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Saturday, August 13, 2022

Willing To Meditate?

We have  become  very much commercial
I would say we are by default commercial.
Take any correlation, action or interaction
It will boil down to something commercial.

The inherent reason is being too physical
Physical body being only hope of survival?
So we imagine, and so we are all but mad
Huffing and puffing ,  to make it immortal!

We cater to its  fancifully wayward wishes
Pamper  and overfeed it with fancy dishes.
We give it comforts  that turn it  moribund.
Tell me of a guy who not a scar nourishes!

Whoever goes beyond physical to cardinal?
We have sidelined that which is reverantial.
The ongoing war hysteria of sickly minds is
To save the sickly physical. Is it  so crucial?

Past this physical body , is the energy body
It's the energy body that sustains this body.
Still we forget to  contact this  energy body
In turn it fails to support  the physical body!

Had we taken advantage of the contiguity
And been in  conversation with  this entity
We would escape all the woes of rat race
We find ourselves in; and be in tranquility!

Were we conversant with the energy body
We would not behave like we were groggy
Rapacious, self-aggrandizing, jackbooted?
'Being' in 'human being' is the energy body!

Only a human being  can  know  this 'being'.
None else is designed  to know  this 'being'.
Is it  not  'once in an aeon' chance  to  grab?
If only we knew how 'to be', to regain 'being'!

Meditation is the science of knowing 'being'
Meditation isn't  challenging if one is willing
To make some changes in one's  living style.
Meditation will take you to your inner 'being'! 

Glimpse of the energy body is the beginning
To begin to relate with it  marks  the 'rooting'
To get merged into the energy body is  'being'
Then physical body works as a human being!

Shiv Shambho 
Ajit Sambodhi. 

Thursday, August 11, 2022

बंधन भी रंजन भी

एक बंधन अच्छा लगता है 
उस  को  कहते  रक्षाबंधन
एक धागा क्या  बाँध  दिया 
मन महक उठा जैसे चन्दन।

साँस  बनी  एक  धागा  है 
गुपचुप  छुपकर  बाँधा  है 
जीवन  को  ही   बाँधा  है 
फ़िर भी  उसको साधा  है।

प्यार भी तो एक बंधन है 
प्यारा  सा   गठबंधन   है 
नि:शब्द सही आवेदन  है 
एक पूजा है और वंदन है।

आकाश ने ढकके रक्खा है 
पूरे  ख़याल  से   रक्खा  है 
प्यार की  रिदा ओढ़ा दी है 
बंधन में खोल के रक्खा है।

बंधन  भी  है , रंजन  भी है 
द्वैत का करता भंजन भी है 
सब करता , नहीं भी करता
कैसी माया , निरंजन भी है।

रिदा=चादर।

शिव शम्भो
अजित सम्बोधि।

Tuesday, August 9, 2022

hitting half century, well done!

You  know  today's  takeaway?
Well, it's midcentury noonday!
That brings  us here , you see
To celebrate the day with you!
Happy birthday to you!
Happy birthday to you!

When do you make a century?
Never  say it's a big trajectory!
We are tough guys , you know
We hope to be  there with you !
Happy birthday to you!
Happy birthday to you!

Life is  what  you  make it
It has  always been  like it
We know you can make it
That's why we're with you!
Happy birthday to you!
Happy birthday to you!

The assemblage assures you
That all of us here, adore you
Both who saw light of the day
Much after you or before you!
Happy birthday to you!
Happy birthday to you!

Shiv Shambho 
Ajit Sambodhi. 

Sunday, August 7, 2022

तज़मीन

                         1.
बहुत गई थोड़ी रही, वा  ऊ  बीती  जाय
नटनी सूँ नटवर कहे, ताल भंग मत लाय।
तज़मीन
मुँह से अब तक कोई ने, दई नहीं हँकार
कान  ढँके  बैठे सभी , ताल भई  बेकार।
                            2.
कहत कबीर सुनो भाई साधो 
साहिब मिले सबूरी में।
तज़मीन
द्रुपद सुता और गज कूँ तो  
साहिब मिले मजबूरी में।
                             3.
चलती चक्की देख के , दिया कबीरा रोय
दो पाटन के बीच में, साबित बचा न कोय।
तज़मीन
चलती चक्की देख के, हँसा कमाल ठठाय
कील सहारे जो रहे, ताहि काल नहिं खाय।

चलती चक्की देख के, देखा एक  कमाल 
पीसन हारी पिस  गई, बाकी करें  मलाल।
                           4.
रात गवाई सोय के, दिवस गवायो खाइ
हीरा जनम अमूल , कौड़ी  बदले जाइ।
तज़मीन
रात बितावें स्वाँग में, दिन बीतत है सोइ
ऐसे ठाठ कलजुग में , हर काहू के होंइ।
                           5.
माला फेरत जुग गया , मिटा न मनका फेर
करका मनका फेंक के, मनका मनका फेर।
तज़मीन
करका मनका, मनका मनका, सबहि दे बिसार
स्वासाँ  आवत  जात  कूँ , पल  पल  तू  निहार।
                           6.
धीरे  धीरे  रे  मना, धीरे  सब  कुछ  होय
माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय।
तज़मीन
फ़ास्ट अबकी ज़िन्दगी, फ़ास्ट अबका फ़ूड
फ़ास्ट   इन्टरनेट   से , बने   सबका    मूड।
                            7.
साईं इतना दीजिये, जामें कुटुम समाय
मैं भी भूखा ना रहूँ, साधु न भूखा जाय।
तज़मीन
साईं इतना दीजिए, हो जाऊँ मालामाल
साधू भी साधें माल , ऐसा  कर  कमाल।
                           8.
बड़ो भयो तो का भयो, जैसे पेड़ खजूर 
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।
तज़मीन
चुलिस्तान  में जहाँ, कोई न  दरख़्त  उगाइ
खजूर वहाँ भी पथिक ने देवत है फल लाइ।
                          9.
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न दीखा कोय
जो मन देखा आपना, मुझसे बुरा न कोय।
तज़मीन
भला जो देखन मैं चला, बुरा न दीखा कोय
जो मन  देखा  आपना , मैं भी  बुरा न कोय।
                            10.
जग में  बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय
यहाँ आपा तो डाल दे , दया करे  सब कोय।
तज़मीन
बैरी तो  हम  आपणे , और  न  दूजा कोय
मन से गरब मिटाइ दो, सखा बने हर कोय।

तज़मीन= Parody. चुलिस्तान=रेगिस्तान।

शिव शम्भो
अजित सम्बोधि।


Thursday, August 4, 2022

करिष्ये वचनं तव

अर्जुन बरबख़्त था , कन्हैया का दोस्त था 
रिश्ता था राब्ता था , बिलकुल  पैबस्त था
कन्हैया ने उसको जो बता दिया, गिराँ  था  
आगे आने वालों का अच्छा बन्दोबस्त था।

अर्जुन ने कहा था , मैं हर वक़्त याद रखूँगा 
जो मुझको बताया , वो कभी ना भुलाऊँगा 
बड़ी ग़लती की ख़ुद को बराबर का समझा
वो ग़लती, आदि देव, मैं फ़िर ना दुहराऊँगा ।

जो आज धारा बहाई, उसी में बहता रहूँगा 
न उससे बाहर जाके, कभी भटका करूँगा 
तुम्हीं हो ज़िन्दगी, तुम्हीं धारा , विश्वेश्वर
तुम्हीं हो किनारा मेरा, तुम्हें  पकड़े  रखूँगा।

अर्जुन का कहा  मुसल्सल  याद  रखना है 
ज़िन्दगी की धारा में  हमको बहते रहना है 
हम भी कुछ हैं , ये तो क़तई भूल जाना  है 
हर मोड़पे किनाया-ए-कान्हा याद रखना है।

बरबख़्त=भाग्यशाली। राब्ता=मेलजोल।
पैबस्त=जुड़ा हुआ।गिराँ=बेश क़ीमती।
मुसल्सल=निरंतर।
किनाया-ए-कान्हा=कान्हा का इशारा।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, August 1, 2022

मम माया दुरत्यया

पहले कभी न जो किसी को था बताया 
हो ऋषि योगी या भक्त, नहीं था बताया 
ये कैसी सख़ावत दिखाई , तुमने कान्हा 
वो भेद सहजमें निज सखा को, बताया!

तुम्हारी माया दुस्तर , ये तुमने बता दिया
तीनों गुणों से भरपूर, ये तुमने बता दिया
कोई न इसको भेद सके, और बता दिया
तुम्हीं मसला तुम्हीं वसीला भी बता दिया।

Kanha , it's a clean confession!
Who makes such a confession?
Can you provide  any  example? 
How fortunate  was dear Arjun!

क्या साफ़गोई है, कान्हा तुमने दिखा दिया 
कितने दियानतदार हो , तुमने बतला दिया 
हमारी इबादत अगर जो मुकम्मल है रहती 
माया का पर्दा हटता है, तुमने बतला दिया।

तुमको याद रखना कोई मुश्किल तो नहीं है 
तुम्हीं जब आमिल, मुझे कुछ करना नहीं है 
कभी हो पोशीदा कभी पोलाब, तुम्हारे संग
आँख मिचोली  खेलना मुश्किल  तो नहीं है।

सख़ावत=उदारता। वसीला=ज़रिया।
दियानतदार=ईमानदार। आमिल = कर्ता धरता।
पोशीदा=invisible. पोलाब=visible.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Friday, July 29, 2022

योगक्षेमं वहाम्यहम्।

कन्हैया ने कभी एक वादा किया था
हमसे भी गो कि एक वादा लिया था 
ऐसा शर्तनामा किसी ने  नहीं बनाया  
कन्हैया ने जैसा मुआहिदा किया था।

बड़ा काम उसने ख़ुद पे ले लिया था
हमारा  बोझ अपने सिर ले लिया था 
हमें  तो कमतर सा काम दे दिया था 
उसे याद रखें , बस ये काम दिया था।

अपने ज़िम्मे सारा  योगक्षेम ले लिया
मैं 'वहन' करता हूँ, ये और बोल दिया 
इतना तो  शर्मिन्दा नहीं  न करना था
ये क्या कम था, ज़ेरबारी को ले लिया।

योगक्षेम रखना कुछ कम तो नहीं है 
ये सिर्फ़ हिफ़ाज़त करना ही  नहीं है 
बल्कि जो  कमी है उसे  पूरा  करके 
ये देखना और  कुछ कमी तो नहीं है।

'ढोया करता हूँ', रब्बा क्या कह दिया 
था ख़ादिमों का काम, ख़ुद कर दिया 
माह ओ मिहिर तेरे इशारे पे हैं चलते 
कहकशाँ हैं नाचते, ये क्या कह दिया?

सौदा तो घाटे का हमें  लगता नहीं है 
किसी ने ऐसा वादा किया भी नहीं है 
एक बार आज़मालें , मन कह रहा है 
क्या ख़्याल है , कुछ  हर्ज़ तो नहीं है?

गोकि= यद्यपि। मुआहिदा=contract. कमतर=छोटा।
ज़ेरबारी=बोझा। रब्बा=ईश्वर। ख़ादिमों=सेवकों।
माह ओ मिहिर=चाँद और सूरज। कहकशाँ=galax(y/ies).

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।  

Tuesday, July 26, 2022

निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन् ।

पता है आपको ये  किसने कहा था
क्योंकर कहा था, किसको कहा था?
कान्हा  ने इसको  उस दम कहा था 
अर्जुन  को जब वहम हो  गया  था।

वो ख़ुद को अहमियत देने लगा था 
ख़ुद को  आमिल समझने लगा था 
सब कुछ तो जैसे उसी को है करना
ख़ुद को  कामिल समझने लगा था।

ये ख़ुशफ़हमी तो सभी को है रहती
हर काम में एक  'मैं' लगी है  रहती
हमारे  सहारे जैसे दुनिया  है चलती 
रब की याद भला किसको है रहती?

भेद कान्हा ने पार्थ को समझा दिया 
सही सही जीने का मर्म बतला दिया 
कान्हा की मर्ज़ी है कान्हा की दुनिया
दिखावे का ज़रिया , हमें  बना दिया।

अगर चैन से तुम्हें , रहना  है जग में
काँटा 'मैं' का जब मिले कोई मग में 
उठा के उसको  कूड़ेदान में पटकना 
नाम  कन्हैया का , रटना हर  पग में।

आमिल=कर्ता। कामिल=पूर्ण।
ख़ुशफ़हमी=स्वयं की विशेषता का भ्रम।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, July 23, 2022

I tell myself, learn !

I   tell   myself ,  learn
Before you get a burn

Don't go anywhere 
I   mean   nowhere 
Without invitation 
Or  an   avocation 
It   is   a   situation
Of high implication
You  may  be  shut out
With no way to get out
Looks like a paradox
Don't   you   flummox
Discard algospeak
Master  plainspeak
Be   a    jukebox
Not a matchbox
Be careful in future
Avoid misadventure
Get you a texture
To avoid fracture
Get   a    debenture
Before any venture
Look  for   implosion
Before any explosion
Look for a chance
To quit in advance 

I   tell   myself ,  learn
Before you get a burn

Om Shantih 
Ajit Sambodhi 




Wednesday, July 20, 2022

क्या इसे भुला सकता हूँ?

मिलकर  के  जो राह चली थी, क्या उसे भुला सकता हूँ?
इतने  जो  सपने  सँजोए थे , क्या उन्हें  भुला सकता  हूँ?

मैं मागने गया था उनको , घर उनके, अम्मा से बाबुल से 
सौंप दिया, भरोसा किया मुझ पे, क्या ये भुला सकता हूँ?

मुझे ज़रूरत थी उनकी, इसलिए माँग के लाया था उन्हें 
कैसे निभाया वो भरोसा उन्होंने, क्या ये भुला सकता हूँ?

कितनी दफ़ा चाँद को पूजा था , साथ मिलकर के हमने 
चाँद को गवाह बनाया था हमने, क्या ये भुला सकता हूँ?

उस दिन कोयल आके बोली थी अपने आम के पेड़ पे
दोनो ने झाँका था खिड़की से, क्या वो भुला सकता हूँ?

क्या सिफ़त थी, रच दिया कैसा नायाब बग़ीचा हमारा
मेरे देखते बाग़बान चला गया, क्या ये भुला सकता हूँ?

पता था बोलता कम, लिखता ज़्यादा हूँ, फ़ोन पर भी 
मौन ज़्यादा  काम आता था , क्या ये भुला सकता हूँ?

सारे मानक बदल गये , क्या कह दूँ , सावन आ गया?
जो बोलता हूँ ग़लत होता है , क्या ये भुला सकता हूँ?

पहले बिना बोले सूना न था ; अब ख़ुद से बोलता हूँ 
मगर सन्नाटा  जाता नहीं , क्या इसे भुला सकता  हूँ?

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, July 18, 2022

बाहर vs अन्दर

बाहर में जिसको तू ढूँढ रहा है 
अन्दर में तुझको वो ढूँढ रहा है 
कैसे  मिलेगी वो  मन्ज़िल तुझे 
गलती जो हरदम दोहरा रहा है।

होने  को  तो  वो हर  शय में है 
बाहर  भी है  और अन्दर भी है 
अन्दर में जब तक मिलोगे नहीं 
बाहर  नज़र वो  आता  नहीं है।

जो कुछ  बाहर  तुम  देखते हो
अन्दर का अक्स तुम देखते हो 
ऐसा नहीं है  कुछ भी  यहाँ पर 
जिसमें न तुम उसको देखते हो।

बाहर की खोज  को बन्द करके 
मन  की  दौड़  को  बन्द  करके 
बैठे  रहो  अम्न  ओ  अमान  से  
पलकों को अपने तुम बंद करके।

बाहर सिर्फ़  थकान ही  मिलेगी 
मन को पेच ओ ताब ही मिलेगी 
सब्र  रख लो , इंतज़ार  कर  लो
मन्ज़िल  तो  भीतर   ही मिलेगी।

अम्न ओ अमान= सुख और शान्ति।
पेच ओ ताब= कश्मकश।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, July 14, 2022

हुस्न ए समाअत

ये  मेपल  का पेड़  और  मैं 
ये नीला  आसमान और  मैं 
ये बादल का टुकड़ा और मैं
सब कुछ नकद है यहाँ 
नहीं कुछ उधार है यहाँ 
इसीसे  मैं  बैठता  यहाँ 
प्यार बहता इसीसे यहाँ 
प्यार बहता इसीसे यहाँ ।

चिकेडी भी आती है यहाँ 
रोबिन भी  गाती है  यहाँ 
फ़िंच  मुस्कुराती  है यहाँ 
मुझे  इनसे  प्यार   है  बहुत 
इनको मुझसे  प्यार है बहुत 
एक दूजे का ख़्याल है बहुत 
इसीसे प्यार बहता यहाँ 
इसीसे प्यार बहता यहाँ ।

हम रहें ना  रहें , बहारें  तो  रहेंगी
हवाओं  की  सरसराहट तो रहेगी 
फ़िज़ाओं की मुस्कुराहट तो रहेगी
प्यार  ही  तो एक  दौलत  है 
इसी को तो कहते मुरव्वत है 
यही  तो  हुस्न ए समाअत है 
यही तो बहता है यहाँ 
यही बहता रहेगा यहाँ ।

हुस्न ए समाअत= सुनने की beauty.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।



Wednesday, July 13, 2022

Who...if not HE?

Looking for a guru ? Better you go inside
Whatever there's outside , you see inside.
Outside you may stumble on a fake guru
But there  is nothing  called  fake , inside. 

Inside is where you can roam , if you  like
Inside is where you can quiten, if you like.
Inside is a dimension of infinite potential
Where you log as  much love as  you  like. 

Don't think it takes a lifetime to go inside
Oh no, you go  there  daily , I mean inside!
The problem is you go there while asleep
But that you were aware, you were inside!

You've counted sheep and gone  to sleep
Haven't you? It has been the way to sleep.
Now try counting your breaths to be glad!
You'll find you are awake and also inside!

Who's coming in and going out If not He? 
Who keeps awake all the time,  if not He? 
Breathing is taken for granted, am I right?
Who cares for us all the time, IF NOT HE ?

Om Shantih 
Ajit Sambodhi. 


Monday, July 11, 2022

look, look

A northerly breeze is brewing 

As a flock of flickers is  flying.

I sit  enchanted  on  the  deck

And  watch the trees swaying.


I  hear  a  thunder  somewhere 

It’s drawing nearer and nearer.

It may  start raining , I surmise

The clouds are turning  thicker.


Suddenly a streak of lightning!

A kinky dazzle perambulating!

I wonder  what it thinks of me 

As I sit uncovered, ruminating!


There's a power so benevolent 

That makes  even me, relevant. 

It made me an instrument who

Would  record  this  elfin  event!


It has made each 'n' everything 

Including me  'n'  the lightening. 

Its  space holds both of us and 

All else , in a bond  unswerving!


Om Shantih 

Ajit Sambodhi. 


Friday, July 8, 2022

पलकों को अच्छे से बंद रखना।

ख़ुद से ही ख़ुद को चुरा लेना 

मुझसे न कहना , भुला  देना ।

अपनी मायूस निगाहों से फ़िर 

मुझसे  शिकायत  ना  करना।


इस जहाँ से अलग भी जहाँ है

रगे जाँ  से  क़रीबतर  जहाँ  है ।

तुमको करना पड़ेगा ये यकीन 

निस्बत में एक और भी जहाँ है ।


चाहत  से  गिला  मत  करना 

राहत  को  मना  मत  करना

सपने तो अपने हें, आया करेंगे 

पलकों को अच्छे से बंद रखना ।


कुछ  वक़्त  गुज़र  जाने देना 

नज़रों को मुसल्लस में रखना 

वहीं पर मिलते रहेंगे हम तुम 

पलकों को अच्छे से बंद रखना।


रगे जाँ=jugular vein. क़रीबतर= अधिक क़रीब।

निस्बत = relation. मुसल्लस= triangle.


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि।


Tuesday, July 5, 2022

हम्द ओ सना

 वो ग़म से  मुझे आबाद करें 

हम  ग़म  के  सहारे  जीते हें  

हम  दर्द  के  मारों को अपने 

दिल में ही मुकम्मल करते हें ।


वो हवा चले चाहे बासन्ती 

या फ़िर लूओं की हो रानी

हमको तो दोनों  लगतीं हैं 

अपनी सी जानी पहचानी । 


कई दर्द  तो होते  दर्द भरे

कई  दर्द भी  मीठे होते हैं 

जो दर्द हमें  दमसाज़ करें

वो  दर्द  सुनहरे   होते   हैं ।


कोई आवाज़ कभी दे देता है 

यूँ ही से मगर, बाबत में नहीं 

फ़िर कितना अच्छा लगता है 

उसको भी पूछो, है कि नहीं?


बेपर्दा   रहूँ    मैं   या   दर   पर्दा

मुझको   नहीं  है   ग़म  ए  फ़र्दा 

मैं हूँ  ही  नहीं  आमिल  कब  से 

सिवा हम्दो सना नहीं कोई कर्दा।


मन में जो भी तुम  को भाए 

करलो  तुमतो  जी भर  राम

मेरा  मन   तो   हरदम  पाए

केवल  तुम  में  ही   विश्राम ।


दमसाज़= हमरंग। दरपर्दा = पर्दे में। 

ग़म ए फ़र्दा = कल का डर। आमिल= doer. 

हम्दो सना= prayer. कर्दा = किया हुआ।

ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि।

Saturday, July 2, 2022

कलंदर

मैं कलंदर हूँ  गुफ़्तार गोई किया करता हूँ
मैं प्यार हूँ  लहरों को आगोश में रखता हूँ 
मैं  सिकंदर नहीं जो ज़मीन को नापता हो
फ़िज़ाओं को लपेट, उनसे  प्यार करता हूँ ।

प्यार की ख़ातिर झुके उसे आसमाँ कहते हैं
प्यार की ख़ातिर रोये  उसे शबनम  कहते हैं
जिन्होंने  प्यार किया है , उनसे पूछ लीजिए
वो जानते हैं कि प्यार को ही  ख़ुदा कहते हैं।

जो सब जानते हैं उसे राज़ नहीं कहते हैं
राज़ तो  राज़ है, उसे  सीने  में  छुपाते हैं
एक और भी राज़ की बात  हम बताते हैं
वही होता राज़ जो हम आपको बताते हैं।

नज़रें मिलती रहीं, नाआशना क़ायम रही
फ़ासला घटता रहा, दूरियाँ मुकम्मल रहीं
है तेरे रहम का ये असर, ऐ  परवरदिगार
हम दूर होते गए, परछाइयाँ  मिलती रहीं।

अश्क पी पी कर जिया और मुस्कुराता रहा
हस्बे आदत ये ज़ख़्म ए कारी छिपाता रहा
मुझको मिली बख़्शीश में, ताब  ताउम्र की
कैसा फ़लसफ़ा था, फ़ैसला फिसलता रहा।

सिकंदर की फ़ितरत है तख़्त नशीनी  की
कलंदर की  फ़ितरत है , मलंग बाज़ी  की
कभी नज़रे इनायत हो तो देख लेना कैसे
हम खड़े हैं जहाँ, मुड़ी थी  नज़र आपकी।

मेरी सूरत न देखें  वो तो वक़्त की  पाबंद है
एक ऐसी हसरत है जो अरसे से नज़रबंद है
मुझे देखना है तो शफ़क में देख लेना, जहाँ
क़ौस ए क़ज़ह  को  बखेर रहा  नख़्लबंद है।

मेरी फ़ितरत पर तुम न जाना, मैं कलंदर हूँ 
बिना साहिल के दरिया में बहता समन्दर हूँ 
मेरी क़बा ए जिल्द में न उलझ के रह जाना
बाहर में सिर्फ़ अक्स है मेरा, मैं तो अन्दर हूँ ।
 
मैं पिघल कर रातभर, बहता हूँ बनके चाँदनी
जैसे  सरगम कोई, बहता हो बनकर  रागिनी
मुस्कराहट तो वही है कि धूप जैसी खिल उठे
या चाँद जैसे  बख़्श दे  ख़ुद की  नूरी चाँदनी।

कलंदर = सूफ़ी, मनमौजी। गुफ़्तारगोई= बातचीत ।
शबनम= ओस। नाआशना= estrangement. 
हस्बे आदत= आदतन। ज़ख़्म ए कारी= fatal wound.
ताब= गर्मी। ताउम्र = उम्र भर। तख़्तनशीनी= गद्दी पे बैठना।
मलंगबाज़ी= बेफ़िक्री। क़ौस ए क़ज़ह= इंद्र धनुष
नख़्लबंद= बाग़वान। शफ़क= क्षितिज पर लाली।
साहिल= किनारा। क़बा ए जिल्द= जिस्म की चमड़ी।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, June 30, 2022

मुहब्बत के सिवा

लबों का काम है कहना, गुलों का काम है खिलना
नज़र का काम है हँसना, दिलों का काम है मिलना 
हमें   मालूम   है   हमको ,  क्या   काम  है   करना 
किसी से है अगर मिलना, मुहब्बत से ही है मिलना।

मुझे  उनसे  मुहब्बत  है , मुझे   इनसे  मुहब्बत  है 
ये  दुनिया  ख़ूबसूरत  है , मुझे   सबसे  मुहब्बत है 
मुहब्बत  तो वो दरिया है, जो  हरदम  बहा  करता
रब   की  ये  कुदरत  है  , मुहब्बत  से  मुहब्बत  है ।

परिन्दों  की तरह  गाना, परिन्दों  की तरह  उड़ना
जहाँ तक  भी  नज़र  जाए ,  सारा  जहाँ   अपना
मुहब्बत  से  बनी  दुनिया, मुहब्बत  से ही रहना है 
मुहब्बत में  ही जीना है, मुहब्बत ही  जहाँ  अपना ।

फ़िरकों में न बाँटें या रब , ये दुनिया  एक बस्ती है 
हम  इन्सान  हैं , इन्सानियत  की   एक  कश्ती  है 
हम  जो  बात  कहते  हैं, बिल्कुल  सीधी  साधी है 
मुहब्बत से ही जीने  दो , मुहब्बत  में   ही  मस्ती है ।

तुम  अपनी अदाओं  पर , इतना  फ़ख्र मत करना
जो दम भर का है उस पर, इतना नाज़  मत करना 
हमें मालूम  है अन्जाम, न  ख़ुद  बेज़ार  हो  जाना 
मुहब्बत के सिवा  ग़ैरत में , कुछ  और मत  करना।

या रब = हे ईश्वर। बेज़ार = दुखी। ग़ैरत= शर्म।

ओम् शान्ति: 
अजित सम्बोधि।

Monday, June 27, 2022

दौलत ए मुहब्बत

कभी मीरा बिलखती थी, कभी कबिरा बिलखता था
कभी रबिया बिलखती थी, कभी रूमी बिलखता था
ये   दौलत   मुहब्बत   की   बड़ी   नायाब   होती  है 
सुदामा  के   ज़ख़्म  धो  धो  कन्हैया   बिलखता  था ।

कभी  धरती  तड़पती  है , कभी  बादल  तड़पता   है 
कभी  शबनम  तड़पती है, कभी  महताब  तड़पता है 
मुहब्बत  को  वही  जाने , जिस्ने  तड़पन को है जाना 
मुहब्बत  वो  क्या समझेगा , बिना तड़पन तड़पता  है ।

मुहब्बत   है    हक़ीक़ी    तो    एहसास    होता    है 
फ़ासला चाहे जितना  हो , मगर   एहसास  होता   है 
किसी की आँख का मोती न खो जाए यूँ ही ढल कर
नमनाक   आँखों   का   मुहासिब,  एहसास  होता  है ।

मुहब्बत  नाम  लेने   से ही ,  सावन   सा  बरसता  है 
अचानक     से     कहीं    जैसे    संतूर    बजता    है 
दिल   की   बात   ने   जैसे    नई   पहचान   है   पाई
रब    के   पास    होने     का    इसरार    बनता    है ।

भँवर  ऐसे  ही   तो   कोई , गुनगुनाया   नहीं   करता
पपीहा  यूँ  ही  तो  फ़िर  फ़िर , पुकारा  नहीं   करता 
कोई   तो   याद   ऐसी  है , जो  साँसों  में   रहती  है 
रफ़ाक़त  के  बिना  तो  गीत , निकला   नहीं   करता।

शबनम= ओस। महताब = चाँद। हक़ीक़ी = असली ।
नमनाक = ज़ियादा नम। मुहासिब = ख़याल रखने वाला ।              
इसरार= जिद करना। रफ़ाक़त= नज़दीकी ।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Friday, June 24, 2022

exuberence algorithm

It was  all  over there  on  display 
All  the  fun, fuss , and , foofaraw.
It was the international yoga day
And  welter, whirl, and williwaw!

This isn't yoga's be-all and end-all
Yoga is a science of  big  potential.
It revamps the whole, big or small
From the physical to the essential!

It links us  with  the  cosmic  hymn
So we learn to tune with its rhythm.
We  cross  the  physical  borderline
By  way  of  exuberence  algorithm!

Exuberence is  essence of existence 
It's energy's vibrating luminescence.
In  meditation  darkness  fluoresces
It becomes an  ocean  of  effulgence. 

Beyond the  physical is the  essential 
It should be our endeavor to attain it.
All we need is to become deferential 
Yoga is the way to  make us fit for it!

Effulgence translates into singularity!
Everything   stops.  Singular   silence !
Then  Blue   Bang   happens. A  rarity!
For the insider, there abides  cadence!

Om Shantih 
Ajit Sambodhi.


Tuesday, June 21, 2022

The sprinklers

The sprinklers are joyfully sprinkling 
Turning all  around,  while sprinkling 
Clouds of fine drops  hang in  the air
 It looks like the clouds are drizzling!

As the drops touch the fading roses
They blush &  turn into red red roses!
Daisies too, don't lag, too far behind 
They burst into smile and rub noses!

Dianthuses put on big velvety smiles 
Seem all set to foot  miles and miles.
Marigolds are  their old self, grinning
Standing steadily  without any guiles. 

Three cheers for the brave  sprinklers 
And three cheers for smiley  showers
Lest you forget the hand behind them
Three cheers for Vineet's  watt-hours! 

Om Shantih 
Ajit Sambodhi. 

Sunday, June 19, 2022

Father’s Day

Happy father's day , Happy father's day
I wish one and all , Happy father's  day.
I welcome you 'n' your august presence
They are enough to tempt one to sway!

I am like a bird. All birds have feathers
They can not fly , without two feathers.
One feather is father , the other mother
I too have lived with , parental feathers.

When they're here, they took me places
To play life's game , they  gave me  aces.
I did my bit very well, but when I failed
All  I  got  were   their  warm  embraces!

I'm what I'm it's because of  my parents
When they're here, days became events.
I'm sure it's so for everyone everywhere 
Life looks like rainbow with our parents!

I am grateful to all , you came over here
Your presence has brought all the cheer.
One and all have contributed their  best
To make  everybody  come a little  near! 

Om Shantih 
Ajit Sambodhi. 


फ़ादर्स डे

                          1
ये  शाम  सुहानी  है , मौसम  की  रवानी  है 
मेरी   ज़ुबानी   है , गो  कि  बात  पुरानी  है 
मुबारक हो  आप सबको , ये  शाम  सुहानी 
ये तो आपके ही दिलकी , नायाब कहानी है ।

प्यार देने के सिवा मा ने, कुछ और नहीं जाना 
अपनी  जान  से  बढकर , औलाद  को  माना ।
पापा ने हिफ़ाज़त को , हिफ़ाज़त से है रक्खा
औलाद की  सलामत, अपना  फ़र्ज  है  माना।

मा ने गोदी में  सुलाया, आँचल का  प्यार देकर
पा  ने  कंधे पे  उठाया , नज़रों  से  प्यार  देकर।
ये  कहानी  है  पुरानी, लगती  है  ताज़ा लेकिन 
हर दिल ने इसे   जाना , कसौटी  पे   कस  कर।

एक हाथ  पकड़ती मा , एक हाथ पकड़ते पा
और बीच में चलता बच्चा , उठा  उठा  के  पा
बच्चा  क्या  मिल  गया , मिल  गया  है  जहाँ 
कभी मा उठाती उसको , कभी उठाते हें पापा।

ये  शाम  सुहानी  है ,  मौसम  की  रवानी  है 
मेरी  ज़ुबानी   है ,  गो  कि   बात  पुरानी  है 
मुबारक हो  आप सबको , ये  शाम  सुहानी 
ये तो आपके ही दिल की , नायाब कहानी है ।

नायाब= matchless. सलामत= सुरक्षा।

                                          2
जिनकी  बदौलत  बैठे  यहाँ  पर , उन्हें याद करना  हो  पा रहा है 
रब का करम है हम सब के ऊपर, सुहाना सफ़र तय हो पा रहा है ।

मालिक कहीं पे दिखता नहीं है, उसका करम कैसे मिल पा रहा है 
माता  पिता  हें  नुमाइंदे  उसके, ऐसे करम  हमको  मिल पा रहा है ।

सबको  नमन  है  मेरा  यहाँ  पर, आपस में मिलना हो पा रहा है 
जुदा सबकी मंज़िल जुदा सबकी राहें, मिलना मगर हो पा रहा है ।

जिनकी बदौलत मिले हम यहाँ पर, उन्हें याद करना हो पा रहा है 
ऐसे  ही  आगे  भी मिलते  रहेंगे, ऐसा  भरोसा भी हो  पा  रहा  है ।

मुझको   इज़ाजत  अब  दीजिए , भारी से मन से मैं  कह रहा हूँ 
मालिक से अब ये दुआ कीजिए , फ़िर से मिलाए ये  कह  रहा हूँ ।

बदौलत = कारण से। रब= ईश्वर। करम= क्रपा।
नुमाइंदा = representative. जुदा= separate. 

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, June 18, 2022

Maple tree

 I’m now sitting under the  maple  tree 

He gives me  shade from sun  for free.

We’ve been chums since  his boyhood 

Now he has become a handsome tree!


He stands up by the corner of the deck

That’s my  favourite place on the deck.

Whenever I stand up my full length up

His leafy branches half cover my back!


His leafy branches look like leafy arms

And  caress me as did my mom's arms.

I am deeply touched by his love for me 

And in return, embrace him in my arms! 


Om Shantih 

Ajit Sambodhi. 


Wednesday, June 15, 2022

Madison Backyard

I am with my daughter in Madison 
She grows flowers, that often stun.
Seven cypresses and a maple tree!
I'm here because I need lot of sun.

I sit all through, under the maple
On a chair with an L shaped table
There hangs a feeder for the birds
I seek every way to  keep it stable.

Birds are lovely, light , and swift
They are Nature’s  precious  gift 
They come to me in numbers big 
Sing songs for me like a  Sophist!

What's life but a rhythmic number
That  short-circuits  our  slumber? 
We come and go , fast  and  slow 
His grace doesn't let itself cumber!

Om Shantih 
Ajit Sambodhi.


Sunday, June 12, 2022

झंडा

उसने आपका झंडा उखाड़ कर ख़ुदका लगा दिया 
आपने उसका झंडा उखाड़ कर अपना लगा दिया।
आप बेदाग़ कैसे रह गए , एक सा ही काम करके 
उस ने पहले किया और आप ने बाद में कर दिया ?

हसद एक मुफ़्तख़ोर है , जिसे नाहक पनाह दी है 
गुमनाम रहकर उसने दिलों में शिगाफ़ खींच दी है 
रब ने तो इन्सान बनाया था , हर तरफ़ से हमवार 
इंसाँ ने मज़हब और सरहद की लकीरें खींच दी हें।

मालिक ने तो न मज़हब बनाया और नाही सरहद
कोई बतला दे हमें जहाँ नहीं है मालिक का अहद?
मालिक ने तो करम करके बनाया था एक इन्सान 
उसकी इंसानियत कहाँ खो गई,कैसे आगई हसद?

देखो इन्सान की तरजीह कैसे  तब्दील हो चुकी है  
उसकी  बरतरी अब  तिशनगी ए लहू  बन चुकी है 
जिधर देखो जंग और ख़ूनी रंजिश नज़र  आती  है 
इन्सानियत हैवानियत की,अदल बदल हो चुकी है।

इस तस्वीर को बदलने की बस एक ही तरक़ीब है 
मान लो कि जो ख़ालिक है , वही हमारा  हबीब है
हम खाली हाथ आए थे , खाली  हाथ  ही  जाऐंगे 
उसके हाथ ख़ुद को सौंप दें, वही हमारा तबीब  है।

हसद= डाह। शिगाफ़ = दरार। हमवार= इकसार।
अहद= दायरा। तरजीह = बरतरी= priority.
तिशनगी ए लहू= ख़ून की प्यास। ख़ालिक= creator.
हबीब = प्यारा। तबीब = हकीम।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, June 9, 2022

GRACE

I wonder  how  everything  conspired
To  come  together  and  be  admired.
The  sun , the   moon , the  stars  and 
The gorgeous sky , all  so well attired.

What have I  done to  have all of them
For me? How did everything just stem
To make me comfortable  and at ease? 
They look so wonderful, like a diadem!

When  I am  empty of me , I  can  see
What most of the time, I just can't see
That there's grace flowing everywhere 
That  holds  everything, including  me! 

At that time, there's so much harmony 
I  suddenly  find, I  am  free  of  agony.
All  my  huffing  and  puffing  is  gone
The rough and tough has turned satiny!

Om Shantih 
Ajit Sambodhi. 



Monday, June 6, 2022

my god

I  think   I  see   my   god   all   day

How else I tell my night from day?


I  see  his  sky  blue  in  hue

It stays alive, it's  truly  true.


He  made the  trees that  look to  him

And falter  not  as  they  pray  to  him.


His   birds   sing   songs  all   the  time

I don't  hear  elsewhere  such  a rhyme. 


He transits me  while I'm  asleep 

And keeps me awake in my sleep!


To know fairly well what I say

While in sleep, awake you stay!


Om Shantih 

Ajit Sambodhi

Saturday, June 4, 2022

आफ़ताब ए फ़लक

सुबह जब शम्स उठता है मेरा सर झुकने लगता है
मेरी आँखें दुआ करतीं वो उन्हें जब  छूने लगता है
मैं अपने दिल में ज्यों ही , मुकर्रर उसको करता  हूँ
मेरा  फड़फड़ाता   दिल , मुझे  ख़ामोश  लगता  है।

इधर  चिकेडी  चहकती है  उधर  सूरज  दमकता है
वो  मेप्पल  हिला के  डाली, ख़ैर मक़दम  कहता है
मैं  जब  खो  रहा  होता  हूँ, हवा  मुझको जगाती है
देख  कर  सारा  नज़ारा  आसमाँ , हँसने  लगता  है।

सूरज  की  आहट  से  अँधेरा , मिटने  लगता  है
ज़र्रा ज़र्रा  ज़मीं  का  फ़िर  से , जगने  लगता  है
आसमाँ  से  ज़मीं  तक  शुआऐं  रास्ता बनातीं है
मिल कर के उनसे हर  गुल, मुस्कुराने  लगता  है।

ये  रिश्ता  मेरा उससे, साल दर साल सलामत है
वो  मेहरबाँ  मुझ  पर, मुझे  मिलती  क़राबत   है 
उसकी सखावत देखकर  मैं उससे  मुतास्सिर  हूँ
उसकी सदाक़त ही  बन गई  उसकी  सदारत  है।

उसकी  सदारत  में हुआ करती हर शै लाजवाब
तकदीर  का  सूरज  चमकने   लगता   बेहिसाब
विरासत  के  लिए  जो  समझते  थे  अहम, बेटा
बेटियाँ  साबित  हो रहीं हैं  फ़लक  में आफ़ताब।

आफ़ताब ए फ़लक= आसमान का सूरज।
चिकेडी= chickadee. मेप्पल= maple.
शम्स= सूरज। ख़ैर मक़दम= स्वागत है।
शुआऐं= किरणें।क़राबत= निकटता। 
सख़ावत= उदारता।मुतास्सिर= प्रभावित।
सदाक़त= सच्चाई।सदारत= अध्यक्षता। शै= चीज़।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Friday, June 3, 2022

समझ ले

जी भर के तू अपनी सी कर ले 
मनमानी तू  अपनी सी कर  ले 
कुछ भी हासिल न कर पायेगा 
कितनी  भी शोरिश तू  कर  ले।
नाकामियाँ  मुसल्सल   मिलेंगी 
सीने कितने भी चाक तू कर ले ।

ज़ुल्म चाहे तू जितने भी ढा  ले 
सीने छैनी तू कितने भी कर  ले
जाना    तो     तुझको    पड़ेगा 
कोशिश चाहे जितनी भी करले।
इन ज़ुल्मों से  एक दिन  नजात
पा जायेंगे, कुछ  भी  तू  कर ले।

तू ख़ुदको ख़ुदाही समझने लगा 
हुकूमत है ख़ुदकी समझने लगा 
ऐसी नादानी क्यों तू करने लगा 
कि मुर्दे को अमर समझने  लगा 
थोड़े दिन का ही खेल है ये सब
करले कुछ दिन का खेला करले। 

घास  का  पत्ता  बना  सकते हो?
छोटी  सी  चींटी  बना सकते हो? 
किस  बात  का गुमान करते हो?
हाँ  बहुत  कुछ  मिटा सकते हो
पर वो पागलपन है, समझते हो?
गुरूर को ताकत मत  समझ ले
गुरूर मिटा करता है,  समझ ले ।

तमाम चेहरों पे लगा मेकअप है 
समझता नहीं तू कब ब्रेकअप है 
ये तो  बता खाली हाथ जाने को
कितना बटोरेगा, कब शटअप है?
मलिक उल मौत घूस लेता  नहीं 
अभी वक्त है,  थोड़ी सीख ले ले।

शोरिश= उथल पुथल। मुसल्सल= लगातार।
चाक करना= फाड़ देना। मलिक उल मौत= यमदूत।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

एतिराफ़ ए मुहब्बत

तुम मानो न  मानो  सदा  ही
मैं   तुमको    मनाता   रहूँगा
ज़िन्दगी को रखूँगा सलामत
ज़िन्दगी  को  मनाता  रहूँगा।

मुहब्बत  के   किस्से  सुना  के
उसको   ही  शाहिद   बना  के 
उसकी  ही  ख़ातिर  मैं  हरदम
सिराजे दिल को जलाता रहूँगा।

आरिफ़   हो  तुम  जाना  मैं  ने
आबिद   हो  तुम  माना   मैं  ने
छिपा  के दुनिया  की नज़रों से
मैं  दिल  को  ये  बताता  रहूँगा।

मुहब्बत का कोई  मुक़ाबिल नहीं
मुहब्बत  का   कोई   सानी  नहीं  
मुहब्बत के दरिया का शनवार मैं 
मुहब्बत को हरदम लुटाता रहूँगा।

आईना  मैं जब भी उठाया करता
देख के मुझे वो मुस्कुराया करता
मुस्कुराहट का  ये अंदाज़ उसका 
मैं उसको सदा ही  सुनाता रहूँगा। 

मुहब्बत  तो बस एक  फुलवारी है
ज़रदोज़ी है, हमवार है, बुर्दबारी है 
कोई  मुहब्बत के छींटे भर डाल दे
मैं   ता उम्र  इबादत  करता रहूँगा।

जब करी थी  मैने  गुज़ारिशे इबादत 
उसने  दिखाई  थी  ये  राहे  मुहब्बत 
तोड़  करके  सभी तिलस्मे फ़जीहत 
मैं बा करीना  मुहब्बत  करता रहूँगा।

दिल की बातें  सभी कहना चाहते  हैं 
ये अलग है, कहते कहते रुक जाते हैं 
ये मेरा वायदा है कोई अगर सुनाएगा 
मैं दिल को पाबंद कर, सुनता रहूँगा। 

चाँद  तो  आस्माँ  का  होके रह गया 
दूर से ही  चक्कर  लगा के  रह गया 
चाँदनी  ही  आती है  सफ़र तय कर
मैं उसी से  सारी उम्र  मिलता  रहूँगा।

पुराने लमहे  जब भी गुफ़्तगू  करते हैं 
जाने कितने चेहरे उभर आया करते हैं 
यादों का एक समन्दर हो जायेगा जब
मैं  उसी  में  डुबकियाँ  लगाता  रहूँगा।

एतिराफ़ ए मुहब्बत = मुहब्बत की स्वीकार्यता।
शाहिद = प्रेमी। सिराजे दिल = दिल का चिराग़।
आरिफ़= सूफ़ी। आबिद= तपस्वी। मुक़ाबिल = equal & opposite.
शनवार= तैराक। ज़रदोज़ी= सलमे सितारे जड़ी हुई।
हमवार= इकसार। बुर्दबारी= सहनशीलता।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।


Saturday, May 28, 2022

आबशार

ऐ बादे सबा, तुझको मेरा नमन
तूने महका दिया है , मेरा चमन।

हर आहट पे मेरा बचपन मौज़ूद रहता है 
हर याद में वो ख़याल  महफ़ूज़  रहता है ।

कागज़ का सफ़ीना था, और  सवार  हो   लिए 
रज़ा दिल की; छोड़ा अंजाम,  किस्मत के लिए ।

जहाँ मिली नफ़रत  वहाँ, कुछ प्यार देता गया 
नामों नसब चलाना है, ये ख़याल रखता गया ।

मुझे बरतर मानने की, गलती करना नहीं 
फिर कहोगे इन्सान है, ये तो मसीहा नहीं ।

ये  तो हकदारियाँ  हैं, तनहाईयाँ नहीं 
इनसे जुदा हो के रहना, आसान नहीं ।

बहुत पहले से  तन्हाई मेरी मंसूब है
अब इस रिश्ते को तकमील दे दी है ।

कभी कोई  माँगे तो,  दे  भी  दिया  करो
ज़िन्दगी की इज़्ज़त,  कर भी लिया करो।

ख़ूबसूरत  चेहरों  की  तलाश  नहीं  है  
जो मुस्कान सुकून दे, वही ख़ूबसूरत है ।

कहीं जबल, कहीं वादी, ज़िन्दगी रुकती नहीं 
कोई  लग्ज़िश न भी  हो, आज़ार रुकती नहीं ।

भूलने वाले को भुलाने के लिए, क्या  चाहिए 
बस अपने सीने में, उसके जैसा दिल  चाहिए ।

दरियादिल है ज़िन्दगी, वो तो दे ही देगी
चाहे कुछ भी न माँगो वो सब कुछ देगी ।

जो छोड़ के गया है, लौट आए ज़रूरी नहीं 
परिंदे लौट आते हैं, शाम को, हर कोई नहीं ।

आजकल वक्त आता है नामाबर बनकर
बड़ी मुहब्बत से कुछ पुरानी यादें लेकर ।

यादों से जो  महक उठा करती है 
दिल का चमन महकाया करती है ।

बादे सबा= सुबह की पुर्वैया हवा।
सफ़ीना= कश्ती । नामों नसब= वंशावली ।
बरतर= अधिक । मंसूब= मँगेतर। तकमील = पूर्णता।
जबल= पर्वत। लग्ज़िश= चूक। आज़ार= बीमारी।
नामाबर = डाकिया। आबशार= झरना।महफ़ूज़= सुरक्षित।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Wednesday, May 25, 2022

शासकीय दोहे

हम हैं शासक देश के, सब  ही जानें  याहि
जो चाहें हम करि सकें, हम कूँ डर है नाँहि।

शासन करने के लिये , हम रहते  स्मार्ट 
शासक उसको जानिये, पहले मारे डार्ट।

जनता हमको चाहती, हम जनता को चाहें 
हम करते हैं काज वही, जो जनता है  चाहे ।

जब लूऐं चलने लगें, करते  बिजली बँद
लोगो का  पैसा बचे, घर  में  हो  आनँद ।

देश  बचाने  के  लिये, बम  बनाते  खूब
जनता बड़ी सयानी है ,भूखी रहले खूब ।

अस्पताल में अगर जो, मिले न दवा अनमोल 
हो  जाता है  आप  ही , आबादी      कन्ट्रोल ।

ग्रीन हाउस की गैसें , बढ़ें  तो  बढ़ा  करें
जनता की हैं  फैक्टरी, कबहु न बँद करें।

प्रथ्वी की क्लाइमेट जब, हो जायेगी  चूर 
मँगल  पे  बसि  जाएँगे, चाहे जितनो  दूर।

हम शासक बेजोड़ हें, मानें न कबउ हार
क्रियेटर छिपतो फिरे, कबहु तो लेंगे मार।

स्मार्ट = smart. डार्ट = dart. क्रियेटर = creator.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, May 22, 2022

दोहे विज्ञानी

देखि दिनन  कौ फेर रे, मति  घबरावे  तू 

कहिके कान्हा सूँ व्यथा, बन बेफिकरा तू  ।


दुनियाँ  जाने   है  रची , वा  ही वा  को  पीर 

अपनो तो बस काम यो, जी भर खाओ खीर ।


होवे  तो   वाई   सदा, जो   चाहें   रघुवीर

अपने तो बस में यही, चिंता भजें कि धीर।


सूरज  उगताँ  ही  करो, दर्शन  राजी   होइ

दिन बीते सुख सूँ घँड़ो, व्यथा न होवे कोइ।


दिन में जब अवसर मिले, देखि लेउ  आकाश 

श्रद्धा  सूँ   करिलो  नमन, कटि हें सिगरे पाश।


धरती कूँ करिके नमन, तब ही  धरिओ पैर

वा  ही   माता  आपणी, वा  ही  राखे  खैर।


जिसको कहते शून्य सब, उसमें ही सब सार

सब कुछ उपजा शून्य से , ये ही सच्चा  सार।


जानन कूँ इस जगत में, मात्र शून्य विज्ञान 

शून्य बनन के वास्ते , धरो शाम्भवी ध्यान ।


चलते, फिरते, उठते, गिरते, दुश्कर नहीं यह काम

शम्भु  जी  की  यह  क्रिया , साधे   सिगरे   काम।


पँच तत्व को नमन करि, अपने  ह्रदय सजाय

प्राप्य  हेतु   निवृत्ति  को , सबसे सरल उपाय ।


चैस्ट  ब्रीदिंग  छोड़  के , बैली  ब्रीदिंग  कर 

पूरी   उम्र   पाने   को , ब्रीदिंग रेट  कम कर ।

   ॐ                         ॐ                          ॐ

पीर = master guide . धीर = धैर्य , धैर्यवान ।

बैली ब्रीदिंग = diaphragmatic breathing. 

ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि।

Thursday, May 19, 2022

दोहों में फैशन

 फैशन  के  बाजार  में , फैशन  के  परिधान 

फैशन सिर पै चढ़ि रही, नहि फैशन सो ज्ञान । 


फैशन  को  समझे  नहीं, वा  सो  मूरख  कौन 

सब  कोई  गिट  पिट  करे, वा  ठाड़ो  है  मौन ।


पीज़ा बरगर कोला , ब्रेड बटर  सब  जानें

फैशन के  मारे परि ,  छाछ  नहीं पहिचानें। 


अल्थी पल्थी मार के, जीवण करो न जाइ

फैशन के काँटे बिना, मुख में ग्रास न जाइ ।


पैर छुअत    में कऊॅ,  रीढ़  न टूट ई जाइ

फैशन  की  बारात में,  सब करें हाइ हाइ ।

 

नेता  या फिर अभिनेता, फैशन  सबको भाइ

कोट, पेंट,  टाई,  बिना , छात्र  क्योंकर  जाइ ?


फैशन के बाजार में, ढूँढत   अपनी जात

फटी पेंट, टैटू बिना , बने  न  कोई  बात।


जब  तक  फैशन  ना  करो, कोई  पूछत  नाँहि

सब  सोचत  या   अनपढ़ो , जाकूँ  देउ  भगाहि ।


फैशन  में  फैशन  रहे, फैशन  कहूँ  न  जाइ

कोई  जो  चाहे  कहो , फैशन  खूब   सुहाइ।


जैसे पूड़ी नहि बने, बिन  गेहूँ के चून

तैसे फैशन के बिना, सब लागे है सून।

हाइ= Hi!

ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि ।


Monday, May 16, 2022

Buddha Poornima

Today is Buddha Poornima, the full moon day 

It’s said Buddha got enlightenment on this day.

He is held the tenth embodiment  of the Divine

The only one who isn’t mythological, so to say.


Enlightenment, well, is recklessly tossed about 

It’s everywhere, from coffee table to self doubt.

It is not entanglement or its copy or its travesty 

Nonchalantly, it’s a distant cry for any gadabout.


It’s beyond the realm of the physical and mental

It is also beyond what revs the duo, their mantle.

Enlightenment is an alignment with the creation 

In which the seeker & creation are complemental.


The job of the moon is that of a catalytic mentor 

The moon factors in, whatever may be the factor.

Full moon fast forwards on full throttle, & hence

Whoever needs last ditch effort, is the benefactor!


Buddha had worked on himself for six years, and 

He was immediately in need of the last push, and 

It happened, in totality. Everybody stood blessed:

Moon, river, pipal, virgin, kheer!What a Godsend!


Om Shantih 

Ajit Sambodhi.


Friday, May 13, 2022

किधर गई ?

 अभी हवा जो आई थी, वो किधर गई 

एक महक सी आई थी, वो किधर गई ?

यहाँ पर एक बस्ती सी हुआ करती थी 

आँखों को धोखा हुआ क्या, किधर गई ?

आईने में देखा था एक अक्स हसीन सा 

वो तस्वीर जो नक़्श हुई थी, किधर गई ?

पाया भी, खोया भी, फ़िर क्या हुआ था 

कुछ यादें तसव्वुर में थीं, वो किधर गईं?

लिखा, याद है, बहुत लिखा, पै एक दिन 

लिखा मिटा दिया, शगुफ़्तगी किधर गई ? 

कुछ दिल में कुछ आँखों में रखा करते हें 

वो सलीका रखने की बसीरत किधर गई ?

दरीचे में क़दम से चिलमन खिसकती थी 

आहट पहचानने  की वो ज़र्फ, किधर गई ?

रहबर बिन कैसे बढ़े राह, जब से फँस गई 

क़िस्मत के पासे में, राह न जाने किधर गई ?

सब कुछ सीखा था पट्टी पर, अब दिखता 

नहीं  गेरू कहीं , खड़िया जाने  किधर गई ?

जो सुना करता था  रबाबो बरबत की धुनें

 पैहम अब वो सज्जादे समाअत किधर गई ?

खनकती आवाज़ में तैरती सरेशाम की वो

सुरमई शरमाहट ओ मुस्कुराहट किधर गई ?

कभी क़ाबिल थे हम, पै अब क़ाबिल न रहे 

सब्र करने की हमारी  दरख़्वास्त किधर गई ?

रौशन थी ज़िंदगी और, मुझको ख़बर न थी 

अँधेरों से क्या पूँछूँ, मेरी परछाईं किधर गई ?

लड़ते थे बिना अस्लहा, वो सादगी चली गई 

किससे पूँछूँ जाकर , मेरी इबादत किधर गई ?

बहुत देर लगी समझने में क्या खो दिया मेंने 

वो जो आजाती थी देखके रौनक़ किधर गई ?

अभी चूँ चूँ करती चिकेडी आई  थी मेरे पास 

मेंने पूँछा, क्या हुआ, बसँती निदा किधर गई ? 

कहने लगी, मैं बच गई, समझो ये  ग़नीमत है 

मई का महीना है, गर्मी लेगई, और किधर गई ?


अक्स = image. नक़्श = imprint. तसव्वुर=कल्पना।

शगुफ़्तगी = आह्लाद । बसीरत = insight. ज़र्फ़ = skill.

रबाबो बरबत = lyres.  पैहम = लगातार ।निदा = call.

चिकेडी=chickadee.Its spring call is chickadee dee dee.

सज्जादे समाअत = सुनने की/का उपासक ।


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि ।


Tuesday, May 10, 2022

बंजर का मंज़र।

वो शोर से शोर को मिटाया करते हें

दीवारें उठा के, प्यार बढ़ाया करते हें

मेरी समझ में नहीं आ रही है ये बात  

वो बन्दूक से बात समझाया करते हें ।

 

प्यार मर गया तो नफ़रतें रह जाँऐंगी

इन्सान  न रहेगा , सरहदें रह जाँऐंगी

बारूद के ढेर पर बैठ के हम लड़ रहे 

कुछ न बचेगा वीरानियाँ बच जाँऐंगी।


वो लड़ाई को लड़ के मारना चाहते हें 

वो बैरी को बैरी बनके मारना चाहते हें 

मालिक ने सब कुछ बख़्शा है मुफ़्त में 

वो उसको हटा के अपना नाम चाहते हें ।


हम तरक़्क़ी पसन्द हें, वे बताया करते हें 

हम एक धरती, हज़ार देश हुआ करते हें 

पहले एक गाँव एक घर, हुआ करता था 

अब एक गाँव एक सौ घर हुआ करते हें ।


कभी एक घर में इतने लोग हुआ करते थे 

बातों के सिलसिले ख़त्म, न हुआ करते थे 

अब बूढ़े वृद्धाश्रम में, बच्चे फ्रंट पर जाते हें 

पा सकेंगे वो दिन, जो पहिले हुआ करते थे ?


अब तो प्यार जैसे चिल्लर में मिला करता है 

कुछ अभी कुछ फ़िर, थैली में मिला करता है 

बहुत चाहते हें, कभी कोई सिल्ली मिल ज़ाइ

आख़िर उम्मीद पे ही हर ख़्वाब टिका करता है ।


बंजर ज़मीन है, इसको बारिश की ज़रूरत है 

सोच में खोट है, इसे सूझ बूझ की ज़रूरत है 

इन सूखे सूखे चेहरों पे, मुस्कान आने दीजिए 

मुस्कान लाने के लिए, मुहब्बत की ज़रूरत है ।


मुहब्बत माँगी नहीं जाती , बस बाँटी जाती है 

किश्तों में नहीं दिया करते, ये उँडेली जाती है 

सूरज चाँद तारे, और न जाने क्या क्या है वहाँ

सारे रिश्तों में बस , मुहब्बत ही नज़र आती है ।   


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि ।

Saturday, May 7, 2022

चाचा की चौपाल !

ये यहाँ की चाचा की चौपाल  है 

यहाँ मिलते हर रँग के कव्वाल हें 

मिलता सब को,  सब का हाल है 

यहाँ रहता क़िस्सों  का  धमाल है । 

                        I

मिट्टी के चूल्हे में हो लकड़ी की आग 

धीमे से खदकता हो सरसों का साग 

सिल बट्टे पे पिसी हरी मिर्ची के साथ 

कुरकुरी मक्की रोटी, लगती है स्वाद ।


ये तो वहीं पड़े रहेंगे, जहाँ पे पुरखे थे 

ज़माना आगे गया, वहाँ से जहाँ वे थे 

अब तो माइक्रो वेव पकाता है झट से 

हड्डी गला दे, इतने ग़र्म कभी अँगारे थे ?

                      II    

मकान की छत पे , रहता है मेरा  मचान 

रात में सोता मैं, तान  के पूरा  आसमान 

मत समझ लेना, मैं सोता हूँ अकेले वहाँ 

तारे भी आ जाते हें, ले के अपना सामान !


सूरज उगने से पहिले, बुलबुल बोलती है 

बड़ी समझदारी से, इस्तक़बाल करती है 

आख़िर सूरज से ही तो , दुनियाँ चलती है 

मुझको जगाने का भी वही काम करती है ।

 

वो होशियार लोग हें, फ्रिज में से खाते हें 

आधी रात को भी उठ कर, पीज़ा खाते हें 

सुबह उठते ही पहिले, सब बरगर खाते हें 

बड़े ठाठ हें उनके दिन में मैकरोनी खाते हें । 

                    

सब के सब गद्दे जैसे गुदगुदे हो रहे हें

सूरज सर पे चढ़ गया, अभी सो रहे हें 

दुगने मोटे गद्दों पे, ए.सी. में सो रहे  हें 

पता नहीं पड़ोसी क्यों परेशाँ हो रहे हें ? 

       ॐ            ॐ              ॐ             

बाई कह रही थी , किसी को बताना नहीं 

हर महीने बिल आता है, बात बताना नहीं 

डाक्टर का,  मेरी साल की पगार जितना 

कमाते किसके लिए हें? बात बताना नहीं । 

                       III

“मारो मारो”,  झण्डे पर यही निशान था 

ताक़त दिखाने का , एक यही पैमाना था 

बचाने का ज़िक्र तो कहीं पे, कभी  न था 

बचाना कभी भी, कोई मुद्दा रहा ही न था । 


हर ओर एक नारा है, दुश्मन को मारना है 

अपनी फ़ौज के  लिए असलहा बनाना है 

बड़ी मुश्क़िल, हर तरफ़ दुश्मन ही दुश्मन 

दोस्त तो है ही नहीं , फ़िर किसे बचाना है ?


गाँव की ज़मीन को तो फ़ैक्टरी निगल गई 

ताज़ी हवा को फ़ैक्टरी की गैस निगल गई 

मोर की आवाज़ फ़ैक्टरी की सीटी खा गई 

इतना विकास ! मेरी तो हवा ही निकल गई !


इस्तक़बाल = स्वागत । असलहा = armament.


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि ।

Wednesday, May 4, 2022

ज़िंदगी

वाह, क्या ख़ूब दिलफ़रेब ज़िन्दगी है 

इम्तिहानों की कैसी, नुमाइश लगी है ।


यहाँ तो हर तरफ़ बस आईने ही लगे हें 

लोग हें, इश्के मजाज़ी देखने में लगे हें । 


इश्क़े हक़ीक़ी के वास्ते एक उम्र चाहिए  

इबादत करने के लिए भी समझ चाहिए ।


रुलास आए तो समझना इश्क़ हो गया 

जिसे ख़ुद से ज़्यादा चाहा वो रुला गया । 


यही चाह है मेरे हिस्से की धूप पाता रहूँ 

और अपनी  कश्ती का  नाख़ुदा बना रहूँ ।


हालात बदल जाने  से पैमाने बदल जाते हें 

ये कैसी  मनमानी है, इन्सान बदल  जाते हें ।


ज़िन्दगी में  सादगी ही बस  एक ख़ज़ाना है 

बाक़ी कुछ  भी कर लो, सब एक  बहाना है ।


ज़िन्दगी में रहती  तब तक ही  ख़ासियत  है 

जब तक चेहरे पे रहा  करती, मासूमियत है ।


हर तरफ़ यहाँ  बिखरा हुआ  पड़ा जलाल  है 

जमाल का अब भी क्या किसी को मलाल है ?


सारी उम्र  का असासा, मेरी  यही इबादत  है 

मुझसे मिलने की यही तज्वीज़ ए अयादत है । 


जब भी मन करे, इबादत  कर लिया  कीजिए 

इबादत  ऐसी बरबत, कभी  भी बजा  लीजिए ।


इश्क़े मजाज़ी = दुनियावी मुहब्बत ।

इश्क़े हक़ीक़ी = रब के लिए मुहब्बत।

नाख़ुदा = नाविक । जलाल = भव्य प्रकाश। जमाल = हुस्न।

तज्वीज़ ए अयादत = बीमारी के बहाने से मिलना । 

बरबत = lyre. असासा = सामान ।


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि।


Sunday, May 1, 2022

सबीर हका के नाम

आज  मज़दूर  दिवस  है

एकसौ बत्तीसवाँ बरस है ।

कौन होते हें  ये  मज़दूर  

वे ही जो होते है मज़बूर ?

सभी को देते जो मकान 

ख़ुद के होते नहीं मकान ?

मज़दूरनी के गर्भ में आते हें 

तब से  मज़दूर बन जाते हें ।

ये सबीर हका  कह रहा है 

एक  मज़दूर  कह  रहा  है । 

बिना खिड़की का कमरा 

किराए पर मिला कमरा। 

आसमान को कहता मैं घर 

इस  को  कैसे कहूँ  मैं घर ? 

छह  लोग  रहते  हें  इसमें 

अहले  बैत रहते  हें  इसमें। 

मौत से भी  डर लगता अब  तो 

उस जहाँ में भी मज़दूर बना तो ? 

पुलिस  मुझे तलाश कर  रही है 

क्या सरकार नज़्मों से डर रही है ? 

सब किताबें क़ब्र में ले जाऊँगा 

अपने साथ इन्हें दफ़्न कर दूँगा । 

ॐ           ॐ           ॐ

सबीर,  सुनो  तुम  साबिर  हो 

हका, तुम  हक़ के शाकिर  हो । 

तुमने तो  एक ख़्वाब  देखा था 

तुमको तो  एक घर  देखना था ।

ऊँची इमारत चढ़ के देखना था 

दिल को सजाए, उसे देखना था । 

तुमने कहा है ख़ुदा भी मज़दूर है

हाँ, उसका मकान बड़ा ज़रूर है । 

मज़दूर होना कोई गुनाह नहीं है 

मज़दूर कोई भी बेपनाह  नहीं है । 

आसमान  को तुमने  माना है घर 

ज़मीन पर  भी मिल  जाएगा घर ।

जिसको तलाश  कर रहे  हो बराबर 

दिल में आ  बैठे, मिलेगा वो दिलबर। 

हमारी   दुआयें  तुम्हारे   साथ  हें 

मालिक का करम तुम्हारे साथ है ।

ॐ             ॐ                ॐ

अहले बैत = घर के लोग ।साबिर = धैर्यवान । हक़ = रब ।

शाकिर = क्रतज्ञ । दिलबर= प्रेमी । करम = क्रपा ।

ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि।


Wednesday, April 27, 2022

चिराग़े मुहब्बत ।

चिराग़े मुहब्बत हूँ सलीके से जला करता हूँ 

ख़ासो आम सभी को, रोशन किया करता हूँ ।


मुहब्बत को मुहब्बत से तोला नहीं करता हूँ 

मुहब्बत को तो  में सिर्फ़  लुटाया  करता हूँ ।


वो मुहब्बत को  दिमाग़  से सोचा  करते  हें 

गोया दिल को दिमाग़ में लिए घूमा करते हें । 


ये समझने में एक अरसा सा लग  जाता है 

वो मुस्कुराते हें या कि आईना मुस्कुराता है ।


फूल जब खिलता है, मुहब्बत बखेर देता है 

हम को हँसाता जाता है और चला जाता है । 


उधर में से पुरवैय्या आती है, छू के जाती है 

सारे बदन को सिहरा देती है, चली जाती है ।


मुहब्बत रब की एक ख़ूबसूरत सी दौलत है 

और मेरी वहशत के लिए वो बड़ी ज़रूरत है । 


मुहब्बत मेरी सआदत है और मेरी  शबाहत है 

उसको निभाना मेरी आदत है, एक रिवायत है । 


मुहब्बत के लिए बस आप एक काम कीजिए 

रुख़ पे मुस्कराहट के लिए जगह बना दीजिए ।


मुस्कुराहट  एक  बड़ी नियामत  हुआ करती है 

नफ़रत को फ़िलफ़ौर, मुहब्बत किया करती है ।


नफ़रत बंजर ज़मीं है, उसे बारिश की ज़रूरत है 

मुहब्बत बारिश है, और  नफ़रत की  बसीरत  है ।


ज़िन्दगी में तूफ़ान अक्सर आते ही रहा करते हें 

मगर मुहब्बत सरबराह हो, तो टिक नहीं पाते हें ।


मुहब्बत है  तो महबूब भी  भला दूर तो  न  होंगे

और ख़ुशबू  के चमन  भी कुछ  कमतर  न होंगे । 


मुहब्बत चिराग़ के मानिन्द चमकने लग जाती है 

जब भी मुस्कान मुहब्बत का किरदार निभाती है ।


रब = ईश्वर । वहशत = पागलपन ।

सआदत = सौभाग्य । शबाहत = हमशक़्ल।

नियामत = वरदान । फ़िलफ़ौर = फ़ौरन ।

बसीरत = prudence. सरबराह = मुखिया ।


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि ।



Sunday, April 24, 2022

काश !

 काश, हाँ काश, वे सब  के  सब बच्चे होते 

मुमकिन है तब वे  इतने फ़रेब  न करते होते।

बचाने में और मारने में किसको बहादुरी कहें 

शायद इसकी समझ रखने वाले बहादुर होते। 


वे हुक्मरान हें, उनका ही कब्ज़ा है सब जगह 

मगर चैन क्यों नहीं उन्हें, क्यों है इतनी कलह ?

क्यों लड़ते रहते हें बराबर, हर वक़्त  बे सबब 

क्यों ख़ुद से ही वे ख़ुद नहीं कर पाते हें सुलह ?


क्या वो  चीज़ है जिसकी कमी है उनके पास में 

क्या कोई ऐशो आराम है जो नहीं उनके पास में ?

क्या है जो करता रहता आख़िर ऐसे बेचैन उनको 

क्यों रहते हें हमेशा ही उनके हाथ सने हुए ख़ून में ? 


काश वे हुक्मरान होने के साथ में इन्सान भी होते 

किसी के दिल  का दर्द समझने  के क़ाबिल होते।

ये तबाही  के मँज़र, ये सितम, ये  कराहटें न होते 

काश वे बाहर ही बाहर में इस क़दर उलझे न होते।


काश एक बार वे अपने  अन्दर में झाँक लिए होते 

अपने बेमिसाल रूहानी ख़ज़ाने को देख लिए होते।

इन सरहदों की ख़ातिर इस तरह जँग  न किए होते 

काश वे सिर्फ़ आसमाँ में उड़ने वाले परिन्दे जो होते।


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि ।



Thursday, April 21, 2022

जब मज़दूर मज़बूर हुए ।

 उन्हें क्या पता था, ये दिन देखना था 

मज़बूरियों का, क़ाफ़िला  देखना  था ।


ये भूखे  ये  नंगे , चले  जा रहे हें 

हें पाओं में छाले, मगर जा रहे हें 

ये गिरते हें उठते, पसीनों  से तर

गले तो हें प्यासे, मगर जा रहे हें।

इतने  ये मज़बूर , क्यों हो  रहे हें ?

क्यों ख़ुदकी अर्थी, लिए जा रहे हें ?

बेकसी में उन्हें , रास्ता नापना था 

लाचारियों का , कारवाँ देखना था ।

उन्हें क्या पता था ये दिन देखना था 

मज़बूरियों का क़ाफ़िला देखना था ।


क्या मेहनत में इनसे कसर रह गई ?

क्या बोझे  को ढोते  कमर सो गई ?

दुपहरी को सर से गुज़ारा नहीं क्या ?

गाली की गोली  निगली  नहीं क्या ?

सूनी सूनी  हें आँखें, होश  गुम गया 

घिसते घिसते संग, नसीब घिस गया ।

क्या धरती को इनके , तले  चूमने थे ?

या बेबसी में चलते ,  इन्हें देखना था ?

उन्हें क्या पता था, ये दिन देखना था 

मज़बूरियों का, क़ाफ़िला देखना था ।


जहाँ पर भी गए ये , बस छले ही गए 

हमदम मिला नहीं , बस डर मिल गए ।

सब कुछ लुट गया , अब  घर  जा रहे 

जहाँ अपना सा लगता , वहीं  जा  रहे ।

आसमॉओं ने भी कोई , की नहीं मदद 

ख़ामोशी में चलता, जा रहा ये जनपद ।

इनसानियत को, बढ़ के पहिचानना था 

जिसने ग़लती की थी , उसे  मानना था ।

उन्हें क्या पता था, ये दिन देखना था 

मज़बूरियों का, क़ाफ़िला देखना था ।


बेकसी = helplessness. संग = पत्थर ।

नसीब = भाग्य । हमदम = दोस्त ।


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि ।

Tuesday, April 19, 2022

Akshat turns nineteen!

Happy birthday to you!

Happy birthday to you!


It’s the month of April 

You are a man of skill.

All things shall happen 

According to your will!

Happy birthday to you!

Happy birthday to you!


Well, the day  is nineteen

You are also, eh, nineteen!

You  know what that means

It means you’re out of teens!

Happy birthday to you!

Happy birthday to you!


Year is twenty twenty two

You are  on to  twenty too!

You’ll have all the fun here 

As if you were in Timbuktu!

Happy birthday to you!

Happy birthday to you!


Love

Nana

Saturday, April 16, 2022

Hanuman Janmotsav 2022

 Hanuman is the monkey god of Hindu pantheon 

He teaches how to take on monkey mind, head on.

Mind keeps jumping from one thought to another 

Monkey god harnessed his & became a superman!


Hanuman exhibits evolved state of monkey mind

Everyone needs to get it, to possess a mastermind!

When Rama asks Hanuman about his take on Him 

Hanuman gives a three fold reply; keep it in mind!


He says, in his corporeal frame, he’s His factotum

In soul form, he is intrinsically a spark of His light. 

He continues, as I get into me, and lose myself, I 

By Your grace Lord, find, You & I are  One  Light!


Hanuman shows that it is Faith that leads the way

To Divinity, by granting access to its own pathway.

Faith is not belief, it’s a direct experience of grace 

Grace, that subsumes everything in the Divine way!


Then there remains no room for any kind of clatter

The Divine ‘hum’ absorbs all sorts of mental chatter.

The inner gets flooded with bliss emitting luminosity 

It’s serenity that reigns there, not any kind of patter!


Om Shantih 

Ajit Sambodhi 







Tuesday, April 12, 2022

चलो चमन में चलते हें ।

 

चलो चमन में कुछ चहलक़दमी करते हें 

बादे सबा से कुछ दिली गुफ़्तगू करते हें 

ये न समझना मुझे आपका ख़याल नहीं 

ऐ आसमाँ आप ही तो कफ़ालत करते हें ।


जो बज़ाहिरा है ख़ुद ही ख़याल रखता है 

जो पोशीदा है सबको मुस्तकिल रखता है ।


ये  सुबह की  हवा आई है  अरबिस्तान से 

नाश्ता फ़ारस से, वाट्सऐप इंग्लिस्तान से 

 जिसने मुझको  बाँधा है आलमे लाहूत से 

वो ढाई आखर प्रेम का आया हिंदुस्तान से ।


उसने चश्मे से देखा और जिन्ना  बना दिया 

माँ के  चश्मा न था , उसने मुन्ना बना दिया ।


आवाज़ से भी इन्सान को  पहिचान सकते हें 

कोई शीरीन है या तल्ख़, ये भी जान सकते हें 

किसी  को है ग़र उँस मगर किसी को है  खुँस

बिना देखे हुए भी चेहरा, यह  बखान सकते हें ।


उसे  सम्हाल के रखना आख़िर  मुहाल ही था 

पाना उस हवा मिज़ाज को एक अजूबा ही था ।


खो खो के पाया किया है कई बार मैंने उसको 

बेवफ़ाई में भी ख़ुशियाँ मिलती रही हें  मुझको

जिस्म को तो एक दिन मैं  हार जाऊँगा मौत से 

हाँ ख़ुशबू की तरह बिखरा मिल जाऊँगा उसको ।


मुझको इसी बात का डर सताता रहता है हरदम 

उसका नाम न कोई मेरे चेहरे पे पढ़ ले गजर दम ।


इधर से ढकते हें तो उधर से उघड़ जाता है बदन 

ज़िन्दगी न हुई  गोया बन गई  ग़ुरबत का पेरहन

पहिचान न पाये  भला एक दूसरे  को अभी तक 

कोई बतायेगा  ये रिवायतन है या कि  इरादतन ।


कोई उस जैसा तो अभी तलक भी मिला ही नहीं 

हक़ीक़त ये भी है कि वो भी अभी मिला ही  नहीं ।


बादे सबा = सुबह की हवा । गुफ़्तगू = बातचीत ।

कफ़ालत= सुरक्षा । बज़ाहिरा= प्रकट में ।

पोशीदा = गुप्त । मुस्तकिल = स्थिर ।

आलमे लाहूत = जहाँ सिर्फ़ ईश्वर ही हो । 

शीरीन= मीठा । तल्ख़ = तीखा । उँस= प्यार ।

मुहाल = असंभव। गजर दम = अलस्सुबह।

ग़ुरबत = ग़रीबी । पेरहन= पोशाक ।

ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि ।


Saturday, April 9, 2022

Ten Minutes

 The tongue is the joystick of articulation 

One can’t speak without its collaboration.

But there’re 3 sounds, I name pure sounds 

That do not  need the tongue’s  facilitation.


अ उ म are the three sounds sans lingual note 

अ flows out freely, initiating from the throat.

उ takes its ipseity from orb like rounded lips

And म purses both lips  on  a humming  note.


Starting  with अ  for ten minutes  at a  stretch 

It is seen that अ glides into उ as if to outreach.

It takes few weeks time, which is not too long

And then it merges into म on its last outstretch.


If one practices these basic sounds assiduously

The body  begins to  align itself  magnificently.

So many changes  begin  to take place  all over

Looks like the body is being overhauled finely.


Fast being the new normal, one may do it anon

By skipping and jumping on to  the last wagon.

But one may miss the miraculous alignment of 

Lips how they learn to round off & purse anon.


People who are eager to tread the spiritual path

Can do  so by  themselves, following  this  path.

It is safe and self supporting. One can easily go

On to higher dimensions following  this bypath.

अ= / SHwa/ । उ= / (_) /  । म= / m /  ।  I. P. A.

Om Shantih

Ajit Sambodhi





Thursday, April 7, 2022

April 7, 2022

The sky  is bright blue
And the air brand new
It smells genuine fresh
To rejig & revamp you.
Happy birthday to you!
Happy birthday to you!

You  know  how  much
Is much  and  too much
We know our soft touch
Is jolly good to fete you.
Happy birthday to you!
Happy birthday to you!

Our life  is so  beautiful
And  sweet and  soulful 
Let's   be  more  tuneful 
And  dance   with  you.
Happy birthday to you!
Happy birthday to you!

We all here admire you
Like you and adore you
We your cherished ones
Have always loved you.
Happy birthday to you!
Happy birthday to you!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Monday, April 4, 2022

Peace? Oh yes!

What’s the biggest industry on earth, you know?

It’s the armament industry, if you want to know.

As humans, our first need is a peaceful ambience 

Withal we’re letting the armament industry grow! 


Armament growth needs rapid market resurgence 

For market growth, there needs be more violence. 

For violence to grow, it needs a volatile ambience 

To camouflage, there needs be a Peace Conference! 


We want to eat our dark chocolate and have it too!

Yes, I know we’re too smart but this will never do. 

Let peace advocates put hands on their hearts, and 

Say they have peace inside; or they mimic a cuckoo?


Ours is an age of technology; ‘all’ is mass produced 

As such, peaceful ambience needs be mass produced.

Those who want their own peace shall tread all alone 

And tap the source within where it is  securely stored.


Om Shantih 

Ajit Sambodhi

Saturday, April 2, 2022

Is War Indispensable?

After peace talks, we focus on the  next war 

It happens every  hour , whether  near or far. 

We look for peace where it’s not; remember 

The street lamppost and the search for Dinar!


Dinar was lost in a room which  had  no light 

Hence it was explored where there  was light! 

While we talk of peace, we buy guns to shoot!

Shooting at the sky? Is it not vicarious delight?


Our  sight  is  outward-orientated  and  hence 

It needs  a turnabout to see  behind the  fence.

No war was  fought before it had been fought 

In the backyard of our sight, in the true sense. 


When we close our eyes , the fence dissolves 

A door becomes visible, the problem resolves.

We come to see ourselves—silent & peaceful!

Not a bickering mass; or rabble that  devolves!


Is war indispensable ? Well, it doesn’t seem so

War happens, since it has been used as a gizmo.

If instead of eyeing ‘the other’, we  focus on us

A day may come when peace becomes a gizmo!


All we need is a course correction of our sight 

Sight is a boon, but let it not turn into  a blight.

It should be trained to see both ways, in a row

Only then it can see the inherently virgin light!


Om Shantih 

Ajit Sambodhi

Monday, March 28, 2022

बच्चा बन जाओ।

 समझदार  लोग  क़िस्मत से  मिला  करते हें 

वो चेहरे पर लिखी इबारत पढ़ लिया करते हें।


मासूमियत से भरे , सम्हल कर  चला  करते  हें 

रास्ता नहीं बदलता, वो ख़ुदको बदला करते हें।


वो सादगी पसन्द अक्सर अकेले मिला करते हें 

वो कसर हो या कसरत, शादमान रहा  करते हें।


कभी भीड़ में ख़ुद को देखना, देखोगे अकेले हो 

वैसे सभी अकेले हें , बस शोर मचाया करते हें।


कभी बनना पड़े तो बस  एक बच्चा बन  जाना 

दौड़ के दौर में होशियार तो सभी बना करते हें।


बच्चा बन कर रहोगे तो उल्फ़त से वास्ता रहेगा 

होशियार लोग उल्फ़त में नफ़रत ढूँढा करते हें।


लताफ़त हो या शराफ़त, कम ही नज़र आती है 

होशियार लोग इसमें  आफ़त को  ढूँढा  करते हें। 


हाँ तिफ़्ल मिज़ाज होगे तो धोखे तो मिलेंगे मगर 

फ़रिश्ते भी ऐसे वक़्त में ही दस्तक दिया करते हें। 


वो पचास साल के हें, बच्चे हें, खुरपी से खेलते हें 

मिट्टी खोदते हें, धूपके शरर चेहरे पे झेला करते हें।


फूल खिलते हें, रंग भरते हें, सजता है उनका चमन 

दुआऔँ के फूल मगर उनके चेहरे पे खिला करते हें।


मुहब्बत बस हो जाती है, ऐसा जानकार कहा करते हें 

चाहे फूल हों या  कुछ और, बस रब को ढूँढा  करते हें।


अगर  रमना है तो रब के रंग में क्यों ना रमा लें ख़ुद को

ख़ुद की सताइश में तो अहले जहान ख़ूब रमा करते हें।


कसर या कसरत = कम या ज़्यादा। शादमान = प्रसन्न चित्त।

 उल्फ़त = मुहब्बत।लताफ़त = कोमलता।रब = ईश्वर।

तिफ़्ल मिज़ाज = बच्चे जैसा स्वभाव। शरर = spark(s).

सताइश = तारीफ़। अहले जहान = दुनिया के लोग।


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि।

Thursday, March 24, 2022

Birding in Madison, AL

There  comes  an  Eagle flying
From behind the cypress trees.
It    looks   like   it   is   floating
Under  the   blue   bright   skies.

It  is  a  sunny  day, very  inviting
After  the  misty  days of  winter.
But the wind is chilly &  piercing
Else it is full of spring splendour.

See a  flock of red chest  Robins
Twitching   tails   while   singing.
I can see some sprightly  Wrens
In upright tails & brown clothing.

Here is  a Warbler in bay belly
Frisking and  warbling a  ditty.
Here’s a Finch in streaky belly
Chirping a  cheery  nitty  gritty.

Here's a Cardinal in its red robe
Majestic in a pointed  red  crest.
A song bird in a small wardrobe
Is the Chickadee, my next guest.

I love birds for they are finespun
Exhibit grace, flying in air  space.
Birds see the first ray of  the sun
And give import to  empty space.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Friday, March 18, 2022

(17--22) मार्च, 2022.

होली जो आई है , हरबार आती रहा करेगी
तुम्हारी कमी खलती है, खलती रहा करेगी।

कैसे कह दूँ मैं यह कि तुम नहीं हो यहाँ पर
वो कुर्सी, वो मुढ्ढा, सभी कुछ तो है यहाँ पर
बस इंतिज़ार कर रहा हूँ कि तुम आ रही हो
और अपने अंदाज़ में आके बैठोगी यहाँ पर।
तुम्हारी यादें, तुम्हारी बातें, ताज़ा हैं यहाँ पर
बस तुम्हीं नहीं हो, कोई शै क्या माना करेगी?

आख़िर हुआ क्या था, कैसे यह सब हो गया?
सब कुछ तो ठीक था , फ़िर कैसे ये घट गया?
क्या हमसे ख़ता हुई , या क़िस्मत का खेल ये?
ज़िन्दगी का पहिया , अचानक से , रुक गया?
सर्द सुबह की धूप क्या मुंडेर पे आया करेगी?
क्या रौनके मानूस इधर से अब गुज़रा करेगी?

जब मिले थे तो बहुत कुछ वादे किए थे, है न?
आँखों में सपने कितने सजाया किए थे , है न?
मुझे याद नहीं बिछड़ेंगे, ये ज़िक्र किये थे क्या?
या कि जानकर इसे नज़रन्दाज़ किए थे , है न?
हमारी क़िस्मत की तो, सभी ने तारीफ़ की थी
ये किसको अंदाज़ था , शाम ऐसे ढला करेगी?

आख़िरी वक्त भी न सोचा, ये आख़िरी घड़ी है
कि फ़िर न आ पाएगी , ये वो नामुराद घड़ी  है
सोचा था हर रोज़ के माफ़िक ये लौटेगी, मगर
वफ़ा के मानिंद ही वफ़ादार वफ़ात की घड़ी है।
होली आयेगी साथ में तुम्हारी याद भी आएगी
मगर तुम्हारे अबीर के बिना लौट जाया करेगी।

शै= चीज़। रौनके मानूस= चिर परिचित रौनक।
नामुराद= बदनसीब। अबीर= रंग।
वफ़ात= final repose.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।





Friday, March 4, 2022

anniversary!

Happy  happy  anniversary!
Happy  happy  anniversary!

I remember the wedding day
Because it was a special day
Today's the 22nd anniversary
Of the indelible priceless day.
Happy    happy    anniversary!
Happy    happy    anniversary!

Marriage is a sacrosanct act
It's  a duty relegated to enact
A role of Titanic  possibilities
Which few can ably  transact.
Happy    happy    anniversary!
Happy    happy    anniversary!

Today is more & more special
You're  more & more adorable
You are an  exemplary couple
Your marriage tract is lovable.
Happy    happy    anniversary!
Happy    happy    anniversary!

May God bless you a long Life
It's an ideal pair of man & wife
I pray to God with all my heart
Let your life be sans any strife.
Happy     happy     anniversary!
Happy     happy      anniversary!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Tuesday, March 1, 2022

आख़िर क्यों ये तबाही मची है?

बख़्श दे कोई सुखनवर,अम्न के नग़मे सुनाने को
नफ़रती दुनिया में एक लफ़्ज़े मुहब्बत सुनाने को।

कितनी बदनसीबी है, कोई तैयार नहीं समझने को
कोई मारे न किसीको,क्या दिक्कत इसमें किसीको?

वो तो नहीं झुका तुम्हारे आगे, ख़ुदा के कहने पर भी
तुमको क्या हो गया कि सजदे करते हो इब्लिस को?

कुछ तो सोचा होता ज़िन्दगी कितनी बेशकीमती है
बख़्श ने वाले की अमानत है सम्हाल कर रखने को।

अपना ज़मीर कहाँ खो गया, ख़्याल तो किया होता
किसी की ज़िन्दगी लेलें, किसने दिया ये हक हमको?

कैसे हाशिए पर आ गया तहम्मुल कोई तो बताए
कौन कैसे ग़ैर है, मन हुआ आज जिसे मारने को?

कहाँ  गया वो बरादराना सुलूक, आपसी भाईचारा?
जो इस जहान में अपना न हो, ज़रा बतादो मुझको?

फ़ेहरिस्ते वारिसान साथ लिए फिरते हैं हर लम्हा वो
जो न जानते हैं ख़ुद को, ना ही पहचानते हैं ख़ुद को।

जानना चाहते हो ख़ुद को तो आज लगा लो शाम्भवी 
होयेंगी सब हिमाकतें तुम्हारी सुपुर्द आज ही शिव को।

फ़िर समझ में आयेगा, जीना कहते जिसे, वो क्या है
अरे आज ही दे डालो सारा बोझ अपना नटराज को।

जो शिव है वही सुन्दर है, बता दो तुम जो शिव नहीं है
अरे सब मिल जाएगा तुम्हें माँग लो बस एक शिव को।

सुखनवर= शायर। इब्लिस= शैतान का शुरुआती नाम।
जब ख़ुदा ने उसको आदम के आगे prostrate करने
को कहा तो उसने नहीं माना। तहम्मुल= सहनशीलता।
फ़ेहरिस्ते वारिसान= उत्तराधिकारी होने की list.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, February 20, 2022

है कि नहीं?

सच्चे मोती और फ़रिश्ते में कोई फ़र्क  नहीं
दोनों दमकते हैं कभी भी होते बेअसर नहीं।

ऐतबार हो तो  अफ़सुर्दगी  की  ज़रूरत नहीं
एहसास हो तो ख़्वाइशमंदी की ज़रूरत नहीं।

कहीं दूर रहकर भी रिश्ते क़ायम रहा करते हैं
देखो, सूरज हर रोज़ मिलने आता है कि नहीं?

कभी जो इतना क़रीब था, अजनबी बन  गया
नज़दीकियों से डर लगना, कुछ ग़लत तो नहीं? 

प्यार  करने को  तमाशा  न समझ लेना  कभी
ख़्याल जब आता है तो, ख़ुशबू रुक पाती नहीं।

धूप कुछ सहमी सहमी  सी लग रही है आज
सर्दी वाली चुहलबाज़ी बंद होगी, डर तो नहीं?

जब सुबह मुस्कुराती है, तो मुस्कुरा लिया करें
हर मरतबा कन्जूसी करना भी कुछ ठीक नहीं।

सुबह अगर बिखरती है मुझमें तो क्या करूँ मैं
किसी को मना करना ? वो मुझको आता नहीं।

इस लमहे को कैसे जाने दूँ, बिना रूबरू हुए मैं
पहले इससे मिला नहीं, आगे मिलना होगा नहीं।

बहुत मंज़र सजाया किये हें , ज़िन्दगी में मैंने 
कितनों ने मुझको है सजाया , मुझे याद नहीं।

कुछ इस तरह से दिल ने गुफ़्तगू की है अभी
गोया खोने में और पाने में कुछ भी फ़र्क़ नहीं।

झूठ बोलता हूँ  , मेरे अल्फ़ाज़ हँसने लगते हैं
सच बोलता हूँ , यहाँ कोई मुस्कुराता भी नहीं।

नज़रें ही जब सब फ़ैसला कर दिया करती हैं, 
किसी के बोलने का इन्तिज़ार रहता ही नहीं।

अंदाज़ बयाँ कर देते है जो सरज़द हो रहा है
बेतार से होता है सब , तार की  ज़रूरत नहीं।

क्या करूँ, कुछ करना ज़रूरी भी नहीं लगता
इतने बड़े शहर में, कोई सुनने वाला जो नहीं।

कोई रुख़ करता नहीं, बोलना छोड़िए जनाब
लगता है कि  किसी को मेरी ज़रूरत ही नहीं।

रोने के बाद सूकून मिलता है, क्या शुरू करें?
उसके  लिए जो दिल में है , ज़िन्दगी में नहीं?

बहुत मज़बूर होने पर  ही रोना निकलता  है
यादें भुलाना भी कोई  आसान काम तो नहीं।

साँसें आँसुओं के लिए अल्फ़ाज़ बन जाती हैं
मुँह छुपा कर रोने की , कोई ज़रूरत तो नहीं।

बोलने पे इधर उधर कुछ डोलने लग जाता है
ख़ामोशतबा रहना ही ठीक होगा, है कि नहीं?

अफ़सुर्दगी= मायूसी। रूबरू= आमने-सामने।
गुफ़्तगू= बातचीत। अल्फ़ाज़= शब्द (बहुवचन)।
सरज़द= घटित। ख़ामोशतबा= शान्त चित्त।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, February 14, 2022

The Day of St Valentine !

Valentine's day! Shall I dream like Chaucer
For birds to gather before goddess Nature
To choose  mates in her august  presence,
End up with a song , waiting for next year? 

Well, wating is not futile. It's like a towrope
For Love to willingly suspend saying..nope!
And pine all through the year for someone!
After all, waiting  is an  extension of  hope!

Chaucer was the poet  who paved the way
For the resuscitation  of St Valentine's day.
Chaucer  was  innovator , a groundbreaker
For modern poetry , he created a pathway!

14th February is not only St Valentine's day
It is equally the Chaucerian Valentine's day
Love is the main art of his medieval heroes
No wonder it culminated in Valentine's day.

Hail Valentine's day! Hail Chaucer's day!
Hail Chaucer for giving us the Love day!
Hail for showing modern day English, in.
Hail Chaucer's day! Hail Valentine's day!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.


Tuesday, February 8, 2022

Spring At Your Door

Come to the fore
Open the door
Spring knocks
At the door!

Look at the sky
It's blue and high
Bright as sunshine
And not a sigh!

See that Robin
With a beak so thin
Chirping cheerily
In a red robe spin!

And what was dud
Has become a bud
Shining in the sun
It's a rosy rosebud!

Thank you my spring
You have a ring
Of refreshing candor
With a lot of zing!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Saturday, February 5, 2022

बाहर बसंती हवा बह रही है।

बाहर  बसंती  हवा  बह   रही  है
देखो वो तुमसे क्या  कह  रही  है।
सुन लो वो तुमसे जो कह रही  है
बातें रफ़ाक़त की  वो कह  रही है।
मुझे  बंद   रहना  आता  नहीं   है
दिल की न सुनना  भाता  नहीं  है।
नज़रें  चुराना  भी  आता  नहीं  है
बहाने  बनाना भी  भाता  नहीं  है।

ज़रा द्वार खोलो बहार आ खड़ी है
ज़रा आँखें खोलो, बसंती खड़ी  है।
बाहर तो आओ, फिज़ाएं  दिखाऊँ 
चुहलबाज़ी करती, मौजें  दिखाऊँ!
ज़रा  मुस्कुराओ, चमेली  खड़ी  है
पहली किरण की, सहेली खड़ी  है।
उधर देखो  कैसी, नवेली  खड़ी  है
रातों  की   रानी   पहेली  खड़ी  है।

मौसम की पहली किरणें  तो  देखो
सुनहरी सी रश्मि  मचलती तो देखो।
वो हवाओं में उड़ते बगुलों को देखो
खुले आसमाँ में वो कुरजों को देखो।
कैसे  महकती   हैं   मंजरियाँ , देखो
शाखें  भी  कैसे  थिरकती  हें, देखो।
वो बहारों से आगे  बहारों  को  देखो
इधर आओ  देखो गुलाबों  को  देखो।

वो बुलबुल की गुलगुल तुमको सुनाऊँ 
वो  चोंचों  की  चूँ  चूँ   तुमको  सुनाऊँ!
पानी की सरसर है बतख़ों की फरफर
वो  ऊपर  से गिरते झरनों की झरझर।
वो फूलों पे उड़ती  तितली  को  देखो
शबनम  की बूँदें  फिसलती  तो  देखो।
बसंती  हवाओं   से  तुमको  मिलाऊँ 
महकते  गुलशन  को तुमसे  मिलाऊँ!

देखो   बसंती   हवा   सुन   रही    है
वो मेरी ज़रूरत को ख़ुद सुन  रही  है
गुनगुनाहट  को  मेरी वो सुनपा रही है
धड़कन  की  आवाज़  वो  सुन रही है
बहारों  से  मुझको  शिकायत  नहीं  है
पुरवय्या   मुझको   लुभाती   रही    है
 साँसों  में   ख़ुशबू   समाती   रही    है
वहशत   से  मुझको   बचाती   रही  है।

रफ़ाक़त= मेलजोल। वहशत= पागलपन।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Tuesday, February 1, 2022

गले से लगा लो

ये दुनिया तुम्हारी, तुम्हीं ये सम्हालो
मैं  भी  तुम्हारा , मुझे  भी  सम्हालो।

तुम्हीं ने  गीता  में  वादा  किया  था
तुम्हीं ने सभी  को भरोसा दिया  था
जब भी  किसी  पर  विपदा  पड़ेगी
अकेले  न   उसको   सहनी  पड़ेगी।
क्या आओगे  सबके लिए तुम ऐसे?
भागे  सुदामा   को   लेने  को  जैसे?
बुलाता हूँ  आओ  मुझको  सम्हालो
मेरी  ख़्वाहिश  को अपनी  बना लो।

तुम्हारे  भरोसे   ही  जीता  रहा   हूँ
तुम्हारी बिना पे ही अब  जी रहा हूँ
मुझको अकेले  न  छोड़ा करो  तुम
मेरा   सहारा  तो   बस   एक   तुम।
तुम्हीं   से   तो   मेरी  पहिचान   है
तुम्हीं   से   तो   मेरी   मुस्कान   है
जब  भी   चाहो   वापस  बुला  लो
तुम्हारा हूँ तुम  ही मुझको सम्हालो।

ज़िंदा  हूँ  केवल  ख़ातिर  तुम्हारी
दिखती  है  सबमें   सूरत   तुम्हारी
यही  एक  रिश्ता है  मेरा  सभी  से
यही तो बहाना है मिलने का तुमसे।
सभी कुछ  तो  होता  तेरी रज़ा  से
जज़ा देके  आगे कर  देते  ख़ुद  से
मुझको सिला  से तुम  नाही  तोलो
मुझे  तो बस  तुम गले से लगा  लो।

बिना=दम। जज़ा=सिला=इनाम।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।