Popular Posts

Total Pageviews

Friday, May 8, 2026

शिव और शक्ति

 नारी शक्ति, पुरुष है शिव 

शक्ति के बिन शिव हैं शव 

शिव बिन शक्ति दिशाहीन 

दोनों के मिलन से है  वैभव।


शिव चेतन, शक्ति अवचेतन 

शिव कीर्तन, शक्ति संकीर्तन 

शिव  धारणा, शक्ति  प्रेरणा 

शिव नीलगगन, शक्ति आँगन।


शिव बादबान, शक्ति बाग़बान 

शिव आनबान, शक्ति मेहरबान 

शिव  परेशान , शक्ति  मुस्कान 

शिव निगहबान, शक्ति क़ुरबान।


ये जोड़ी अनूठी, अति आवश्यक 

ये जोड़ी स्वाभाविक और रोचक 

एक के बिना  यहाँ दूसरा अधूरा 

रहते  हैं दोनों  बन कर  के पूरक!


बादबान = नाव खेने वाली पाल 

बाग़बान = बगीचा सँभालने वाला/वाली 

निगहबान = सुरक्षा देखने वाला/वाली 


जय शिव शक्ति 

अजित सम्बोधि 

Thursday, May 7, 2026

बुद्ध का मार्ग

 जिस मार्ग पर चलते रहे थे बुद्ध 

वही मार्ग जाना जाता है  विशुद्ध 

मन को मिलती है शान्ति वहाँ पे 

भटकने पर मिलते हैं  सिर्फ़  युद्ध।


दुख अनिवार्य है, बुद्ध ने  कहा है 

निवारण सम्भव है, ये भी कहा है 

दुख जन्म लेता लालसा रखने से 

लालसा का गर्भ भूत भविष्य में है।


जब हम भूत या भविष्य में रहते हैं 

लालसा का निर्माण करते रहते हैं 

वर्तमान में  करिश्मा  हो  जाता  है 

लालसा के  पद चाप  रुके रहते हैं।


जब भी हम साँस उथली कर लेते हैं 

भय, लालसा, क्रोध को जन्म देते हैं 

साँस के गहरी होते ही, आप पायेंगे 

प्रेम व करुणा उत्पन्न होने लगते हैं!


इसे ही बुद्ध का मध्यम मार्ग कहते हैं 

क्रोध की जगह प्रेम करुणा ले लेते हैं 

लालसा मौन में परिवर्तित हो जाती है 

भंते एक निरापद जीवन जीने लगते हैं।


बुद्धम् शरणम् गच्छामि!

अजित सम्बोधि 

Sunday, May 3, 2026

जीवन बहती धारा है

यह  जीवन  बहती  धारा है 

कभी नदिया कभी सहारा है 

अहं ने जब जब छलाँग भरी 

तब तब  ही  ख़ुद से  हारा है!


हर दिन  दुल्हन सी  नवेली है 

हर  दिन  एक  नई  पहेली  है 

हर लम्हा रब की  अठखेली है 

न समझ पाओगे, अलबेली  है!


अपना  काम  बस  बहते  रहना 

जिधर बहे नदिया उधर ही बहना 

अपना केवट, रब  ही तो आख़िर 

उसी  के साथ  हरदम बने  रहना!


जब  साँसें  अपनी गहरी  हो जाती 

तमन्नाएँ  निरंतर  कमतर हो  जाती 

मन  के  मौन में  हो  जाता  इज़ाफ़ा 

रब  के  संग  पैठ  बढ़ने  लग  जाती।


सहारा = रेगिस्तान।रब = ईश।केवट = नाविक।

कमतर = और कम।इज़ाफ़ा = बढ़ोतरी।पैठ = पहुँच।


जय राधे राधे 

अजित सम्बोधि 

Saturday, May 2, 2026

फिर न आया सबेरा

बेचैनी मिटाने को  लिखने  बैठ  गया हूँ 
जानता हूँ मिटेगी नहीं, आदी हो गया हूँ। 

जब भी लमहात  गुज़ारे हें अपने  साथ
एक उम्मीद का दामन लगा  है मेरे हाथ।

हालात बदतरीन  हुए जाते हैं इस क़दर
सूरते तहम्मुल कहीं से नहीं आती नज़र।

गुज़र जायेगा, कुछ मुस्तक़िल तो है नहीं 
उम्र ज़ियादह होने से पकड़ बढती  नहीं। 

उनके जज़्बात को दाद दिया  करता हूँ 
ख़्वाबों में ही सही, मिल लिया करता हूँ।

 हमनवाओं के लिए क्या कर सकता हूँ? 
रब से सबके लिए  दुआ माँगा करता हूँ।

दिल में एक सूनापन है , बेबसी सी भी है
 सदम ए फ़िराक़ जैसी बेकसी सी भी है।

साँस की बख़्शीश से ही तो है ये ज़िन्दगी 
एक झोंके की हाँ से ही तो है ये ज़िन्दगी।

ज़िन्दगी तुझसे नाराज़ नहीं यक़ीन करना 
 तुझसे मुहब्बत है मगर मज़बूर न करना।

मैं  ख़ुदा था उसका , वो था  नाख़ुदा मेरा 
 रुक गया झोंका तो फ़िर न आया सबेरा।
 
लमहात = moments. दामन = पल्लू का छोर।
सूरते तहम्मुल = picture of endurance.
मुस्तक़िल = permanent. हमनवाओं = समान सोच वालों।
सदम ए फ़िराक़ = जुदाई का सदमा।
 बेकसी = लाचारी।नाख़ुदा =  नाव खेने वाला/ वाली।


अजित सम्बोधि।

Thursday, April 30, 2026

बैसाख पूर्णिमा

 आज बैसाख पूर्णिमा है , बुद्ध पूर्णिमा है 

याद रहे, बुद्ध जयंती नहीं, बुद्ध पूर्णिमा है 

जयंती दर्शाती है जन्म मरण, मरण जन्म 

जब कि पूर्ण से पूर्णतम दर्शाती पूर्णिमा है!


बुद्ध अवतरित हुए, एकान्त में, लुम्बिनी में 

महामाया द्वारा, एक अति मनोरम उपवन में 

साल वन के वृक्षों की  सुगन्ध पूरित गोद में 

बैसाख की पूर्णिमा के  चन्द्रमा की आभा में!


३५ वर्ष की आयु में वे पूर्ण से पूर्णतर हो गए 

निरंजना यानी निर्मल नदी के तट पर हो गए 

सुजाता के लिए बोधिवृक्ष के देवता हो गए 

बैसाख पूर्णिमा को खीर खाके बुद्ध हो गए।


जब कुशीनगर में थे, वे अस्सी वर्ष के हो गए 

लगने लगा था ,  वापस जाने के दिन आ गए 

बैसाख का चिरपरिचत पूर्ण चंद्र चमकता था 

और तब वे अपने पूर्णतम परिवेश में समा गए!


बुद्ध से लोग पूँछते आप कौन? वे कहते तथागत 

जब कुछ बनना नहीं होता तभी तो हौंगे तथागत 

नदी समन्दर में समाती, खोती नहीं, होती पूर्णतम 

जब पूर्ण पूर्णतम में समाया बस तभी से तथागत!


बुद्धम् शरणम् गच्छामि 

अजित सम्बोधि 

Tuesday, April 28, 2026

Blue Dot

Carl Sagan talks of earth as a pale blue dot

As seen from 6 billion kms. That says a lot!

Deep meditators, often see, a deep blue dot!

Chitishakti Vilas sings paeans about this dot!


Meditators see that the blue dot harbours life 

Their doubts melt on seeing a genitore of life!

This divine dot takes them to different realms

It’s no joke. Meditate to see changes in yer life!


Carl Sagan didn’t accept anything sans evidence 

About life beyond this earth, there’s no evidence.

Carl Sagan and meditators seem to converge here

That life springs from blue dot, makes some sense!


It shows that, for seeking life earth is the only place

Haven’t we a duty toward earth in saving this place?

Aren’t we obliged to save each & every life on earth?

Aren’t we bent on wiping out every life on this place?


Radhe Radhe 

ajit sambodhi 

Sunday, April 26, 2026

कौन छू गया ?

मुझे कौन छू गया ये, इक सुकून दे गया

तन्हाइयों में मुझको, इक सिला दे गया

बँजर पड़ी  ज़मीन को  सम्बल  दे  गया । 


मायूसियों ने मुझको घेरा है  इस  क़दर

बेख़ुद हुआ सा मैं , फिरता  हूँ दर ब दर

क्या हवा का झौंका बन ख़्वाब दे गया?


हर शाम आती है शब का पैग़ाम लेकर 

बेख़ुदी को ओढ़ाने, नूरी मलबूस  लेकर 

कौन दरख़्तों से झाँकती चाँदनी दे गया?


हर आहट दर्द भरी झनझनाहट बन गई

कैसे झनझनाहट इक मुस्कुराहट बन गई

कोई बुलबुल को मेरे नाम पैग़ाम दे गया? 


ये कौन छू गया , ये कौन  मुस्कुरा  गया 

बिना कुछ कहे भी , बहुत कुछ कह गया 

एक बेसहारा  हुए  को , सहारा  दे  गया । 


मेरे लिए भला, ये कौन इबादत कर गया 

मुझ पे ये कौन , इतना  करम कर  गया 

उसको क्या पता , वो क्या कुछ कर गया ।


हार और जीत के बीच का तलफ़्फ़ुज़ दे गया 

मसाइब के दरमियाँ, एक मुस्कुराहट दे गया

अँधेरी रात में , एक दीप  जला  के  दे गया ।


सुकून = चैन । सिला = इनाम । बेख़ुद = बेसुध ।

शब = रात । नूरी = रोशनी का । मलबूस = पेरहन ।

करम = कृपा।तलफ़्फ़ुज़ = उच्चारण।मसाइब = मुसीबतें । 


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि।

Friday, April 24, 2026

be in sync!

Be in sync with Nature
Let Nature guide your nature. 

It’s Nature’s job to bless
Ours is only to witness.

Follow Nature, everything makes sense
Follow yourself. things tend to be tense.

When tense, look at a tree 
It gives everything, for free.

Let Nature be your teacher 
It  safeguards  your  future.

Hard work  captures  marts
Heart-work captures hearts. 

You think you run the show?
Across the sky, carve a rainbow!

Radhe Radhe
ajit sambodhi 

Saturday, April 18, 2026

है न?

साँस लेना तो ज़रूरी होता है 

मगर न साँस लेना भी होता है 

साँस न लेना ख़ुद ब ख़ुद होता है 

जब थोड़ी देर के लिये होता है 

वो ख़ुद से मिलना होता है 

जब ज़ियादा देर के लिये होता है 

वो ख़ुदा से मिलना होता है 

है न?

बोलना भी तो ज़रूरी होता है 

मगर न बोलना भी होता है 

जहाँ इत्मीनान होता है 

वहाँ बोलने के बजाय न बोलना 

ज़ियादा अच्छा भी होता है

बोलना सीमा बाँध देता है 

न बोलना असीमित होता है 

है न?

वफ़ात बड़ी वफ़ादार है 

वफ़ात न हो तो हयात कैसे हो?

ये एक रोज़ की बाबत नहीं है 

हर लम्हे की कहानी है 

हर लम्हा स्पंदित है

जीवन का बहाव तरंगित है

बोल के चौपट मत कर देना 

बस मुस्कुरा भर देना 

है न?

वफ़ात = मृत्यु।वफ़ादार = faithful.हयात = जीवन।

लम्हा = moment. स्पंदित = vibrational.

ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Wednesday, April 15, 2026

Outer bombardment vs Anandamide!

See the bombardment, how it hits 
And turns all significance into bits.
The bombardment of visual inputs
The bombardment of audio inputs.
All one’s vitality gets annihilated 
All one’s energy stands mutilated.


It’s the inner that sustains the outer
Sans the inner, outer turns to falter.
Everyone moves fast & fast & fast
By the day, everyone stands aghast!
Very few aspire to enter one’s inside
And taste the nectarean anandamide!

Anandamide is nonchalantly euphoric 
It promises the boon of not getting sick.
It’s endogenous, internally effectuated 
By meditation and yogasan prompted!
It is a cannabinoid neurotransmitter 
And a memory, pain, sleep regulator!

Remember the inner conserves energy
So it happens to be sanctum of synergy.
The outer constantly consumes energy 
And possibly gives fatigue and allergy.
The inner blazes with the blissful light
Which is capable of fending off blight!

Radhe Radhe 
ajit sambodhi 

Tuesday, April 14, 2026

जंगोजहद या महावीर और लालदेद ?

ये नफ़रत, ये सितम, हर तरफ़ा जंगोजहद
नहीं चाहिए मुझको ये  ऐसे  पसरा अहद।

किसे पता, फ़िर आप से मुलाकात हो या न हो 
कोई ऐसा बता दें जो वक़्त की गिरफ़्त में न हो।

किसी को चाहना  क़तई गुनाह नहीं है 
हाँ आगे बढ़कर लौटना आसान नहीं है। 

जाने वाले को दुआ करते हैं, ख़ुश रहना
ख़्याल रखना, हो सके तो आज़ाद रहना।

 जब आये थे तो कुछ भी न था तन पर 
 फिर कपड़े पहनाये, रखा इसे ढक कर।

कभी सुर्ख़ कभी नीला कभी ज़र्द कभी सफ़ा 
 क़सर न छोड़ी, हर दाँव लगाया, कफ़न पर।

 गर सोचा होता महावीर और लालदेद को 
तो दाँव लग जाता ज़िन्दगी की हक़ीक़त पर ।

जहाँ रोशनी के समन्दर हैं हर सिम्त में उमड़ते 
 हर राहगीर लौटता  जहाँ से कलंदर बन कर।

जंगोजहद = लड़ाई झगड़ा।अहद = माहौल, वादा।
गिरफ़्त = पकड़।सुर्ख़ = लाल।ज़र्द = पीला।सफ़ा = सफ़ेद।
महावीर और लालदेद = दोनों दिगम्बरी थे।लालदेद 
महिला संत थीं। सिम्त = दिशा। कलंदर = सूफ़ी।

ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि                   

Monday, April 13, 2026

Hi Akshat

Hi Akshat, happy birthday to you 

Today I wish Shelley’s lark to you!


Listen young man, let the time bark

You listen only to Shelley’s skylark!

You’re no Time’s Fool, ye know well 

Even sans pining, U can make a mark!


The great blue’s deep is mesmerising 

It’s full of tales absolutely fascinating 

Shelley’s skylark is live & picturesque 

Let mortals dream, song is tantalising!


A small brown bird hops in joyousness 

It flies on wings  & sings in  happiness!

Stressfulness  cohabits  Pandora’s  box

Doesn’t the tiny bird teach blissfulness?


Thanks for listening to me for so long 

I have tried to make every day a song!

I wish again a happy birthday to you 

Let the lark turn your life into a song!


Happy Birthday 

Nana

Sunday, April 12, 2026

जंगबाज़ या बल्लेबाज़?

 हम जंगबाज़, जंगबाज़ी हमारा इक़राम है 

जंगआज़माई से ही तो मिलता एहतराम है 

जब तक न जंग हो, हमें मिलता नहीं चैन है 

धरती सुधार दी अब चाँद अगला मुक़ाम है।


देखिए कोई जंगबाज़ हो या कि कबूतरबाज़ 

चाहे वो तीरंदाज़ हो या फिर बड़ा तीतरबाज़ 

ये बाज़ियाँ जानलेवा हैं कैसे करें नज़रअंदाज़?

कोई समझाये कि क्यों नहीं बनते पतंगबाज़?


बाज़ी पसंदगी है तो बन जाइये दिल्लग़ीबाज़ 

या तमाशेबाज़ , या जल्दबाज़ी का कलाबाज़ 

हेकड़ीबाज़ मत बनिये, बड़ी नुकसानदायक है 

नाम कमाना चाहते हैं तो बन जाइये बल्लेबाज़!


जंगबाज़ = लड़ाका।इकराम = इनाम। 

एहतराम = आदर।मुक़ाम = पड़ाव।

नज़रअंदाज़ = जिस पर ध्यान न दिया गया।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Thursday, April 9, 2026

नाचना

ये धरती नाचती, माहताब नाचता है 
सितारे नाचते और फ़लक नाचता है 
ये कौन है जो मेरे, दिल में आगया है 
बना के जोड़ी वो, मेरे  संग नाचता है।

ये ना समझना ये कोई और नाचता है 
भोला सा बनके जो  हरदम नाचता है 
ये तो वही  है जो  सबको नचा रहा है 
ये ही  तो  है जो  मेरे  संग  नाचता  है।

सुनो नाचना ख़ुद ब ख़ुद होता रहता है 
जब भी दिल चाहता, ये होने लगता है 
मैं दिल से कहता हूँ फ़ुर्सत में नाचा कर 
वो बोला फुर्सत का किसे ध्यान रहता है!

अब कैसे बताऊँ मैं कि वो कैसे नाचता है 
सच कहूँ, वो अब्र ए नूर हो हो नाचता है 
जब भी आप नाचें , ज़रा ग़ौर कर लेना
येकि आप नाचते हैं याकि वो नचाता है।

माहताब = चाँद। फ़लक = आसमान।
अब्र ए नूर = प्रकाश का बादल।

ओम् शान्ति: 
अजित सम्बोधि।

Tuesday, April 7, 2026

Happy birthday Alok!

Wish you a happy birthday Alok!

You’re light, you know well Alok.

Yours is daylight, called Divalok 

No one can live sans light, Alok!


There’s a cousin of Divalok, Alok 

It’s divine, and is named Chidalok.

Few people aspire to reach out to it 

It is as variegated as Divalok, Alok.


Both the lights derive from Maharlok 

They’re like two sides of a coin, Alok 

As Divalok covers the physical aspect 

Chidalok woos the metaphysical, Alok!


Thanks Alok for your meaningful name

Which took me along and started a game!

I played and played while lolling around 

Bidding happy birthday was my only aim!


Happy Birthday!

Ajit Sambodhi 

Wednesday, April 1, 2026

चैत्र पूनम

मैं अभी देख रहा हूँ आसमान को 

घुमड़ती घटाओं के  करिश्मों को 

उनमें डूबते हुए अथक दिनकर को 

और उभरते हुए सम्पूर्ण चन्द्रमा को!


हाँ आज पूर्णिमा का चाँद निकला है 

गोल थाल जैसा बड़ा चाँद निकला है 

आख़िर प्रथम माह चैत्र का चाँद जो है 

अंजनि पुत्र हनुमान के लिए निकला है!


आज संकटमोचन हनुमान का जन्मदिन है 

आज बजरंगबली कपीश्वर का जन्मदिन है 

हाँ आज लक्ष्मणप्राणदाता का जन्मदिन है 

आज सीताशोकविनाशक  का जन्मदिन है!


केसरीनंदन महाबली हनुमान के चरणों में नतमस्तक 

अजित सम्बोधि 

Monday, March 30, 2026

पचपन वर्ष पूर्व

 बच्चे परिंदों की तरह उड़ जाते हैं बड़े होने पर 

कुछ यादें छोड़ जाते हैं, याद करने को उम्र भर 

जया, मुझे याद है पचपन वर्ष पूर्व का वो दिन 

जब तुम्हें देखा था पहली बार अपने अंक में भर।


सूरज की पहली पहली किरण तुम्हें छू रही थी

चाँदनी उचक उचक के तुमको पुचकार रही थी 

तुम अपनी माँ की गोदी में दुबक के सो रही थीं 

कभी मुस्कुरा देती थीं मानो सपना देख रही थीं।


मैं बीते हुए लमहों को याद कर कर रोता नहीं हूँ 

मैं उनको याद कर के ज़ोरों से  हँसता भी नहीं हूँ 

ये यादें तो ज़िंदगी भर की अमानत हुआ करती हैं 

इसलिए मैं इन्हें  याद कर कर के जिया करता हूँ।


तुम्हें बिटिया आज मुबारक हो तुम्हारा ये जन्म दिन 

मैं ख़ुशनसीब हूँ देख पा रहा हूँ तुम्हारा ये जन्म दिन 

रब से इल्तिज़ा है बख़्शा करे इसी मानिंद जन्म दिन 

ताकि तुम मनाती रहो ख़ुश ख़ुश अपना ये जन्म दिन!


परिंदों/परिंदे = birds. अंक = गोद।

लमहों/लमहे = moments.अमानत = धरोहर।

रब = ख़ुदा।इल्तिज़ा = दुआ।मानिंद = मुताबिक।


राधे रानी की कृपा बनी रहे तुम पर सदा 

पापा 

Sunday, March 22, 2026

वो 22 मार्च

मुश्किल है बहुत मुश्किल यादों को भुला देना 

आसान नहीं है जुदाई को दिल से बिदाई देना 

जन्मों की मुरव्वत से, मिल पाती है ऐसी निस्बत 

आसान नहीं है कुदरत की बेरुख़ी को भुला देना। 


घर तो वही है न, जहाँ कोई इंतिज़ार में बैठा हो 

तभी न पैर मुड़ते घरको, जब यादमें कोई बैठा हो 

पड़ते हैं क़दम मेरे अब जहाँ वो घर नहीं मकान है

कैसा लगेगा वो सूना मंज़र जहाँ सन्नाटा बैठा हो?


एक वो भी दिन था जब माँ इन्तिज़ार कर रही थीं 

और मैंने बाअदब, उनके हुक्म की तामील की थी 

एक घूँघट ने उनके आँगन का, सूनापन समेटा था 

और हवा की सरसराहट में स्वर लहरी तैर गई थी।


मुरव्वत = लगाव।निस्बत = relationship.मंज़र = दृश्य।

बाअदब = आदरपूर्वक।तामील = अनुपालन।


ये सूना मंज़र और मैं 

अजित सम्बोधि 

Tuesday, March 17, 2026

कितना कमाऊँ?

 एक ही सवाल है ज़ेहन में, पूछने के लिये 

कितना कमाऊँ, ख़ाली हाथ जाने के लिये?

…..

सिकन्दर को जाना था जीतने के लिये 

दुनियाँ, गया अरस्तू से मिलने के लिये।

अरस्तू ने दुआयें दीं उसके भले के लिये 

भेजा…डायोज़िनीज़ से मिलने के लिये।

….

डायोज़नीज़ ने पूछा कहाँ को चल दिये 

सिकन्दर ने कहा, दुनियाँ जीतने के लिये।

अच्छा दुनियाँ जीतोगे, मगर किसके लिये 

सोचा नहीं…शायद आराम करने के लिये।

अरे अरे इतनी मेहनत करोगे..इस के लिये 

आजा आजा मेरी झोंपड़ी है…इस के लिये!

….

दुनियाँ जीत ली, जा रहा हूँ, ख़ाली हाथ लिये 

डायोज़िनीज़ तुमने सही पूछा था, किसके लिये।

…..

जो सिकन्दर ने कहा उस दिन, सही है मेरे लिये 

मुझे जवाब मिल गया पसंदीदा, आज मेरे लिये।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Saturday, March 7, 2026

जाऊँ कहाँ?

जाऊँ कहाँ, मिला न दर खुला
शाम हो चली, कोई ना मिला 
वक्त ने मुझे, क्यों दिया भुला 
कैसा सफ़र ,  कैसा ये सिला।

ख़्वाब थे कई, मिलने आ गये
भूली सी बातें, याद दिला गये
सोई थी आह , फ़िर जगा गये 
ख़ुश्क आँखें , मगर रुला गये।

सूरज ढल चला, पंछी उड़ चले
फूल थे कन्ज के , बन्द हो चले
रोशनी रुक गई, अँधेरे बढ़ चले 
रहगुज़र सभी , ओझल हो चले।

दिल को क्योंकर , समझाऊँ मैं 
मन को  क्योंकर , बतलाऊँ  मैं 
कितनी क़ीमत ,  चुकाई है मैंने 
हर बार ख़ुद से, मिला सिर्फ़ मैं।

सिला = इनाम।रहगुज़र = रास्ता/ रास्ते।

ओम् शिव
अजित सम्बोधि।

Wednesday, March 4, 2026

होली 2026

जब जब भी आता है ये बद्र ए कामिल 

बहुत ख़ुशी हो जाती है हमको हासिल   

कल ख़ुसूफ़ था कई जगहों पर , मगर 

हमको बद्र देखना हो गया था  हासिल।


आज तोहफ़े में मिली है खेलने की होली 

साल में एक बार मिलती है ये हमजोली 

चाह कर भी हम छुपा न पायेंगे  ख़ुद को 

ढूँढ ही लेगी हमको आज कोई तो टोली।


फ़िर होगा सिलसिला शुरू गले मिलने का 

साथ में रंगीन गुलाल चेहरों पर लपेटने का 

थोड़ी सी देर में नज़र आयेंगे हम नए रंग में 

जब चढ़ जाएगा हम पर ख़ुमार, अबीर का।


ये होली का त्योहार है दिलों को पास लाने को 

अरसे से रूँठे हुए दिलों को फ़िर से मिलाने को 

जो चेहरे बारूद बन कर  बरसने को तैयार  बैठे 

उन चेहरों पर फिर मुस्कुराहटें वापस लाने को।


सब को मुबारक हो आज की होली की ये रंगत 

आजा ओ मेरे मेहरबान बैठ जाओ बना के पंगत 

सुनाओ एक एक करके अपनी पसन्द  का गाना 

ताकि याद रहे कभी जुटी थी एक सुरीली संगत!


बद्र ए कामिल = पूर्णिमा का पूरा चाँद।

ख़ुसूफ़ = चंद्रग्रहण।बद्र = पूनम।

अबीर = ख़ुशबूदार रंग।


सबको होली की हार्दिक शुभकामनाएँ 

अजित सम्बोधि 

Tuesday, March 3, 2026

Holi 2026

 It’s all about how to celebrate Holi

Legend has it,  it’s about being holy

Holi is a markedly  popular festival 

It’s a playful way of becoming jolly.


People use colours and paints deftly 

So as to carve out designs  amicably 

But in Holi, our aim is to get giggles 

Holi festival harnesses joy intensely!


We apply colour to each other’s face

Then nobody can recognise any face

Becoming nobodies we merge in One

Skylarking works as promise of grace!


So let’s play Holi, it’s tremendous fun

Invite everyone to join, it harms  none

In this era of bombs, shrieks and death

Let it be a catalyst of joy for everyone!


Wishing Everyone A Happy Holi

Ajit Sambodhi

Tuesday, February 24, 2026

कभी ऐसे चल पड़ा था मैं

 ज़िन्दगी निकल गई चैन भी  मिला  नहीं 

सोचा:क्या है ज़िन्दगी, जान पाया मैं नहीं।


कभी इस राह पर 

चल पड़ा था सब्र कर 

दिल में कान्हा को लिया 

बंद दरवाज़ा किया 

आँख की किनार से 

टपका था कुछ प्यार से 

वक्त ने पुकार दी रुक न पाया मैं मगर 

सूनी सूनी थी डगर नई नई थी डगर।


जिस सिम्त मैं था जा रहा 

नज़र को था घुमा रहा 

हमराज़ कोई बना नहीं 

हमराह कोई दिखा नहीं 

मुझको थी न कोई ख़बर 

पहुँचूँगा मैं कब किधर

लो आँख बंद  हो गईं

लो साँस बंद  हो गई।


मैं सम्हल गया गिरता हुआ 

मैं बैठ गया लुढ़का हुआ 

आँख ऊपर चढ़ गईं 

 कमर सीधी हो गई 

अँधेरा घुलने लग गया 

रौशनी में धुल गया 

मैं बैठा बैठा जम गया 

और सबेरा हो गया!


फ़िर न कह पाया कभी चैन तो मिला नहीं 

या कि ज़िन्दगी को पहिचान पाया मैं नहीं।


वाह कान्हा वाह 

अजित सम्बोधि 

Friday, February 20, 2026

कैसे भुला दूँ तुझे मैं भला

 मैं  सोता  रहा , तू  जगता  रहा

तू हर दम  मुझे  लाड़ करता  रहा 

अब कैसे  भुला दूँ, तुझे  मैं  भला

साँस बनकर  मेरी,  तू बहता  रहा।l


मैं लड़ता  रहा और झगड़ता  रहा 

ख़िलक़त की दौड़ में दौड़ता  रहा 

तू हर वक़्त ख़ैरख़्वाह बन कर  रहा   

दिल की धड़कन बन धड़कता रहा।


क्या कुछ नहीं दे दिया तूने मुझे

सूरज आता रोज़ जगाने को मुझे 

यामिनी आती है सुलाने  को मुझे 

मुफ़्त में मिलतीं ये ख़िदमात मुझे।


पेड़ों को देखो खड़े रहते उम्र भर 

धूप हो सर्दी हो बरखा हो जी भर 

देते छाया, फूल, फल  झोली भर 

और रूह ए रवाँ संजीवनी उम्र भर।


तू हयात बख़्श, सब बख़्शा  रहा है 

बिना माँगे ख़ुद ही अता कर रहा है 

कैसे कोई भुला सकता  है  तुझको 

नक़द दम उदर, परवरिश कर रहा है।


ख़िलक़त = दुनियाँ।ख़ैरख़्वाह = भला चाहने वाला।

यामिनी = रात।ख़िदमात = सेवायें।रूह ए रवाँ = प्राणवायु, O2. 

संजीवनी = जीवन देने वाली। हयात बख़्श = जीवनदाता।

अता = देना।नक़द दम = अकेला।उदर = पेट।परवरिश = nourish.

मुरीद ए ताउम्र = सारी उम्र का follower.


मुरीद ए ताउम्र 

अजित सम्बोधि 

Monday, February 16, 2026

मेरा दोस्त घनश्याम!

चेहरे से चुस्त हो ,  सफ़ा-परस्त   हो
नेक दिल हो, ख़ुश दिल हो, मस्त हो
इतनी ख़ूबियाँ  लिए  फिरते हो  यार 
क्यों न हर दिल  घनश्याम-परस्त हो?

हाँ, सुना करता हूँ तुमको  मैं अक्सर 
तुम्हारी बातें होती हैं  बड़ी पुर-असर
क्या ख़ूब ज़ेहानत पाई है  बरख़ुरदार
मुख़्तसर भी  नहीं  होता है  बे-असर!

रबने बख़्शी है बड़ी इनायत तुम  पर 
झोली भरके  कर  दी कृपा  मयस्सर
प्यार को उड़ेला है मालिक ने तुम  पे
दिल होता बाग़ बाग़ तुम को देखकर।

दिल से दुआऐं भेज रहा हूँ मैं  तुमको 
रब  की रहमत  मिले  दायम  तुमको 
उम्र के आख़िरी पड़ाव  पर बैठा  हूँ मैं 
देख ली  इंसानियत, देख कर  तुमको।

सफ़ा-परस्त = स्पष्ट वादी।पुर-असर = असरदार।
ज़ेहानत = प्रतिभा।मुख़्तसर = रत्ती मात्र।
दायम = हमेशा।दिलनशीं ए ताउम्र = उम्रभर का मित्र।

दिलनशीं ए ताउम्र 
अजित सम्बोधि

Sunday, February 8, 2026

Happy Birthday Arunima!

you are the rosiness of the  rising sun

the sun that gives life to all, bars none 

i wish happy birthday to you arunima 

let rosiness touch the lives of everyone!


life is an invaluable gift given by god

some become uneasy if i mention god!

i don’t know what’s your take on god

but i am sure he has bestowed his nod!


there’s an intelligence that runs the show 

your yen word for it out of the long row?

we are indebted to it, you subscribe to it?

do untold trips round the sun! flow, flow!


wish you a happy birthday again, arunima 

nana 

Saturday, January 31, 2026

Happy Birthday Pollyanna!

Hi! Happy birthday to you Pollyanna 

Yes, Pollyanna dressed in a bondanna!

So everyone gets much too overjoyed  

& feels like crying Hosanna! Hosanna!


Last year also you made it to the States

This year also you happen in the States!

Coincidence! Yes, but I miss hailing you 

Face to face according to heart’s dictates!


We have known each other only for a year 

I can’t think if there is anything to forbear 

Instead I find it has been too fruitful to me 

I recall the time you sat with my daughter!


Happy Birthday Pollyanna 

Ajit Sambodhi 

Friday, January 30, 2026

Jolly Infinity!

 Whose sky this is, I need not to know 

I am lying supine while I watch it grow 

It grows and grows, and turns quite big 

It doesn’t seem to know, it’s high or low.


It wraps me all around, and enters me 

The world goes out and I become free

Anon, I happen to forget, who is who?

Whether I’m inside it or it’s inside me.


The sky is too very vast but vaster here

A space is inside me, brighter and clear 

Where heart seems to melt, at each beat

How strange, no one seems to be aware!


Friends, as you lie under the infinite sky

Go on watching it, till tear drops  roll by  

Don’t forget to forget each & everything 

& don’t be surprised when joy comes by!


Jolly Infinity!

Ajit Sambodhi

Friday, January 23, 2026

आगया बसन्त

आगया बसन्त छाई मौसमे बहार है 

बुलबुल ने फ़िर से लगा दी गुहार है 

सर्द हवाओं से  मिल गई  निजात है 

रवि बरसा रहा किरणों की फुहार है।


कलियाँ मुस्कुराने लगीं रौनक़े बहार है 

देखो बसंत आ गया हर तरफ़ पुकार है 

हर चेहरा खिल उठा  नज़रों में सिंगार है 

ये है ऐसी ताज़गी जो सबको दरकार है।


खेतों में पीली सरसों का लग रहा अंबार है 

लगता है जैसे हो रही हो सौने की बौछार है 

मन सभी के पुलकित हैं पाके नया संसार है 

सर्दी की बिदाई पे हर ओर जय जय कार है।


सबको बसंत पंचमी की बधाई 

अजित सम्बोधि 

Wednesday, January 21, 2026

जनम दिन मुबारक हो

 जन्म दिन  मुबारक  हो दिव्या तुमको 

ख़ुशियों का अम्बार मिल जाये तुमको 

वक़्त की मेहरबानियाँ ऐसी हों तुम पर 

बख़्शिश ए रब सब मिल जाँय तुमको!


 ये जो ज़िन्दगी मिली है, है बड़ी सौगात 

हर रोज़ सूरज की किरणें लातीं हैं प्रभात 

हर रोज़ एक नई ज़िन्दगी मिलती है हमको 

ये प्रभात है याकि तवील ए उम्र की बारात?


ख़ुशियाँ तुम्हारी होती हैं ख़ुशियाँ हमारी भी 

टकराके तुमसे, वो आतीं जानिब हमारी भी 

ये प्रभात की खुशियाँ तुमको सजाया करें 

ताकि चेहरा तुम्हारा मुस्कुराना न भूले कभी!


बख्शिश ए रब = god’s gift. सौगात = gift.

तवील ए उम्र = उम्र की लम्बाई।जानिब = दिशा में।


सदा मुस्कुराती रहो बिटिया 

पापा 

Thursday, January 1, 2026

नये साल का गीत

 नया साल आ रहा हैं नए सपने ला रहा है 

नई उड़ानें भरने को, नया जज़्बा ला रहा है।


मालिक ने है बख्शा हमको, इतना बड़ा जहाँ 

ज़मीं से लेके फ़लक तक क्या कुछ नहीं यहाँ 

सुबह कली मुस्कुराती, शाम में तारे जगमगाते 

क्यों ना कर लें हम इबादत, मेरा मन कह रहा है।


कभी चाँद झुरमुट की ओट से, कैसा झाँकता है 

कभी सूरज बादलों में से, अकस्मात  झाँकता है 

सब कुछ जो हो रहा है, कितना सुहाना लगता है 

हम पर रब कितनी रहनुमाई, हरदम  कर  रहा है।


जो कुछ बाहर हम देखते वो अंदर का अक्स है 

कभी अंदर में तो झाँकना, कैसा हो रहा रक़्स है 

 अब के नये दिन पर पलकों को गिरा के रखना 

फ़िर देखना पर्दे के पीछे कैसा कमाल हो रहा है।


फलक = आसमान।जज़्बा = कुछ कर गुज़रने का जोश।

रब = ईश्वर। अक्स = reflection. रक़्स = dance.


सब को नये साल की शुभ कामनायें 

अजित सम्बोधि 

Friday, December 26, 2025

वृंदावन की गलियों में

 ये जो मैं आज यहाँ चल रहा हूँ, ये जादू से भरी गलियाँ हैं 

ज़र्रे ज़र्रे में लिपटी हुई, यहाँ पर मुरलीधर की पगथलियाँ हैं।


ये वृन्दावन की गलियाँ हैं जहाँ जुटा करतीं थीं सहेलियाँ हैं 

कान्हा की बाँसुरी की धुन पर यहाँ, थिरकतीं थीं गोपियाँ हैं।


ये जो कदम्ब का पेड़ है, इस पर झूला करते थे, कन्हैया हैं 

साथ में उनके झूलती थीं राधा जी, होती थीं गल बहियाँ हैं।


आज हम पहुँच गये हैं रमण रेती में, लेते हैं इसकी बलैयाँ हैं 

हाँ हाँ यही तो वो रेती है जहाँ कभी करते थे रमण कन्हैया हैं।


यहाँ जमुना बह रही हैं, किनारे पर जो दिख रहीं चमेलियाँ हैं 

वो तुम्हारी याद में गोपाल, अब भी सिसकती कुंज गलियाँ हैं।


तुम जो गये लौट के न आये श्याम, राह देखती रहीं अखियाँ हैं 

तुम्हारे गीता के वायदे को याद कर कर, गुज़ारतीं  तन्हाईयाँ हैं।


यहाँ पर आने पर पाया मैंने, हर सिम्त, यादों की परछाइयाँ हैं 

हर तरुवर की कलियों की ज़ुबाँ पर, बस तुम्हारी कहानियाँ हैं।


हर एक ज़ुबाँ पर तुम हो, तुम्हें देखने को तरस रहीं पुतलियाँ हैं 

घनश्याम बहुत देर हो चुकी है, अब और न बुझाना पहेलियाँ हैं।


पर कैसे भूलूँ कि घनश्याम से तुम ही कराते हो मेरी गलबहियाँ हैं 

तुमने अपना नाम-रूप मुझे दे कर, शुरू से किया करम कन्हैया है।


ये  जो मैं  आज  यहाँ  चल  रहा  हूँ, ये  जादू  से  भरी  गलियाँ  हैं 

ज़र्रे  ज़र्रे  में  लिपटी  हुई, यहाँ  पर  मुरलीधर  की  पगथलियाँ  हैं।


मुरीद ए मुरारी 

अजित सम्बोधि 

Friday, December 5, 2025

एक गुज़ारिश है

 मुझे कुछ कर तो लेने दो 

मुझे यूँ लुटने भी तो दो 

तुम तो हो ग़ैबी हाँ 

हाँ तुम तो हो ग़ैबी हाँ 

हाँ हाँ तुम तो हो ग़ैबी कन्हाई 

मुझे भी रूह बनने दो।

मुझे कुछ कर तो लेने दो 

मुझे कुछ लुट तो लेने दो।


 तुम्हें पाने की हसरत में 

मुझे कुछ खो तो लेने दो 

हाँ मुझे कुछ खो तो लेने दो 

ये जिस्म ले लो वापस 

हाँ हाँ इसे ले लो वापस 

मुझे भी रूह बनने दो 

या तो तुम जिस्म लेके आओ 

वरना मुझे भी रूह बनने दो।

मुझे कुछ कर तो लेने दो 

मुझे यूँ लुटने भी तो दो 

तुम तो हो ग़ैबी कन्हाई 

मुझे भी रूह बनने दो।


कितने सावन बीत गये 

पर तुम फ़िर भी नहीं आये 

आँखें सावन बन बन हारीं 

झूले सूने सूने रह गये 

मैं बन गया यायावर 

तुम तो रहे ग़ैबी 

मुझे आश्कारा बना दिया 

हटा लो ये जिस्मानी चादर 

मुझे अब रूह बनने दो 

मुझे अब रूह बनने दो।


ग़ैबी = invisible. यायावर = फक्कड़।

आश्कारा = visible, जिस्मानी।


रहनशीं रहरौ 

अजित सम्बोधि 

Thursday, December 4, 2025

यहाँ सब क़ुदरती, नहीं कुछ कीमियाई

 मुझे मत रोको मुझे बोलने दो 

बन्द थी ज़ुबाँ आज खोलने दो 

रहम खाओ मुझ पर, ख़ुद पर 

सारे जहान पर, इज़ाज़त दे दो।

सच कह रहा हूँ मैंने देखी हैं 

अपनी इन आँखों से देखी हैं 

वो हरी भरी वादियाँ अंतहीन 

उनमें विचरती गौऐं मैंने देखी हैं।

मैंने देखा है वो जो प्यार देती हैं 

हाँ वो माँ के जैसा लाड़ देती हैं 

भूल जाओगे ख़ुद को यक़ीनन 

जब जीभ से तुम्हें लपेट लेती हैं।


मैंने देखा है बतख़ों को नज़दीक में 

मैंने देखा कैसे सिमटती हैं वो घेरे में 

न पैर हिलते हैं न गर्दन और न पंख 

कैसा इज़ाफ़ा करतीं आपकी शान में।

कहीं पे डोर से झूलती गौरैया दिखेगी 

कहीं शाख़ से लटकती तोरई मिलेगी 

कहीं कचनार के खिलते फूल महकेंगे 

कहीं गोभी के फूलों की क़तार मिलेगी।

यहाँ सब है कुदरती, नहीं कुछ कीमियाई 

हर तरफ़ से फैली हुई है रब की रहनुमाई 

आफ़ताब है दीप्त है, माहताब है दीप्ति है 

इसलिए पसरी है हर सिम्त में ख़ुशनुमाई।


कुदरती = जैविक। कीमियाई = गैर जैविक।

आफ़ताब = सूरज जो दीप्त है, रौशन है।

माहताब = चाँद जो दीप्ति है, काम रोशनी बखेरना।

सिम्त = दिशा। रहनशीं रहरौ = रास्ते में बैठा पथिक।


एक रहनशीं रहरौ 

अजित सम्बोधि 

Monday, November 24, 2025

बधाई हो 24 नवम्बर !

 बधाई हो आज 24  नवम्बर है 

आज भी कुछ वैसा ही अम्बर है 

जैसा था  बत्तीस   साल  पहिले 

ज़हन में  रखने  वाला  नम्बर  है!


हर मिलन के पीछे एक कहानी है  

न सोचना इक बार की कहानी है 

जन्मों जन्मों से चलती आ रही है

मिलना  निरंतरता  की निशानी है।


हर बार चोगे बदलते  रहा  करते हैं 

हर बार किस्से बदलते रहा करते हैं 

मगर रूहें  कभी भी  नहीं बदलती हैं 

  सिर्फ़ बाब  हैं जो  बदला  करते हैं।


 आप दोनों ख़ुश रहें, दुआ करता हूँ 

वक़्त  तामील  करे, दुआ  करता  हूँ 

बच्चे सभी ख़ुश  रहें, दुआ  करता  हूँ 

रब का करम रहे, यही दुआ करता हूँ।


बाब = chapter.  तामील = आज्ञापालन।

रब = ईश्वर। करम = कृपा।


शुभचिन्तक 

पापा 

Monday, October 20, 2025

दिवाली आ गई है

 तीरगी टूटने लगी है 

शमा जलने लगी है 

रात मह-जबीं होने लगी है 

कहाँ छिपी थी अभी तक 

ए दिवाली बता तू 

फ़लक को बाहों में लिए 

लो दिवाली आने लगी है।

                    हवा बदल सी रही है 

                    फ़िज़ा बदल सी रही है 

                     पस ए मंज़र ही बदल रही है 

                      किसको करूँ मैं नज़राना पेश 

                      खुशियाँ करने लगीं बेहोश 

                      शाम गुलज़ार होने लगी है

                      दिवाली आने लगी है।

मौसम ने करवट लेली 

सपनों ने करवट  लेली 

बंधनों की गहराइयों में 

ज़मीं ने भी करवट है ले ली 

रंगत बदलने लगी है 

सीरत बदलने लगी है 

दिवाली आने लगी है।

                            राहत आ रही है 

                             पर्दा हटा के आ रही है 

                              नई सौगात ला रही है 

                              ज़िंदगी परवाज़ होने लगी है 

                             कोई न हारा, सब जीते 

                              दिल की आवाज़ आ रही है 

                              दिवाली आने लगी है।

पेड़ों का लिबास बदल गया 

फूलों का सलीका बदल गया 

नई सुवास आ रही है 

मन में हुलास आ रही है 

दिवाली आने लगी है 

दिवाली आ रही है

दिवाली आ गई है

क्या दिवाली है जैसे रंगो ने ली अँगड़ाई है?

बल खाती शम्माओं  की कैसी रहनुमाई है?


तीरगी = अंधकार। शमा = light.

मह-जबीं = चाँद जैसी। फ़लक = आसमाँ।

पस ए मंज़र = backdrop.परवाज़ = उड़ने।


सभी को दिवाली की बधाइयाँ 

एवम् शुभ कामनाएँ!


शुभेच्छु 

अजित सम्बोधि 

Monday, October 13, 2025

HPB speaks !

 HPB had  predicted 140  years ago 

European  science  is going  to  sow

Two seeds for  death of  human race

Consumerism with Militarism, Halo!


Consumerism  buoys up  consumers

& they’re mass produced by traders!

There come upheavals in economies

Inviting display of fighters & lasers!


This science is clueless about the soul 

To work only for  the outer, is  its goal

It will  boomerang upon itself  one day 

So HPB chastised fawning over its role!


Aren’t we all at the brink of annihilation?

Casually  press the trigger of decimation!

HPB was for  the ancient science  of soul

As taught  in India from  times  unknown!


For one to behave like a human being

One must be linked to the inner being

Humans become  human beings  only

When they align to their  inner  being!


Only humans possess this capability 

To connect to their own inner ability 

To escape behaving like  humanoids

Shouldn’t we give up love of frivolity?


HPB = Helena Petrovna Blavatsky, a Russian 

noble woman in Czarist Russia. To know more

about her please refer to my blog piece The 

Tipping Point.


Om Shantih

Ajit Sambodhi

Monday, October 6, 2025

आज शरद पूनम है

  आज शरद पूनम है 

ये अनुभव अति अनुपम है 

लगती जैसे नज़्म है कोई 

ये अद्भुत पूनम है 

आज शरद पूनम है। 


                               वर्षा जाती शरद है आती 

                                नई छटा लेकर है आती 

                                सब के मन को खूब लुभाती 

                                जैसे कोई सरगम है 

                                आज शरद पूनम है।

धुले धुले सब पेड़ खड़े हैं 

रंग बिरंगे फूल खिले हैं 

पंछी भी सब चहक रहे हैं 

ऊपर को सब झाँक रहे हैं 

आज का चाँद चमाचम है 

आज शरद पूनम है।

                                   अभी चाँद निकला ही है 

                                    पूरा गोल ही निकला है 

                                    साम्राज्य बड़ा है उसका 

                                     कितना मगर सुगम है 

                                    आज शरद पूनम है।

वो पूर्ण है, परिपूर्ण है 

सम्पूर्ण है, शान्तिपूर्ण है 

आसमान का परचम है 

कैसा अजब समागम है 

आज शरद पूनम है।


सभी को शरद पूर्णिमा की बधाइयाँ 

एवम् शुभ कामनाएँ।


शुभेच्छु 

अजित सम्बोधि।

Wednesday, October 1, 2025

मैंने वादा कर लिया है

 मैंने वादा कर लिया है 

मुठ्ठियों को खोल दिया है 


मैं पलकें बिछाऊँगा 

मैं नज़रें बिछाऊँगा 

मैं तुम्हें ना भुलाऊँगा 

मैं वादे निभाऊँगा 

कैसा  करम है तेरा 

कैसा रहम है तेरा 

मैंने वादा कर लिया है 

मैंने दिल खोल दिया है 

                   सब रानाइयाँ सजाऊँगा 

                   तनहाइयाँ मिटाऊँगा 

                    रोने न दूँगा अकेले में 

                     रोने न दूँगा मेले में 

                     आँखों में जो नमी है तेरी 

                      पलकें जो झुकी हैं तेरी 

                      क़सम है ये अब मेरी 

                       हर शमा जलाऊँगा 

                       मैंने वादा कर लिया है 

                        ख़ुद को तैयार कर लिया है 

कभी था जो सरताज 

किसने दिया था वो ताज 

तूने ही दिया था साज़ 

तूने ही बख्शा था ताज 

कैसे हो गया मोहताज 

मैं दिल नवाज़ बनाऊँगा 

फ़िर से नाज़ करवाऊँगा 

मैंने वादा कर लिया है 

शुआओं को खोल दिया है 

               फ़लक से ज़मीं तक सभी 

                सूना पड़ा है जो अभी 

                 नामुमकिन दिखे, था जो मुमकिन 

                  मैं उसको बनाऊँगा मुमकिन 

                  मैं ख़ुदी को मनाऊँगा 

                   मैं तुमको मनाऊँगा 

                   मैंने वादा कर लिया है 

                    जो सोया था जगा दिया है 

कैसी झिलमिल सी झलकती हैं 

कैसी रिमझिम सी बरसती हैं 

ये बे इन्तिहा इनायतें तेरी 

 ये दिलाराइयाँ तेरी 

ये चाँद की शुआऐं 

ये मुस्कुराती रानाइऐं

मैं इन्हें सब तक पहुँचाऊँगा 

सब को दिल से लगाऊँगा 

मैंने वादा कर लिया है 

मैंने वादा कर लिया है 


 रानाइयाँ = सजावटें।शमा = दिया।

दिल नवाज़ = दिल को ख़ुशी देने वाला।

शुआओं/ऐं = किरणें। फ़लक = आसमान।

दिलाराइयाँ = दिल में छुपी ख्वाहिशें/ ख़ुशियाँ।


क़दम बोस 

अजित सम्बोधि 

Friday, September 26, 2025

परिन्दा बना दे।

 परिंदों के लिए तो नहीं कोई बंदिश 
उड़ जाते हैं जहाँ की होती ख़्वाहिश 
कोई सरहद उनको  रोक नहीं पाती 
कोई मज़हब  बना  न पाता  दबिश।

 कैसे उड़ते हैं पंख  फैला कर 
कैसे ख़ुश होते हैं  गीत गाकर 
सारा आसमाँ  बना  ख़ैरख़्वाह 
सब चहकते हैं उनको देख कर।

कितनी ख़ुशनुमा है उनकी ज़िंदगी 
हर दरख़्त करता है उनकी बन्दिगी 
जहाँ चाहते हैं  बना लेते हैं नशेमन 
हर मोड़ पे पलकें बिछाती ज़िन्दगी।

मैं तो थक गया हूँ इस ज़िन्दगी से मालिक 
इन नफ़रतों से, इन दरिंदगीयों से  मालिक 
क्या हो गया है तेरे  इन्सान को ऐ मालिक 
अच्छा हो मुझे  भी परिंदा बना दे  मालिक।

ख़ैरख़्वाह = भला चाहने वाला।नशेमन = बसेरा।

ओम शान्ति:
अजित सम्बोधि 

Tuesday, September 23, 2025

Ever thought?

 Ever thought why people keep fighting 

Even in sleep they don’t forget fighting!


Be it any religion, you see them fighting 

Be it any nation, you find them fighting!


Every nation spends 80% gdp on fighting 

Asks people to live on 20% sans fighting!


Aristotle wanted a philosopher to be a ruler

But Harishchandr only was such a one ruler!


We have reached a  cul de sac,  haven’t we?

Let’s look inside ourselves,  shouldn’t  we?


A wise guy pointed out that ‘I’ is an illness

It creates 80K thoughts/day in the process!


Let’s swap ‘I’ with ‘We’ that denotes wellness

Each thought will be for ‘We’for real progress!


Shouldn’t we try it, though it looks trifling?

Let’s hope it ends, endless rage for fighting!


sans = without. cul de sac = dead end of a street 

in the form of a circle, for turning back.


Om Shantih

ajit sambodhi 


Thursday, September 18, 2025

बस एक मुस्कान चाहिये

वो पूछने लगे आपको क्या चाहिए 

मैंने पूछा किस बाबत क्या चाहिए?

कहने लगे कि ख़ुश  रहने  के लिए 

मैंने कहा सिर्फ़ एक मुस्कान चाहिए।


 तारीकी मिटाने को भला क्या चाहिए 

बस एक  जलता  हुआ  दिया  चाहिए 

 दिल की मायूसियत मिटाने के लिये 

बस  एक  नन्ही  सी  मुस्कान  चाहिए।


ख़ुश होने के लिए न बड़ी दौलत चाहिए 

और ना ही बहुत सी शोहरत ही चाहिए 

 दिल की ख़ुशी के लिए बस नक़द-दम 

 तहे दिल से निकली एक मुस्कान चाहिए!

 

तारीकी = अन्धकार। मायूसियत = उदासी।

 नक़द-दम = सिर्फ़।तहे दिल = अन्तरतम।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Friday, September 5, 2025

अन्दाज़ ए इबादत।

 तुम जो कहो नग़मा-ए-उल्फ़त सुनाऊँ?

कुछ    माज़ी    सर…गोशी    दुहराऊँ?

तुम्हारे  सरगम   की  ख़ातिर   दरकार 

दिल  में  छिपा   मेरा  बरबत  बजाऊँ?


 दिल की परतों में दबा वो   भेद सुनाऊँ ?

क़ैफ़ियत गुमनाम आज उजागर कराऊँ?

जुबाँ पे ला न पाया जिसे मैं अभी तक 

वो अन्दाज़ ए बयाँ  भी तुमको  सुनाऊँ?


एक  तुम्हारी ख़ातिर ही जिन्दा हूँ,  समझे?

 तुम्हारे  सिवा  कुछ  न  चाहिए ,  समझे?

और बता दूँ  एक  राज़  की बात  तुमको  

 हररोज़ मरता हूँ, सो थक गया हूँ, समझे?

 

अन्दाज़ ए इबादत = बन्दगी करने का ढंग।

नग़मा ए उल्फ़त = प्यार का गीत।माज़ी = पुरानी।

सर गोशी = कानाफूसी।बरबत = एक वाद्य यन्त्र।

क़ैफ़ियत = पहचान।अन्दाज़ ए बयाँ = बोलने का ढंग।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि।

Wednesday, August 27, 2025

paying gratitude

I bow to the rising sun
It gives life to everyone!

I smile and they too smile
Isn't that quite worthwhile?

I thank water and then drink it
It sates  before danger can hit.

I vow to remain humble
So  that I don't  bumble.

I thank all the foods that i feed on
They're my friends i depend upon.

I pray to God  before going to sleep
He remains awake, while I'm asleep!

Please God, fill me with compassion 
No passion compares with compassion!

Om Shantih 
ajit sambodhi 

Saturday, August 16, 2025

कान्हा से कुछ सवालात

 जन्माष्टमी के सुअवसर पर सभी कों शुभ कामनाएँ

 एवं प्रणाम:  अजित सम्बोधि।


भादों  की अँधेरी रात, जमुना  उफान पर

 देवकी वसुदेव क़ैद में, कंस के आदेश पर 

 क्या सोच के आधी रात को  कान्हा तुमने 

देवकी की गोद भरी, सूनी रखने को उम्र भर?


 तुमने जो अजीब ओ ग़रीबf दुनिया रची है 

क्या आज तक किसी के समझ में आई है?

  क्या इसलिए  कि कोई सवाल न पूछ ले 

तुमने पर्दे के पीछे  अपनी  जगह  बनाई  है?

 

तुम्हारी कायनात का आग़ाज़ ओ अंजाम है?

मेरा  मन्तव्य है कि इसका कोई ओर-छोर है?

 माना कि  इन्तिहाई उम्दा और  करिश्माई है 

 मगर क्या ये अनन्य सवालों के घेरे में नहीं है?

 

तुमने हमको बनाया है, हम तुम्हारी औलाद हैं 

 हम तुम्हारी ईजाद हैं, फ़िर क्यों हम नाशाद हैं?

 क्या हमारे दिल नहीं है,  कोई   हम फ़ौलाद हैं ?

 तुम मिलते नहीं, कैसे बतायें जो हमारी मुराद हैं?


तुम जब यहाँ आये थे तो, एक इन्सान बन के आये 

 मिलन जुदाई देखीं, गालियाँ खाईं, रणछोड़ कहाये 

मगर तुम्हारी पहिचान  तुम्हारी चिर मुस्कान ही  रही 

क्यों निभा न पा रहे हम सूत्रों को जो गीता में गिनाये?


अजीब ओ ग़रीब = रहस्यमय।कायनात = सृष्टि। 

आग़ाज़ ओ अंजाम = सीमा।इन्तिहाई = बेहद।

 ईजाद = आविष्कार।नाशाद = दुखी।फ़ौलाद = लोहा।

मुराद= अभिलाषा। मुरीद = चेला।

 

तुम्हारा  मुरीद 

 अजित सम्बोधि 

Saturday, August 9, 2025

राखी का बन्धन

 ये बन्धन बड़ा  अनूठा, इसको कहते  रक्षा बन्धन 

राखी बनी कबीर की साखी, सजाने को ये बन्धन।


इक धागा बन जाता कंगन 

रिश्तों में भर देता स्पन्दन 

बहना को अपने भैय्या में  

मिल जाते हें अदितिनन्दन!


 कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं 

जो रब के बनाए होते हैं 

 वे बेहद अनुपम होते हैं 

मधुरम से मधुरम होते हैं।


भाई और बहिना का  नाता 

एक फर्राता हुलसाता नाता 

सावन की पूनम के दिन वो 

रक्षाबन्धन  बन  कर  आता।


हर बहना अपने भैय्या को राखी की याद दिलाती है 

हाथ में धागा बाँधती है, माथे पर तिलक लगाती  है।


 साखी = साक्षी, गवाह।


सबको रक्षा बन्धन की बधाई 

अजित सम्बोधि 

Thursday, August 7, 2025

अब का सावन

 अब का सावन बड़ा ही सुहाना रहा 

नाख़ुश होने का न कोई बहाना रहा 

बहारों  की  झड़ियाँ  बरसती  रहीं 

 अब्र- ए- बाराँ  मेरा  सिरहाना  रहा।


मैं हँसता  रहा  और वो  हँसाता  रहा 

वो बरसता रहा मैं खिलखिलाता रहा 

 मुसलसल  फुहारों से  नहलाता  रहा 

मैं नहाता रहा  गुनगुन  गुनगुनाता  रहा।


कभी दम साधे मुझको बहकाता रहा 

कभी कड़क कर मुझको डराता रहा 

 कभी बिजली बनके चौंधियाता रहा 

मैं दम साधे मन ही मन मनाता रहा।


 तुम्हारी याद मुझको सताती रहेगी 

तुम्हारी कमी मुझको खलती रहेगी 

रुआँसे  मन से तुम्हें  बिदा कर रहा 

तुम्हारी याद में आँखें बरसती रहेंगी।


 अब्र- ए- बाराँ = बारिश से भरी घटायें।

 मुसलसल = लगातार।


  तुम्हारा दिलबर 

अजित सम्बोधि 

 

Friday, August 1, 2025

सावन में साँवरिया

जब जब बरसे बादरिया 

मैं बन जाता बावरिया 

जब जब सुनता बाँसुरिया 

मैं याद करूँ साँवरिया 

  सावन मुझे भिगोता है साँवरिया मुझे सँजोता है 

 जोड़ा सावन साँवरिया का मन में प्यार पिरोता है।


साँवरिया ऐसा बाजीगर 

दिन में बन जाता जादूगर 

रात में जब मैं सोता हूँ 

तब जाके होता उजागर 

दिन में बादल बन के बरसता रात को रोशन होके बरसता 

 ऐसी बनी जुगलबंदी ये, कोई देख  न  पाया मुझे तरसता।


 ये जो सावन की फुहारें हैं 

क्या ये प्यार की छिटकारें हैं?

 साँवरिया की बंदनवारें हैं?

 या  मुहब्बत की जागीरें हैं?

 मैं बताऊँ तुम्हें ऐ मेरे दुलारे, ये इस बंजारे की मनुहारें हैं 

 सुन साँवले साँवरिया, ये एक तड़पते दिल की पुकारें हैं।


क़दीम मुरीद 

अजित सम्बोधि 

 

Wednesday, July 30, 2025

अरावली की वादियाँ

 ये अरावली की वादियाँ हैं 

 यहाँ वीथियाँ हैं कुंजगलियाँ हैं 

लहराती पगडंडियाँ हैं 

भूलभुलइयाँ नहीं है।

 

ऊँची ऊँची चोटियाँ हैं 

भेड़ें हैं भेड़वालियाँ हैं 

छोटी छोटी मींगड़ियाँ हैं 

पेस्टिसाइड वाली नहीं हैं।


 ग़ुलज़मीं है रानाइयाँ हैं 

 कलियाँ हैं फुलझड़ियाँ हैं 

 अन्ना हैं पॉलीअन्ना हैं 

दोनों की गलबहियाँ हैं।


 ये सावन की फुहारें हैं 

कुछ मचलती बहारें हैं 

मेरी नज़रों के नज़ारे हैं 

पसन्द आयें तो सबके हैं।


 ग़ुलज़मीं = फूलों की क्यारियाँ।

रानाइयाँ = सजावटें।अन्ना = शालीनता।

 पॉलीअन्ना = ख़ुशमिजाज़  वाली।


 ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Sunday, July 20, 2025

अरावली की वादियों में फ़िर से दस्तक

पहले भी यहाँ आया, कुछ  ख़्वाब यहीं  भूल  गया 

आज उनसे रूबरू होने  को, मैं  फ़िर  से  आ गया।

 

ये कचनार का पेड़, मेरा गवाह 

ये वहीं खड़ा है, रस्ते पे निगाह 

  मानता है मुझको  अपना ही 

इसीलिए  रखता है  मेरी चाह।


ये वादियाँ हैं या कोई साज़ है 

इन वादियों में मेरी आवाज़ है 

 मैं प्यार से आवाज़ लगाता हूँ 

ये  करने  लगती  रियाज़  है।


वो आसमान देखिए क्या कर रहा 

मुझे अपने आगोश में लिए ले रहा 

इतना प्यार तो किसी ने नहीं दिया 

जितना  ये  बयाबान मुझे   दे रहा।


आज क्या आगया मैं यहाँ फ़िर से 

 लगता है सारे सावन लौटे फ़िर से 

 सोचिए ज़िन्दगी में ग़र सावन न हो 

क्या मतलब है जनम  लूँ मैं फ़िर से।


मैं बरबख़्त हूँ मेरा ख़ैरख़्वाह मुझे लेके यहाँ आ गया 

रब का ममनून हूँ वो मेरा हमदम बनके यहाँ आ गया।


 रूबरू = आमने सामने।रियाज़ = practice. 

आग़ोश = embrace. बयाबान = जंगल। 

बरबख्त = fortunate.ख़ैरख़्वाह = भला चाहने वाला।

 रब = ईश्वर।ममनून = thankful. हमदम =दोस्त।


ओम शान्ति: 

अजित सम्बोधि 

Friday, July 18, 2025

मनभावन है ये सावन

सावन  को दिल दे दिया, सावन ने दिल दे दिया 

 मौका मुहब्बत का हमें, फ़िर मौसम ने दे दिया।


ये सौदा बुरा नहीं है 

कोई ख़फ़ा नहीं है 

बेहद तपिश थी गो 

नतीजा बुरा नहीं है 

ये राज़े मुहब्बत है आ आ के बचा दिया 

 दस्तूरे फ़लसफ़ा ने किरदार निभा दिया।


 बैठा था कब से ग़मगीन  

अश्कों के  सागर में लीन 

 बारिश की झड़ी लगाकर 

  आब ए चश्म उठा लिया 

मनभावन है ये सावन, मैंने दीदार कर लिया 

जो तसव्वुर में था  मेरे, रूबरू  कर  लिया।


 ये सावन बड़ा आला 

जैसे पूरा भरा प्याला 

गरमी से  देता राहत 

जैसे भूखे को निवाला 

बादल को मुहब्बत है, ज़मीं को भिगो गया 

सावन को मुहब्बत है, फ़िर मिलने आ गया।

  

गो = यद्यपि। किरदार = role. आब ए चश्म = आँसू।

  दीदार = दर्शन। तसव्वुर = कल्पना। रूबरू = सामने।


 ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Saturday, July 12, 2025

सावन आ गया

सावन का महीना आगया, झूलों का मौसम आगया 

ज़मींन महकने लग गई, आसमान चहकने लग गया।


सावन की बहारें आ गईं 

 गुमनाम बहारें  छा गई 

 बौछारों की झड़ियाँ लग गईं 

 फुहारों की लड़ियाँ झूल गईं 

पेड़ों पे निखार आ गया, रंगत में उछाल आ गया 

 पत्तों में खुमार आ गया, फूलों पे शबाब आ गया।


शम्स का तेवर  पलट गया 

हवा का मिज़ाज बदल गया 

गुलशन जो सूख चला था 

दुलहन के जैसा सज गया 

 बादल का ढंग बदल गया, घटा बनके आ गया 

मौसम जो बदरंग था, रूमानी बन के आ गया।


 अम्बर में परिन्दे छा गये 

 फ़िज़ाएँ बदलने आ गये 

सुनसान  पड़ी हवाओं में 

चहचहाहट ले के आ गये 

 सावन क्या आ गया,  नया मज़मून लेके आ गया 

 हर इन्सान के चेहरे की, इबारत बदलने आ गया।


 गुमनाम = unknown. ख़ुमार = intoxication.

 शबाब = तरुणाई। शम्स =  सूरज। गुलशन = चमन।

रूमानी = romantic.  मज़मून = मूल लेख, मुख्य बात।

इबारत = इमला, script.


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Thursday, July 10, 2025

गुरु पूर्णिमा 2025

मैं सोया करा रात भर, तुम साँस ढोया करे रात भर 

कौन करेगा प्यार इतना तुमने किया है जैसा उम्र भर।

तुम्ही मेरा दाता 

तुम्ही हो नियंता 

तुम्ही मेरे करता 

 तुम्ही भवितव्यता 

हर सुबह सूरज बनके उठाते रहे, अपने अंक में भर 

 कौन है सिवाय तुम्हारे ऐसा मददगार , हे विश्वम्भर।


तुम्ही हो मेरे रहबर 

तुम्ही हो मेरे दिलबर 

मैं रहता रहा बेख़बर 

तुम रहे सदा ही मोतबर 

मैं जो फ़क़ीर हूँ, क्या करूँ तुम पर  मैं निछावर 

एक तेरे नाम के सिवा कुछ नहीं पास, हे गुरुवर।


बना  दो मुझे बे-ज़रर 

करदो मुझे मुक़र्रर 

अपना नामाबर 

भेज  दो मुझे दिसावर  

ये जिस्म तुमने दिया, बना दो इसे  यायावर 

बख़्श दो ऐसा हुनर, गूँजता फिरूँ बनके भँवर।


रहबर = राह दिखाने वाला।दिलबर = प्रिय।

मोतबर = भरोसेमंद।बे-ज़रर = बुरा करने में अक्षम।

 मुकर्रर = नियुक्त।नामाबर = डाकिया।

दिसावर =  परदेस।यायावर = ख़ानाबदोश।


ओम  जगतगुरूं नमामि 

अजित सम्बोधि 

Saturday, June 21, 2025

योग दिवस 2025

कहते हैं  आज योग दिवस है 

भला इसमें क्या असमंजस है 

योग एक ऐसा पूर्ण  विधान है

जो दायमी है, बेहद मुकद्दस है।


योग तो एक शाश्वत विधा है 

जो दूर कर देती हर दुविधा है 

जिस्म को  रूह से मिलाने की 

सभी को उपलब्ध ये सुविधा है।


हर दिवस ही योग दिवस है 

सबके लिए ही ये सरबस है 

जिन्हें रूह से रूबरू होना है 

उनके लिए  अहम ढाढ़स है।


योग का अर्थ  होता है  जोड़ना 

ज़रूरी है इस बात को समझना 

एक रास्ता जो रूह तक जाता है 

योग से है उस रास्ते को खोजना।


दायम = eternal. मुकद्दस = पवित्र।

सरबस = सर्वस्व। रूबरू = सन्मुख।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 


Thursday, June 12, 2025

मेरा चाँद और मैं

आसमान साफ़ था 

सामने चाँद था 

मध्य रात्रि का वक़्त था 

शायद दूसरा पहर था 

 चाँद में सुहास था 

मौसम में सुवास था 

 कुछ ऐसा एहसास था 

बल्कि पूरा विश्वास था 

पक्षी का परिहास था 

 श्वास निश्वास था 

हवा बह रही थी 

और कह रही थी 

मिलने का यही 

तो वक़्त है सही 

चलो एक गीत गुनगुना लें

कुछ पुरानी यादें दुहरा लें 

जब भी हम मिले थे 

हम दोनो अकेले थे 

भीड़ भाड़ से अलग 

उखाड़ पछाड़ से अलग 

 चाहे भीड़ हो 

या भाड़ हो 

दोनों में क्या फ़र्क़ है 

दोनों ही ज़र्कबर्क हें 

भाड़ में भभकते हें 

भीड़ में  भोंकते हें 

यहाँ सुकूत था 

आसमाँ अभिभूत था 

मौसम का मज़मून था 

चाँद का जुनून था 

शोशा अफ़लातून था ?

 नहीं, सब पुरसुकून था!

 चाँद गोलमोल था 

पूरा सुडोल था 

करता कलोल था 

अमोल था अनमोल था।


ज़र्कबर्क = तड़क भड़क। सुकूत = शान्त।

मज़मून = लेख। जुनून = गहरी रुचि।

 शोशा = चुटकुला। अफ़लातून = Plato.

 पुर सुकून = चैन से भरपूर।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि।

Tuesday, June 3, 2025

दिखते हो तुम

 ये ना समझना मैं चला जाऊँगा 

मैं  तुमको  तुम्हीं  से ले के रहूँगा 

चला हूँ मैं अब तक जितने क़दम

आसमाँ ने देखा किया दम ब दम

पर आसमाँ से अलग हो क्या तुम?

 जिधर देखो उधर दिखते हो तुम!


तुम्हारे  जैसा अलबेला  तो  हूँ नहीं 

सबको पसन्द आऊँ नवेला भी नहीं 

दिखने  में तो अकेला ही दिखता हूँ 

 लुकाछिपी में  ऐसा ही  दिखता हूँ 

 किसी को कैसे बताऊँ कैसे हो तुम 

हर पल निराले रंग में दिखते हो तुम!


पूछते हो कि मैं क्या किया करता हूँ?

तो मैं बताऊँ कि मैं इबादत करता हूँ 

अक्सर तो फ़रियाद किया करता हूँ 

कभी कभी मैं रोने भी लगा करता हूँ 

मैं कहता हूँ कि मैं रो रहा हूँ और तुम 

सिर्फ़ सिर्फ़ मुस्कराते दिखते हो तुम।


 ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Thursday, May 29, 2025

I say be a songster!

You are a  prankster 

You   are   a  funster 

Sometimes a punster 

I  say  be  a  songster!


I wish I were merry 

But  I  am  so  sorry.

You  Humpty Dumpty

Please be  hunky dory!


Why  are  we   here?

Who  is  happy here?

Do you hear our sighs?

Have you  ears to hear?


Why are you in hiding?

Our time we are biding 

& what  are you  doing?

You  keep   on   chiding!


I have been to whirls

I have been  to twirls 

But I am just helpless 

After all those  swirls!


Yes I mean  luminous

Lambent and lustrous. 

All tunnels & channels

Glorious  and obvious!


I  am  at  the  fag  end 

With nil on each hand.

Can you  come  to  me 

For    a    shake    hand?


every moment yours

ajit sambodhi 

Saturday, May 17, 2025

All happens with his nod!

Whether  it is good  or bad 

Whether one is jolly or sad

Whether  it is  hot or cold 

Whether it’s silver or gold 

Whether it is odd or mod 

All happens with his nod!


Whether it is  right or wrong

Whether it’s jingle or a song

Whether it’s soulful or doleful

Whether it is cupful or half full 

Whether it’s awed or lot of sod

All   happens    with   his   nod!


Nothing ever  goes  against you

Good & bad happen to help you 

It mayn’t look immediately good 

It’s going  to be  ultimately good

Didn’t you fall while you trod?

All   happens   with   his   nod!


Always be  full of gratitude

Gratitude is just pulchritude

Even in  times  of  turpitude 

Gratitude is full of beatitude

Whatever comes, learn to nod

All   happens   with   his   nod!


Om Shantih 

ajit sambodhi 

Tuesday, May 13, 2025

शामे ग़म

 देख  कर के  ये हालत मेरी 

कहीं तेरा दिल न दुखने लगे

 मुझे डर है ए आसमाँ ये कि 

किसी दिन तू भी रोने न लगे।

          अब कैसे सम्हालूँ ख़ुद को कोई तो ये बता दे 

           इन ग़मों के दरमियाँ मुझे मुस्कुराना सिखा दे।


अब देखो न किस  तरह से ये 

शाम ए ग़म सिमटता  ही नहीं 

हर  तरफ़  छाया  अँधेरा घना 

दिया जलता कहीं दिखता नहीं।

          क्या कुछ जियादह माँग रहा हूँ तू ये बता दे 

          यही तो कह रहा हूँ मुझे कुछ रोशनी दिला दे।


मेरे  ऊपर  थोड़ा ये  करम करदे 

ग़म से ग़म को मिटाना सिखा दे 

या लपेट के मुझे अपने दामन में 

इन ग़मों को  मुस्कुराना सिखा दे

          मैं जानता हूँ तेरी फ़ितरत तू कुछ भी कर दे 

          तो फ़िर पहिले मेरी ख़ुदी को ही तू मिटा दे।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Sunday, May 4, 2025

मैंने तुमको पहचान लिया है

मैं गिर रहा था किसने थामा था मुझे?

अपना समझ किसने उठाया था मुझे?

मानोगे नहीं कि तुम थे वहाँ पे, पर मैं 

अजनबी था तो कैसे पहचाना था मुझे?


वो कैसी आतिशबाज़ियाँ हो रही थीं?

वो कैसी  फुलझड़ियाँ  बरस रहीं थीं?

कभी सब्झ, गुलरू तो कभी नीलफ़ाम 

सब मुझ से  लिपटे  चली जा रहीं थीं?


हाँ अब  मैंने  तुमको  समझ  लिया है 

सच कहूँ तो मैंने तुमको  देख लिया है 

तुम कितना भी भरमाया करो मुझको 

मैंने तुमको  बख़ूबी  पहचान लिया है!


सब्ज़ = हरी। गुलरू = पुष्पमुखी।नीलफ़ाम = नील वर्ण।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Tuesday, April 29, 2025

रोशन करता चलूँ!

 मैं अँधेरों को  रोशन करता चलूँ 

मुश्किलों को हरदम थकाता चलूँ 

 ज़िद है मेरी कि मैं सम्हल के चलूँ 

ख़ुद ब ख़ुद ख़ुदको, मिटाता  चलूँ!


 सितारों से  कदम  मिलाता चलूँ 

 शाख़ को गुलों  से सजाता  चलूँ 

हर  शै  को  हरदम  निभाता  चलूँ 

हर आह को  इबादत  बनाता चलूँ!


 ख्वाबों को ख्वाबों से जुटाता चलूँ 

 ठोकरों को लबों से पुचकारता चलूँ 

इसको किस्मत कहूँ या तेरी क़ुर्बत 

तेरे ही सपनों से सपने  बुनता चलूँ!


 खुदको = अहं को।  गुल = फूल।

शै = चीज़, स्थिति। इबादत = पूजा।

लबों = होठों। क़ुर्बत = निकटता।


 ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Saturday, April 26, 2025

welcome to the rising sun!

Ever  welcomed  the rising  sun?

It’s not only early morning  fun!

It’s an extravaganza, to observe 

Fear, stress & anger, on the run! 


When the  sun pours  its treasure

Into you, in such  great  measure!

Every pilferer receives a  big jolt 

Rushes pell-mell, quitting leisure!


Your body gleams, sterling  pure!

Full of  all the  things that assure!

Body attains to highest vibrations!

Love compassion gratitude endure!


Om Shantih 

ajit sambodhi 

Monday, April 21, 2025

God Nods!

          GOD  NODS

You breathe in  when  he nods

You breathe out when he nods

You go to sleep when you will 

But he doesn’t  forget his nods!


Raise your hand to drink water 

Or to wipe  when you  perspire 

Don’t forget,  without his  nods

Nothing  is  going   to  transpire!


Things  happen  when  he   nods

Things  happen  when  god  nods

Never  forget  to  offer  gratitude 

You are alive because of his nods!


Om Shantih 

ajit sambodhi 

Saturday, April 12, 2025

मुझे ऐसी रुखसती चाहिये

 मेरे  जाने  पे  न  मातम  मनाना 

कुदरत का दस्तूर है आना जाना।

ये हक़ीक़त है इसे भूल मत जाना 

मेरी रज़ा से  हो रहा है मेरा  जाना।


 मेरा  मज़हब  है  गले  से  लगाना 

 मेरी  फ़ितरत  है  तस्लीम  करना।

मैं बादल हूँ, मेरा निशाँ  मत ढूँढना 

हो  सके  तो  बस  ख़ामोश  रहना।


मेरे  जाने  पे   न   मरसिया   गाना 

 न  अपनों   को  नाहक  में रुलाना।

 ये   कारवाँ   यूँ  ही  चलता  रहेगा 

न   गुज़रे  ज़माने  पे  आँसू   बहाना।


मेरे  जाने  को   मुक़द्दस  ही   रखना 

 मुझे   हुज्जूम   से   दूर   ही   रखना।

मैं    भीड़    का    इन्सान    नहीं    हूँ 

चुनिन्दा  नज़रों   से  रुख़सत   करना।


 मेरी  राख   को   न  दरिया  में  बहाना 

बहर ए नूर में नहाता हूँ  ये  याद  रखना।

 ये  जिस्म  क्या  है?  ख़ाक  ही  तो  है? 

जब  ख़ाक  है तो  सुपुर्द ए ख़ाक करना।


मुझे रस्मों, रवाज़ों की, आवाज़ न बनाना 

ये तीया, बारवाँ जैसी रूढ़ियाँ, न निभाना।

मेरी बारात में मेरे समेत कुल नौ इन्सान थे 

आख़िरी दफ़ा भी मुझे मेरे माफ़िक़, रखना।


 सफ़र   पे  निकलना   है,  तय्यार  हूँ  मैं 

वक़्त  की  पेशगोई  को,  पहचानता हूँ मैं।

 सभी  को  गुज़रना  है   इस  रहगुज़र  से 

है  ये कुदरत  का  दस्तूर,  वाक़िफ़  हूँ  मैं।


 सभी   को   अलविदा   कह   रहा  हूँ   मैं 

तहे दिल से शुकराना  अता कर  रहा हूँ मैं 

ये   ज़िन्दगानी   तो   नेमत   है    रब   की 

रब   को  भी   तस्लीम   कर   रहा   हूँ  मैं।


फ़ितरत = प्रकृति। तस्लीम = प्रणाम।

मरसिया = शोक गीत। मुक़द्दस = पवित्र।

हुज्जूम = भीड़। चुनिन्दा = चुनी हुई।

बहर ए नूर = प्रकाश का समुद्र।प्रकाश की गंगा

में रोज़ नहाता हूँ ।गंगा में राख बहाने मत जाना।

मुझे कर्म कांड बिल्कुल नहीं भाते।

सुपुर्द ए ख़ाक = मेरी राख़ तुलसी में डाल देना।

पेशगोई = क्या होना है उसे पहचान लेना।

रहगुज़र = रास्ता। अता = देना। नेमत = gift.

ये आख़िरी ख्वाहिशें हैं। पूरा करना फ़र्ज़ बनता है।


ओम शान्ति:

अजित सम्बोधि।

Friday, March 28, 2025

वही 22 मार्च

 हाँ वही 22 मार्च 

जब मेरा रहबर  चला गया 

रहगुज़र   सूना   रह   गया।


 तुम जो न मिलते गीत न मिलते 

फूल  ये  मन  के, कैसे  खिलते 

बिन   गाये   ही   मैं   रह   जाता 

तुम  जो  न  आके  यूँ  मुसकाते।

 

तुम जो न मिलते ख़्वाब न मिलते 

तन्हा   दिन   मेरे,    कैसे    कटते 

आँखे      सूनी      सूनी      रहतीं

तुम    जो   मेरे    पास   न    होते।


 तुम जो  न  मिलते  दर्द न  खुलते 

अनजाने      में      अन्दर     घुटते 

जीवन      मेरा      बंजर      रहता 

अपना सलीका न तुम जो सिखाते।


रहबर = रास्ता दिखाने वाला।

रहगुज़र = रास्ता।


भूली बिसरी यादें 

अजित सम्बोधि

Friday, March 14, 2025

Holi is Holy

 Holi is just another name for fun

No festival displays  so much fun

It’s  open  for  all, young  and  old

Even a child  enjoys  the  holi  gun.


People open their arms ‘n’ embrace 

They bury dead past, leave no trace. 

A   pinch  of   red  is  all  the  charm

They anoint the other  with so grace.


I wish  everybody, the  funniest  Holi

Holi is, as the name sings, really holy

Play it with  bright and fragrant abeer

Its aroma is lilting, shall make ye jolly!


Wish everyone happy and aromatic Holi

Ajit Sambodhi

होली मिलन

 मौसम ने लेली करवट, खुशियाँ मना रहे हें 

जिसको हें कहते होली, वो  हम  मना  रहे हें।


कलियाँ हें मुस्कुराती, भँवर  गीत  गा  रहे  हें 

किलकारियाँ जम गई थीं, अब सुन पा रहे हें।


आसमाँ झुकने लगा है, तारे खिलखिला रहे हैं 

 रातों की ये मुसालमत, फ़िर से देख  पा रहे हें।


किसलय हें फूटते जब, होली का  होता  आना 

अंकुर उकरते  मन में, अपनों  का  होता  आना।


होली मिलन का सपना, हर  कोई  देखा  करता 

मिलते  हैं  रूँठे  कैसे, नज़ारा  भी  देखा  करता।


तासीर ए गुलाल ऐसी, हर कोई  हँसने  लगता 

खुशबू ए अबीर ऐसी, हर कोई महकने लगता।


सुनसान फ़लक के नीचे, हूँ  रहता  तन्हाई में मैं 

मन  के  इक  कोने  में बसाके, रखता  होली  मैं।


मुसालमत = सन्धि करना जैसे तारों ने करी हुई है।

किसलय = नये पत्ते। तासीर ए गुलाल = गुलाल 

की प्रक्रति। ख़ुशबू ए अबीर = अबीर की ख़ुशबू।

फ़लक = आसमान। तन्हाई = अकेलापन।


सभी को होली की शुभकामनाएँ 

अजित सम्बोधि 

Wednesday, March 5, 2025

A Cascade of Colours!

When you close your eyes, what do you see?

Most likely it’s a dark curtain that you’ll see.

Dark is black and  black has  zero  frequency 

Yes black is dead. It possesses  zero vibrancy.


Black is wed to dead and dead to  being glad

Got to pull back the curtain, if you aren’t mad.

The only  way out is to work  on your chakras

Turn on the chakras if you don’t want to be sad.


The first chakra is red like it is  the rising sun

It sits at the bottom with lot of strength to stun!

When you need an extra force it stands by you

It is called muladhar and helps in the long run.


The second chakra is orange like it’s orange sun

It helps in extending  your presence, just for fun!

It’s called swadisthan that translates established

In the self. Yes, self not Self! Remember the pun!


The third chakra is yellowish like the fading moon 

It fosters haste, doing everything speedily and soon.

It’s manipur sitting  at the top  of the  lowest  region

In matters of nagmani, bullies make two-bits  croon.


We are at the limits of the familiar, the physical region

Hardly anyone tries to peep into the adjoining domain 

Some day you do come across a soul straining its neck.

The lucky one is stunned locating the lush green region!


This is the terrain of anahat, the heart of unstruck sound 

The physical is ended; the metaphysical takes the ground. 

Now the rules of the game change to navigate you further 

So that one morn you might coo with the soundless sound!


Yes you have reached the vishudh chakra to get purified 

Its krishna blue enjoins on ajna chakra you aren’t denied 

Assent to enter into the  realms of your  loved destination 

Wherein, oceans of lights wait for you  to  get  sanctified!


Ya, this is sahasrar where blaze lights of the thousand suns

The blaze allows no colouration. Pure white is what it guns.

It’s not hot, dazzling it is, your ego gets dissolved for good.

When you come out you are a different breed: son  of  suns!


self = common notation for ego.

Self = it’s used for soul.

nagmani = it’s symbolic of dubious desires.


Om Shantih 

Ajit Sambodhi

Tuesday, March 4, 2025

दुआ दे रहा हूँ

 मैं भूल भी जाऊँ तो क्या होगा 

रब को तो  सब कुछ याद है न 

मेरी   भला   क्या  औक़ात   है 

रब की  रज़ा  तो  क़ायम  है  न।


ये जो रिश्ते हैं अभी के तो नहीं हैं 

ये रिश्ते तो जन्मों से चले  आ रहे 

हम भूलते  रहे हें  तो क्या हो गया 

रूहें   नहीं   भूलतीं   ये   याद  रहे।


तुम दोनों के रिश्ते भी पुराने रहे हें 

रुहों  से  ये  जिस्म  सजते  रहे  हें 

न   तुम   थे  जुदा  न   होगे  जुदा 

बस जिस्मानी  चोगे बदलते रहे हें।


जीवन  की  नदिया  बहती  रही  है 

दो  किनारे  हमेशा  से  चलते रहे हें 

तुम्हारी  ये   नाव   चलती   रही   है 

रब के इशारे से हर काम होते रहे हें।


तहे दिल  से दोनों  को दुआ दे रहा हूँ 

बहारों   को   ये   पैग़ाम  दे   रहा   हूँ 

ख्वाबों   को    तुम्हारे    सजाते    रहें 

रब  से  भी  ये  ही  दुआ  कर  रहा  हूँ।


तुम दोनों को मुबारकबाद 

पापा 

Wednesday, February 26, 2025

शिव रात्रि 2025

 तुम अगर अपने शिव को पहचान लो 

शिव को मनाना ज़रा भी मुश्किल नहीं।

तुम अगर अपनी साँसों को पहचान लो 

शिव तक का सफ़र क़तई मुश्किल नहीं।


तुम अगर मानो तो उपवास  ज़रूरी नहीं 

तुम अगर जानो तो व्रत की  हुज्जत नहीं।

लम्बी दूरियाँ तय करना भी लाज़मी नहीं 

सच तो ये है वो तुम से, अलग है ही नहीं।


अपनी साँसों को समझने की कोशिश करो 

हाँ इनको पढ़ पढ़ कर आज़माइश तो करो।

साँसो की इबारत में एक अजब सा जादू है 

जब साँस थिर हो जाए, उसकी आस  करो।


शिव थिर हुआ शून्य बन गया, शुभ बन गया 

ख़ुद को मिटा दिया और वो शक्ति बन गया!

ख़ुद को मिटा लेना, समझ जाओगे कैसे वो 

शिव से शम्भो, तत्पश्चात, शाम्भवी बन गया!


शाम्भवी, अर्थात, सभी कुछ सम्भव हो गया 

जो असम्भव सा था वह भी सम्भव हो गया।

इस सृष्टि और स्रष्टा का दृश्य बदल गया 

जो ख़ुद को कर्ता कहता रहा, दर्शक हो गया!


 जय शिव शम्भो!

अजित सम्बोधि 

Friday, February 14, 2025

14 Feb 2025

 क्यों याद आती है 14 फ़रवरी 

हाँ जो हुआ करती थी रस भरी।

आज भी तो आगई है वो  मगर 

ये आँखें  क्यों हें यूँ, आँसू  भरी।


कैसे बीतते  हें ख़ुशबख्शी के दिन 

हज़ारहा दिन भी लगते हें एक दिन।

अब क्या बेड़ियाँ  पड़ गई  हें इनके 

बमुश्किल गुज़रता है एक एक दिन।


क्या दुनिया बनाई है ऐ मालिक तूने 

क्या है ऐसा जो न बनाया इसमें तूने।

क्या इतना हक़  नहीं हमें  जानने का 

क्यो छुपा के रख  लिया ख़ुद को तूने?


तू दिखता तो तुझसे फ़रियाद तो करते 

तेरे रूबरू दिल की  बातें तो बयाँ करते।

तुम तो ग़मख़्वार हो, हमे पूरा एतिबार है 

तेरे दरपेश  होते, हमें तग़ाफ़ुल  न करते।


ख़ुशबख्शी = ख़ुश क़िस्मती। हज़ारहा = हज़ारों।

बमुश्किल = मुश्किल से। ग़मख़्वार = हमदर्द।

दरपेश = रूबरू = सामने।तग़ाफ़ुल = ignore.


ॐ शान्ति:

अजित सम्बोधि 

Saturday, February 8, 2025

Happy Birthday Arunima!

 One more  year, one  year  more

We are again here, for to be sure!

Nice to hear the ringing bells again

I only blinked and found I was here!

Happy birthday to you Arunima!

Happy birthday to you Arunima!


We move on but what’s that moves on?

Put the finger on whatsoever moves on!

Can we do so? Is it at all possible to do?

As we age, don’t we say we’ve moved on?

Happy birthday to you Arunima!

Happy birthday to you Arunima!


Yes that which  moves on is  called our  age

We keep on gazing while all we do is to age!

You can count your age like rings on the tree

We are useful like a tree,  doubling as a sage!

Happy birthday to you Arunima!

Happy birthday to you Arunima!


Let’s  make  merry  and  dance  our  way 

Don’t curse or regret, just blink your way!

Whatsoever happens, happens for our good 

Just flow with the flow and sway and sway!

Happy birthday to you Arunima!

Happy birthday to you Arunima!


Bless you Arunima 

Nana 

Sunday, February 2, 2025

बसन्त पंचमी 2025

 बसन्त आ गया यानि कि बस अन्त आ गया!

अच्छा! भला  बताओ तो  किसका अन्त आ  गया?

 मुफ़्लिसी का  या कि फ़िर बे-इन्तिहाई नफ़रत का ?

क्या मज़्लूम का दौर ए बेहिसाई ख़त्म होने आ गया?


क्या निर्भया को लूटने मारने के दौर का अन्त आ गया?

क्या मणिपुर जैसी  नंगी परेड होने  का अन्त आ गया?

क्या वाक़ई सख़ाफ़त हार गया, सख़ावत  जीत  गया?

ऐसा दिन  जब  आयेगा, मैं माँन  लूँगा, बसन्त आ गया।


कुदरत ने अपना फ़र्ज़ बख़ूबी अपने वक़्त पे निभा दिया 

शिशिर की सर्द हवाओं को धीमा होने का हुक्म दे दिया।

क्या इन्सान भी  अपनी फ़ितरत में  तब्दीली ला पाएगा?

ताकि दिल पे हाथ रख के मैं कह सकूँ हाँ बसन्त आगया।


मुफ़्लिसी = ग़रीबी। बे इन्तिहाई = limitless.

मज़लूम = जिस पे ज़ुल्म किया जाता है।

दौर ए बे हिसाई = period of insensitivity.

सख़ाफ़त = ओछापन। सख़ावत = उदारता।

फ़ितरत = nature. तब्दीली = change.


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि

Thursday, January 30, 2025

Happy Birthday Dipti!

 Hail to you, Dipti the lighted  one

Happy birthday to you bright one!

Do you know that  you can listen

To the voice  of the  blighted  one?


Can you show me a fruit or veggie 

That  doesn’t make everyone edgy?

Infused  with the  deadliest  potions

Though  the facade looks real sedgy!


You took  the  brunt  of  it bravely 

Vigorously, happily and smoothly!

With  no deep  lines  on your  face

Tend 132 acres of land sagaciously!


It’s like an oasis in a  desert land

I mean your indelible AOF brand!

It’s truly philanthropy  in disguise 

You give organic  without  a band!


Hail to you, Dipti the lighted one!

Who turned barren into arable one!

To feed the helpless, and the feeble 

Happy birthday to you  bright  one!


With warmest greetings to you 

Ajit Sambodhi


Tuesday, January 21, 2025

मेरी बिटिया दिव्या : पचासवाँ जन्म दिन!

 दुआ करता रहता हूँ यही रब से 

न देखूँ चश्मे पुरनम तुम्हें फ़िर से।

यही इल्तज़ा रहती है लबों पे मेरे 

दामन तुम्हारा भरा रहे ख़ुशियों से।


हाँ तुम दिव्य हो, सौम्य हो, भव्य हो

यह अतिशयोक्ति नहीं, तुम श्रव्य हो।

तुमको आबदीदा देखना  गवारा नहीं 

ध्यान रखना कि तुम एक चरितव्य हो।


तुमसे  सुबह  सुबह गुफ़्तगू  जो हो  गई

दिल की तमन्नाएँ मेरी जैसे  पूरी हो गईं। 

पचासवाँ जन्मदिन अच्छे से मनाना बानो 

तुमको देखके दुनियाँ मेरी आबाद हो गई।


रब = ईश्वर। चश्मे पुरनम = नम आँखों में।

इल्तज़ा = प्रार्थना। लबों = होठों।

आबदीदा = आँसूओं से भरा। गवारा = स्वीकार्य।

चरितव्य = जिसका आचरण अनुकरणीय हो।

गुफ़्तगू = बातचीत। बानो = लाड़ली।


जनम दिन मुबारक हो बिटिया

पापा

Wednesday, January 1, 2025

नया साल 2025

वो पूँछते लगे हमसे, नया क्या हो रहा है 

हमने कहा ये उनसे नया साल आ रहा है।


नया साल आ रहा है, नया वक़्त आ रहा है 

ख़ुशियाँ जो थीं पुरानी, उनको भी ला रहा है।


ये ठंड क्या करेगी, नया सूरज निकल रहा है 

समझ लो ठंडे जिस्म में गर्म साँस बह रहा है।


सूरज से मिला आज, लगा वक़्त थम रहा है 

इतनी गरमजोशी थी, लगा दरिया बह रहा है।


बादल आते जाते हें, आसमान मौजूद रहा है

साल बदलते हें, पुर-ऐहसास मसल्सल रहा है।


गुनगुनाता हुआ वो नया साल चला आ रहा है 

अन्दर एक समन्दर गूँज बन के बहा आ रहा है।


ये हक़ीक़त है कि हर वक्त बदलाव आ रहा है 

हम समझें, न समझें, हर वक्त नया हो रहा है।


जिस दिन देख पाएँगे कि मन मन्सूख़ हो रहा है 

असल में समझ पाएँगे कि नया साल आ रहा है।


कभी फ़ुर्सत हो तो झाँक लेना अंदर जो हो रहा है 

वहाँ जश्न  हो रहा है, अलख  जगाया  जा  रहा है!


पुर-एहसास= super consciousness. 

मसल्सल = perpetually.

मन्सूख़ = disband.


नए साल की शुभ कामनाएँ 

अजित सम्बोधि।

New year 2025

 Let  us  find  a  gong

And give to us a song.

Ding dong Ding dong

Ding dong Ding dong.


Let’s  ring in  the song

&  ring out  the  wrong.

Ding dong  Ding dong

Ding dong   Ding dong.


A  new  sun  is   rising 

A new morn is singing.

Ding dong Ding  dong

Ding dong  Ding  dong.


The  breeze  is  brisky 

The    gong   is    tipsy.

Dina dong Ding dong

Ding dong  Ding dong.


It’s a happy rappy new year

It’s near  It’s  here  It’s  dear.

Ding dong Ding dong

Ding dong Ding dong


Wish everyone a happy new year!

ajit sambodhi

Wednesday, December 25, 2024

प्यार का तोहफ़ा

 कितना  अच्छा  लगता  है 

जब पास कोई आ जाता है 

कितनी भी हो तपन जगत में 

मन   शीतल  हो   जाता   है।


प्यार  के तोहफ़े  के आगे 

सब तोहफ़े फ़ीके लगते हें 

जैसे     हीरे     के     आगे 

सब मोती  फ़ीके लगते हें

प्यार मुझे दे दो जग वालो

और न कुछ  मुझे  भाता है।


इक छोटी सी मुस्कान से जब 

कोई मन का  दीप जलाता है 

दिल  के  सारे  दर्द   पिघलते

मन   हल्का   हो   जाता    है 

पलकें  मेरी  हँस  पड़ती  जब 

वो नज़र से  नज़र  मिलाता है।


प्यार के  जादू के  आगे 

सब जादू फ़ीके लगते हें 

प्यार बिना  सब  सूना है 

प्यार से  रिश्ते  पलते  हें 

नाँच सभी लेते हें लेकिन 

रास कन्हैया का भाता है।


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि

Wednesday, November 27, 2024

वो दो घण्टे ( अरावली की वादियों में )

तेरा ख़्वाब मेरा भी ख़्वाब है 

क्यों न कह  दूँ  लाजवाब है 

जो ख़्वाब मैं   न बता  सका 

ये   उसका   ही   जवाब   है।

शादाब    है     नायाब      है 

माहताब  है      आदाब     है।


पेड़ों  से  गल  बहियाँ  चली 

गुलज़मीं  गुलज़ार  हो चली 

जम्बूरात   के   हुज्जूम   से 

 सलामती   मेने   माँग   ली 

ये  ख़्वाब  में  इक  ख़्वाब  है 

बख़ूबी   यहाँ    दस्तयाब   है।


 बतख़ों ने लगाया था डेरा 

मुझे पा के सिमटा वो घेरा 

क्या सूरज सिमट के आगया

 सफेद सरोवर वहाँ बन गया।

प्यार से जियें ज़िन्दगी के लिए 

रानाइयों   में मिला जवाब  है।


आसमाँ  ने   चादर  उढ़ा  दी

मामूनियत की चादर उढ़ा दी

अब  सब महफ़ूज़ हें  यहाँ पे 

तहम्मुल  की  चादर  उढ़ा दी। 

उसी  का   तो  ये  जवाब  है

क्या ख़ूब दायरा ए अहबाब है। 


दो घण्टे  तुमने  बख़्शा  किये

करम है रब  का बख़्शा किये

मेरे  ख़्वाब  बाइस बन  के हँसे

ममनून  तुम्हारा  बख़्शा  किये।

बज  उठा  दिल  का  रबाब  है 

हर सिम्त  ख़ुशियों  का बाब है।


शादाब = हरा भरा। नायाब=unique.

माहताब = चाँद। गुलज़मीं= flower beds. 

गुलज़ार = रौनक़ वाला।जम्बूरात = honey bees.

दस्तयाब = प्राप्त।रानाइयों = सजावटों।

मामूनियत=security. 

तहम्मुल = love. महफ़ूज़ = secure. 

दायरा ए अहबाब = दोस्तों का दायरा।

बाइस=basis. ममनून=thankfulness. 

रबाब = lyre. बाब = दरवाज़ा।


ओम् शान्ति:

अजित सम्बोधि

Tuesday, November 19, 2024

Nod of the Lord

 Let’s watch every nod

Of the Lord 

That pulsates as breath

In beats of life & death.

To understand 

How things unfold!


It’s the nod

From the Lord

That strikes each chord 

Of our heart to applaud!

It makes us wade a ford 

Or else sign some accord.


No one visits us on one’s own 

Everyone is sent by him, alone!

Let’s welcome, not only as a friend 

Let’s greet breath as a kind of herald!

Don’t shrug it off, it’s from the lord

It is not tailwind. Mark! It’s his nod!


Breath is the nod of god

Breath is endlessly broad.

Let’s prod ourself & plod

To see life in a lump of sod.

Breath enjoins us upon god

To let us in the amity of god!


Om Shantih

Ajit Sambodhi

Thursday, October 31, 2024

संग संग थे दीप जलाने।

कैसे भूले वायदे निभाने?
संग संग थे दीप जलाने!

रख लेता मन में  छुपा के 
सपनों के संग में सजा के।
इबादत के लिए  बचा के
दो घड़ी सब को भुला के।
काहे  न आये  तुम बुलाने
संग संग  थे  दीप  जलाने!

कैसा भी हो भले ही नशेमन
वहीं पर तो मिलता है अमन।
वही तो होता दिल का चमन
दिवाली का हो गया आगमन।
इसी बहाने से आ जाते बुलाने 
संग   संग   थे   दीप   जलाने!

हर गोशा मैं खोजा किया 
जा जा के तलाशा किया।
यादों  ने  किनाया  किया 
तेरी मुस्कान मैं ढूँढा किया।
तुम न आए पे दीप जलाने
संग  संग  थे  दीप  जलाने!

ये  मौक़े  न  हर  दिन आने 
बस बरस में इक बार आने।
क्या इतनी भी फ़ुर्सत न थी 
चले आते जो वायदा निभाने?
कब  आओगे  अश्क़  मिटाने?
संग  संग  थे   दीप   जलाने!

नशेमन = घौंसला। गोशा = कोना।
किनाया= इशारा। अश्क़=आँसू।

दिवाली की शुभ कामनायें
अजित सम्बोधि

दिवाली आ गई।

लो वो आ गई, लो वो आ गई 
मुंतज़िर थे हम, लो वो आ गई।
रौशनतर करने के लिए सबको 
आज फ़िर से याद उसे आ गई।
जिसे कहते हें सब दिवाली, वो 
फ़िर से अपनी दिवाली आ गई।

ज़िन्दगी इक सफ़र है सुहाना
साथ  रहते  हुए  हमने  जाना।
ये नेमतें  जो  हमको  मिली हें 
रब दी किरपा है , हमने  माना।
मिटाने को अँधेरे घनेरे आ गई 
अपनी दिवाली फ़िर से आ गई।

दम ब दम हम यों ही चलते रहेंगे 
मालिक तेरा नाम गुनगुनाते रहेंगे। 
गो कि  हम  बहकते  भी  रहते हें 
मुनव्वर  तेरे पास, हम आते रहेंगे।
तू हमारा है , दिलाने याद  आगई
प्यारी दिवाली आज फ़िर आ गई।

मुंतज़िर=इंतिज़ार करने वाला।
रौशनतर= और अधिक रौशन।
दम ब दम= हर दम।गो कि= यद्यपि।
मुनव्वर=ईश्वर।

दिवाली की शुभ कामनाएँ 
अजित सम्बोधि 

Wednesday, October 30, 2024

Festival of Lights!

We call Festival of Lights, Diwali!

It’s the biggest festival beside Holi.

Holi uses colors and Diwali floods

Of lights, to make everybody jolly!


Diwali drives away  all  darknesses 

That everyone one day experiences.

Yes, darkness has so many contours

But light  lights up all  the  recesses!


Light, yes, natural light, is life giving 

Its modes and colors keep on altering.

It may swap  sunning for burning, Or

It may melt the heart, it’s so softening!


I wish everyone a very happy Diwali 

Be he Chandan, Changez, or  Charlie!

Look for this lively wizard inside you 

Where there transpires nonstop Diwali!


Your chum

Ajit Sambodhi

Monday, September 16, 2024

है कोई अपना?

कोई आज तक , छू तक न पाया , अन्दर में मेरे 
सारी ख़ुशियाँ हटा न पाईं उदासियों के साए मेरे ।

इसमें किस को कुसूरवार ठहराऊँ आख़िर में मैं 
उसको या नसीब को? दौनों का तलबगार हूँ मैं।

तंग आगया हूँ मिलते मिलते लोगों के किरदार से
अरसा होगया है मुझको मिले हुए किसी अपने से।

कभी ऐसे ही चले आना, आकर के मिल भी जाना
बहाने बनाकर के तो हरकोई करता है आना जाना।

पता है कितने दिन बीत गए हें मुस्कुराहट देखे बगैर
बस मसनूई मुस्कुराहट दिखाई देती है, यही है ख़ैर।

एक दौर था जब चाँद सुन्दर हुआ करता था, है न?
एक अरसा हुआ अब दाग़दार  लगने लगा है, है न?

तलबगार=तलाश करने वाला।मसनूई= कृत्रिम।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि