Monday, February 16, 2026
मेरा दोस्त घनश्याम!
Sunday, February 8, 2026
Happy Birthday Arunima!
you are the rosiness of the rising sun
the sun that gives life to all, bars none
i wish happy birthday to you arunima
let rosiness touch the lives of everyone!
life is an invaluable gift given by god
some become uneasy if i mention god!
i don’t know what’s your take on god
but i am sure he has bestowed his nod!
there’s an intelligence that runs the show
your yen word for it out of the long row?
we are indebted to it, you subscribe to it?
do untold trips round the sun! flow, flow!
wish you a happy birthday again, arunima
nana
Saturday, January 31, 2026
Happy Birthday Pollyanna!
Hi! Happy birthday to you Pollyanna
Yes, Pollyanna dressed in a bondanna!
So everyone gets much too overjoyed
& feels like crying Hosanna! Hosanna!
Last year also you made it to the States
This year also you happen in the States!
Coincidence! Yes, but I miss hailing you
Face to face according to heart’s dictates!
We have known each other only for a year
I can’t think if there is anything to forbear
Instead I find it has been too fruitful to me
I recall the time you sat with my daughter!
Happy Birthday Pollyanna
Ajit Sambodhi
Friday, January 30, 2026
Jolly Infinity!
Whose sky this is, I need not to know
I am lying supine while I watch it grow
It grows and grows, and turns quite big
It doesn’t seem to know, it’s high or low.
It wraps me all around, and enters me
The world goes out and I become free
Anon, I happen to forget, who is who?
Whether I’m inside it or it’s inside me.
The sky is too very vast but vaster here
A space is inside me, brighter and clear
Where heart seems to melt, at each beat
How strange, no one seems to be aware!
Friends, as you lie under the infinite sky
Go on watching it, till tear drops roll by
Don’t forget to forget each & everything
& don’t be surprised when joy comes by!
Jolly Infinity!
Ajit Sambodhi
Friday, January 23, 2026
आगया बसन्त
आगया बसन्त छाई मौसमे बहार है
बुलबुल ने फ़िर से लगा दी गुहार है
सर्द हवाओं से मिल गई निजात है
रवि बरसा रहा किरणों की फुहार है।
कलियाँ मुस्कुराने लगीं रौनक़े बहार है
देखो बसंत आ गया हर तरफ़ पुकार है
हर चेहरा खिल उठा नज़रों में सिंगार है
ये है ऐसी ताज़गी जो सबको दरकार है।
खेतों में पीली सरसों का लग रहा अंबार है
लगता है जैसे हो रही हो सौने की बौछार है
मन सभी के पुलकित हैं पाके नया संसार है
सर्दी की बिदाई पे हर ओर जय जय कार है।
सबको बसंत पंचमी की बधाई
अजित सम्बोधि
Wednesday, January 21, 2026
जनम दिन मुबारक हो
जन्म दिन मुबारक हो दिव्या तुमको
ख़ुशियों का अम्बार मिल जाये तुमको
वक़्त की मेहरबानियाँ ऐसी हों तुम पर
बख़्शिश ए रब सब मिल जाँय तुमको!
ये जो ज़िन्दगी मिली है, है बड़ी सौगात
हर रोज़ सूरज की किरणें लातीं हैं प्रभात
हर रोज़ एक नई ज़िन्दगी मिलती है हमको
ये प्रभात है याकि तवील ए उम्र की बारात?
ख़ुशियाँ तुम्हारी होती हैं ख़ुशियाँ हमारी भी
टकराके तुमसे, वो आतीं जानिब हमारी भी
ये प्रभात की खुशियाँ तुमको सजाया करें
ताकि चेहरा तुम्हारा मुस्कुराना न भूले कभी!
बख्शिश ए रब = god’s gift. सौगात = gift.
तवील ए उम्र = उम्र की लम्बाई।जानिब = दिशा में।
सदा मुस्कुराती रहो बिटिया
पापा
Thursday, January 1, 2026
नये साल का गीत
नया साल आ रहा हैं नए सपने ला रहा है
नई उड़ानें भरने को, नया जज़्बा ला रहा है।
मालिक ने है बख्शा हमको, इतना बड़ा जहाँ
ज़मीं से लेके फ़लक तक क्या कुछ नहीं यहाँ
सुबह कली मुस्कुराती, शाम में तारे जगमगाते
क्यों ना कर लें हम इबादत, मेरा मन कह रहा है।
कभी चाँद झुरमुट की ओट से, कैसा झाँकता है
कभी सूरज बादलों में से, अकस्मात झाँकता है
सब कुछ जो हो रहा है, कितना सुहाना लगता है
हम पर रब कितनी रहनुमाई, हरदम कर रहा है।
जो कुछ बाहर हम देखते वो अंदर का अक्स है
कभी अंदर में तो झाँकना, कैसा हो रहा रक़्स है
अब के नये दिन पर पलकों को गिरा के रखना
फ़िर देखना पर्दे के पीछे कैसा कमाल हो रहा है।
फलक = आसमान।जज़्बा = कुछ कर गुज़रने का जोश।
रब = ईश्वर। अक्स = reflection. रक़्स = dance.
सब को नये साल की शुभ कामनायें
अजित सम्बोधि
Friday, December 26, 2025
वृंदावन की गलियों में
ये जो मैं आज यहाँ चल रहा हूँ, ये जादू से भरी गलियाँ हैं
ज़र्रे ज़र्रे में लिपटी हुई, यहाँ पर मुरलीधर की पगथलियाँ हैं।
ये वृन्दावन की गलियाँ हैं जहाँ जुटा करतीं थीं सहेलियाँ हैं
कान्हा की बाँसुरी की धुन पर यहाँ, थिरकतीं थीं गोपियाँ हैं।
ये जो कदम्ब का पेड़ है, इस पर झूला करते थे, कन्हैया हैं
साथ में उनके झूलती थीं राधा जी, होती थीं गल बहियाँ हैं।
आज हम पहुँच गये हैं रमण रेती में, लेते हैं इसकी बलैयाँ हैं
हाँ हाँ यही तो वो रेती है जहाँ कभी करते थे रमण कन्हैया हैं।
यहाँ जमुना बह रही हैं, किनारे पर जो दिख रहीं चमेलियाँ हैं
वो तुम्हारी याद में गोपाल, अब भी सिसकती कुंज गलियाँ हैं।
तुम जो गये लौट के न आये श्याम, राह देखती रहीं अखियाँ हैं
तुम्हारे गीता के वायदे को याद कर कर, गुज़ारतीं तन्हाईयाँ हैं।
यहाँ पर आने पर पाया मैंने, हर सिम्त, यादों की परछाइयाँ हैं
हर तरुवर की कलियों की ज़ुबाँ पर, बस तुम्हारी कहानियाँ हैं।
हर एक ज़ुबाँ पर तुम हो, तुम्हें देखने को तरस रहीं पुतलियाँ हैं
घनश्याम बहुत देर हो चुकी है, अब और न बुझाना पहेलियाँ हैं।
पर कैसे भूलूँ कि घनश्याम से तुम ही कराते हो मेरी गलबहियाँ हैं
तुमने अपना नाम-रूप मुझे दे कर, शुरू से किया करम कन्हैया है।
ये जो मैं आज यहाँ चल रहा हूँ, ये जादू से भरी गलियाँ हैं
ज़र्रे ज़र्रे में लिपटी हुई, यहाँ पर मुरलीधर की पगथलियाँ हैं।
मुरीद ए मुरारी
अजित सम्बोधि
Friday, December 5, 2025
एक गुज़ारिश है
मुझे कुछ कर तो लेने दो
मुझे यूँ लुटने भी तो दो
तुम तो हो ग़ैबी हाँ
हाँ तुम तो हो ग़ैबी हाँ
हाँ हाँ तुम तो हो ग़ैबी कन्हाई
मुझे भी रूह बनने दो।
मुझे कुछ कर तो लेने दो
मुझे कुछ लुट तो लेने दो।
तुम्हें पाने की हसरत में
मुझे कुछ खो तो लेने दो
हाँ मुझे कुछ खो तो लेने दो
ये जिस्म ले लो वापस
हाँ हाँ इसे ले लो वापस
मुझे भी रूह बनने दो
या तो तुम जिस्म लेके आओ
वरना मुझे भी रूह बनने दो।
मुझे कुछ कर तो लेने दो
मुझे यूँ लुटने भी तो दो
तुम तो हो ग़ैबी कन्हाई
मुझे भी रूह बनने दो।
कितने सावन बीत गये
पर तुम फ़िर भी नहीं आये
आँखें सावन बन बन हारीं
झूले सूने सूने रह गये
मैं बन गया यायावर
तुम तो रहे ग़ैबी
मुझे आश्कारा बना दिया
हटा लो ये जिस्मानी चादर
मुझे अब रूह बनने दो
मुझे अब रूह बनने दो।
ग़ैबी = invisible. यायावर = फक्कड़।
आश्कारा = visible, जिस्मानी।
रहनशीं रहरौ
अजित सम्बोधि
Thursday, December 4, 2025
यहाँ सब क़ुदरती, नहीं कुछ कीमियाई
मुझे मत रोको मुझे बोलने दो
बन्द थी ज़ुबाँ आज खोलने दो
रहम खाओ मुझ पर, ख़ुद पर
सारे जहान पर, इज़ाज़त दे दो।
सच कह रहा हूँ मैंने देखी हैं
अपनी इन आँखों से देखी हैं
वो हरी भरी वादियाँ अंतहीन
उनमें विचरती गौऐं मैंने देखी हैं।
मैंने देखा है वो जो प्यार देती हैं
हाँ वो माँ के जैसा लाड़ देती हैं
भूल जाओगे ख़ुद को यक़ीनन
जब जीभ से तुम्हें लपेट लेती हैं।
मैंने देखा है बतख़ों को नज़दीक में
मैंने देखा कैसे सिमटती हैं वो घेरे में
न पैर हिलते हैं न गर्दन और न पंख
कैसा इज़ाफ़ा करतीं आपकी शान में।
कहीं पे डोर से झूलती गौरैया दिखेगी
कहीं शाख़ से लटकती तोरई मिलेगी
कहीं कचनार के खिलते फूल महकेंगे
कहीं गोभी के फूलों की क़तार मिलेगी।
यहाँ सब है कुदरती, नहीं कुछ कीमियाई
हर तरफ़ से फैली हुई है रब की रहनुमाई
आफ़ताब है दीप्त है, माहताब है दीप्ति है
इसलिए पसरी है हर सिम्त में ख़ुशनुमाई।
कुदरती = जैविक। कीमियाई = गैर जैविक।
आफ़ताब = सूरज जो दीप्त है, रौशन है।
माहताब = चाँद जो दीप्ति है, काम रोशनी बखेरना।
सिम्त = दिशा। रहनशीं रहरौ = रास्ते में बैठा पथिक।
एक रहनशीं रहरौ
अजित सम्बोधि
Monday, November 24, 2025
बधाई हो 24 नवम्बर !
बधाई हो आज 24 नवम्बर है
आज भी कुछ वैसा ही अम्बर है
जैसा था बत्तीस साल पहिले
ज़हन में रखने वाला नम्बर है!
हर मिलन के पीछे एक कहानी है
न सोचना इक बार की कहानी है
जन्मों जन्मों से चलती आ रही है
मिलना निरंतरता की निशानी है।
हर बार चोगे बदलते रहा करते हैं
हर बार किस्से बदलते रहा करते हैं
मगर रूहें कभी भी नहीं बदलती हैं
सिर्फ़ बाब हैं जो बदला करते हैं।
आप दोनों ख़ुश रहें, दुआ करता हूँ
वक़्त तामील करे, दुआ करता हूँ
बच्चे सभी ख़ुश रहें, दुआ करता हूँ
रब का करम रहे, यही दुआ करता हूँ।
बाब = chapter. तामील = आज्ञापालन।
रब = ईश्वर। करम = कृपा।
शुभचिन्तक
पापा
Monday, October 20, 2025
दिवाली आ गई है
तीरगी टूटने लगी है
शमा जलने लगी है
रात मह-जबीं होने लगी है
कहाँ छिपी थी अभी तक
ए दिवाली बता तू
फ़लक को बाहों में लिए
लो दिवाली आने लगी है।
हवा बदल सी रही है
फ़िज़ा बदल सी रही है
पस ए मंज़र ही बदल रही है
किसको करूँ मैं नज़राना पेश
खुशियाँ करने लगीं बेहोश
शाम गुलज़ार होने लगी है
दिवाली आने लगी है।
मौसम ने करवट लेली
सपनों ने करवट लेली
बंधनों की गहराइयों में
ज़मीं ने भी करवट है ले ली
रंगत बदलने लगी है
सीरत बदलने लगी है
दिवाली आने लगी है।
राहत आ रही है
पर्दा हटा के आ रही है
नई सौगात ला रही है
ज़िंदगी परवाज़ होने लगी है
कोई न हारा, सब जीते
दिल की आवाज़ आ रही है
दिवाली आने लगी है।
पेड़ों का लिबास बदल गया
फूलों का सलीका बदल गया
नई सुवास आ रही है
मन में हुलास आ रही है
दिवाली आने लगी है
दिवाली आ रही है
दिवाली आ गई है
क्या दिवाली है जैसे रंगो ने ली अँगड़ाई है?
बल खाती शम्माओं की कैसी रहनुमाई है?
तीरगी = अंधकार। शमा = light.
मह-जबीं = चाँद जैसी। फ़लक = आसमाँ।
पस ए मंज़र = backdrop.परवाज़ = उड़ने।
सभी को दिवाली की बधाइयाँ
एवम् शुभ कामनाएँ!
शुभेच्छु
अजित सम्बोधि
Monday, October 13, 2025
HPB speaks !
HPB had predicted 140 years ago
European science is going to sow
Two seeds for death of human race
Consumerism with Militarism, Halo!
Consumerism buoys up consumers
& they’re mass produced by traders!
There come upheavals in economies
Inviting display of fighters & lasers!
This science is clueless about the soul
To work only for the outer, is its goal
It will boomerang upon itself one day
So HPB chastised fawning over its role!
Aren’t we all at the brink of annihilation?
Casually press the trigger of decimation!
HPB was for the ancient science of soul
As taught in India from times unknown!
For one to behave like a human being
One must be linked to the inner being
Humans become human beings only
When they align to their inner being!
Only humans possess this capability
To escape behaving like humanoids
Shouldn’t we give up love of frivolity?
HPB = Helena Petrovna Blavatsky, a Russian
noble woman in Czarist Russia. To know more
about her please refer to my blog piece The
Tipping Point.
Om Shantih
Ajit Sambodhi
Monday, October 6, 2025
आज शरद पूनम है
आज शरद पूनम है
ये अनुभव अति अनुपम है
लगती जैसे नज़्म है कोई
ये अद्भुत पूनम है
आज शरद पूनम है।
वर्षा जाती शरद है आती
नई छटा लेकर है आती
सब के मन को खूब लुभाती
जैसे कोई सरगम है
आज शरद पूनम है।
धुले धुले सब पेड़ खड़े हैं
रंग बिरंगे फूल खिले हैं
पंछी भी सब चहक रहे हैं
ऊपर को सब झाँक रहे हैं
आज का चाँद चमाचम है
आज शरद पूनम है।
अभी चाँद निकला ही है
पूरा गोल ही निकला है
साम्राज्य बड़ा है उसका
कितना मगर सुगम है
आज शरद पूनम है।
वो पूर्ण है, परिपूर्ण है
सम्पूर्ण है, शान्तिपूर्ण है
आसमान का परचम है
कैसा अजब समागम है
आज शरद पूनम है।
सभी को शरद पूर्णिमा की बधाइयाँ
एवम् शुभ कामनाएँ।
शुभेच्छु
अजित सम्बोधि।
Wednesday, October 1, 2025
मैंने वादा कर लिया है
मैंने वादा कर लिया है
मुठ्ठियों को खोल दिया है
मैं पलकें बिछाऊँगा
मैं नज़रें बिछाऊँगा
मैं तुम्हें ना भुलाऊँगा
मैं वादे निभाऊँगा
कैसा करम है तेरा
कैसा रहम है तेरा
मैंने वादा कर लिया है
मैंने दिल खोल दिया है
सब रानाइयाँ सजाऊँगा
तनहाइयाँ मिटाऊँगा
रोने न दूँगा अकेले में
रोने न दूँगा मेले में
आँखों में जो नमी है तेरी
पलकें जो झुकी हैं तेरी
क़सम है ये अब मेरी
हर शमा जलाऊँगा
मैंने वादा कर लिया है
ख़ुद को तैयार कर लिया है
कभी था जो सरताज
किसने दिया था वो ताज
तूने ही दिया था साज़
तूने ही बख्शा था ताज
कैसे हो गया मोहताज
मैं दिल नवाज़ बनाऊँगा
फ़िर से नाज़ करवाऊँगा
मैंने वादा कर लिया है
शुआओं को खोल दिया है
फ़लक से ज़मीं तक सभी
सूना पड़ा है जो अभी
नामुमकिन दिखे, था जो मुमकिन
मैं उसको बनाऊँगा मुमकिन
मैं ख़ुदी को मनाऊँगा
मैं तुमको मनाऊँगा
मैंने वादा कर लिया है
जो सोया था जगा दिया है
कैसी झिलमिल सी झलकती हैं
कैसी रिमझिम सी बरसती हैं
ये बे इन्तिहा इनायतें तेरी
ये दिलाराइयाँ तेरी
ये चाँद की शुआऐं
ये मुस्कुराती रानाइऐं
मैं इन्हें सब तक पहुँचाऊँगा
सब को दिल से लगाऊँगा
मैंने वादा कर लिया है
मैंने वादा कर लिया है
रानाइयाँ = सजावटें।शमा = दिया।
दिल नवाज़ = दिल को ख़ुशी देने वाला।
शुआओं/ऐं = किरणें। फ़लक = आसमान।
दिलाराइयाँ = दिल में छुपी ख्वाहिशें/ ख़ुशियाँ।
क़दम बोस
अजित सम्बोधि
Friday, September 26, 2025
परिन्दा बना दे।
Tuesday, September 23, 2025
Ever thought?
Ever thought why people keep fighting
Even in sleep they don’t forget fighting!
Be it any religion, you see them fighting
Be it any nation, you find them fighting!
Every nation spends 80% gdp on fighting
Asks people to live on 20% sans fighting!
Aristotle wanted a philosopher to be a ruler
But Harishchandr only was such a one ruler!
We have reached a cul de sac, haven’t we?
Let’s look inside ourselves, shouldn’t we?
A wise guy pointed out that ‘I’ is an illness
It creates 80K thoughts/day in the process!
Let’s swap ‘I’ with ‘We’ that denotes wellness
Each thought will be for ‘We’for real progress!
Shouldn’t we try it, though it looks trifling?
Let’s hope it ends, endless rage for fighting!
sans = without. cul de sac = dead end of a street
in the form of a circle, for turning back.
Om Shantih
ajit sambodhi
Thursday, September 18, 2025
बस एक मुस्कान चाहिये
वो पूछने लगे आपको क्या चाहिए
मैंने पूछा किस बाबत क्या चाहिए?
कहने लगे कि ख़ुश रहने के लिए
मैंने कहा सिर्फ़ एक मुस्कान चाहिए।
तारीकी मिटाने को भला क्या चाहिए
बस एक जलता हुआ दिया चाहिए
दिल की मायूसियत मिटाने के लिये
बस एक नन्ही सी मुस्कान चाहिए।
ख़ुश होने के लिए न बड़ी दौलत चाहिए
और ना ही बहुत सी शोहरत ही चाहिए
दिल की ख़ुशी के लिए बस नक़द-दम
तहे दिल से निकली एक मुस्कान चाहिए!
तारीकी = अन्धकार। मायूसियत = उदासी।
नक़द-दम = सिर्फ़।तहे दिल = अन्तरतम।
ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि
Friday, September 5, 2025
अन्दाज़ ए इबादत।
तुम जो कहो नग़मा-ए-उल्फ़त सुनाऊँ?
कुछ माज़ी सर…गोशी दुहराऊँ?
तुम्हारे सरगम की ख़ातिर दरकार
दिल में छिपा मेरा बरबत बजाऊँ?
दिल की परतों में दबा वो भेद सुनाऊँ ?
क़ैफ़ियत गुमनाम आज उजागर कराऊँ?
जुबाँ पे ला न पाया जिसे मैं अभी तक
वो अन्दाज़ ए बयाँ भी तुमको सुनाऊँ?
एक तुम्हारी ख़ातिर ही जिन्दा हूँ, समझे?
तुम्हारे सिवा कुछ न चाहिए , समझे?
और बता दूँ एक राज़ की बात तुमको
हररोज़ मरता हूँ, सो थक गया हूँ, समझे?
अन्दाज़ ए इबादत = बन्दगी करने का ढंग।
नग़मा ए उल्फ़त = प्यार का गीत।माज़ी = पुरानी।
सर गोशी = कानाफूसी।बरबत = एक वाद्य यन्त्र।
क़ैफ़ियत = पहचान।अन्दाज़ ए बयाँ = बोलने का ढंग।
ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि।
Wednesday, August 27, 2025
paying gratitude
Saturday, August 16, 2025
कान्हा से कुछ सवालात
जन्माष्टमी के सुअवसर पर सभी कों शुभ कामनाएँ
एवं प्रणाम: अजित सम्बोधि।
भादों की अँधेरी रात, जमुना उफान पर
देवकी वसुदेव क़ैद में, कंस के आदेश पर
क्या सोच के आधी रात को कान्हा तुमने
देवकी की गोद भरी, सूनी रखने को उम्र भर?
तुमने जो अजीब ओ ग़रीबf दुनिया रची है
क्या आज तक किसी के समझ में आई है?
क्या इसलिए कि कोई सवाल न पूछ ले
तुमने पर्दे के पीछे अपनी जगह बनाई है?
तुम्हारी कायनात का आग़ाज़ ओ अंजाम है?
मेरा मन्तव्य है कि इसका कोई ओर-छोर है?
माना कि इन्तिहाई उम्दा और करिश्माई है
मगर क्या ये अनन्य सवालों के घेरे में नहीं है?
तुमने हमको बनाया है, हम तुम्हारी औलाद हैं
हम तुम्हारी ईजाद हैं, फ़िर क्यों हम नाशाद हैं?
क्या हमारे दिल नहीं है, कोई हम फ़ौलाद हैं ?
तुम मिलते नहीं, कैसे बतायें जो हमारी मुराद हैं?
तुम जब यहाँ आये थे तो, एक इन्सान बन के आये
मिलन जुदाई देखीं, गालियाँ खाईं, रणछोड़ कहाये
मगर तुम्हारी पहिचान तुम्हारी चिर मुस्कान ही रही
क्यों निभा न पा रहे हम सूत्रों को जो गीता में गिनाये?
अजीब ओ ग़रीब = रहस्यमय।कायनात = सृष्टि।
आग़ाज़ ओ अंजाम = सीमा।इन्तिहाई = बेहद।
ईजाद = आविष्कार।नाशाद = दुखी।फ़ौलाद = लोहा।
मुराद= अभिलाषा। मुरीद = चेला।
तुम्हारा मुरीद
अजित सम्बोधि
Saturday, August 9, 2025
राखी का बन्धन
ये बन्धन बड़ा अनूठा, इसको कहते रक्षा बन्धन
राखी बनी कबीर की साखी, सजाने को ये बन्धन।
इक धागा बन जाता कंगन
रिश्तों में भर देता स्पन्दन
बहना को अपने भैय्या में
मिल जाते हें अदितिनन्दन!
कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं
जो रब के बनाए होते हैं
वे बेहद अनुपम होते हैं
मधुरम से मधुरम होते हैं।
भाई और बहिना का नाता
एक फर्राता हुलसाता नाता
सावन की पूनम के दिन वो
रक्षाबन्धन बन कर आता।
हर बहना अपने भैय्या को राखी की याद दिलाती है
हाथ में धागा बाँधती है, माथे पर तिलक लगाती है।
साखी = साक्षी, गवाह।
सबको रक्षा बन्धन की बधाई
अजित सम्बोधि
Thursday, August 7, 2025
अब का सावन
अब का सावन बड़ा ही सुहाना रहा
नाख़ुश होने का न कोई बहाना रहा
बहारों की झड़ियाँ बरसती रहीं
अब्र- ए- बाराँ मेरा सिरहाना रहा।
मैं हँसता रहा और वो हँसाता रहा
वो बरसता रहा मैं खिलखिलाता रहा
मुसलसल फुहारों से नहलाता रहा
मैं नहाता रहा गुनगुन गुनगुनाता रहा।
कभी दम साधे मुझको बहकाता रहा
कभी कड़क कर मुझको डराता रहा
कभी बिजली बनके चौंधियाता रहा
मैं दम साधे मन ही मन मनाता रहा।
तुम्हारी याद मुझको सताती रहेगी
तुम्हारी कमी मुझको खलती रहेगी
रुआँसे मन से तुम्हें बिदा कर रहा
तुम्हारी याद में आँखें बरसती रहेंगी।
अब्र- ए- बाराँ = बारिश से भरी घटायें।
मुसलसल = लगातार।
तुम्हारा दिलबर
अजित सम्बोधि
Friday, August 1, 2025
सावन में साँवरिया
जब जब बरसे बादरिया
मैं बन जाता बावरिया
जब जब सुनता बाँसुरिया
मैं याद करूँ साँवरिया
सावन मुझे भिगोता है साँवरिया मुझे सँजोता है
जोड़ा सावन साँवरिया का मन में प्यार पिरोता है।
साँवरिया ऐसा बाजीगर
दिन में बन जाता जादूगर
रात में जब मैं सोता हूँ
तब जाके होता उजागर
दिन में बादल बन के बरसता रात को रोशन होके बरसता
ऐसी बनी जुगलबंदी ये, कोई देख न पाया मुझे तरसता।
ये जो सावन की फुहारें हैं
क्या ये प्यार की छिटकारें हैं?
साँवरिया की बंदनवारें हैं?
या मुहब्बत की जागीरें हैं?
मैं बताऊँ तुम्हें ऐ मेरे दुलारे, ये इस बंजारे की मनुहारें हैं
सुन साँवले साँवरिया, ये एक तड़पते दिल की पुकारें हैं।
क़दीम मुरीद
अजित सम्बोधि
Wednesday, July 30, 2025
अरावली की वादियाँ
ये अरावली की वादियाँ हैं
यहाँ वीथियाँ हैं कुंजगलियाँ हैं
लहराती पगडंडियाँ हैं
भूलभुलइयाँ नहीं है।
ऊँची ऊँची चोटियाँ हैं
भेड़ें हैं भेड़वालियाँ हैं
छोटी छोटी मींगड़ियाँ हैं
पेस्टिसाइड वाली नहीं हैं।
ग़ुलज़मीं है रानाइयाँ हैं
कलियाँ हैं फुलझड़ियाँ हैं
अन्ना हैं पॉलीअन्ना हैं
दोनों की गलबहियाँ हैं।
ये सावन की फुहारें हैं
कुछ मचलती बहारें हैं
मेरी नज़रों के नज़ारे हैं
पसन्द आयें तो सबके हैं।
ग़ुलज़मीं = फूलों की क्यारियाँ।
रानाइयाँ = सजावटें।अन्ना = शालीनता।
पॉलीअन्ना = ख़ुशमिजाज़ वाली।
ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि
Sunday, July 20, 2025
अरावली की वादियों में फ़िर से दस्तक
पहले भी यहाँ आया, कुछ ख़्वाब यहीं भूल गया
आज उनसे रूबरू होने को, मैं फ़िर से आ गया।
ये कचनार का पेड़, मेरा गवाह
ये वहीं खड़ा है, रस्ते पे निगाह
मानता है मुझको अपना ही
इसीलिए रखता है मेरी चाह।
ये वादियाँ हैं या कोई साज़ है
इन वादियों में मेरी आवाज़ है
मैं प्यार से आवाज़ लगाता हूँ
ये करने लगती रियाज़ है।
वो आसमान देखिए क्या कर रहा
मुझे अपने आगोश में लिए ले रहा
इतना प्यार तो किसी ने नहीं दिया
जितना ये बयाबान मुझे दे रहा।
आज क्या आगया मैं यहाँ फ़िर से
लगता है सारे सावन लौटे फ़िर से
सोचिए ज़िन्दगी में ग़र सावन न हो
क्या मतलब है जनम लूँ मैं फ़िर से।
मैं बरबख़्त हूँ मेरा ख़ैरख़्वाह मुझे लेके यहाँ आ गया
रब का ममनून हूँ वो मेरा हमदम बनके यहाँ आ गया।
रूबरू = आमने सामने।रियाज़ = practice.
आग़ोश = embrace. बयाबान = जंगल।
बरबख्त = fortunate.ख़ैरख़्वाह = भला चाहने वाला।
रब = ईश्वर।ममनून = thankful. हमदम =दोस्त।
ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि
Friday, July 18, 2025
मनभावन है ये सावन
सावन को दिल दे दिया, सावन ने दिल दे दिया
मौका मुहब्बत का हमें, फ़िर मौसम ने दे दिया।
ये सौदा बुरा नहीं है
कोई ख़फ़ा नहीं है
बेहद तपिश थी गो
नतीजा बुरा नहीं है
ये राज़े मुहब्बत है आ आ के बचा दिया
दस्तूरे फ़लसफ़ा ने किरदार निभा दिया।
बैठा था कब से ग़मगीन
अश्कों के सागर में लीन
बारिश की झड़ी लगाकर
आब ए चश्म उठा लिया
मनभावन है ये सावन, मैंने दीदार कर लिया
जो तसव्वुर में था मेरे, रूबरू कर लिया।
ये सावन बड़ा आला
जैसे पूरा भरा प्याला
गरमी से देता राहत
जैसे भूखे को निवाला
बादल को मुहब्बत है, ज़मीं को भिगो गया
सावन को मुहब्बत है, फ़िर मिलने आ गया।
गो = यद्यपि। किरदार = role. आब ए चश्म = आँसू।
दीदार = दर्शन। तसव्वुर = कल्पना। रूबरू = सामने।
ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि
Saturday, July 12, 2025
सावन आ गया
सावन का महीना आगया, झूलों का मौसम आगया
ज़मींन महकने लग गई, आसमान चहकने लग गया।
सावन की बहारें आ गईं
गुमनाम बहारें छा गई
बौछारों की झड़ियाँ लग गईं
फुहारों की लड़ियाँ झूल गईं
पेड़ों पे निखार आ गया, रंगत में उछाल आ गया
पत्तों में खुमार आ गया, फूलों पे शबाब आ गया।
शम्स का तेवर पलट गया
हवा का मिज़ाज बदल गया
गुलशन जो सूख चला था
दुलहन के जैसा सज गया
बादल का ढंग बदल गया, घटा बनके आ गया
मौसम जो बदरंग था, रूमानी बन के आ गया।
अम्बर में परिन्दे छा गये
फ़िज़ाएँ बदलने आ गये
सुनसान पड़ी हवाओं में
चहचहाहट ले के आ गये
सावन क्या आ गया, नया मज़मून लेके आ गया
हर इन्सान के चेहरे की, इबारत बदलने आ गया।
गुमनाम = unknown. ख़ुमार = intoxication.
शबाब = तरुणाई। शम्स = सूरज। गुलशन = चमन।
रूमानी = romantic. मज़मून = मूल लेख, मुख्य बात।
इबारत = इमला, script.
ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि
Thursday, July 10, 2025
गुरु पूर्णिमा 2025
मैं सोया करा रात भर, तुम साँस ढोया करे रात भर
कौन करेगा प्यार इतना तुमने किया है जैसा उम्र भर।
तुम्ही मेरा दाता
तुम्ही हो नियंता
तुम्ही मेरे करता
तुम्ही भवितव्यता
हर सुबह सूरज बनके उठाते रहे, अपने अंक में भर
कौन है सिवाय तुम्हारे ऐसा मददगार , हे विश्वम्भर।
तुम्ही हो मेरे रहबर
तुम्ही हो मेरे दिलबर
मैं रहता रहा बेख़बर
तुम रहे सदा ही मोतबर
मैं जो फ़क़ीर हूँ, क्या करूँ तुम पर मैं निछावर
एक तेरे नाम के सिवा कुछ नहीं पास, हे गुरुवर।
बना दो मुझे बे-ज़रर
करदो मुझे मुक़र्रर
अपना नामाबर
भेज दो मुझे दिसावर
ये जिस्म तुमने दिया, बना दो इसे यायावर
बख़्श दो ऐसा हुनर, गूँजता फिरूँ बनके भँवर।
रहबर = राह दिखाने वाला।दिलबर = प्रिय।
मोतबर = भरोसेमंद।बे-ज़रर = बुरा करने में अक्षम।
मुकर्रर = नियुक्त।नामाबर = डाकिया।
दिसावर = परदेस।यायावर = ख़ानाबदोश।
ओम जगतगुरूं नमामि
अजित सम्बोधि
Saturday, June 21, 2025
योग दिवस 2025
कहते हैं आज योग दिवस है
भला इसमें क्या असमंजस है
योग एक ऐसा पूर्ण विधान है
जो दायमी है, बेहद मुकद्दस है।
योग तो एक शाश्वत विधा है
जो दूर कर देती हर दुविधा है
जिस्म को रूह से मिलाने की
सभी को उपलब्ध ये सुविधा है।
हर दिवस ही योग दिवस है
सबके लिए ही ये सरबस है
जिन्हें रूह से रूबरू होना है
उनके लिए अहम ढाढ़स है।
योग का अर्थ होता है जोड़ना
ज़रूरी है इस बात को समझना
एक रास्ता जो रूह तक जाता है
योग से है उस रास्ते को खोजना।
दायम = eternal. मुकद्दस = पवित्र।
सरबस = सर्वस्व। रूबरू = सन्मुख।
ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि
Thursday, June 12, 2025
मेरा चाँद और मैं
आसमान साफ़ था
सामने चाँद था
मध्य रात्रि का वक़्त था
शायद दूसरा पहर था
चाँद में सुहास था
मौसम में सुवास था
कुछ ऐसा एहसास था
बल्कि पूरा विश्वास था
पक्षी का परिहास था
श्वास निश्वास था
हवा बह रही थी
और कह रही थी
मिलने का यही
तो वक़्त है सही
चलो एक गीत गुनगुना लें
कुछ पुरानी यादें दुहरा लें
जब भी हम मिले थे
हम दोनो अकेले थे
भीड़ भाड़ से अलग
उखाड़ पछाड़ से अलग
चाहे भीड़ हो
या भाड़ हो
दोनों में क्या फ़र्क़ है
दोनों ही ज़र्कबर्क हें
भाड़ में भभकते हें
भीड़ में भोंकते हें
यहाँ सुकूत था
आसमाँ अभिभूत था
मौसम का मज़मून था
चाँद का जुनून था
शोशा अफ़लातून था ?
नहीं, सब पुरसुकून था!
चाँद गोलमोल था
पूरा सुडोल था
करता कलोल था
अमोल था अनमोल था।
ज़र्कबर्क = तड़क भड़क। सुकूत = शान्त।
मज़मून = लेख। जुनून = गहरी रुचि।
शोशा = चुटकुला। अफ़लातून = Plato.
पुर सुकून = चैन से भरपूर।
ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि।
Tuesday, June 3, 2025
दिखते हो तुम
ये ना समझना मैं चला जाऊँगा
मैं तुमको तुम्हीं से ले के रहूँगा
चला हूँ मैं अब तक जितने क़दम
आसमाँ ने देखा किया दम ब दम
पर आसमाँ से अलग हो क्या तुम?
जिधर देखो उधर दिखते हो तुम!
तुम्हारे जैसा अलबेला तो हूँ नहीं
सबको पसन्द आऊँ नवेला भी नहीं
दिखने में तो अकेला ही दिखता हूँ
लुकाछिपी में ऐसा ही दिखता हूँ
किसी को कैसे बताऊँ कैसे हो तुम
हर पल निराले रंग में दिखते हो तुम!
पूछते हो कि मैं क्या किया करता हूँ?
तो मैं बताऊँ कि मैं इबादत करता हूँ
अक्सर तो फ़रियाद किया करता हूँ
कभी कभी मैं रोने भी लगा करता हूँ
मैं कहता हूँ कि मैं रो रहा हूँ और तुम
सिर्फ़ सिर्फ़ मुस्कराते दिखते हो तुम।
ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि
Thursday, May 29, 2025
I say be a songster!
You are a prankster
You are a funster
Sometimes a punster
I say be a songster!
I wish I were merry
But I am so sorry.
You Humpty Dumpty
Please be hunky dory!
Why are we here?
Who is happy here?
Do you hear our sighs?
Have you ears to hear?
Why are you in hiding?
Our time we are biding
& what are you doing?
You keep on chiding!
I have been to whirls
I have been to twirls
But I am just helpless
After all those swirls!
Yes I mean luminous
Lambent and lustrous.
All tunnels & channels
Glorious and obvious!
I am at the fag end
With nil on each hand.
Can you come to me
For a shake hand?
every moment yours
ajit sambodhi
Saturday, May 17, 2025
All happens with his nod!
Whether it is good or bad
Whether one is jolly or sad
Whether it is hot or cold
Whether it’s silver or gold
Whether it is odd or mod
All happens with his nod!
Whether it is right or wrong
Whether it’s jingle or a song
Whether it’s soulful or doleful
Whether it is cupful or half full
Whether it’s awed or lot of sod
All happens with his nod!
Nothing ever goes against you
Good & bad happen to help you
It mayn’t look immediately good
It’s going to be ultimately good
Didn’t you fall while you trod?
All happens with his nod!
Always be full of gratitude
Gratitude is just pulchritude
Even in times of turpitude
Gratitude is full of beatitude
Whatever comes, learn to nod
All happens with his nod!
Om Shantih
ajit sambodhi
Tuesday, May 13, 2025
शामे ग़म
देख कर के ये हालत मेरी
कहीं तेरा दिल न दुखने लगे
मुझे डर है ए आसमाँ ये कि
किसी दिन तू भी रोने न लगे।
अब कैसे सम्हालूँ ख़ुद को कोई तो ये बता दे
इन ग़मों के दरमियाँ मुझे मुस्कुराना सिखा दे।
अब देखो न किस तरह से ये
शाम ए ग़म सिमटता ही नहीं
हर तरफ़ छाया अँधेरा घना
दिया जलता कहीं दिखता नहीं।
क्या कुछ जियादह माँग रहा हूँ तू ये बता दे
यही तो कह रहा हूँ मुझे कुछ रोशनी दिला दे।
मेरे ऊपर थोड़ा ये करम करदे
ग़म से ग़म को मिटाना सिखा दे
या लपेट के मुझे अपने दामन में
इन ग़मों को मुस्कुराना सिखा दे
मैं जानता हूँ तेरी फ़ितरत तू कुछ भी कर दे
तो फ़िर पहिले मेरी ख़ुदी को ही तू मिटा दे।
ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि
Sunday, May 4, 2025
मैंने तुमको पहचान लिया है
मैं गिर रहा था किसने थामा था मुझे?
अपना समझ किसने उठाया था मुझे?
मानोगे नहीं कि तुम थे वहाँ पे, पर मैं
अजनबी था तो कैसे पहचाना था मुझे?
वो कैसी आतिशबाज़ियाँ हो रही थीं?
वो कैसी फुलझड़ियाँ बरस रहीं थीं?
कभी सब्झ, गुलरू तो कभी नीलफ़ाम
सब मुझ से लिपटे चली जा रहीं थीं?
हाँ अब मैंने तुमको समझ लिया है
सच कहूँ तो मैंने तुमको देख लिया है
तुम कितना भी भरमाया करो मुझको
मैंने तुमको बख़ूबी पहचान लिया है!
सब्ज़ = हरी। गुलरू = पुष्पमुखी।नीलफ़ाम = नील वर्ण।
ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि
Tuesday, April 29, 2025
रोशन करता चलूँ!
मैं अँधेरों को रोशन करता चलूँ
मुश्किलों को हरदम थकाता चलूँ
ज़िद है मेरी कि मैं सम्हल के चलूँ
ख़ुद ब ख़ुद ख़ुदको, मिटाता चलूँ!
सितारों से कदम मिलाता चलूँ
शाख़ को गुलों से सजाता चलूँ
हर शै को हरदम निभाता चलूँ
हर आह को इबादत बनाता चलूँ!
ख्वाबों को ख्वाबों से जुटाता चलूँ
ठोकरों को लबों से पुचकारता चलूँ
इसको किस्मत कहूँ या तेरी क़ुर्बत
तेरे ही सपनों से सपने बुनता चलूँ!
खुदको = अहं को। गुल = फूल।
शै = चीज़, स्थिति। इबादत = पूजा।
लबों = होठों। क़ुर्बत = निकटता।
ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि
Saturday, April 26, 2025
welcome to the rising sun!
Ever welcomed the rising sun?
It’s not only early morning fun!
It’s an extravaganza, to observe
Fear, stress & anger, on the run!
When the sun pours its treasure
Into you, in such great measure!
Every pilferer receives a big jolt
Rushes pell-mell, quitting leisure!
Your body gleams, sterling pure!
Full of all the things that assure!
Body attains to highest vibrations!
Love compassion gratitude endure!
Om Shantih
ajit sambodhi
Monday, April 21, 2025
God Nods!
GOD NODS
You breathe in when he nods
You breathe out when he nods
You go to sleep when you will
But he doesn’t forget his nods!
Raise your hand to drink water
Or to wipe when you perspire
Don’t forget, without his nods
Nothing is going to transpire!
Things happen when he nods
Things happen when god nods
Never forget to offer gratitude
You are alive because of his nods!
Om Shantih
ajit sambodhi
Saturday, April 12, 2025
मुझे ऐसी रूखसती चाहिए
मेरे जाने पे न मातम मनाना
कुदरत का दस्तूर है आना जाना।
ये हक़ीक़त है इसे भूल मत जाना
जाये बिना फ़िर कैसे होगा आना?
मेरा मज़हब है गले से लगाना
मेरी फ़ितरत है तस्लीम करना।
मैं बादल हूँ, मेरा निशाँ मत ढूँढना
हो सके तो बस ख़ामोश रहना।
मेरे जाने पे न मरसिया गाना
न अपनों को नाहक में रुलाना।
ये कारवाँ यूँ ही चलता रहेगा
न गुज़रे ज़माने पे आँसू बहाना।
मेरे जाने को मुक़द्दस ही रखना
मुझे हुज्जूम से दूर ही रखना।
मैं भीड़ का इन्सान नहीं हूँ
चुनिन्दा नज़रों से रुख़सत करना।
मेरी राख को न दरिया में बहाना
बहर ए नूर में नहाता हूँ ये याद रखना।
ये जिस्म क्या है? ख़ाक ही तो है?
जब ख़ाक है तो सुपुर्द ए ख़ाक करना।
मुझे रस्मों, रवाज़ों की, आवाज़ न बनाना
ये तीया, बारवाँ जैसी रूढ़ियाँ, न निभाना।
मेरी बारात में मेरे समेत कुल नौ इन्सान थे
आख़िरी दफ़ा भी मुझे मेरे माफ़िक़, रखना।
सफ़र पे निकलना है, तय्यार हूँ मैं
वक़्त की पेशगोई को, पहचानता हूँ मैं।
सभी को गुज़रना है इस रहगुज़र से
है ये कुदरत का दस्तूर, वाक़िफ़ हूँ मैं।
सभी को अलविदा कह रहा हूँ मैं
तहे दिल से शुकराना अता कर रहा हूँ मैं
ये ज़िन्दगानी तो नेमत है रब की
रब को भी तस्लीम कर रहा हूँ मैं।
फ़ितरत = प्रकृति। तस्लीम = प्रणाम।
मरसिया = शोक गीत। मुक़द्दस = पवित्र।
हुज्जूम = भीड़। चुनिन्दा = चुनी हुई।
बहर ए नूर = प्रकाश का समुद्र।प्रकाश की गंगा
में रोज़ नहाता हूँ ।गंगा में राख बहाने मत जाना।
मुझे कर्म कांड बिल्कुल नहीं भाते।
सुपुर्द ए ख़ाक = मेरी राख़ तुलसी में डाल देना।
पेशगोई = क्या होना है उसे पहचान लेना।
रहगुज़र = रास्ता। अता = देना। नेमत = gift.
ये आख़िरी ख्वाहिशें हैं। पूरा करना फ़र्ज़ बनता है।
ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि।
Friday, March 28, 2025
वही 22 मार्च
हाँ वही 22 मार्च
जब मेरा रहबर चला गया
रहगुज़र सूना रह गया।
तुम जो न मिलते गीत न मिलते
फूल ये मन के, कैसे खिलते
बिन गाये ही मैं रह जाता
तुम जो न आके यूँ मुसकाते।
तुम जो न मिलते ख़्वाब न मिलते
तन्हा दिन मेरे, कैसे कटते
आँखे सूनी सूनी रहतीं
तुम जो मेरे पास न होते।
तुम जो न मिलते दर्द न खुलते
अनजाने में अन्दर घुटते
जीवन मेरा बंजर रहता
अपना सलीका न तुम जो सिखाते।
रहबर = रास्ता दिखाने वाला।
रहगुज़र = रास्ता।
भूली बिसरी यादें
अजित सम्बोधि
Friday, March 14, 2025
Holi is Holy
Holi is just another name for fun
No festival displays so much fun
It’s open for all, young and old
Even a child enjoys the holi gun.
People open their arms ‘n’ embrace
They bury dead past, leave no trace.
A pinch of red is all the charm
They anoint the other with so grace.
I wish everybody, the funniest Holi
Holi is, as the name sings, really holy
Play it with bright and fragrant abeer
Its aroma is lilting, shall make ye jolly!
Wish everyone happy and aromatic Holi
Ajit Sambodhi
होली मिलन
मौसम ने लेली करवट, खुशियाँ मना रहे हें
जिसको हें कहते होली, वो हम मना रहे हें।
कलियाँ हें मुस्कुराती, भँवर गीत गा रहे हें
किलकारियाँ जम गई थीं, अब सुन पा रहे हें।
आसमाँ झुकने लगा है, तारे खिलखिला रहे हैं
रातों की ये मुसालमत, फ़िर से देख पा रहे हें।
किसलय हें फूटते जब, होली का होता आना
अंकुर उकरते मन में, अपनों का होता आना।
होली मिलन का सपना, हर कोई देखा करता
मिलते हैं रूँठे कैसे, नज़ारा भी देखा करता।
तासीर ए गुलाल ऐसी, हर कोई हँसने लगता
खुशबू ए अबीर ऐसी, हर कोई महकने लगता।
सुनसान फ़लक के नीचे, हूँ रहता तन्हाई में मैं
मन के इक कोने में बसाके, रखता होली मैं।
मुसालमत = सन्धि करना जैसे तारों ने करी हुई है।
किसलय = नये पत्ते। तासीर ए गुलाल = गुलाल
की प्रक्रति। ख़ुशबू ए अबीर = अबीर की ख़ुशबू।
फ़लक = आसमान। तन्हाई = अकेलापन।
सभी को होली की शुभकामनाएँ
अजित सम्बोधि
Wednesday, March 5, 2025
A Cascade of Colours!
When you close your eyes, what do you see?
Most likely it’s a dark curtain that you’ll see.
Dark is black and black has zero frequency
Yes black is dead. It possesses zero vibrancy.
Black is wed to dead and dead to being glad
Got to pull back the curtain, if you aren’t mad.
The only way out is to work on your chakras
Turn on the chakras if you don’t want to be sad.
The first chakra is red like it is the rising sun
It sits at the bottom with lot of strength to stun!
When you need an extra force it stands by you
It is called muladhar and helps in the long run.
The second chakra is orange like it’s orange sun
It helps in extending your presence, just for fun!
It’s called swadisthan that translates established
In the self. Yes, self not Self! Remember the pun!
The third chakra is yellowish like the fading moon
It fosters haste, doing everything speedily and soon.
It’s manipur sitting at the top of the lowest region
In matters of nagmani, bullies make two-bits croon.
We are at the limits of the familiar, the physical region
Hardly anyone tries to peep into the adjoining domain
Some day you do come across a soul straining its neck.
The lucky one is stunned locating the lush green region!
This is the terrain of anahat, the heart of unstruck sound
The physical is ended; the metaphysical takes the ground.
Now the rules of the game change to navigate you further
So that one morn you might coo with the soundless sound!
Yes you have reached the vishudh chakra to get purified
Its krishna blue enjoins on ajna chakra you aren’t denied
Assent to enter into the realms of your loved destination
Wherein, oceans of lights wait for you to get sanctified!
Ya, this is sahasrar where blaze lights of the thousand suns
The blaze allows no colouration. Pure white is what it guns.
It’s not hot, dazzling it is, your ego gets dissolved for good.
When you come out you are a different breed: son of suns!
self = common notation for ego.
Self = it’s used for soul.
nagmani = it’s symbolic of dubious desires.
Om Shantih
Ajit Sambodhi
Tuesday, March 4, 2025
दुआ दे रहा हूँ
मैं भूल भी जाऊँ तो क्या होगा
रब को तो सब कुछ याद है न
मेरी भला क्या औक़ात है
रब की रज़ा तो क़ायम है न।
ये जो रिश्ते हैं अभी के तो नहीं हैं
ये रिश्ते तो जन्मों से चले आ रहे
हम भूलते रहे हें तो क्या हो गया
रूहें नहीं भूलतीं ये याद रहे।
तुम दोनों के रिश्ते भी पुराने रहे हें
रुहों से ये जिस्म सजते रहे हें
न तुम थे जुदा न होगे जुदा
बस जिस्मानी चोगे बदलते रहे हें।
जीवन की नदिया बहती रही है
दो किनारे हमेशा से चलते रहे हें
तुम्हारी ये नाव चलती रही है
रब के इशारे से हर काम होते रहे हें।
तहे दिल से दोनों को दुआ दे रहा हूँ
बहारों को ये पैग़ाम दे रहा हूँ
ख्वाबों को तुम्हारे सजाते रहें
रब से भी ये ही दुआ कर रहा हूँ।
तुम दोनों को मुबारकबाद
पापा
Wednesday, February 26, 2025
शिव रात्रि 2025
तुम अगर अपने शिव को पहचान लो
शिव को मनाना ज़रा भी मुश्किल नहीं।
तुम अगर अपनी साँसों को पहचान लो
शिव तक का सफ़र क़तई मुश्किल नहीं।
तुम अगर मानो तो उपवास ज़रूरी नहीं
तुम अगर जानो तो व्रत की हुज्जत नहीं।
लम्बी दूरियाँ तय करना भी लाज़मी नहीं
सच तो ये है वो तुम से, अलग है ही नहीं।
अपनी साँसों को समझने की कोशिश करो
हाँ इनको पढ़ पढ़ कर आज़माइश तो करो।
साँसो की इबारत में एक अजब सा जादू है
जब साँस थिर हो जाए, उसकी आस करो।
शिव थिर हुआ शून्य बन गया, शुभ बन गया
ख़ुद को मिटा दिया और वो शक्ति बन गया!
ख़ुद को मिटा लेना, समझ जाओगे कैसे वो
शिव से शम्भो, तत्पश्चात, शाम्भवी बन गया!
शाम्भवी, अर्थात, सभी कुछ सम्भव हो गया
जो असम्भव सा था वह भी सम्भव हो गया।
इस सृष्टि और स्रष्टा का दृश्य बदल गया
जो ख़ुद को कर्ता कहता रहा, दर्शक हो गया!
जय शिव शम्भो!
अजित सम्बोधि
Friday, February 14, 2025
14 Feb 2025
क्यों याद आती है 14 फ़रवरी
हाँ जो हुआ करती थी रस भरी।
आज भी तो आगई है वो मगर
ये आँखें क्यों हें यूँ, आँसू भरी।
कैसे बीतते हें ख़ुशबख्शी के दिन
हज़ारहा दिन भी लगते हें एक दिन।
अब क्या बेड़ियाँ पड़ गई हें इनके
बमुश्किल गुज़रता है एक एक दिन।
क्या दुनिया बनाई है ऐ मालिक तूने
क्या है ऐसा जो न बनाया इसमें तूने।
क्या इतना हक़ नहीं हमें जानने का
क्यो छुपा के रख लिया ख़ुद को तूने?
तू दिखता तो तुझसे फ़रियाद तो करते
तेरे रूबरू दिल की बातें तो बयाँ करते।
तुम तो ग़मख़्वार हो, हमे पूरा एतिबार है
तेरे दरपेश होते, हमें तग़ाफ़ुल न करते।
ख़ुशबख्शी = ख़ुश क़िस्मती। हज़ारहा = हज़ारों।
बमुश्किल = मुश्किल से। ग़मख़्वार = हमदर्द।
दरपेश = रूबरू = सामने।तग़ाफ़ुल = ignore.
ॐ शान्ति:
अजित सम्बोधि
Saturday, February 8, 2025
Happy Birthday Arunima!
One more year, one year more
We are again here, for to be sure!
Nice to hear the ringing bells again
I only blinked and found I was here!
Happy birthday to you Arunima!
Happy birthday to you Arunima!
We move on but what’s that moves on?
Put the finger on whatsoever moves on!
Can we do so? Is it at all possible to do?
As we age, don’t we say we’ve moved on?
Happy birthday to you Arunima!
Happy birthday to you Arunima!
Yes that which moves on is called our age
We keep on gazing while all we do is to age!
You can count your age like rings on the tree
We are useful like a tree, doubling as a sage!
Happy birthday to you Arunima!
Happy birthday to you Arunima!
Let’s make merry and dance our way
Don’t curse or regret, just blink your way!
Whatsoever happens, happens for our good
Just flow with the flow and sway and sway!
Happy birthday to you Arunima!
Happy birthday to you Arunima!
Bless you Arunima
Nana
Sunday, February 2, 2025
बसन्त पंचमी 2025
बसन्त आ गया यानि कि बस अन्त आ गया!
अच्छा! भला बताओ तो किसका अन्त आ गया?
मुफ़्लिसी का या कि फ़िर बे-इन्तिहाई नफ़रत का ?
क्या मज़्लूम का दौर ए बेहिसाई ख़त्म होने आ गया?
क्या निर्भया को लूटने मारने के दौर का अन्त आ गया?
क्या मणिपुर जैसी नंगी परेड होने का अन्त आ गया?
क्या वाक़ई सख़ाफ़त हार गया, सख़ावत जीत गया?
ऐसा दिन जब आयेगा, मैं माँन लूँगा, बसन्त आ गया।
कुदरत ने अपना फ़र्ज़ बख़ूबी अपने वक़्त पे निभा दिया
शिशिर की सर्द हवाओं को धीमा होने का हुक्म दे दिया।
क्या इन्सान भी अपनी फ़ितरत में तब्दीली ला पाएगा?
ताकि दिल पे हाथ रख के मैं कह सकूँ हाँ बसन्त आगया।
मुफ़्लिसी = ग़रीबी। बे इन्तिहाई = limitless.
मज़लूम = जिस पे ज़ुल्म किया जाता है।
दौर ए बे हिसाई = period of insensitivity.
सख़ाफ़त = ओछापन। सख़ावत = उदारता।
फ़ितरत = nature. तब्दीली = change.
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि
Thursday, January 30, 2025
Happy Birthday Dipti!
Hail to you, Dipti the lighted one
Happy birthday to you bright one!
Do you know that you can listen
To the voice of the blighted one?
Can you show me a fruit or veggie
That doesn’t make everyone edgy?
Infused with the deadliest potions
Though the facade looks real sedgy!
You took the brunt of it bravely
Vigorously, happily and smoothly!
With no deep lines on your face
Tend 132 acres of land sagaciously!
It’s like an oasis in a desert land
I mean your indelible AOF brand!
It’s truly philanthropy in disguise
You give organic without a band!
Hail to you, Dipti the lighted one!
Who turned barren into arable one!
To feed the helpless, and the feeble
Happy birthday to you bright one!
With warmest greetings to you
Ajit Sambodhi
Tuesday, January 21, 2025
मेरी बिटिया दिव्या : पचासवाँ जन्म दिन!
दुआ करता रहता हूँ यही रब से
न देखूँ चश्मे पुरनम तुम्हें फ़िर से।
यही इल्तज़ा रहती है लबों पे मेरे
दामन तुम्हारा भरा रहे ख़ुशियों से।
हाँ तुम दिव्य हो, सौम्य हो, भव्य हो
यह अतिशयोक्ति नहीं, तुम श्रव्य हो।
तुमको आबदीदा देखना गवारा नहीं
ध्यान रखना कि तुम एक चरितव्य हो।
तुमसे सुबह सुबह गुफ़्तगू जो हो गई
दिल की तमन्नाएँ मेरी जैसे पूरी हो गईं।
पचासवाँ जन्मदिन अच्छे से मनाना बानो
तुमको देखके दुनियाँ मेरी आबाद हो गई।
रब = ईश्वर। चश्मे पुरनम = नम आँखों में।
इल्तज़ा = प्रार्थना। लबों = होठों।
आबदीदा = आँसूओं से भरा। गवारा = स्वीकार्य।
चरितव्य = जिसका आचरण अनुकरणीय हो।
गुफ़्तगू = बातचीत। बानो = लाड़ली।
जनम दिन मुबारक हो बिटिया
पापा
Wednesday, January 1, 2025
नया साल 2025
वो पूँछते लगे हमसे, नया क्या हो रहा है
हमने कहा ये उनसे नया साल आ रहा है।
नया साल आ रहा है, नया वक़्त आ रहा है
ख़ुशियाँ जो थीं पुरानी, उनको भी ला रहा है।
ये ठंड क्या करेगी, नया सूरज निकल रहा है
समझ लो ठंडे जिस्म में गर्म साँस बह रहा है।
सूरज से मिला आज, लगा वक़्त थम रहा है
इतनी गरमजोशी थी, लगा दरिया बह रहा है।
बादल आते जाते हें, आसमान मौजूद रहा है
साल बदलते हें, पुर-ऐहसास मसल्सल रहा है।
गुनगुनाता हुआ वो नया साल चला आ रहा है
अन्दर एक समन्दर गूँज बन के बहा आ रहा है।
ये हक़ीक़त है कि हर वक्त बदलाव आ रहा है
हम समझें, न समझें, हर वक्त नया हो रहा है।
जिस दिन देख पाएँगे कि मन मन्सूख़ हो रहा है
असल में समझ पाएँगे कि नया साल आ रहा है।
कभी फ़ुर्सत हो तो झाँक लेना अंदर जो हो रहा है
वहाँ जश्न हो रहा है, अलख जगाया जा रहा है!
पुर-एहसास= super consciousness.
मसल्सल = perpetually.
मन्सूख़ = disband.
नए साल की शुभ कामनाएँ
अजित सम्बोधि।
New year 2025
Let us find a gong
And give to us a song.
Ding dong Ding dong
Ding dong Ding dong.
Let’s ring in the song
& ring out the wrong.
Ding dong Ding dong
Ding dong Ding dong.
A new sun is rising
A new morn is singing.
Ding dong Ding dong
Ding dong Ding dong.
The breeze is brisky
The gong is tipsy.
Dina dong Ding dong
Ding dong Ding dong.
It’s a happy rappy new year
It’s near It’s here It’s dear.
Ding dong Ding dong
Ding dong Ding dong
Wish everyone a happy new year!
ajit sambodhi
Wednesday, December 25, 2024
प्यार का तोहफ़ा
कितना अच्छा लगता है
जब पास कोई आ जाता है
कितनी भी हो तपन जगत में
मन शीतल हो जाता है।
प्यार के तोहफ़े के आगे
सब तोहफ़े फ़ीके लगते हें
जैसे हीरे के आगे
सब मोती फ़ीके लगते हें
प्यार मुझे दे दो जग वालो
और न कुछ मुझे भाता है।
इक छोटी सी मुस्कान से जब
कोई मन का दीप जलाता है
दिल के सारे दर्द पिघलते
मन हल्का हो जाता है
पलकें मेरी हँस पड़ती जब
वो नज़र से नज़र मिलाता है।
प्यार के जादू के आगे
सब जादू फ़ीके लगते हें
प्यार बिना सब सूना है
प्यार से रिश्ते पलते हें
नाँच सभी लेते हें लेकिन
रास कन्हैया का भाता है।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि
Wednesday, November 27, 2024
वो दो घण्टे ( अरावली की वादियों में )
तेरा ख़्वाब मेरा भी ख़्वाब है
क्यों न कह दूँ लाजवाब है
जो ख़्वाब मैं न बता सका
ये उसका ही जवाब है।
शादाब है नायाब है
माहताब है आदाब है।
पेड़ों से गल बहियाँ चली
गुलज़मीं गुलज़ार हो चली
जम्बूरात के हुज्जूम से
सलामती मेने माँग ली
ये ख़्वाब में इक ख़्वाब है
बख़ूबी यहाँ दस्तयाब है।
बतख़ों ने लगाया था डेरा
मुझे पा के सिमटा वो घेरा
क्या सूरज सिमट के आगया
सफेद सरोवर वहाँ बन गया।
प्यार से जियें ज़िन्दगी के लिए
रानाइयों में मिला जवाब है।
आसमाँ ने चादर उढ़ा दी
मामूनियत की चादर उढ़ा दी
अब सब महफ़ूज़ हें यहाँ पे
तहम्मुल की चादर उढ़ा दी।
उसी का तो ये जवाब है
क्या ख़ूब दायरा ए अहबाब है।
दो घण्टे तुमने बख़्शा किये
करम है रब का बख़्शा किये
मेरे ख़्वाब बाइस बन के हँसे
ममनून तुम्हारा बख़्शा किये।
बज उठा दिल का रबाब है
हर सिम्त ख़ुशियों का बाब है।
शादाब = हरा भरा। नायाब=unique.
माहताब = चाँद। गुलज़मीं= flower beds.
गुलज़ार = रौनक़ वाला।जम्बूरात = honey bees.
दस्तयाब = प्राप्त।रानाइयों = सजावटों।
मामूनियत=security.
तहम्मुल = love. महफ़ूज़ = secure.
दायरा ए अहबाब = दोस्तों का दायरा।
बाइस=basis. ममनून=thankfulness.
रबाब = lyre. बाब = दरवाज़ा।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि
Tuesday, November 19, 2024
Nod of the Lord
Let’s watch every nod
Of the Lord
That pulsates as breath
In beats of life & death.
To understand
How things unfold!
It’s the nod
From the Lord
That strikes each chord
Of our heart to applaud!
It makes us wade a ford
Or else sign some accord.
No one visits us on one’s own
Everyone is sent by him, alone!
Let’s welcome, not only as a friend
Let’s greet breath as a kind of herald!
Don’t shrug it off, it’s from the lord
It is not tailwind. Mark! It’s his nod!
Breath is the nod of god
Breath is endlessly broad.
Let’s prod ourself & plod
To see life in a lump of sod.
Breath enjoins us upon god
To let us in the amity of god!
Om Shantih
Ajit Sambodhi
Thursday, October 31, 2024
संग संग थे दीप जलाने।
दिवाली आ गई।
Wednesday, October 30, 2024
Festival of Lights!
We call Festival of Lights, Diwali!
It’s the biggest festival beside Holi.
Holi uses colors and Diwali floods
Of lights, to make everybody jolly!
Diwali drives away all darknesses
That everyone one day experiences.
Yes, darkness has so many contours
But light lights up all the recesses!
Light, yes, natural light, is life giving
Its modes and colors keep on altering.
It may swap sunning for burning, Or
It may melt the heart, it’s so softening!
I wish everyone a very happy Diwali
Be he Chandan, Changez, or Charlie!
Look for this lively wizard inside you
Where there transpires nonstop Diwali!
Your chum
Ajit Sambodhi
Monday, September 16, 2024
है कोई अपना?
Monday, August 26, 2024
कान्हा का जन्मदिन!
आज एक अजन्मे का जन्मदिन है, कान्हा
है न कितना बड़ा अजूबा आज ये, कान्हा
ये भादों में कृष्ण पक्ष की अष्टमी है, कान्हा
आज तुम्हारा ही अद्भुत जनमदिन है, कान्हा!
ये दुनिया तुम्हारी, और मैं भी तुम्हारा, कान्हा
तुम आते रहे हो अब आ जाओ फ़िर से कान्हा
कितने जन्मों से तुमको पुकारता आ रहा हूँ मैं
अबके न फ़िर से मायूस करो, मुझको कान्हा।
तुमने पैर धोये अपने बाल सखा के, ऐ कान्हा
अबकी बार अपने चरण हमसे धुला लो कान्हा
तुम तो लीला दिखाने में माहिर हो बेहद कान्हा
अबके मेरे आँगन में भी दिखा दो खेला कान्हा।
तुम्हारे सिवाये, अब कहाँ पे ढूँढूँ सहारा, कान्हा
मेरे मन का अँधेरा कैसे मिटेगा, बताओ कान्हा
रिझावों भुलावों का सहारा नहीं चाहिए, कान्हा
तेरी रहमत के सिवा मुझे कुछ न चाहिये कान्हा।
लक्ष्मी चंचला से न बहलाना तुम मुझको कान्हा
ये खिलोना न कभी बहला पायेगा मुझको कान्हा
तू बस बना ले मुझको अपना पसन्दीदा कान्हा
तमन्ना है कि उँगली पकड़ कर चलूँ तेरी कान्हा।
मेरी आँखों के ये आँसू तो कभी देख ले, कान्हा
ये जमुना की धारा है, तट पे फ़िर आजा कान्हा
ये दिल की वादियाँ कब से सूनी पड़ी हें कान्हा
कभी बाँसुरी फ़िर से इनमें बजा तो दे, कान्हा।
तुम्हारी मुस्कुराहट का कोई सानी है क्या कान्हा
तुम शरारत करते थे और मुस्कुरा देते थे कान्हा
तुम मक्खन चुराते थे और मटकी फोड़ते थे कान्हा
पर तुम्हारी मुस्कुराहट सबको रिझाती थी कान्हा।
कान्हा के जन्मदिन पे सबको बधाइयाँ!
अजित सम्बोधि
Saturday, July 13, 2024
क़दमबोसी की चाहत कबसे कर रहा हूँ
मालिक तेरा फ़ज़ल है, जिससे मैं जी रहा हूँ
Saturday, June 1, 2024
नज़रों से पर नज़र न आए ।
Tuesday, May 14, 2024
शब-ओ-रोज़ ये दिया जल रहा है।
किसके लिये ये समाँ सज रहा है
शब-ओ-रोज़ ये दिया जल रहा है?
क्या आसमाँ को यक़ीं हो रहा है
फ़रिश्ता ए नूर इधर आ रहा है?
खड़ी थी साहिल पे अरसे से कश्ती
क्या उसे अब माँझी नज़र आ रहा है?
क्या बहारों ने पैग़ाम अब दे दिया है
फ़ुरकत का वक़्त बिदा हो रहा है?
कोई भी रिश्ता हो, अभी का नहीं है
हर रिश्ता अज़ल से चला आ रहा है
रूहों से ही सदा, जिस्म सजते रहे हें
ये दस्तूर पुराना है, चला आ रहा है ।
न कोई था जुदा और न होगा जुदा
जिस्मानी चोग़ा ही बदलता रहा है।
मुद्दतों से सिलसिला चलता रहा है
वही नूर बनके यहाँ पे बह रहा है ।
शब-ओ-रोज़ = रात दिन।
फुरकत=जुदाई। अज़ल= प्रारम्भ।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।
Tuesday, April 23, 2024
जीत ही गई ये दुनिया
Thursday, April 18, 2024
आज बस मुस्कुरा देना!
बस कोई मुस्कुरा भर दे, इतना ही चाहता हूँ
यह करम मुझ पर कर दे, इतना ही चाहता हूँ।
वो मुस्कान ए लब हो या इब्तिसामे चश्म हो
यह तोहफ़ा है प्यार का, इसे पाना चाहता हूँ।
मुझे नहीं चाहिए बड़े बड़े वायदे वो प्यार के
ना ही मुझे चाहिए वो अल्फ़ाज़ इकरार के।
बोल दिया तो बात का वज़न बिखर जाता है
बिना बोले कहदेना, ये जादू पास मुस्कान के !
ये बड़ी नायाब दौलत है, यही जो मुस्कुराहट है
नाहीं वहाँ कोई आहट है और नाहीं घबराहट है।
न बातों को चमकाने की कोई खुसफुसाहट है
बस चेहरे पे लिख जाती दिलकी जगमगाहट है!
अगर जो रश्क है मुझसे, बस मुस्कुरा भर देना
मैं पास में हूँ या दूर में हूँ, बस मुस्कुरा भर देना।
लफ़्ज़ तो बेमानी हो जाते हें उस सुकूत के आगे
जिसका काम है दम ब दम, सुकून से भर देना!
मुस्कान ए लब= होठों पे मुस्कान।
इब्तिसामे चश्म = आँखों में मुस्कान।
रश्क= किसी के जैसा होने की चाहत।
सुकूत= ख़ामोशी। सुकून = चैन।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।
Sunday, April 7, 2024
Happy birthday to you, Alok!
Happy birthday to you, Alok!
How you remind me of an oak?
Yea yea the same familiar oak!
The dependable & durable oak!
Hallmark marks one’s consistency
Piston pin of fealty and constancy!
Consistency builds the momentum
Essential. for gaining efficiency!
It’s not a matter of some joke
To remove the billowing smoke
Of rampant ignorance and then
Become timeless like the oak!
One has to bet oneself to evoke
As if one is going to invoke
The essentiality of being an oak!
Happy birthday to you, Alok!
Om Shantih
Ajit Sambodhi
Saturday, March 30, 2024
Happy birthday, Jaya!
Moon was crescent pale
But eager to smile and hail!
Breeze was all fragrance
To welcome the sun’s trail !
All eyes were set upon
The bracing morning sun
To decamp night’s trance
And bless the early frisson!
Then a flicker of smile
Lit up the last mile
A slit of benediction opened
And blessed us for a while!
At the rising of the sun
In nineteen seventy one
Into our lives entered
Rhythms of moon & sun!
Happy birthday, Jaya
Papa
Monday, March 25, 2024
होली 2024!
वो पूँछते हें क्यों रंगो से हम
ये घोल बनाया करते हें
फिर आते जाते पथिकों को
क्यों रंग बिरंगा करते हें?
ये रंग करिश्मा करते हें
सब भेद मिटाया करते हें
ग़ैरों को भी इन रंगों से
हम अपना बनाया करते हें!
जब ख़ुशी मनानी होती है
हम रंग लपेटा करते हें
ख़ुशियों को जी भरके फ़िर
हम जीवन से लपेटा करते हें।
होली पे बसन्ती मौसम की
एक झलक दिखाया करते हें
पुरवैय्या के रंगीन थपेड़े
नई छटा बखेरा करते हें!
ये जीवन तो रब की नेमत
जीवन को सजाया करते हें
दो घड़ी कहीं भी मिलकर के
हम हँसना हँसाना करते हें!
ये करम है मालिक का जो हम
ये मिलना मिलाना करते हें
हर फ़िज़ा चमकने लगती है
जब गुलाल उड़ाया करते हें ।
फ़िर आगे मिलने का वायदा
जाने से पहिले करते हें
रब की ये मेहर बानी है
वायदा भी निभाया करते हें !
होली की शुभ कामनायें
अजित सम्बोधि।
Sunday, March 24, 2024
Holi 2024
Holi is wonderful
It’s so colourful!
Be you young or old
It makes you playful!
Holi is no roly poly
It’s straight & holy
It’s sanctifying fire
It burns the unholy!
Air we have fouled
And water is dirtied
Skies are all blighted
Earth has been tainted.
Only the fire is pure
And it’ll remain pure
We just can’t defile it
Of this, are we sure ?
True, we’ve progressed
But haven’t we messed?
Before going to the Mars
Let the earth be cleansed!
Let’s sing happy holi
Let’s play happy holi
Holi is the holy refiner
Let’s chant happy holi !
Happy holi, everyone!
Ajit Sambodhi
Monday, March 11, 2024
Merry birth anniversary, Anuv!
Wish you a merry anniversary!
Wish you a merry anniversary!
You turn eighteen, ya, eighteen
Long since you were a tween!
There’s not much time left now
For you to say quits as of a teen!
Wish you a merry anniversary!
Wish you a merry anniversary!
Life has many twists and turns
Graphic bends where one learns!
Don’t think you are alone in this
They are everybody’s concerns!
Wish you a merry anniversary !
Wish you a merry anniversary!
I am no better as a soothe sayer
But I’ve seen it happen anywhere
Nineteen is the teen that decides
Where you’re headed to from here!
Wish you a merry anniversary!
Wish you a merry anniversary!
Everyone learns how to earn
Only a few learn how to discern!
Humans have the gift of vision
A cloak that doesn't let them burn!
Wish you a merry anniversary!
Wish you a merry anniversary!
Bless you!
Nana
Friday, March 8, 2024
कौन हें शिव ?
शिव मतलब शव मतलब शून्य
शून्य यानि सूना, ये ही तो पर्याय।
क्या वह गोचर है यानि द्रश्य है
अथवा कि अगोचर या अद्रश्य ?
शिव को समझना है, जानना है ?
मतलब है कि शून्य में उतरना है?
यानि कि शून्य में स्थिर होना है?
यानि कि ध्यनावस्थित होना है?
यही तो स्वयं को जानना है
हम शून्य हें , यही पहिचानना है।
शून्य से उठते स्पन्द बताते हें कि
हम अक्षर हें! इसी को देखना है!
ध्यान तो प्रत्याहार में छिपा है
और ध्यान में शून्य छिपा है।
शून्य के लोच में अगोचर है
उसके अक्स में गोचर छिपा है !
जो शून्य है वही चेतन्य है
वही समितिंजय मृत्युंजय है
वही अविभाज्य अपरित्याज्य
शिव है, वन्दनीय है, पूज्य है !
शिवोहं शिवोहं
अजित सम्बोधि
Thursday, March 7, 2024
बहिना की पाती भैय्या के नाम !
दिव्या के पापा, मेरे भैय्या, भारत से यहाँ पे आये हें
ढेरों सारी ख़ुशियों की, सौगात को संग में लाये हें।
भैय्या तेरा यहाँ पे आना, है जैसे ख़ुशियाँ बाँटते जाना
बस देते जाना देते जाना, यादें दिल की याद दिलाना।
सर्व प्रथम, सदैव, सर्वत्र, दिव्य दृष्टि को अपना कर
दिव्या प्यारी लेके आई, ज्ञान, ध्यान और प्यार का सागर।
पश्चिम में अमरीका आके, आलोक को संगी अपना बनाके
सम्मान की गागर पूरी भर दी, स्वयं ही सारा बीड़ा उठा के।
यहाँ रहें या और कहीं हम, पायें हर दम दुनिया की ख़ुशियाँ
भाई बहिन का प्यार हमारा, लाये हर दिन ख़ुशियों पे ख़ुशियाँ।
आओ सब मिलकर के यहाँ पर, ख़ुशियों का अम्बर फैलायें
नाचें गायें, धूम मचायें, हम ख़ुशियों की, दुनियाँ बन जायें।
जया कमल
( मेरी बहिना)
Sunday, March 3, 2024
Happy wedding anniversary
We love to recast the past
We love to visit the past
Because it is, so nostalgic!
We love to recreate the past!
Happy wedding anniversary!
Happy wedding anniversary!
For the unwed, to be wed
Is a great time to be glad
Just try to go into the past
See how fast the time’s fled!
Happy wedding anniversary!
Happy wedding anniversary!
Twenty four years in a row
That’s how we tick and go!
Life sails like a boat when
We let it flow with the flow!
Happy wedding anniversary!
Happy wedding anniversary!
One need never become sad
Being sad is like being mad
Let’s charge life with love
To make it easier to tread!
Happy wedding anniversary!
Happy wedding anniversary!
God bless the doting pair
Who lead a life that’s fair
Bred on love & compassion
Their byword is love & care!
Happy wedding anniversary!
Happy wedding anniversary!
Om Shantih
ajit sambodhi
Wednesday, February 14, 2024
हाँ एक थी चौदह फ़रवरी थी !
हाँ कभी ऐसा भी होता था
बिना कहे ही सब होता था
आज क्या क्या होना है
सब को भी पता होता था !
युगों युगों से होता आया है
हर स्पंद सोखता आया है
बोलकर न इसे बिगाड़ देना
बिना कहे निभाता आया है !
न दिखाता हूँ न बोलता हूँ
न सजाता हूँ, न छिपाता हूँ
वो खुद ही बोलता रहता है
रुख़ पे सब लिखे जाता है !
हाँ एक थी, चौदह फ़रवरी थी
फ़िक्रमंद थी, दानिशमंद थी
मगर एक दिन को भी न अलग
होने वाली अजब सी शिद्दत थी!
क्या रिश्ता था हमारा उनका
ये न अब का था न तब का
सदियों से यूँ ही चला आता है
नाम नहीं होता है कोई इस का !
स्पंद = throb. फ़िक्रमंद = फ़िक्र करने वाली/वाला
दानिशमंद = जानकार।शिद्दत = intensity.
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि
They walk hand in hand!
Cooing in chorus as the red rose flutters!
It’s 14th of February and I talk of, you know
Those Valentinos and their husky whispers!
Rituraj and St. Valentine walk hand in hand
This year it is special for the graphic band!
Like it befell more than a millennium ago
Rituraj joins hands with the romantic band!
Chaucer gave life to ‘the parliament of fowls’
When all the birds, including the hooting owls
Shall wait for 14th Feb, the first day of spring!
To choose their mates amidst songs and howls!
Some got their mates, some only the brickbats
For all the clamor & clatter, they lost their bets.
They would wait a full long year, for the spring!
Hoping next year not to hide behind their hats!
Remember, spring and valentine are intertwined
It has happened every year, they’re so entangled!
Love birds wait eagerly for the spring, every year
Expecting saint’s presidency to end the dead end!
Today is basant panchmi , the herald of Spring!
So is Valentine’s Day, the harbinger of Spring!
It was Geoffrey Chaucer, father of modern poetry
Who made Love an art, in the spirit of the Spring!
Rituraj = Prince Charming in Spring!
Om Shantih
Ajit Sambodhi
Thursday, February 8, 2024
Happy birthday to you, Arunima
Happy birthday to you, Arunima!
Happy birthday to you, Arunima!
Who’s Arunima? flash of the dawn?
All across the sky, elegantly drawn?
Live expression of euphoric vibes?
To experience every morn hands-on?
Happy birthday to you, Arunima!
Happy birthday to you, Arunima!
You chose the month of February
The time of purification festivity!
And eight, the pinnacle of power
Riding the vibes of spirituality!
Happy birthday to you, Arunima!
Happy birthday to you, Arunima!
Everyone loves you so much
For distancing the double dutch
With emotional sensitivity and
Insight that make you nonesuch!
Happy birthday to you, Arunima!
Happy birthday to you, Arunima!
Blessings
Nana
Sunday, January 21, 2024
Happy Birthday!
Hi Divya, I wish happy birthday to you!
And I wish 100 returns of the day to you!
You chose the month of Roman god Janus
You cherry-picked the number twenty one
That’s the number of harmony & vibrations!
For your choices, I congratulate you today
And wish you a hundred returns of the day!
Twenty one is said to be an angelic number
& name Divya speaks of the divine number!
It is also a number of independent thinking
And yet is inclusive of every other number!
I wish you all, that is best, on your birthday
Also I wish you hundred returns of the day!
May god bless you with choicest blessings
That should outshine all the past blessings!
So that you may keep your anchorage ready
To harbour needy nestlings and fledglings!
I’m sure that everyone loves your walkway
And wishes you hundred returns of this day!
Love
Papa
Sunday, January 14, 2024
Sun Transit
Friday, January 5, 2024
A Family!
Ah, living like a family?
Well, it’s a beautiful simile!
It’s not at all an anomaly
Nor is it any absurd homily.
Rather it’s a blossoming lily!
I say it’s dilly! Yes, really!!
I’m sure it will be great fun
Not any silly, vaporous fun
Or one coming out of the gun
When one’s gunning someone.
No, it will be transformational
So we peep in on the inner sun!
One who’s made a human being
Has been made very far seeing!
Besides all that exists as physical
He’s able to see the metaphysical!
Family provides a stout backbone
To sit firm & watch the only One!
Om Shantih
ajit sambodhi
Monday, January 1, 2024
Happy New Year 2024
I wish you all, a happy new year!
You heard it right, a happy new year!
We are beings, all of us, human beings!
It’s not a joke to remain human beings!
We must be aware we are not creatures
We know how ‘to be’, we are ‘beings’!
‘To be’ represents ‘to exist consciously’!
‘Being’ is existence existing consciously!
We live in an Existence that’s conscious!
Don’t think machines work consciously!
Machines are efficient, but not conscious!
They work tirelessly, sans being conscious!
It’s unfortunate, we’re imitating machines!
We have forgotten how to remain conscious!
When conscious, we’re in sync with existence!
So we start flowing with the flow of Existence!
Suffused with the power & pranks of existence
We become the puissant sustainer of Existence!
So I wish you all a happy new year!
You heard it right, a happy new year!
Om Shantih
Ajit Sambodhi
नया सबेरा 2024
नई सबा आ रही है, नई हवा आ रही है
ख़ुशियाँ लुटाने को, नई फ़िज़ा आ रही है।
दिल में ख़ुशी का आलम फ़िरसे भर गया है।
रब के करम से हमको नई किश्त मिल रही है।
भूली बिसरी यादें लेकर, ख़ुशियों ने डाला डेरा
बन जाए सब हमारा, मिट जाए मेरा तेरा।
फ़िर से गले लगें हम, ये उम्मीद जग रही है।
मुबारक हो सबको ये दिन, मिल जायें बिछड़े दिल
नई फ़िज़ा में साँस ले लें , चेहरे जायें फ़िर से खिल
मासूमियत की रंगत, देखो चेहरे पे आ रही है।
हर सबा ओ शाम अबसे, बन जायें सबके मोहसिन
ऐसी चले हवा कि, दिल हो जायें सब के मुतमइन
नया इन्सान बनने को देखो, नई सुबह आ रही है।
सबा= सुबह। शम्स=सूरज। करम=कृपा।
मोहसिन= उपकारी। मुतमइन=सन्तुष्ट।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि
