुश्मन को मारना है
अपनी फ़ौज के लिए असलहा बनाना है
बड़ी मुश्क़िल, हर तरफ़ दुश्मन ही दुश्मन
दोस्त तो है ही नहीं , फ़िर किसे बचाना है ?
गाँव की ज़मीन को तो फ़ैक्टरी निगल गई
ताज़ी हवा को फ़ैक्टरी की गैस निगल गई
मोर की आवाज़ फ़ैक्टरी की सीटी खा गई
इतना विकास ! मेरी तो हवा ही निकल गई !
इस्तक़बाल = स्वागत । असलहा = armament.
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि ।
Wednesday, May 4, 2022
ज़िंदगी
वाह, क्या ख़ूब दिलफ़रेब ज़िन्दगी है
इम्तिहानों की कैसी, नुमाइश लगी है ।
यहाँ तो हर तरफ़ बस आईने ही लगे हें
लोग हें, इश्के मजाज़ी देखने में लगे हें ।
इश्क़े हक़ीक़ी के वास्ते एक उम्र चाहिए
इबादत करने के लिए भी समझ चाहिए ।
रुलास आए तो समझना इश्क़ हो गया
जिसे ख़ुद से ज़्यादा चाहा वो रुला गया ।
यही चाह है मेरे हिस्से की धूप पाता रहूँ
और अपनी कश्ती का नाख़ुदा बना रहूँ ।
हालात बदल जाने से पैमाने बदल जाते हें
ये कैसी मनमानी है, इन्सान बदल जाते हें ।
ज़िन्दगी में सादगी ही बस एक ख़ज़ाना है
बाक़ी कुछ भी कर लो, सब एक बहाना है ।
ज़िन्दगी में रहती तब तक ही ख़ासियत है
जब तक चेहरे पे रहा करती, मासूमियत है ।
हर तरफ़ यहाँ बिखरा हुआ पड़ा जलाल है
जमाल का अब भी क्या किसी को मलाल है ?
सारी उम्र का असासा, मेरी यही इबादत है
मुझसे मिलने की यही तज्वीज़ ए अयादत है ।
जब भी मन करे, इबादत कर लिया कीजिए
इबादत ऐसी बरबत, कभी भी बजा लीजिए ।
इश्क़े मजाज़ी = दुनियावी मुहब्बत ।
इश्क़े हक़ीक़ी = रब के लिए मुहब्बत।
नाख़ुदा = नाविक । जलाल = भव्य प्रकाश। जमाल = हुस्न।
तज्वीज़ ए अयादत = बीमारी के बहाने से मिलना ।
बरबत = lyre. असासा = सामान ।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।
Sunday, May 1, 2022
सबीर हका के नाम
आज मज़दूर दिवस है
एकसौ बत्तीसवाँ बरस है ।
कौन होते हें ये मज़दूर
वे ही जो होते है मज़बूर ?
सभी को देते जो मकान
ख़ुद के होते नहीं मकान ?
मज़दूरनी के गर्भ में आते हें
तब से मज़दूर बन जाते हें ।
ये सबीर हका कह रहा है
एक मज़दूर कह रहा है ।
बिना खिड़की का कमरा
किराए पर मिला कमरा।
आसमान को कहता मैं घर
इस को कैसे कहूँ मैं घर ?
छह लोग रहते हें इसमें
अहले बैत रहते हें इसमें।
मौत से भी डर लगता अब तो
उस जहाँ में भी मज़दूर बना तो ?
पुलिस मुझे तलाश कर रही है
क्या सरकार नज़्मों से डर रही है ?
सब किताबें क़ब्र में ले जाऊँगा
अपने साथ इन्हें दफ़्न कर दूँगा ।
ॐ ॐ ॐ
सबीर, सुनो तुम साबिर हो
हका, तुम हक़ के शाकिर हो ।
तुमने तो एक ख़्वाब देखा था
तुमको तो एक घर देखना था ।
ऊँची इमारत चढ़ के देखना था
दिल को सजाए, उसे देखना था ।
तुमने कहा है ख़ुदा भी मज़दूर है
हाँ, उसका मकान बड़ा ज़रूर है ।
मज़दूर होना कोई गुनाह नहीं है
मज़दूर कोई भी बेपनाह नहीं है ।
आसमान को तुमने माना है घर
ज़मीन पर भी मिल जाएगा घर ।
जिसको तलाश कर रहे हो बराबर
दिल में आ बैठे, मिलेगा वो दिलबर।
हमारी दुआयें तुम्हारे साथ हें
मालिक का करम तुम्हारे साथ है ।
ॐ ॐ ॐ
अहले बैत = घर के लोग ।साबिर = धैर्यवान । हक़ = रब ।
शाकिर = क्रतज्ञ । दिलबर= प्रेमी । करम = क्रपा ।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।
Wednesday, April 27, 2022
चिराग़े मुहब्बत ।
चिराग़े मुहब्बत हूँ सलीके से जला करता हूँ
ख़ासो आम सभी को, रोशन किया करता हूँ ।
मुहब्बत को मुहब्बत से तोला नहीं करता हूँ
मुहब्बत को तो में सिर्फ़ लुटाया करता हूँ ।
वो मुहब्बत को दिमाग़ से सोचा करते हें
गोया दिल को दिमाग़ में लिए घूमा करते हें ।
ये समझने में एक अरसा सा लग जाता है
वो मुस्कुराते हें या कि आईना मुस्कुराता है ।
फूल जब खिलता है, मुहब्बत बखेर देता है
हम को हँसाता जाता है और चला जाता है ।
उधर में से पुरवैय्या आती है, छू के जाती है
सारे बदन को सिहरा देती है, चली जाती है ।
मुहब्बत रब की एक ख़ूबसूरत सी दौलत है
और मेरी वहशत के लिए वो बड़ी ज़रूरत है ।
मुहब्बत मेरी सआदत है और मेरी शबाहत है
उसको निभाना मेरी आदत है, एक रिवायत है ।
मुहब्बत के लिए बस आप एक काम कीजिए
रुख़ पे मुस्कराहट के लिए जगह बना दीजिए ।
मुस्कुराहट एक बड़ी नियामत हुआ करती है
नफ़रत को फ़िलफ़ौर, मुहब्बत किया करती है ।
नफ़रत बंजर ज़मीं है, उसे बारिश की ज़रूरत है
मुहब्बत बारिश है, और नफ़रत की बसीरत है ।
ज़िन्दगी में तूफ़ान अक्सर आते ही रहा करते हें
मगर मुहब्बत सरबराह हो, तो टिक नहीं पाते हें ।
मुहब्बत है तो महबूब भी भला दूर तो न होंगे
और ख़ुशबू के चमन भी कुछ कमतर न होंगे ।
मुहब्बत चिराग़ के मानिन्द चमकने लग जाती है
जब भी मुस्कान मुहब्बत का किरदार निभाती है ।
रब = ईश्वर । वहशत = पागलपन ।
सआदत = सौभाग्य । शबाहत = हमशक़्ल।
नियामत = वरदान । फ़िलफ़ौर = फ़ौरन ।
बसीरत = prudence. सरबराह = मुखिया ।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि ।
Sunday, April 24, 2022
काश !
काश, हाँ काश, वे सब के सब बच्चे होते
मुमकिन है तब वे इतने फ़रेब न करते होते।
बचाने में और मारने में किसको बहादुरी कहें
शायद इसकी समझ रखने वाले बहादुर होते।
वे हुक्मरान हें, उनका ही कब्ज़ा है सब जगह
मगर चैन क्यों नहीं उन्हें, क्यों है इतनी कलह ?
क्यों लड़ते रहते हें बराबर, हर वक़्त बे सबब
क्यों ख़ुद से ही वे ख़ुद नहीं कर पाते हें सुलह ?
क्या वो चीज़ है जिसकी कमी है उनके पास में
क्या कोई ऐशो आराम है जो नहीं उनके पास में ?
क्या है जो करता रहता आख़िर ऐसे बेचैन उनको
क्यों रहते हें हमेशा ही उनके हाथ सने हुए ख़ून में ?
काश वे हुक्मरान होने के साथ में इन्सान भी होते
किसी के दिल का दर्द समझने के क़ाबिल होते।
ये तबाही के मँज़र, ये सितम, ये कराहटें न होते
काश वे बाहर ही बाहर में इस क़दर उलझे न होते।
काश एक बार वे अपने अन्दर में झाँक लिए होते
अपने बेमिसाल रूहानी ख़ज़ाने को देख लिए होते।
इन सरहदों की ख़ातिर इस तरह जँग न किए होते
काश वे सिर्फ़ आसमाँ में उड़ने वाले परिन्दे जो होते।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि ।
Thursday, April 21, 2022
जब मज़दूर मज़बूर हुए ।
उन्हें क्या पता था, ये दिन देखना था
मज़बूरियों का, क़ाफ़िला देखना था ।
ये भूखे ये नंगे , चले जा रहे हें
हें पाओं में छाले, मगर जा रहे हें
ये गिरते हें उठते, पसीनों से तर
गले तो हें प्यासे, मगर जा रहे हें।
इतने ये मज़बूर , क्यों हो रहे हें ?
क्यों ख़ुदही अर्थी, लिए जा रहे हें ?
बेकसी में उन्हें , रास्ता नापना था
लाचारियों का , कारवाँ देखना था ।
उन्हें क्या पता था ये दिन देखना था
मज़बूरियों का क़ाफ़िला देखना था ।
क्या मेहनत में इनसे कसर रह गई ?
क्या बोझे को ढोते कमर सो गई ?
दुपहरी को सर से गुज़ारा नहीं क्या ?
गाली की गोली निगली नहीं क्या ?
सूनी सूनी हें आँखें, होश गुम गया
घिसते घिसते संग, नसीब घिस गया ।
क्या धरती को इनके , तले चूमने थे ?
या बेबसी में चलते , इन्हें देखना था ?
उन्हें क्या पता था, ये दिन देखना था
मज़बूरियों का, क़ाफ़िला देखना था ।
जहाँ पर भी गए ये , बस छले ही गए
हमदम मिला नहीं , बस डर मिल गए ।
सब कुछ लुट गया , अब घर जा रहे
जहाँ अपना सा लगता , वहीं जा रहे ।
आसमॉओं ने भी कोई , की नहीं मदद
ख़ामोशी में चलता, जा रहा ये जनपद ।
इनसानियत को, बढ़ के पहिचानना था
जिसने ग़लती की थी , उसे मानना था ।
उन्हें क्या पता था, ये दिन देखना था
मज़बूरियों का, क़ाफ़िला देखना था ।
बेकसी = helplessness. संग = पत्थर ।
नसीब = भाग्य । हमदम = दोस्त ।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि ।
Tuesday, April 19, 2022
Akshat turns nineteen!
Happy birthday to you!
Happy birthday to you!
It’s the month of April
You are a man of skill.
All things shall happen
According to your will!
Happy birthday to you!
Happy birthday to you!
Well, the day is nineteen
You are also, eh, nineteen!
You know what that means
It means you’re out of teens!
Happy birthday to you!
Happy birthday to you!
Year is twenty twenty two
You are on to twenty too!
You’ll have all the fun here
As if you were in Timbuktu!
Happy birthday to you!
Happy birthday to you!
Love
Nana
Saturday, April 16, 2022
Hanuman Janmotsav 2022
Hanuman is the monkey god of Hindu pantheon
He teaches how to take on monkey mind, head on.
Mind keeps jumping from one thought to another
Monkey god harnessed his & became a superman!
Hanuman exhibits evolved state of monkey mind
Everyone needs to get it, to possess a mastermind!
When Rama asks Hanuman about his take on Him
Hanuman gives a three fold reply; keep it in mind!
He says, in his corporeal frame, he’s His factotum
In soul form, he is intrinsically a spark of His light.
He continues, as I get into me, and lose myself, I
By Your grace Lord, find, You & I are One Light!
Hanuman shows that it is Faith that leads the way
To Divinity, by granting access to its own pathway.
Faith is not belief, it’s a direct experience of grace
Grace, that subsumes everything in the Divine way!
Then there remains no room for any kind of clatter
The Divine ‘hum’ absorbs all sorts of mental chatter.
The inner gets flooded with bliss emitting luminosity
It’s serenity that reigns there, not any kind of patter!
Om Shantih
Ajit Sambodhi
