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Wednesday, January 6, 2021

तिलोपा ने कहा था

तिलोपा ने नरोपा से कहा था, तुम  बाँस हो जाओ 
जैसे  बाँस खोखला होता है,तुम खोखले हो जाओ।
तुम उसे पा नहीं सकते हो, कभी अपने प्रयासों से
वही आयेगा तुम तक, तुम तो बस तैयार हो जाओ।

तुम एक कण मात्र हो उस पूर्ण के, उस अनन्त के
कुछ नहीं मिलेगा तुमको, नाहक दुस्साहस करके।
तुम से बस अपेक्षित है,तुम स्वयं को खाली कर दो
ताकि वह उतर सके, तुम में, बिना किसी बाधा के।

जब वह अनन्त चैतन्य तुम्हारे अन्दर उतर आयेगा
तुम्हारा हर विचार तुमको त्याग कर, चला जायेगा।
विचार ही से क्रोध, लालसा, मत्सर उपजा करते हैं
विचार बिना तुम कहाँ, सब चैतन्य मय हो जाएगा।

आँखें जब बन्द करोगे, उधर दरवाज़ा खुल जायेगा
चैतन्य प्रकाश रूप में , प्रवाहित करने लग जायेगा।
तुम बनोगे खोखली बाँसुरी, वह बजाने लग जायेगा
स्वर्गिक संगीतमय लहरी तुम्हें , सुनाने लग जायेगा।

कौन बहाता है नदी को, कौन सागर में गिरा रहा है?
कौन चलाता है चाँद को, कौन तारों को घुमा रहा है?
वह करता है इसीलिए चाँद तारे नदी सागर सुंदर हैं
फूल भी सुन्दर हैं क्योंकि वह ही उन्हें खिला रहा है।

जब तुम करते हो तो, संत्रास का उद्घाटन हो जाता है
मन भय ईर्षा मद स्पर्धा क्रोध से आक्रान्त हो जाता है।
हर वक्त मन रहता काँपता, अनिष्ट का डर लगा रहता
उसकी सुन्दर सी बगिया का,कैसा रूप बदल जाता है।

तुम हो लेशमात्र और संपूर्णत्व की करते हो अवहेलना
स्वयं को ही समझने लगे नियंता, ये कैसी है विडम्बना?
उसका जगत कितना सुन्दर है, शून्य बनकर समझना
वह कितना मधुर गाता है, बाधा न बनना, फ़िर सुनना।

जीवन जैसा है अति सुन्दर है, वह नहीं कोई समस्या है
समस्या है तो तुम्हारी हल करने की कोशिश समस्या है।
जीवन धारा बह रही है, बहाने वाला बहाता जा रहा है
तुम  बाँस बनकर बहते रहो, फ़िर नहीं कोई समस्या है।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।



Saturday, January 2, 2021

मौलुकपुत्त और बुद्ध

मौलुकपुत्त एक अभूतपूर्व जिज्ञासु था
बुद्ध के पास ग्यारह प्रश्न लेके गया था।
तुम्हारे हरएक प्रश्न का उत्तर मैं दे दूँगा 
यदि एक वचन दे दो, बुद्ध ने कहा था।

मौलुकपुत्त ने कहा था, वह कटिबद्ध है
आप कृपया बताएं वचन जो भी देना है।
बुद्ध ने कहा था उसे, पुनर्विचार कर लो
ताकि फ़िर न कहना पड़े, संभव नहीं है।

भन्ते ! मौलुकपुत्त एक क्षत्रिय का पुत्र है
वचन देकर न निभाना निपट असंगत है।
मौलुकपुत्त ने इस तरह बुद्ध से कहा था
पुनः पूछा बताएं, मुझे क्या वचन देना है? 

बुद्ध ने कहा था,दो वर्ष तक प्रतीक्षा करो
यहाँ मेरे पास ही शान्त बन कर रहते रहो।
दो वर्ष पश्चात अपने सभी प्रश्न पूछ लेना
मैं अवश्य उत्तर दूँगा, निश्चिंत होकर रहो।

क्षात्र धर्म के हेतु प्राणोत्सर्ग स्वाभाविक है
वह एक क्षण में होजाता है, अतः सुगम है।
परन्तु उत्तर जानने के लिए इतनी प्रतीक्षा ?
पर वह वचनबद्ध था, बोला वह सन्नद्ध है।

एक प्रातः जब दो वर्ष का समय बीत गया
बुद्ध ने कहा था, प्रश्न पूछो, समय आ गया।
मौलुकपुत्त बुद्ध के चरणों पर गिर पड़ा था
आपका उपक्रत हूँ, बिना माँगे सब दे दिया।

प्रश्न तो चलायमान मन में ही उठा करते हैं
जब तक विचार श्रृंखलाएं है, उठते रहते हैं।
एक दिन आता है जब विचार थम जाते हैं
शून्यता के भाव में प्रश्न गिरते चले जाते हैं।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, December 20, 2020

सिकन्दर ए आज़म और डायोजिनीज़

सिकन्दर एक जाँबाज़ जंगबाज़ था
वो जब सिर्फ़ इक्कीस बरस का था
उसने सारी दुनियाँ जीतने की ठानी
वो अरस्तू का ख़ास शागिर्द रहा था।
डायोजिनीज़ से मुलाकात कर लेना
जाते वक्त, अरस्तू ने उससे कहा था।

इसलिए सिकन्दर मिलने को गया था
डायोजिनीज़ रेत पर धूप सेंक रहा था
सर्दी का मौसम था , वह नंगा पड़ा था
उसका कुत्ता भी लेटा , धूप ले रहा था
सिकन्दर बोला, मैं सिकन्दरे आज़म हूँ 
डायोजिनीज़ बड़े ज़ोर से हँस पड़ा था।

उसने कुत्ते से कहा, ये आज़म कहता है
ख़ुद को,अपनी तारीफ़ ख़ुद ही करता है।
सिकन्दर का हाथ तलवार पर चला गया
फ़क़ीर हँसा, बोला, अरे ये  क्या करता है
यहाँ कौन है जिस पे तू तलवार चलायेगा
क्या ज़िन्द ए जावेद को तू मार गिरायेगा?

सिकन्दर ए आज़म हक्का-बक्का हुआ था
वो अब तक ऐसी शख़्सियत से मिला न था
सभी उसके सामने झुक कर मिला करते थे
और यह फ़क़ीर नंगा, मगर शान से पड़ा था
सिकन्दर बोला माँगो, जो चाहते हो, पाओगे
फ़क़ीर बोला, ज़रा हट जाओ, धूप आने दोगे?

कुछ देर हुई सिकन्दर बोला:मुझे अब जाना है
फ़क़ीर ने पूछ लिया : अच्छा तो कहाँ जाना है?
आलमे शहूद फ़तह करने को निकला हुआ हूँ 
वो बोला: अच्छा तो उसके बाद क्या करना है
फ़क़ीर ने पूछा ? उसके बारे में बाद में सोचूँगा 
सिकन्दर ने बताया, शायद मैं आराम करूँगा।

फ़क़ीर फ़िर से हँसा, अपने कुत्ते से कहने लगा
सुनले, ये दुनिया जीत लेगा,फ़िर आराम करेगा
अपुन बिना दुनिया जीते भी आराम कर रहे हैं
अरे सुन ले हमारे झोंपड़े में तू भी समा जाएगा
आजा आजा, छोड़ ये झंझट, अब कहाँ जाएगा
सिकंदर: डायोजिनीज़ नहीं मैं, नहीं हो पाएगा।

आज़म = महान। ज़िन्द ए जावेद = अविनाशी।
आलमे शहूद = सारी दुनिया।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।



Thursday, December 17, 2020

IS THAT SO ?

Hakuin Zenji was known for his piety
He attained satori at the age of thirty.
He became Master at the age of forty
He was distinguished for his propriety.

Once it happened that a girl who spent
Time with him, found she was pregnant.
Questioned by parents who the man is
Amazingly she named the saint , errant.

Enraged parents reproached the monk
Called him names, said he was a bunk.
The monk bore the allegations calmly
He neither okayed, nor did he debunk.

When pressed hard,he said: is that so?
Mad, they abused. He said : is that so?
For parents it meant:do you think I'm so?
While he was asking his guide: is that so?

After a time, girl mother delivered a child
Parents went to the monk, gave the child.
It's your child, look after him, they advised
The priest said nothing and took the child.

So now the monk had to find food for two
It was a hard time,he was passing through.
Mostly it was barbs he got,in place of alms
He had no option,except to intently persue.

It is often very trying to bring up a suckling
He was not made for this, nor had training.
Sometimes the child would holler all night
He would be at his wit's end. It was taxing.

The girl mother could stand it no further
So she disclosed the identity of her lover.
He was fish market help,she told parents
Parents rushed to the saint helter skelter.

They caught hold of his feet and repented
They begged his forgiveness and lamented
They requested him to hand over the child
The saint was silent, their wish he granted.

Throng gone, saint looked out the window
And once again, he muttered: IS THAT SO?
He asked his inner guide:what is this joke?
More jokes in pipeline,he smiled,is that so?
                                      story: courtesy osho

Om Shantih
Ajit Sambodhi.



Tuesday, December 15, 2020

बुद्ध वाणी

बुद्ध के ऊपर किसी ने थूक दिया
बुद्ध ने उसे उत्तरीय से पोंछ दिया।
कहा, क्या कहना चाहते हो, कहो
आनन्द ने कहा, कमाल कर दिया।
जो दंड का अधिकारी है, कहते हो
उससे, क्या कहना चाहते हो, कहो।

बुद्ध ने कहा वो कुछ कहना चाहता है
आवेग तीव्र है अतः कह नहीं पाता है।
वह आदमी चला गया, घर पे रोता रहा
दूसरे दिन बुद्ध के पाँव में गिर जाता है।
आनंद की समझ में कुछ नहीं आता है
बुद्ध बोले जो देते हैं, वही लौट आता है।

आदमी जो देता है, वही वापस पाता है
स्नेह देने वाला बराबर स्नेह ही पाता है।
नफ़रत करने वाला देखता रह जाता है
जो देते हो कई गुना बनके आ जाता है।
न माँगने की ज़रूरत, न कुछ बोलने की
बिना आवाज़ किए ख़ुद चला आता है।

जब किसी के हाथ पर हाथ रख देते हो
बिना कुछ परोसे, बहुत कुछ  दे देते  हो।
जब किसी को गले से लगाया करते हो
बिना बोले बहुत सा कह दिया करते हो।
जो बात ज़ुबान कहने में नाक़ाबिल होती
वही इस तरह बयान कर दिया करते हो।

जब कोई आपके पाँव में आके गिरता है
ये न समझ लें वो आपके आगे झुकता है।
भाषा असमर्थ है, वह बता नहीं सकती है
इसलिए वो उसको प्रत्यक्ष करने लगता है।
वह अपने ह्रदय में एकीकृत होने लगता है
और सार्वकालिक के आगे झुकने लगता है।

एकीकृत=crystallised. सार्वकालिक=everlasting.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, December 13, 2020

Being Spiritual?

A lady once said: I want to be spiritual.
I said: first thing first, leave each ritual.
Spirituality signs itself on a clean slate.
 I want to be spiritual, is but only ritual !

Spirituality vows, you go to the source
No predilections happen on this course.
You don't require any baggage to carry
To be frank, it is a very straight course !

There sits the source in all its versatility
It is all clear, with no trace of ambiguity.
All about it are its myriad manifestations
One can remain entangled in, for eternity.

Being spiritual is as easy as birdwatching
Only you have to keep your eyes smiling.
Be natural and drop away all pretensions
You will be surprised to see you, arriving!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Saturday, December 12, 2020

क़ाबिले ग़ौर?

सुना है, अकबर बादशाह तालीमयाफ़्ता नहीं थे
लोग कहते हैं कि इसलिए वो अच्छे हुक्मरान थे
उन्होंने बड़े क़ाबिल लोगों को नौकरी दे रखी थी
ऐसे नौ इल्मदाँ थे जिन्हें वो नौरत्न कहा करते थे।

ये जो रिवायत है क़दीम ज़माने से चली आ रही है
कि नाख़्वाँदगी शाइश्तगी को नौकर रखती रही है
इल्मदाँ इस बाबत बख़ूबी फ़क्र ज़ाहिर करते रहे हैं
कि रअय्यत हुक्मरानों की हिमायत  करती रही है।

आज भी नामचीन शाइश्ताँ इस बाबत ख़ुश होते हैं
कि हुक्मरान उन्हें मशविरा करने को बुलावा देते हैं
हुक्मरान की क़ैफ़ियत है, हुक्म की तामील कराना
वैसे इस बाबत भी क़ाबिल रज़ाकार बुलवा लेते हैं।

क्या वाक़ई में हुक्मरान और हुकूमत की ज़रूरत है?
क्या वाक़ई सबेरा होने के लिए हुक्म की ज़रूरत है?
जब कि हम अकबर से अक्सरियत तक आ पहुँचे हैं
 क्या हमें इबादत और इत्मीनान की नहीं ज़रूरत है?

क़दीम= पुराने।‌‌ नाख़्वाँदगी = अशिक्षा। 
शाइश्तगी= शिक्षा। क़ैफ़ियत= पहिचान। 
रज़ाकार= स्वयंसेवक।अक्सरियत= बहुमत। 

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, December 10, 2020

अलविदा

आज शाम कुछ ग़मग़ीन है
बैठी है जैसे परदानशीन है
फ़िजा में चहचहाहट नहीं 
माहौल दिखता संगीन है।

दरख़्त भी ख़ामोश खड़े हैं
न हिलने को मानो अड़े हैं
कुछ ऐसा लग रहा है जैसे
वो खुले में ख़ला में जड़े हैं।  

बादलों का एक झुंड खड़ा है
ग़मामा एक निकल पड़ा है।  
पुरनम है उसका रोआँ रोआँ
दरख़्त के ऊपर ही खड़ा है।

ग़मग़ीन होना एक कहर है
 बेनसीबी का एक पहर है
ग़म को बुलाया नहीं जाता
वो हर वक्त हाज़िर दहर है।

अभी अभी एक मैना आई है
एक शाख़ नीचे लटक गई है
एक मैना उल्टी पड़ी है; रस्मे
रवानगी अता कर दी गई है।

ख़ला=शून्य। ग़मामा= बादल का टुकड़ा।
दहर=समय। अता करना = देना।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Wednesday, December 9, 2020

नौन स्टौप सूफ़ीमनिश

ये क़िस्सा है एक ऐसे सूफ़ी फ़क़ीर का
जिसको पता मालूम था रब के घर का।
रहता था नाम की मस्ती में बेफ़िक्र वो
फ़रिश्ता आया , देने इनाम पसन्द का।
पूछा बताओ क्या चाहिए भला तुमको
कहा फ़क़ीर ने कुछ न चाहिए मुझको।

फ़रिश्ता बोला कुछ नेमत तो लेनी होगी
ना लेने पर तो रब की बेअदबी जो होगी।
फ़क़ीर बोला, तुमने तो मुश्किल कर दी
तुम ही बता दो तुम्हारी पसंद क्या होगी?
फ़रिश्ते ने कहा माँगलो तुम्हारे छू लेने से
मरा हुआ भी लौट आएगा वापस फ़िर से।

फ़क़ीर ने कहा इसमें ख़तरे का इमकान है
किसी के भी मगरूर होजाने का कैवान है।
ऐसा करो जिस पर पड़ जाए मेरी परछाईं
खुशहाली मिलेगी, कह दो  ये फ़रमान है।
मैं पीछे में मुड़कर कभी भी देखूँगा ही नहीं
तो मगरूर होने का डर मुझे सतायेगा नहीं।

किस्सा कहता है फ़क़ीर तभी से दौड़ रहा है
बिना रुके मसल्सल आज भी वो दौड़ रहा है।
पता नहीं कितनों को बख़्शी है ज़िंदगी उसने
वो तो बस रब्ब के प्यार में दौड़े ही जा रहा है।
मुहब्बत का पैग़ाम है सिर्फ़ प्यार करते जाना
हिसाब लगाने में तो माहिर है, सारा ज़माना।

सूफ़ुमनिश= सूफ़ी मन वाला। इमकान= संभावना।
कैवान= सबसे ऊँचा आसमान। मसल्सल= लगातार।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Tuesday, December 8, 2020

चवांगतुसे

एक फ़क़ीर था, नाम था चवांगतुसे 
रात में गुज़रता था , कबरिस्तान से।
अँधेरा था, कुछ टकरा गया पाँव से
इंसानी खोपड़ी थी,टकराया जिससे।
खोपड़ी लेकर घर आ गया, साथ में
हर लम्हे, खोपड़ी रखता था पास में।

शागिर्द ने पूछा पास रखने का  सबब
कहा इससे मिलता है सब्र का मशरब।
गुस्सा हो, कहता हूँ अपनी खोपड़ी से
गुरूर न कर, तुझे भी मिलेगा ये तअब।
कोई पत्थर मारे, कहता फ़िक्र ना कर
आगे या पीछे, हश्र तो ये रहेगा होकर।

मशरब=सागर।तअब=चोट।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, December 7, 2020

Enjoying or Rejoicing?

Going distances to declare : "I enjoyed".
Sounds like a child says : "I am buoyed''.
It's fairly common : Running & Running!
Looks as if, there they live , on Steroid !

Enjoying appears to be a mischievous tab.
It says something gladdens,say a sea ebb.
It is out there and it should not be routine.
There ought to be something new, to grab.

To enjoy, there needs be objectification
Of something that invites your attention.
Say, it's the frown of a clown, in your town.
Out there, it can be anything, you mention!

Once I was questioned: 'Are you enjoying'?
I said : "I am helpless. I am just rejoicing!"
To do enjoying, you always need the other.
Even Joying appears better than Enjoying !

When you joy, it is only you who is needed.
Go for the other; in return, you are needed.
In enjoying, the joy comes from the other.
But joy is inside,it comes up when needed.

The Bible declares : Rejoice continuously!
Rejoicing in your heart is simply heavenly!
Rejoicing comprises Joying and Enjoying!
Rejoicing gladdens others, it's so benignly!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Wednesday, December 2, 2020

तवक्को

रूप ढलता गया, सँवारते सँवारते
उम्र ढलती गई, विचारते विचारते
डगर खोती गई, भटकते भटकते
थक चुका हूँ, सम्हालते सम्हालते
क्या मुमकिन नहीं, तू ले सम्हाल
ग़म के साये से मुझे तू ले निकाल।

रात बढ़ती गई, कोई तारा दिखता नहीं
कश्ती चलती रही, साहिल मिलता नहीं
पलकें झपकी नहीं, इत्तिसाल होता नहीं
लुटती रही हर घड़ी, फ़ासला घटता नहीं
ज़िंदगी चलती रही, जीना होगया मुहाल
क्या मुमकिन नहीं, तू ही कर दे निहाल।

मुझको भरोसा है बस, तेरे ही नाम का
मैं तो हूँ शैदाई, तेरे जमाले कामिल का
कुछ तो है जो तू क़ाबिज़ है हर दिल में
आख़िर तू ही तो सहारा हर पामाल का
मुझे आस है तू बेहाली से करेगा बहाल
तवक्को है तू दिखायेगा अपना जलाल।

तवक्को= उम्मीद। इत्तिसाल= मिलन।
मुहाल= नामुमकिन। शैदाई= आशिक
जमाले कामिल = पूर्ण सौन्दर्य।
पामाल= पद दलित। जलाल= तेज।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, November 30, 2020

बद्र का चाँद

देखो बद्र का चाँद खिल गया है
आसमान  में  समाँ बँध  गया है
नज़र उठा  के जो  देखा  है उसे
नज़ारा नज़र के नाम हो गया है।

वो रात का शहंशाह बना हुआ है
फ़िर आज  ताबिंदातरीन हुआ है
जो चाहिए है वही माँग लो उससे
माँगने में तुम्हारा ख़ू छुपा हुआ है।

किरणों की डोर  को पकड़ना है
उसके सहारे चाँद तक  चढ़ना है
ग़लत मानने की ग़लती न करना
ये मुमकिन है इंसान को करना है।

हर एक  इंसान इसे कर  सकता है
वो ख़ुद को बख़ूबी बदल सकता है
जो बाहर है, वो ही तो अन्दर भी है
उसके  पास है, वो पहुँच सकता है।

हाँ, अपना चाँद  तुम हासिल कर लो
वो तुम्हारा ही है, बात करके देख लो
एक बार अगर मिल  लोगे तुम उससे
तुम्हारे दिल में बैठ जाएगा , सोच लो।

बद्र= पूर्णिमा। ताबिंदातरीन= brightest. 
ख़ू= spirit.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Friday, November 27, 2020

तुलसी

सुबह उठके जाता हूँ देखने, मैं अपनी तुलसी
हरी भरी, सुगन्धित, आमंत्रित करती, तुलसी
निस्प्रह, नैसर्गिक, निरुक्त, पुण्यफल प्रदायिनी
निरख कर पाता हूँ, मेरी रूह है हुलसी हुलसी।

कभी जब देखता हूँ मन मेरा हो रहा भ्रांत है
रूह से रह रह कर अलग, हो गया क्लान्त है़
मैं उठ कर के बैठ जाता हूँ तुलसी के पास में
तुलसी को निरख निरख चित्त होता शान्त है।

जो अंग करता सत्संग, तुलसी करती निर्द्वंद है
जहाँ पे भी लाज़िमी होता, हटा देती निर्बन्ध है
ये तो रोग निवारणी, कल्मष हारिणी, शीली है
पशु, पक्षी, मानव, सबसे रखती म्रदु संबन्ध है।

कदम्ब को कृष्ण से हुआ अदभुत अनुराग था
बुद्ध के प्यार में पीपल भी बन गया फ़राग़ था
वर्ड्सवर्थ को तो समस्त ग्रीनवुड ही प्यारा था
तुलसी का अनुषंग मुझे शैशव में ही प्राप्त था।

फ़राग़=मुक्ति।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, November 26, 2020

क़िस्मत बनाम कर्म

मैं था नौख़ेज़, और वो थे उम्रदराज़
फ़राख़ पेशानी , आवाज़ में  फ़राज़
वो आए थे वहाँ, जहाँ पे मैं रुका था
झिझकते हुए पूछा, उलझा इक राज़।

सब क़िस्मत से होता है या , कर्मों से
उलझन में हूँ, जानना चाहता आपसे।
उन्होंने मुस्कुराके देखा था, मेरी ओर
बोले थे, एक क़िस्सा कहता हूँ तुमसे।

दो जिगरी दोस्त थे, बड़े ही नेकदिल थे
एक जाँ दो जिस्म, हर हाल में साथ थे।
जो क़िस्सा है, उसको बख़ूबी जानता हूँ
मैं उनसे वाक़िफ था, वो मेरे पड़ोसी थे।

एक कहता था, सब होता है क़िस्मत से
दूसरे ने कहा था , सब होता है कर्मों से।
एक को भरोसा था नीली छतरी वाले पे
दूसरा ख़ुश था, अपने कर्मों के भरोसे से।

उनको फँसा दिया गया चोरी के मामले में
शहर कोतवाल ने भेज दिया, हवालात में।
हवालात थी एक दूसरे मुल्क की सरहद पे
कर्मकुशल, कौशल से पहुंचा ग़ैर मुल्क में।

आज़ाद होगया, मगर बड़ा ग़म आलूद था 
बिना हमनशीन के हरदम रहता बेचैन था
लौट कर आया फ़िर वहीं पे, जहाँ क़ैद था
हमदम को लेकर गया, जैसे ख़ुद गया था।

उन्होंने मेरी तरफ़ देख कर फ़िर कहा था
अब तुम सोच लो, आख़िर हुआ क्या था?
यह सारा कर्मसनेही का था, कर्म कौशल
या फ़िर नीली छतरी वाले का कमाल था?

नौख़ेज़= नई उम्र का। उम्रदराज़= अधिक उम्र के।
फ़राख़ पेशानी= चौड़ा माथा। फ़राज़= बुलन्दी।
ग़म आलूद= ग़म से भरा। हमनशीन= दोस्त= हमदम।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।


Tuesday, November 24, 2020

दूसरा पहलू

अहा सर्दी की धूप, वो भी सह पहर की
जैसे इनायत मिल गई हो, सारे दहर की
लगता है लिपटा हूँ , रूंएदार दोशाले में
गरमाहट मिल रही, मुलायम लिहाफ़ की।

बिछी हुई है धूप की, उजली एक चादर
सबके ऊपर, चाहे तवंगर हो या गदागर
किसने कह दिया बर्फ़ानी हो गई बस्तगी
इतनी धूप तो काफ़ी है , करने को असर।

सर्दी क्या आई , धूप की सीरत बदल गई
दिन रहते रहते धूप, माहताब सी बन गई
गर्मियों की शाम के मानिंद सुहानी हो गई
मेरी मुश्ताक़ रूह की , हमजोली बन गई।

गरमी में सोचा न था , सर्द धूप के बारे में
तब क़वाइद हुई , धूप से बचने के बारे में
जो धूप नापसंद थी , पसंदीदा बन गई है
अहम है विचारना, दूसरे पहलू के बारे में।

सह=तीसरा।दहर=ज़माना।तवंगर=अमीर।
गदागर=फ़क़ीर।बस्तगी=bonding.
माहताब=चाँद।मुश्ताक़=उत्कंठित।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, November 23, 2020

हवा

ये हवा है कि मुझको हरवक्त ही छेड़ती रहती है
कभी सिर को तो कभी चेहरे को छूती रहती है
उसकी चुहलबाज़ी मुझे बख़ूबी भाया करती है
जब छुट्टी मनाती है तो मुझे बेचैनी सी रहती है।

ये बेहद घुमक्कड़ है, जगह जगह घूमा करती है
फ़िर मेरे पास आकर सारी ख़बरें दिया करती है
कभी फुलझड़ी फ़टाकों की गंध लाया करती है 
कभी सब्ज़ी छुकने की महक, सुँघाया  करती है।

इंतिख़ाबात के वक्त, सब हवा को ही देखा करते हैं
हवा का रुख़ किसकी तरफ़ है ग़ौर से देखा करते हैं
कौन उम्मीदवार हवा हो रहा, किसकी हवा निकली
माहिरे कामिल ये सब नज़रें गढ़ा कर देखा करते हैं।

कुछ उम्मीदवार समाँ बाँधते हैं, हवा भी बाँध देते हैं
जो मुकाबले में होते हैं , उनकी हवा बंद कर देते हैं
अब ग़ौर कीजिए , हवा बंद हो जाए तो क्या होगा
ऐसे हालात में हम तो हवाख़ोरी के लिए चल देते हैं।

हवाख़ोरी भी जनाब क्या ही मज़ेदार हुआ करती है
हवा खाइए, हवा पीजिए, हवा हवाई हुआ करती है
चाहे कितनी भी खपत कीजिए, इस्तमाल कीजिए
कुछ फ़र्क़ नहीं होता, हवा तो फ्री में हुआ करती है।

इन्तिख़ाबात = चुनाव का बहुवचन।
माहिरे कामिल = विशेष विशेषज्ञ।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, November 22, 2020

खुला दिल

खुला दिल खुले आसमान के जैसा होता है
खुलेपन में इमकान का अंबार लगा होता है
फूल जब खुलता है, खिलखिलाने लगता है
 खुला दिल हो तो चेहरा भी , खिला होता है।

खिले चेहरों में नामचीन ख़सूसियतें होती हैं
जैसे उनकी आँखें बेलौस शफ़्फ़ाफ़ होती हैं
और खिलावट को मुकम्मल , करने के लिए
उनके लबों के कोनों पे इक मुस्कान होती है।

खुला दिल होने को ज़रूरी है ख़ुशदिल होना
ख़ुशदिली के लिए ज़रूरी है , ख़ुशकुन होना
ख़ुशकुन होने के लिए दिल में रौशनी चाहिए
रौशनी के लिए ज़रूरी है रौशनदान का होना।

रौशनी आने दीजिए, रौशनदान खोल दीजिए
दकियानूसी छोड़ कर, दरवाज़ा खोल दीजिए
दकियानूस जबरन जफ़ाकार था,  मरदूद था
उसे छोड़िए, दिल को आसमान बनने दीजिए।

इमकान=possibility. बेलौस=पाक साफ़।
शफ़्फ़ाफ़=Transparent. ख़ुशकुन=ख़ुश करने वाला।
जफ़ाकार=ज़ालिम। मरदूद= रद्दी।

ओम् शान्ति: 
अजित सम्बोधि।

Friday, November 20, 2020

एक जोड़ा फ़ाख़्ता

मैं देख रहा था, दो फ़ाख़्ता हवा में तैर रहे थे
एक से एक बढ़कर, कलाबाज़ी दिखा रहे थे
कभी नीची डुबकी लगाते, कभी ऊपर उठते
ज़मीं के बजाय आसमाँ में जादू दिखा रहे थे।

यकायक डुबकी लगाई, मेरे क़रीब उतर आए
मैं हैरत में था, ख़ुश भी था, वो मेरे पास आए
तभी देखा ऊपर उक़ाब को चक्कर लगाते हुए
अब समझा मैं कि वो क्यों मेरे पास उतर आए।

पिकैसो के पिता ने कहा था नक़्शतराज़ बेटे से
फ़ाख़्ता नक़्श बरदीवार बनाओ अपनी कूची से
दुनियाँ में कोहराम मचा  हुआ है , एक अरसे से
बहुत कुछ सीखना है , अमन पसंद फ़ाख़्ता से।

फ़ाख़्ता पास आए , मैं अजनबी था उनके लिए
भरोसा था इंसान पे, वो ख़तरा न था उनके लिए
अमन पसंद को पहिचान लिया अमन पसंदों ने
साबित कर दिया अहम है अमन दोस्ती के लिए।

फ़ाख़्ता= dove. उक़ाब= hawk.
नक़्शतराज़= चित्रकार।नक़्श बरदीवार= दीवार पर चित्र।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।



Thursday, November 19, 2020

दिला!

दिल बड़े नाज़ुक होते हैं, जल्दी बिखर जाते हैं
फ़िर सिमटते नहीं, हम हाथ मलते रह जाते हैं
इनकी धड़कनों को नज़रंदाज़ न किया करिये
ज़मीनें बाद में बंटती हैं, ये पहिले बंट जाते हैं।

वैसे दिल सा मुआफ़िक़ कोई भी नहीं होता है
आप चाहे बियाबां में हों, हमेशा साथ होता है
आप जब चाहें इससे इंतिहाई बात किया करें
इसकी जा कोई वक्त ग़ैरमुनासिब नहीं होता है।

दुनियां में एक दिल है जो हर कहीं मिला करता है
परिंदा, पेड़, बंदर या पंजर सब में धड़का करता है
दिल तो पत्थर में भी होता है, आप चाहे न माने ये
जब वो बिलखता है, झरना होके निकला करता है।

दिल तो एक पनाहगाह है जो मुरब्बी दिया करता है
दिलकश है, दिलकुशा है , दिलावेज़ी दिया करता है
इससे हमेशा बातें किया करें, दिलनवाज़ी के बाबत
वहीं रहता है दिलबर, जो दिलाराई किया करता है।

दिला= ऐ दिल। जा= जगह। मुरब्बी= सरपरस्ती।  दिलकुशा= रमणीक। दिलावेज़ी= शोभा। दिलनवाज़ी= दोस्ती। दिलबर= दोस्त। दिला राई= दिल में बस कर उसकी शोभा बढ़ाने का काम।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।


Wednesday, November 18, 2020

हिफ़ाज़त

ये आँखें बड़ी नायाब हैं, इनमें सब कुछ दिखता है
बाहर का ही नहीं, जो अन्दर है, वह भी दिखता है
ये जितना देखती हैं , उससे ज़ियाद:दिखाती भी हैं
तुर्रा ये कि जो नहीं दिखाती इनमें वो भी दिखता है।

इसलिए अपनी आँखों को मैं हिफ़ाज़त से रखता हूँ 
शिफ़ा का ही नहीं, शिगुफ़्त का भी ख़्याल रखता हूँ।
हर चीज़ को अगर देखें , तो सेहत बिगड़ने लगती है
वो क्या देखा करें इस बाबत बख़ूबी ख़्याल रखता हूँ।

मैं अपने आँसुओं को भी बड़ी हिफ़ाज़त से रखता हूँ 
कहीं बेवक्त छलक न आऐं, इसलिए ख़याल रखता हूँ।
ये आँसू बड़े मासूम हुआ करते हैं, ख़ूब बहक जाते हैं
दिल के बहलावे में न आ जाएं, इन पर नज़र रखता हूँ।

ये दिल मुतफ़र्रिक है , इसलिए हिफ़ाज़त से रखता हूँ 
दूसरों से ही नहीं , ख़ुद से भी बचा बचा कर रखता हूँ।
कहीं ऐसा न हो कि यह पकड़ से बाहर निकल जाए
मैं अपने दिल में मुकम्मल उसको  सजा कर रखता हूँ।

शिफ़ा = सेहत। शिगुफ़्त= ख़ुशदिली। मुतफ़र्रिक= बेलगाम।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Tuesday, November 17, 2020

उसे मेरी याद आती है

अगर ख़ुद से ही ख़ुद ब ख़ुद मिलते रहोगे
दूसरों से मिलने को फ़िर इतना न तड़पोगे
हर इंसान में  कई कई परतें हुआ करती हैं
एक से मिलके, बाकी से अनजान ही रहोगे।

ज़ियाद: दूर तक न मिला करो हर किसी से
बिला वजह मिलना भी करता है दूर ख़ुद से
अधिक दूर जाने पे अक्सर लोग डूब जाते हैं
डूबना है तो ख़ुदा में डूबो, पहल करो ख़ुद से।

ये औरों की बात करना अपाहिज बना देता है
बात बनती नहीं , बात बनने का धोखा देता है
इसके बजाय, ख़ुद से ख़ुद की बातें किया करो
तब देखना कैसे तुम्हारे काम ' वो' कर देता है।

और सुनो एक डोर मेरे उसके दरमियाँ रहती है
ये डोर मस्ख़री है मुझको उल्लू बनाती रहती है
मैं जब समझता हूँ कि, मैंने उसको पा लिया है
ये डोर झटका लगा के मेरी खिल्ली उड़ाती है।

मगर उसकी ये खिल्ली मुझे ख़ूब रास आती है
 इससे ख़ुद पे हँस पाने की मश्शाकी आती है 
दूसरों पर सभी हँसते हैं, मुझे ख़ुद पर हँसना है
ख़ुद पर हँसता हूँ तो 'उसको' मेरी याद आती है।

मश्शाकी=दक्षता।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, November 15, 2020

मक़ाम ए सुकून

शाम का वक्त है और दरख़्तों के लम्बे साये हैं
सूरज की सुनहरी किरणों के, सरमाये छाये हैं
परिंदे उड़े जा रहे हैं, ख़ूब मुस्तैदी से उड़ रहे हैं
घर पर इंतिज़ार हो रहा है , मुश्ताक़ी बनाये हैं।

ये घर भी क्या चीज़ है, मुस्तक़िल है शादाब है
नायाब है, सेहतयाब है , एकदम से अहबाब है 
चाहे बियाबान हो, कारवाँ हो, या आसमान हो
दिल उसी में रहता है , वहीं पर तो सुरख़ाब है।

सब कुछ पाकर भी लगता है, कुछ पाया नहीं
मन में लगता है कि कुछ और है जो मिला नहीं
ज़िन्दगी बीत जाती है उस घर को तलाशने में
मुक़म्मल सुकून बख़्शता है, मगर मिलता नहीं।

हाँ, वो घर जहाँ हर वक्त नूरुन अलानूर रहता है
नूरे मुजल्ला, नूरे मुजस्सम वा नूरे शम्स रहता है
वही घर है जहाँ जाने को दिल तरसता रहता है
वही घर है, फ़ुरोज़ाँ है, वहीं दिलफ़ुरोज़ रहता है।

मक़ाम ए सुकून=चैन का पड़ाव। सरमाये=हितकारी। 
मुश्ताक़ी=उत्कंठा। शादाब=ख़ुशनुमा। अहबाब=मित्र। 
सुरख़ाब=चकवा। नूरुन अलानूर=नूर-नूर।
नूरे मुजल्ला=बिखरा नूर। नूरे मुजस्सम=आपादमस्तक नूर।
नूरे शम्स=नूर का सूरज। फ़ुरोज़ाँ=प्रकाशमान।
दिलफ़ुरोज़=दिल का प्रकाश।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Wednesday, November 11, 2020

ये मुहब्बत है

मुझे तुमसे मुहब्बत है, मुझे उनसे मुहब्बत है
मुहब्बत चीज़ है ऐसी, मुझे सबसे मुहब्बत है।

तुम ढूँढ कर देखो , ज़रा फ़िर पूछ  कर देखो
परख कर फ़िर ज़रा देखो, और ग़ौर से देखो
ज़माने भर में जाकर के, घूम के धूम से देखो
बताना मुहब्बत के सिवा ग़र, और कुछ देखो
ये दुनिया है लगती हसीं उतनी, पूछ कर देखो
कि दिल में किसी के वास्ते, जितनी मुहब्बत है।

फ़िर से दे रहा दस्तक, है मौसम दिवाली का
ये मौसम शुमाली का, ये मौसम उजाली का
हमें था बेक़रारी से, इंतिज़ार बारहा जिसका
है आगया फ़िर लौटके वो मौसम बहाली का
दिवाली सजाई जाया करती, है दीपों से मगर
दिलों में जलते हैं चिराग़, तो होती मुहब्बत है।

मुहब्बत के हुआ करते हैं , शग़ल मुख़्तलिफ़
हो सकता है कुछ लोग इससे , हों नावाक़िफ़
मुहब्बत में मगर होती है , इक अजब सिफ़त
वो ज़ाहिर कर ही देती है कि कौन है आलिफ़  
ज़िन्दगी सिर्फ़ ज़िंदा रहने का नहीं होता नाम
ज़िंदगी तो वहीं होती है जहाँ होती मुहब्बत है।

वो परचम है सरनिगूँ करता किसकी इबादत है
मैं जानता हूँ ये इबारत , उसे हवा से मुहब्बत है
ज़रा आने तो दो झोंका बादे सबा का इस तरफ़
फ़िर देखना फड़फड़ाता कैसा होके मदमस्त है
वो तैरते बादलों के टुकड़े , वो उड़ते हुए परिन्दे
सब कह रहे हैं हर तरफ़ मुहब्बत ही मुहब्बत है।

शुमाली = सम्पूर्णता। बारहा = बार बार।
 शग़ल = दिल बहलाने के काम।मुख़्तलिफ़ = भिन्न।
 सिफ़त = गुण।आलिफ़ = स्नेहिल।परचम = झण्डा।
सरनिगूँ = झुका हुआ सिर।बादे सबा = सुबह की हवा।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।



Monday, November 2, 2020

Wish You A Happy Dipawali

When the symbol and the symbolized become one, it becomes an emblem. If not, it remains an epilogue. In this sense light is an emblem because it is a symbol of love and hope; love for life, for vibrancy, for munificence, and hope for liberation. Light is Nature's Prozac, so to say. To paraphrase Thomas Fuller, light is God's eldest daughter who brightens your path as you light another's path. There is no region, race, or religion, under the sun, that doesn't recognise light as an expression of goodness and buoyancy. Some people like the Swedes, the Dutch, the Jews, and the Indians are, however, more eloquent in their expression. The Jews lead the pack with an eight day celebration of lights called Hanukkah. The Dutch observe St. Martin's Day on November 11 with children visiting community households carrying lighted lanterns in their hands. The Swedes honor St. Lucia on December 13 with wreaths of lighted candles.

Light is the only constant in this otherwise changeful cosmos. It needs no donning and doffing perhaps because it doesn't get polluted. Yes, light cannot be polluted. Man has polluted the earth, the air, the water, the space, and above all his mind, but he can never pollute light. The photon, its smallest unit, is a massless elusive entity which behaves as a particle and wave at the same time. And moves, if not polarized, in all dimensions in one time! It moves with a velocity nothing can ever attain, much less overtake. Also it doesn't decay. Yes light is deathless. Nothing whatsoever can kill it. Yet man the mortal, has the wherewithal to attain to immortal light. He has had a long tradition of people who have attained to light. Such people are called Avatars, Prophets, Messiahs, Buddhas. In this blog I am going to talk about one such Avatar from India. Rama is his name.

In India we observe Dipawali, literally, an array of lamps, to celebrate the return, from exile, of Rama the ruler of Ayodhya, after fourteen years. However, there is a frame story to it. He doesn't simply return but returns with his wife after killing Ravana, the ruler of Lanka and the abductor of his wife Sita. Whether or not, it is a historical tale, let the pedants and the movers and shakers, battle it out. After all, History is Hi story! You can not even exit history without re-entering history. Like most stories, history begins in romance but it has, unfortunately, a very short half-life. After which, a continuous amaranthine argument ensues which more often than not, turns bloody. For me, it suffices that the tale of Rama is a historical success which provides a symphony of echoes, heard and unheard. You will have to tread the path cautiously with me because it is a very powerful pathway which promises freedom to anybody who is a willing participant in the whole unfolding.

Raman Maharshi advised people to quizz themselves endlessly about who am I? till one realises the essence of this exhortation inside oneself. I don't know how many people succeeded in their effort, simply because I was not fortunate enough to be near him. But I do know of some people who were benefitted when they were called upon to ask to themselves Who is Rama? Where does he live? The year was 1954; place was a nondescript amroodon ka bagicha, about 30 kilometres from Lucknow; and the man who enjoined this discipline upon us was Swami Sadanand Jr. Rama literally means a pleasing being in whom the mind likes to roam. We were asked to sit silently, eyes closed, legs folded, spine straight, for a minimum of 40 minutes, to micro-examine our body from toe-to-top, for a spot where we felt a pull.

It took most of us, more than a month's practice to have the experience that whenever we reached the ajna chakra between the eye brows, we felt a pull. After some time the pull, sort of, sucked us inside where we felt like we were in a different dimension. Swami ji then explicated to us that the ajna chakra was the doorway to the sahasrar, which is our body's lighthouse that perennialy sheds soft milky light. And sahasrar is the Ayodhya where Rama ever dwells. Ayodhya, literally means against which no battle can be waged. Who can wage a battle against the light that is your sahasrar? Light is invincible. Rama, the eternal being, the blissful being, is ever present in Ayodhya, your Ayodhya, your sahasrar, as eternal light. As the time of disbanding was drawing near, Swamiji was keen that we should know the place where, as a rule, we dwell most of the time. So he told us to locate the position in our body where we felt most secure.

Fortunately for us, it didn't take us long to find the second point of our sojourn. It was the area of the pelvis, almost where the tailbone is, where we felt like we had been thrown back into the womb. This is where the muladhar chakra, the basal energy center, is positioned. If the sahasrar is the seat of spiritual strength, the muladhar is the seat of physical strength. You must have experienced that whenever you need to push something hard, the extra strength is provided by the lowest point of your torso. To survive on earth, we need strength, brute strength. This comes from muladhar. This chakra is the most earthy. When we live in this chakra, we sort of, grab the earth and fortify ourselves tenuously, lest we should be torn apart from the earth.

Now the name for the pelvic region is लंक, in sanskrit. Yes, Lanka means the loins. The seed mantra for muladhar is लं, which means to secure oneself. So in Lanka we strive to secure ourselves that is, we make ourselves secure against the other. Ofcourse the only way we are conversant with, to make ourselves secure, is with power, pelf, property and deception. We often go into overdrive to achieve this end. Hence there is always a propensity for combat, competition, and conflict. Whenever we feel threatened, it is not unusual for us, in moments of privacy, to curl ourselves and bury our heads  in the loins. Also when we are secure, we think of multiplying ourselves. Just at a nodding distance from it, is another chakra, called the svadisthan chakra. Its seed mantra is वं which stands for वमन, that is, vomit. So a part of the energy that we store in the root chakra, is spent here, in propagating ourselves. 

The next energy center is called the manipur chakra which as the name suggests, is the apex of the Lankan region. You may as well call it the belly button chakra. Its seed mantra is रं which stands for fiery flow. It is the driving force of the Lankan region, its de facto brain. The scientists also describe the belly as the second brain because most of the chemicals secreted by the brain are secreted by the guts also. According to them there is a hot line between the brain and the belly brain. That is why we have expressions like gutsy, gut feeling, gut action, gut reaction, having guts, not having guts or gutless. The manipur chakra is home to all the earthy drives in man---lust, anger, pride, attachment, greed, lithargy, jealousy, fickleness, deception, obduracy. These are the ten heads of Ravana. This rally of the belly keeps everybody tethered to the earth. This region comprises, the kitchen, the toilet, the bedroom, and the patronage of the belly brain (read body consciousness). No wonder people stay here birth after birth.

I will revisit the second chakra, for a while, to explain that svadisthan means established in the self.  Remember that the 's' in self is a lowercase letter, here. People are more than willing to remain in this region, life after life. In this regard American uprightness is redoubtable. They call their toilets, restrooms. Since the Americans are the modern day trend setters, every bedroom across the globe has become an annex to a restroom. Yes, not the other way round. A day may come when bedrooms may be cannibalized by restrooms. Now the ruler of this region is called Ravana which means a yelling mouth that makes everyone cry, including itself. As an epitome of all the earthy drives mentioned before, Ravana makes people with truck loads of money, and fame vast enough to wrap the globe twice, not only cry, but commit suicide. Advise these people to come out of this hell, and see how they balk at the advice. They prefer hooking their hammocks to these chakras and laze away their time swinging to the tunes of these chakras.

Freud, the father of western psychology, refused to come out of the second chakra. Osho says: Freud is the master of the world of the toilet. He lives there; that is his temple. Though what Freud calls psychology has nothing to do with Psyche, that is, the soul-mind, his upshot that 99.99% of people are abnormal, is correct. Instead of Psyche, it is Circe who impacts our lives. Let me remind you that Circe, according to Greek mythology, was an enchantress who turned men into swines. Living in the Lankan region, all the time, one can't be otherwise. Adler went upto the third chakra and talked of ego. Ego is very deceptive. It speaks from ten mouths. All the ten drives of Ravana issue from ego, that is, body consciousness. While one is in body consciousness, no growth happens. Desire drives everyone to move only in circles. Whatsoever one may achieve, but the desire remains. Even after one has amassed a fortune, one remains what one was to start with--a bundle of unfulfilled desires, a virtual panhandler.

The fourth chakra, called the anahat being in the middle, gives an overview of both the worlds--the world of body consciousness and the world of soul consciousness. Only Jung craned his neck to have a peek into it. He found that the consciousness of the Lankan region was only the tip of an iceberg. A humongous chunk of consciousness which he termed collective unconsciousness, remained untapped. Its seed mantra is यं which stands for संयम, that is, discipline. Without disciplining the senses, it is difficult to reach here, much less stay here. Only on reaching here does one realise that there is a world beyond the concrete world of the senses--a world of love and compassion as against a world of cut throat competition, and bitterness. From here starts the realm of love, light, lilt, and laughter. It becomes refined in vishuddh, the fifth chakra and when you reach the sixth, the ajna, it becomes so intense it starts pulling you inside. Ajna is the seat of naad, the original sound of Om.

If naad comes, can noor be far behind? Yes, noor follows naad as butterflies follow caterpillars. Noor is light. And as you reach the seventh chakra, the sahasrar, the floodgates of light open. To let you have a taste of the experience, I ask Pandit Gopi Krishna, world's foremost expert on kundalini, to speak to you of his first experience after persuing meditation assiduously for 18 years. Says he: Suddenly, with a roar like that of a waterfall, I felt a stream of liquid light entering my brain through the spinal cord... The illumination grew brighter and brighter, the roaring louder, I experienced a rocking sensation and then felt myself slipping out of my body, entirely enveloped in a halo of light. It is difficult to describe the experience accurately... I was no longer myself, or to be more accurate, no longer as I knew myself to be, a small point of awareness confined in a body, but instead was a vast circle of consciousness in which the body was a point, bathed in light and in a state of consciousness and happiness impossible to describe.

It is a long journey from wallowing in restrooms to bathing in the pools of light, from baking in kitchen fires to tasting celestial blissfulness. Isn't it an irony that we burst crackers that pollute the air, damage our ears, and sometimes even start fires, just to declare to ourselves that we are happy? Can the dazzle of all the artificial lights put together, bring us one move nearer to our Ayodhya where lights cascade in a never ending Dipawali? It is about this Dipawali that Kabir sings:

रस गगन गुफा में अजर झरे
बिन चंदा उजियारी बरसे, समझ परे जब ध्यान धरे
बिन बाजा झनकार उठे, जब अलख पुरुष का ध्यान करे
काम विकार निकट नहीं आवे, क्रोध लोभ मद द्वेष जरे
कहत कबीर सुनो भई साधो, अमर होइ जम सूं न डरे।

"Nectar drips from the celestial vault. Moon light cascades without the moon. Cadence arises without a musical instrument. You are lost to lust, anger, greed, and jealousy. Death nolonger, frightens you."

Kabir promises this gift to anybody who is willing to meditate. Any takers? Perhaps if I tell you the other half of the story, you may get interested. By now you have become familiar with the prominent beads in the mala--Ayodhya, Rama, Lanka, Ravana. But where is the thread that sustains these beads? Yes, the central character without whom the story collapses? You guessed it right. Where is Sita, the one irreplaceable character of the story? But more important than where is Sita? Is the query who is Sita? Well, etymologically speaking, Sita means a furrow, a narrow track made in the soil by a plough. According to the common tradition, she was found while Janak furrowed his field. A cubit long furrow in our body which translates rubbish into rubies has been known to the yogis of India by the name of sushumna, the madhya nadi, from times immemorial.

Thus it is Sita who as madhya nadi, links Ayodhya to Lanka, the highlands of sahasrar to the lowlands of mooladhar. She is the bridge between soul consciousness and body consciousness. Meher Baba was more explicit when he said that the journey from heaven to hell and vice versa, is only a cubit long. On one side of the sushumna is heaven; on the other, hell. The seven chakras are the seven stopovers en route the journey. These seven chakras are variously described as the seven lokas, the seven seas, the seven rishis, the seven ragas, the seven days, the seven rainbow colors. Sita gives life to these chakras and through them to the pindand, our body. In this role of a creatrix and sustainer, her name is akashganga. Yes, Sita means akashganga, the celestial ganga, the ganga of liquid light.

Sita is the natura naturans, the creative energy, of Rama. As akashganga, she flows down from the highlands of Ayodhya to the lowlands of Lanka to nourish us. But she gets stuck in muladhar which is dead-to-heaven and wed-to-hell. Here she is known as dakshinayini, that is, bound southward. The place overweighs her spirit. She coils down and goes to sleep as kundalini and waits for Rama to come and deliver her from the prison. With the help of a sadguru, the seeker comes to recognize Rama and thereby burns the Lanka of ego with the heat of meditation. Sita is set free and she rises up the seven chakras in the form of the liquid light as experienced by Pandit Gopi Krishna. And then the sahasrar blazons with celestial light. This is Dipawali, the festival of lights of the meditators. My Guru would often humorously exhort his disciples to meditate so they didn't have to shell out money to buy themselves a television set!

Just a couple of days before, on November 02, 2020, two distinctive headlines in a local newspaper of my city of 40 lakh head count, drew my attention. One read: राजस्थान: पटाखों पर पाबंदी। And the other said: राजधानी में दिवाली पर ₹४५ करोड़ के पटाखे बिकते हैं। But for corona, 45 crore rupees would have gone in flames, in one day, in one city! For what? For the display of fireworks! If one obtains to the inner flood of lights, one could be a witness to far greater fireworks, and that too gratis and without any pollution!  Instead, imagine about the damage to the city air already burdened with noxious gases. This money can bring cheer to a thousand faces from the slums, slums that remind us constantly, whatsoever the claims made, that India is yet to arrive. 

The descent and ascent of akashganga, the life sustaining energy, involves (7+7=14) steps in the form of chakras, for the rejuvenation of the body and the soul. These are known as the 14 years of exile in the traditions. We can easily reverse the whole scenario, for the benefit of everyone, to put an end to our exile. Yes, we are all in exile, without knowing about it. We have to take only 7 steps of ascent to achieve to our freedom. So when are we going to get out of our self imposed exile? This is possible only when we replace the modern accent on अर्थकरी विद्या by the time tested wisdom of मुक्तकरी विद्या—-सा विद्या या विमुक्तये।
 
Heat and cold, day and night, pain and pleasure, prosperity and penury, peace and crisis, Ayodhya and Lanka, are all examples of the double helix that is part of one framework, one cycle-- the cycle of growth, the cycle of evolution. Both the strands of each pair are like the two legs needed for our locomotion. If we get stuck in any one place, growth stops. When the liquid light of kundalini, of Sita, of cosmic energy, keeps on circulating through all the chakras, it nourishes both--Ayodhya and Lanka, soul consciousness and body consciousness. If it gets stuck in Ayodhya, in the sahasrar, the body falls after 21 days, so they say. Sri Ram Krishna Paramhans presents the only exception of surviविंग in soul consciousness for six months. For the body to continue, body consciousness is essential. Similarly when we make the lowlands our home, our soul starves. Like when a child pining for his mother, is handed out a rattle, we buy ourselves a Bugatti, or a holiday ticket, when we feel a vacuum inside. Since we don't understand what is happening to us, we label it boredom.

It should not be dismissed as boredom, it is a matter of introspection. We refuse to see the wider cosmological perspective of Nature and instead, vote for our narrowly individualistic point of view. So we busy ourselves polarizing what had been designed as one inseparable unit of opposites. Whenever we feel boredom, alarm bells should ring in our ears to indicate that we are identifying ourselves with one half of the unit. The other half is crying for our attention, but since we don't understand or pretend not to understand, we go and sit in front of the TV or the PC, or down a spot of booze, go visit our buddies (read gossip). No one can escape the inevitability of the opposites. If we don't learn the art of what J. Krishnamurthy calls choiceless awareness, that is, remaining equidistant from both and witnessing them, we will keep hopping up and down the mental pogo stick. Our mental state is likely to become unstable and our judgements erratic. Most of the time we remain ignorant how harsh we can be to ourselves.

That which comes from the mind is written in prose. That which comes from the heart is expressed in poetry. Judgments and history are written in prose. Epics and lyrics are written in poetry. Prose is literal. Poetry is metaphorical. The story of Rama is epical like Homer's Illiad. It is a metaphor, a grand metaphor, and a very powerful one too. Our outer is only a reflection of the inner. If the inner is lackadiasical, window dressing the outer doesn't help. The inner journey brings about light (I am not using the word enlightenment), harmony and poetry in our lives. I wish all my readers a Dipawali that never stops.
Completed: 8.30 P.M; Nov. 05, 2020. 

अर्थकरी=begetter of money
मुक्तकरी=begetter of freedom from bondage,
सा विद्या या विमुक्तये=that which frees, is education.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Sunday, November 1, 2020

आज का सूरज

मुझे तुमसे सब कुछ चाहिए
इस हाल से मुझे तार दे
ग़र तुमको मैं भाने लगा
मेरा नाम क़दमों में जोड़ दे।

मैं ये भूल जाऊँगा मैं कभी
तुमसे जुदा होकर रहा
मैं ये भूल जाऊँगा मैं कभी
बनकर अनाड़ी भी रहा
जिन पे करम बख़्शा है तुमने
मेरा नाम उनमें ही जोड़ दे।

तुम्हें अपना कहने की चाह है
मुझे ये इजाज़त चाहिए
 दिल के पनाहगाह में
कुछ जगह मुझको चाहिए
जिन्हें मिल चुका तेरा सिला   
मुझे उस मिसिल में जोड़ दे।  

जब सुबह में तू झाँकता 
मुझे लगता गुले वर्द है    
तेरा देखकर घेरा शफ़क़गूँ 
शफ़तैन होते सुर्ख़ हैं       
जिस राह से गुज़रा करे 
उस राह में मुझे डाल दे।

सिला = पुरस्कार। मिसिल = फ़ेहरिस्त।
गुले वर्द = गुलाब का फूल।
शफ़क़गूँ = शफ़क़ जैसी लालिमा।
शफ़तैन = दौनो होंठ।


ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Tuesday, October 27, 2020

जंग रुकती क्यों नहीं?

कितने जनम बीते ये जंग रुकती क्यों नहीं?
ये कैसी भंग है इसकी लत जाती क्यों नहीं?
क्या हम कोई मशीन हैं जो लड़ते ही रहेंगे?
समझदारों जैसे शराफ़त से रहते क्यों नहीं? 

हर ज़माने में कुछ अक्लमंद भी होते रहे हैं
वो समझदारी से बिना लड़े रहते भी रहे हैं
कैसे रहना चाहिए इस बाबत बताते रहे हैं
फ़िर ये कौन हैं जो माहौल बिगाड़ते रहे हैं?

क्या ये वो हैं जो बाज़ुओं को फ़ड़काते रहते हैं?
या बिला वजह अपनी मूँछों को मरोड़ते रहते हैं?
या मूँछें न हों तो ज़ुबान से कुश्ती लड़ा करते हैं?
ग़रज़ ये कि अपनी अहमियत को गिनाते रहते हैं?

उन्हें एक बार देखना होगा उगते हुए सूरज को
नीले आसमान में उड़ते हुए  रंगीन परिन्दों को
वो दूर दिखते हुए पहाड़ों की ऊँची चोटियों को
और आहिस्ता आहिस्ता से बह रही नदिया को।

ग़ौर करना होगा उन्होंने बनाया है क्या क्या?
परिंदे, पहाड़, फ़लक में से गढ़ा है भला क्या?
 सूरज को उगना सिखाया या हवा को बहना?
इन नायाब तोहफ़ों में उनकी शराकत है क्या?

जनाब ये ख़ज़ाना बिना माँगे मुफ़्त में मिला है
ये सुकूत भीऔर सुकून भी सौग़ात में मिला है
और आप हैं कि जंग में इसे बरबाद कर रहे हैं
आप बहुत बड़ी एहसान फ़रामोशी कर रहे हैं।

ग़ुरूर छोड़ कर बनाने वाले की तारीफ़ कीजिए
जिसने बख़्शा है उसका शुक्रिया अदा कीजिए
लड़ना झगड़ना छोड़ के सुकून से रहना सीखिए
ये करिश्मे हैं इन्हें देख कर  मुस्कुराना सीखिए।

फ़लक=आसमाँ।नायाब=unique, अनोखा।
शराकत=योगदान।सुकूत=शान्ति।सुकून=चैन।
एहसान फ़रामोशी=एहसान न मानना।ग़ुरूर=घमण्ड।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, October 26, 2020

बता न

ग़र तू पुकारेगा, राधा आएगी कि नहीं
ग़र तू नचाएगा, राधा नाचेगी कि नहीं
एक दीगर ज़ुबाँ है जो दीदावर समझते हैं
ग़र तू मुस्कुरायेगा, इबादत होगी कि नहीं।

उम्र घटती जा रही, हवस घटती क्यों नहीं
तीरगी बढ़ती रही, चिराग़ जलते क्यों नहीं
इबादत की इन्तिहा, कभी होती है नहीं
वक़्त थम जाएगा, गर्द होता क्यों नहीं।

झुरमुट से झाँके चाँद, सब देखते क्यों नहीं
वो बेपर्दा हो रहा, हिम्मत दिखाते क्यों नहीं
माँगा था तू ने एकबार यशोदा से इसे कभी
नज़ारा नफ़्से नज़र, नज़र उठाते क्यों नहीं।

चंदन का सुतून मैं, तू काटता क्यों नहीं
तिल्ला का डला मैं, तू गलाता क्यों नहीं
तू ही तो मुकद्दर है मेरा, मैं हूँ तेरे हवाले
बावर नहीं है ग़र, आज़माता क्यों नहीं।

जब से देखा है तुझे, होश आता क्यों नहीं
तू आफ़ताबे नूर, सब को दिखता क्यों नहीं
तू तो है मेरा बातिन , मैं पड़ा हूँ ख़ाक़ में
ये सब माजरा क्या है, तू बताता क्यों नहीं।

वो दिन जो कभी थे, वापस आते क्यों नहीं
वो सरगोशियाँ शोखियाँ वापस आते क्यों नहीं
क्या ऐसी ख़ता हुई, जो इतनी सज़ा दे दी
छोड़ा जो तुमने एक बार, वापस आते क्यों नहीं।

दीदावर = जौहरी।तीरगी = अँधेरा। सुतून = तना।
 तिल्ला = स्वर्ण। बावर = यक़ीन। बातिन = अन्तर्मन।
ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Friday, October 23, 2020

Flower Children*

Weeds and beads
Crystals and pistols
Life is a big bawl of pot
Swim across the top
Of Niagara falls.

Turn on, tune in
Blow your brain
Hook onto escape
From the rat race
To nirvana.

Go grass-happy
Pull your eye balls
So they can see
Colors suspended
On the air.

Get stoned
For the last great high-up
In the sky
Pace
Hasan Sabah, the pagan.

SKY-SCRATCHERS

Sinews tightened grip,
Earth loosened her loins.
Stalactites jut out
Skyward
A jungle of iron and concrete.
Blood and iron mix well
To mummify glory
And fossilize ambition.

* Reprinted from Youth Times (defunct)1976 October 15-28.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Thursday, October 22, 2020

मुझे तुमसे मिलना है

तुझको पाने के लिए लोग मशक़्क़त करते हैं
परस्तिश  भी करते हैं , ज़ियारत भी  करते हैं
जहालत की  भी ख़रीद ओ फ़रोख़्त  करते  हैं
ख़ुद को ढूँढे बग़ैर मगर, तुझको ढूँढा  करते  हैं।

तुझे पता नहीं कैसे मिलती चाहत मुझको?
तुझे पता नहीं कैसे मिलती  राहत मुझको?
ज़िन्दगी एक  वीरान  चुलिस्ताँ  बन जाती
तेरी  मुस्कान  न देती ग़र  ताक़त  मुझको!

दर्द कमतर नहीं होता  दर्द दुनिया  बदलता है
दर्द क़ालिब है कि  जिसमें हर कोई ढलता है
दर्द धरती  का देखकर , बादल  सिसकता  है
धरती जब जब  तड़पती  वो रो रो  बरसता  है।

सूरज   है   करता , इन्तिज़ार   सुबह   का
शबगीर   को  रहता , इन्तिज़ार   रात  का
किसी ना किसी का हर किसी को इंतिज़ार
आख़िर   है   भूखा   हर   कोई   प्यार   का।

निकले जो बात दिल से सुनता है दिल ठहर के
साँसें  भी ठहर  जातीं , आँसू भी ढलते  रुक के
घबरा  के  ग़मों  से  कभी  मायूस  न  हो  जाना
बरसेगी  उसकी रहमत  थोड़ा  सा ठहर  कर के।

मुझे तुमसे मिलना है  तुम समझते क्यों नहीं?
बहुत कुछ  कहना है  तुम समझते क्यों नहीं?
माना कि मैं अहमक मगर तुम तो आलिम हो
मुझे ख़ुद से मिलना है तुम समझते क्यों नहीं?

मशक़्क़त= मेहनत।परस्तिश = पूजा।
ज़ियारत= तीर्थयात्रा।जहालत = बेवक़ूफ़ी।
ख़रीद ओ फ़रोख़्त= ख़रीदना और बेचना।
चुलिस्ताँ= desert devoid of any oasis.
क़ालिब= ढाँचा। शबगीर= रात में गाने वाला पक्षी।
अहमक= बेवक़ूफ़।आलिम= ज्ञानवान।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Wednesday, October 21, 2020

मैं और तुम

मैंने सोचा न था और ये क्या हो गया
हस्बे आदत जब तुमपे फ़िदा हो गया
मैं तो ज़र्रा था  बिस्मिल बियाबाँ  का
तुमसे मिलकर के मैं आसमाँ हो गया।

 क़तरा ए आब को जब होश हो गया
तेरी पुश्तपनाही से वो समंदर हो गया
ये मेरी चाहत थी या तेरी नियामत
तुझसे मिला 'मैं' और रफ़ा हो गया।

मैं सफ़ा से मिला और सफ़ा हो गया
दर्द मुझसे मिला और दफ़ा हो गया
वो वाक़िया फ़िर अफ़साना हो गया
ख़फ़ा मुझसे मिला नाख़फ़ा हो गया।

 हस्बे आदत = आदत से मजबूर।
बिस्मिल बियाबाँ = उजाड़ जंगल।
 क़तरा ए आब = पानी का टुकड़ा।
पुश्तपनाही = कृपा।नियामत = gift.
“मैं”= ego. रफ़ा = दूर। सफ़ा = पवित्र।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, October 19, 2020

वो

उसका नाम है दिलकश तू पुकारता क्यों नहीं
वक़्त फिसला जा रहा तू सम्हलता क्यों नहीं
क्यों बैठा है मायूस मुकैयद के मानिंद 
वो तो आता है यक़ीनन तू बुलाता क्यों नहीं।

उल्फ़त है दरकार तो फ़िर बाँटता क्यों नहीं
निशाना लगाना है तो सहम छोड़ता क्यों नहीं 
उसको मनाना है तो दर पे जाता क्यों नहीं
ये तो रिवाज़ है उसको निभाता क्यों नहीं।

मयूरा की तरह श्यामघन रटता क्यों नहीं
मीरा के मानिंद कृष्ण पुकारता क्यों नहीं
दीन के हैं दीनानाथ तू समझता क्यों नहीं
सुदामा के सखा को पहिचानता क्यों नहीं।

उसका दीदार पाने की चाहत करता क्यों नहीं
जज़्बा दिखाने की हिम्मत जुटाता क्यों नहीं
दम भरता था अपनी मुहब्बत का हरदम
अब मुहब्बत को हक़ीक़त बनाता क्यों नहीं।

दुनिया है फ़ानी हक़ीक़त पसंद क्यों नहीं
लोग आते हैं यहाँ मगर ठहरते क्यों नहीं
समझने की तमन्ना है अगर इसके बारे में
दस्ते रहबर कोई तलाशता क्यों नहीं।

रास्ता न बदलेगा ख़ुद को बदलता क्यों नहीं
अहमियत को नज़रंदाज़ करता क्यों नहीं
क्यों औरों को बनाता है रहनुमा अपना
उसकी ख़्वाइश के मुताबिक ढलता क्यों नहीं।

दिलकश=मनमोहक।मुकैयद=कैदी।
उल्फ़त=प्यार।सहम=तीर।दीदार=दर्शन।
जज़्बा=जोश।फ़ानी=नश्वर।
दस्ते रहबर=मार्गदर्शक का हाथ।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, October 18, 2020

अपडेट्स

चंद्र टरे सूरज टरे, टरे न कोविड ज्ञानी
मंत्री, तंत्री, संत्री, उतरा सबका पानी।

कबिरा खड़ा बजार में, पूछति है सब काहि
घणो ढिढोरो कोविद को, मोहे दीखत नाँहि।

अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है, ऐसी सुविधा और कहाँ है
पानी कोसों दूर है तो क्या, शौचालय बन गया यहाँ है।

चलती चक्की देख के लोग भये बेहाल
पीसनहारी पिस गई, बाकी करें मलाल।

ऊँचा पेड़ खजूर का, फल लागे अति नीक
पल में ऊपर चढ़ गया, फल खावे निर्भीक।

कबिरा सूता का करे, जागतऊ सोवो करे
जो चावे अमरित चखन, सूतोऊ जागण करे।

काँकर पाथर जोड़ के, ठाकुरद्वारा लियो बनाइ
घंटा भेरी बज रहे, क्या बहरे हैं ठकुराइ।

निंदक नियरे राखिये, फिर कोई चिंता नाँइ
वा देख मलाई निंदा करे, अपनु मलाई खाँइ।

माटी कहे कुम्हार से, हम दोनो तो एक
किरपा देखो राम की, बासन बने अनेक।

काल करे सो आज कर, आज करे सो अब
धंधा चौपट कर लिया, क्या करना है अब ? 

राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट
कंजूसी मत ना करो, घड़ा भरन की छूट।

कोविद= ज्ञानी।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।





Saturday, October 17, 2020

बरज़बाँ लम्हा

भूले से सुलूक जो तुम से मिला है
उसी  के  सहारे  मैं  जीता  रहा  हूँ 
सफ़र में अकेला ही  चलता रहा हूँ 
तुम्हें याद मुसल्सल मैं करता रहा हूँ।

कहीं कोई आवाज़  देता नहीं है
कहीं से कोई भी बुलाता नहीं है
ग़मे दिल से है  ये अजब दोस्ती
मुझे छोड़ कर वो जाता  नहीं है
तमन्नाएं  ख़ाक   होती  रही  हैं
उसी ख़ाक को मैं उड़ाता रहा हूँ।

क्या मुमकिन नहीं फ़िर से आवाज़ दे दो
दर ए वाक़िफ पे  फ़िर  से दस्तक  दे दो
रुख़ पे तेरे मैं मुसर्रत की ला दूँ हँसी
इतनी इजाज़त तो मुझको भी दे दो
दामन  पे  तेरे  लगाया  न  दाग़
हर लम्हा हिफ़ाज़त से रखता रहा हूँ।

क्या मुमकिन  नहीं भूलना  तुम भुला दो
क्या वाजिब नहीं फ़ासला तुम मिटा दो
मेरी बदनसीबी को  मक़सद बनाना
तुम्हें हक है लेकिन ख़ता तो बता दो
तेरी आँख से कोई  आँसू  न टपके
आसमाँ  से दुआ  माँगता  मैं रहा हूँ।

मैं तनहा रहूँ, रास  आता क्या तुमको?
दिल को दुखाना क्या भाता है तुमको?
मुझको यकीं  है  कि  ऐसा  नहीं है
ख़ुदारा बतादो क्या भाता है तुमको?
तुमको समझने में नाकाम हूँ मैं
भरपूर कोशिश मैं करता रहा हूँ।

मुसल्सल = लगातार। दर ए वाक़िफ़ = परिचित दर।
दस्तक = knock. रुख़ = चेहरा।मुसर्रत = ख़ुशी।
तनहा = अकेला।ख़ुदारा = ख़ुदा के लिये।
बरज़बाँ = हर वक्त ज़ुबान पर रहने वाला।

ओम् शान्ति: 
अजित सम्बोधि।

Friday, October 16, 2020

सुबह का चिराग़

रात ख़ामोश है, एक सितारा चमक रहा है
वक़्त की इनायत है, साथ लिए चल रहा है।

ज़िंदगी ग़र यूँ ही चलती रहे, तो क्या हर्ज़ है
हाँ, वक़्त की ताबीर करना, तो मेरा फ़र्ज़ है।

मालूम नहीं , वफ़ा का दर्द से क्या रिश्ता है
हाँ ये मालूम है कि बेवफ़ाई से दर्द रिसता है।

कुछ लम्हे चुनने भर से ज़िंदगी नहीं बनती है
लम्हों को लम्हों में पिरोने से , ज़रुर बनती है।

क्या कुछ न हो जाता, एक ख़्याल आने भर से
आसान नहीं होता जीना, ऐसी आमदोरफ्त़ से।

किसी ने पूछा क्या मुमकिन है सितारों को छूना
मैंने कहा सितारों से पूछा उन्हें पसंद है ये छूना? 

मुझे क़तई मालूम नही, कि कैसा सबेरा होता है
मैं तो जब जगता हूँ तो, चिराग़ जलाना होता है।

तसव्वुर में आने से कभी दूरियाँ कम नहीं होती
हाँ मगर ये दख़लंदाज़ियाँ बेमानी भी नहीं होती।

बेलिहाज़ और बेवक़्त की शिकस्तें अलग होती है 
एक से रंज होता है और दूसरी में शतरंज होती है।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, October 15, 2020

जंगजू

लोग लड़ा करते हैं , बख़ूबी लड़ा करते हैं
 कोई बैरी नहीं हो तो पैदा किया करते हैं
कुछ सजधज के पहिन वर्दी लड़ा करते हैं
कई जोशीले तो , बिला वर्दी लड़ा करते हैं।

लड़ाई एक मौजू है जिसे लोग पढ़ा करते हैं 
बड़ी शिद्दत से लड़ने की अदा सीखा करते हैं 
ये लड़ाई बड़ी काम की चीज़ हुआ करती है
अगर ये ना हो तो लोग नाकारा हुआ करते हैं।

कुछ लोग फ़रीक़ ए इंसाफ़ बन लड़ा करते हैं 
और कुछ नाइंसाफी की, बाजी लड़ा करते हैं
लड़ने वालों में लखनवी बाँके भी हुआ करते हैं
वो कमज़ोर दिलों का हौसला बढ़ाया करते हैं।

कोई उन्हें जाँबाज़ तो कोई जाँनिसार कहता है
कोई जंगजू तो फ़िर कोई , पहरेदार कहता है
जंग चलती रहे ताकि , तवारीख़ रुक न जाए
हरेक उन्हें अपने फ़िरके का हिसार कहता है।

 मौजू = विषय।शिद्दत = मेहनत।
फरीक़ ए इंसाफ़ = वादी।हिसार = अभेद्य।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Wednesday, October 14, 2020

बे हिसाब का हिसाब

इस हिसाबी दुनिया में, सब हिसाब लगाते जाऐंगे
मेरा हिसाब तेरे हवाले , तेरी अँग़ुली थामे जाऐंगे।

यहाँ पर जो शै बनी , बिगड़ने को ही बनी 
ये देखकर भी हर शै, हम ख़ूबतर बनाऐंगे।

कभी नहीं कोई हुआ किसी का इस जहान में
ये जानकर भी दामनगीर , ख़ूब हम बनाऐंगे।

बुझे बुझे हैं दिल यहाँ, ज़ेहन में है धुआँ धुआँ
ऐसी तीरगी में भी, हम चराग़ ए उंस जलाऐंगे।

मुमकिन है मेरी बात , समझ पाये ना कोई
है बात काम की जो, हम गीत बनके गाऐंगे।

गूँज बनकर मेरे गीत, गूँजेंगे इस जहान में
चाहे कोई ना सुने, हक़ को हम सुनाऐंगे।

जिसका है ये जहाँ , उसको ये बता दिया
बे हिसाब के हिसाब से, हिसाब हम लगाऐंगे।

शै=चीज़।ख़ूबतर=बेहतर।हक़=ईश्वर।
दामनगीर=दामन पकड़ने वाला।ज़ेहन=मन।
तीरगी=अँधेरा।चराग़े ए उंस=प्यार का दीपक।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Tuesday, October 13, 2020

Right ?

Laugh at yourself, if laugh you can
That's a sure way, your ego to scan.

If fair don a cloak; if clever be a joke
What's fair to poke ego, if not a joke?

Don't be fast, fast tires fast
And ends up , past the last.

Go slow, let go; that's the ticket to grow
Life is a flow;rapids flounder, don't flow.

Be not afraid however long the tunnel
See the light , at the end of the tunnel.

Lie low to stand up
Be empty, to fill up.

Back straight, think straight
Never die, to become great!

Surrender, it's never too late
To Him,the smallest is great.

Soft surpasses brusque
Trunk outdoes the tusk!

Anger is  hunger for pride
Ride it to guide your stride.

Desire and sorrow , are sisters great
Tell your remote to ask them to wait.

There's nothing ever great about hate
Instead , trade it up for love , straight!

What I write , I write to tease my mind
Dear Reader, read it to read your mind.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.


Monday, October 12, 2020

तेरा दर्द मेरा भी दर्द है

तेरा दर्द  मेरा भी  दर्द है, अब  कैसे  इस को  नकार दूँ 
जोहै मिल गया मुझे भूलसे, उसे क्योंन दिलमें पनाह दूँ ।

तुझे याद हो कि न याद हो, मुझे याद है वो वाक़या
बिन हुए  सब  हो  गया, अब  कैसे  कर  इनकार दूँ।

क्या  बात  ऐसी  हो  गई, हर  सिम्त  जैसे  खो  गई
फ़िज़ा ने जिसको भुला दिया, मैं क्यों न उसको सँवार दूँ।

ये जो रात दिन का  मेल है, ये भी आश्ना का  खेल है
जब आसमाँ  ही झुक गया, मैं क्यों न उसकी दाद दूँ।

मुझे क्या पता मेरी  ज़िंदगी, अभी कैसे गुल  खिलायेगी
जो शिगाफ़ बन के सता रही, उसे क्योंन सीने में दफ़्न दूँ।

तेरा  राज़ मेरा  भी राज़  है, पर  रास्ते  हैं बदल  गये
जिसे हम निभा पाए नहीं, उसे क्यों न राज़ ही रहने दूँ।

मैं वक़्त का मारा  हुआ, और तुम  तजाहुल  हो गये
ग़र वक़्त इक महबूब है, मैं क्यों न उसको बख़्श दूँ।

ये जुस्तजू मुझे  बारहा, हमज़ात  बनके  मिटा गई
जो बनके बिगड़ती गई, उस नक़्श को क्या नाम दूँ।

सिम्त= दिशा। आश्ना= याराना। शिगाफ़= दरार।
तजाहुल = दोस्त का अनजाना बन जाना।
जुस्तजू= तलाश। बारहा= बार बार।
हमज़ात= एक ज़ात।नक़्श= तस्वीर।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, October 11, 2020

अपना दर्द मुझे दे दे

हो सके तो इक इक इन्सान का दर्द मुझे दे दे
मेरी ये दरख़्वास्त है तू अपना दर्द भी मुझे दे दे।

गुलाब के मानिंद किसी की ज़िंदगी महका सकूँ
 रहम कर के अपने चमन का इक वर्द मुझे दे दे।

ज़िन्दगी की बाजी हार के, मायूस हुए बैठे हैं जो
पासा पलट दूँ उनके नसीब का, वो नर्द मुझे दे दे।

तू ख़ालिक है जहान का, तुझे भी आराम चाहिए
ऐ कर्दगार मेरी इल्तज़ा है, कुछ कर्द मुझे भी दे दे।

जो माँगा है न दे सके तो इतना ही कर दे, मुनव्वर
तेरे प्यार में पागल है जो, मेरा वो फ़र्द मुझको दे दे।

वर्द=गुलाब।नर्द=गोटी।ख़ालिक=स्रष्टा।
कर्दगार=doer, god. इल्तज़ा=प्रार्थना। कर्द=काम।
मुनव्वर=चमकने वाला, चमकाने वाला।फ़र्द=इन्सान।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, October 10, 2020

भगवान और भला इंसान

एक पुराना मक़ूला है:भोले में भगवान  
ऐसा ही एक और है: भोले के भगवान
अब भगवान तो कहीं नज़र आता नहीं
क्या इसलिए दिखता नहीं भोला इंसान?

भोला होता ग़ज़ाला, बिल्कुल मस्तमौला 
हावला बावला वो , जानता न रामरौला। 
वो तो धोखा खा खा के भी रहता  भोला 
हक़ताला का ख़ादिम, वो सुहेला औला। 

इस मक़ूले से आपका पड़ा होगा वास्ता
जब आप उलझन में थे, ख़ुदा न ख़ास्ता।
समझ में न पड़ा होगा कि अब क्या करें
 एक भला इंसान आया बता गया रास्ता।

ख़ज़ाना तो बिखरा पड़ा है, भगवान का
आप नहीं मानते हैं तो बतादें है किसका?
हर फूल में मौजूद, रंग भर रहा रंगरेज़ है
नहीं दिखता है फ़िर तो फ़र्क़ है नज़र का।

भगवान से मिलना है, भला इंसान देख लो
जिसकी नज़र में न कोई बुरा ऐसा देख लो।
ज़ियादह ज़हमत न उठाना तलाश करने में
तुम्हारे दिल में बैठा वो, बात करके देख लो।

मक़ूला= कहावत। ग़ज़ाला = बच्चा हिरन।
रामरौला= हल्ला करना। हक़ताला= रब।
ख़ादिम= सेवक। सुहेला= सुख दायक।
औला= अति उत्तम। ज़हमत= परेशानी।


ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।


Friday, October 9, 2020

लमहात का ख़्याल रखना

हाँ हर पल जीना, होश में रह कर जीना
ख़ुद सम्हल के, इन्हें सम्हाल कर जीना।

बड़ी मुश्किल से मिले हैं, इन्हें खो न देना
बेशकीमती हैं, कभी इनको भुला न देना।

कोई नज़रें चुराये, फ़िर भी मुस्कुरा देना
कभी ना मुराद होकर, बस रो मत देना।

कि वो ही पहल करे, ये भी ज़िद न करना
ख़ुद ही चले जाना, लमहे न ज़ाया करना।

वो दिल में उतर गये, और क्या जो करना
हस्बे आदत, लमहात को सजा के रखना।

मायूस रहूँ कोई हर्ज नहीं, मुझे मासूम ही रहने देना
ज़िंदगी इतना रहम करना, मुझे इंसान ही रहने देना।

मुझे तारीकी से डर नहीं, मगर उजालों में रहने देना
मैं ग़ुलूकार नहीं तो क्या, बस मौसिकी में बहने देना।

मैं क्या माँगूँ, मुझे है पता, तेरा बिना माँगे ही दे देना
लगता है जैसे तेरा काम है सिर्फ़ बख़्शीश का देना।

लम्हात = moments. ना मुराद = हार कर।
ज़ाया = बरबाद।हस्ब ए आदत = आदतन।
तारीकी=अँधेरा। ग़ुलूकार =गायक। मौसिकी=संगीत।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, October 8, 2020

Being Prayerful

A flower is cheerful, for it is prayerful
A dumb stone can give tears plentiful.

The prayerful man is a truly lonely man
He fears falling not failing, he is human!

His prayer is his longtime lifeboat
Even if he fails, it keeps him afloat.

Forget not that prayer is his poetry
Hope you know, where lives poetry.

Poetry is born of the pining heart
And so it touches a longing heart.

When mind and lips end their play
It is the soul which begins to pray.

Prayer never begs,it always grants
Gracious solace and bonny chants!

Om Shantih
Ajit Sambodhi

Wednesday, October 7, 2020

Measure of Grace

Measure of grace
Is patience, not race.
Measure of patience
Is gratitude in silence.

Measure of triumph
Is peace, not trophy.
Measure of attainment
Is silent contentment.

Measure of rapture
Is void, not treasure.
Void is not an abstraction
It has tenor 'n' complexion.

Don't try playing smart
Him you can't outsmart.
Simply bare your heart
To win His loving heart.

Don't ever smother yourself
With bouts of unhappiness.
Help comes unexpectedly
In the hour of helplessness.

Om Shantih
Ajit Sambodhi

Tuesday, October 6, 2020

The Only Temple

The only temple there is , is inside
Silent and serene, like a new bride.

Shy it is , of public's wanton gaze
Ash covered it lies in a secret blaze.

Although smaller than the smallest
Surely , it is bigger than the biggest.

As it is much nearer than the nearest
So it is much farther than the farthest.

Resplendent it is like midday sunshine
Even as nactarean it is like moonshine.

Tread softly, like the morning breeze
That livens your neighborhood trees.

Talk,yes talk, if talk you must
But let it be, to test your trust
In the nuzzles and cuddles of birds
And the whispers of floating scuds.

Try to experience the presence
That masquerades as absence.

When silence is deep,it becomes tangible
It is the echo from God, never , intangible !

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Retold : 'one night I had a dream'

I dreamt I was walking with God 
like we were two best friends.
As we went along we made two sets of
footprints on the sands.
I enjoyed His company for He was good
at telling funny stories
Of ancient peoples and lands that were
full of strange glories.
Meanwhile the scene shifted and I saw
we were at a different place.
I looked back over my shoulder to find
that there was no trace
Of the second set of footprints many a
time at many a place.
Those were the times when I was sad
and needed His grace.
I questioned God why He deserted me
 when I needed Him most?
He looked at me so lovingly, my heart went out for Him and I cried, almost.
He said:"My child I lifted you up, in my arms when you needed me most".

Om Shantih
Ajit Sambodhi

Monday, October 5, 2020

शिकायत

ख़्वाबों की सीढ़ी चढ़ कर,हम शीशमहल तक पहुंच गए
वक्त ने दामन छुड़ा लिया तो काचके माफ़िक बिखर गए।

हमने अपने सपने चुन चुन, पलकों में थे ख़ूब संजोए
क़िस्मत ने नज़रें फेरीं तो, मोती बन कर बिखर गए।

अपने दर्द के साथ ही हमने, अपनाया था दर्द भी तेरा
तुम क्या नहीं अकेले मुझ सम, फ़िर कैसे यूं दूर हो गए।

जिस दिन तुमने क़समें तोड़ीं, उस दिन हम भी टूट गए
ख़ंजर क्यों ऐसा मारा , कि सारे मंज़र बिखर गए।

सांसों में और आहों में क्या फ़र्क़ है अब हम भूल गए
देख लो आकर के कैसे , शाख से पत्ते बिखर गए।

ऐसी भी क्या मज़बूरी है ज़ुबां पे बंदिश लगा के बैठे
इख़लास के धागे अब आकर कैसे अचानक टूट गए।

अपनी फ़िक्र के साथ ही मुझको तेरी फ़िक्र सताती है
क्या होगा ग़र हया के चलते , तुम भी ऐसे टूट गए।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, September 24, 2020

सिखा दिया

बख़्शा के खुला आसमाँ
बाहें फैलाना सिखा दिया
रंग भर के चमन में
सैर करना सिखा दिया।

जब भी घिरा मायूसियों से
या तन्हा हुआ तन्हाइयों से
तेरी इनायतों ने , कन्हैया
दिल को गाना सिखा दिया।

ज़िन्दा हैं मेरी चकल्लसें
तेरे ही रहमो-करम से
दिल में उल्फ़त के गीत भरके
गुनगुनाना सिखा दिया।

उफ़क को देके शफ़क के रंग  
आसमानों को देके उड़ते विहंग
फूलों को बख़्शा के रूप-रंग
मुस्कुराना सिखा दिया।

उफ़क=horizon. शफ़क=dawn/dusk colors.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि

Wednesday, September 23, 2020

जंग गाह

कभी सरहद कभी मज़हब,जंग रुकती क्यों नहीं
कब्र गाह बनी तवारीख़ , होश , आता क्यों नहीं
कभी सीज़र कभी सिकंदर , कभी ज़ारो ज़रीना
फ़ातेह तो हुए बेइंतिहा , नज़र आते क्यों नहीं।

जंग लड़ता रहा, फ़िर मन भरता क्यों नहीं
क्या हासिल हुआ, हिसाब रखता क्यों नहीं
जिस को मारा है, तूने , तेरे नाम लिख गया
इंसानियत की शिकस्त पे तू रोता क्यों नहीं।

जंग जीतकर भी बात , बनती क्यों नहीं
शोहरत तो मिल गई, मुतमुइन क्यों नहीं
क्या ज़िन्दगी भर यों ही छटपटाया करेगा
रणछोड़ से तू फ़लसफ़ा सीखता क्यों नहीं।

ईसा को तो मारा, ज़ुल्म को मारा क्यों नहीं
बापू को मारा , नफ़रत को मारा क्यों नहीं
जब भी मारा , प्यार करने वाले को मारा
कैसे मरता प्यार में मंसूर , समझा क्यों नहीं।

तू ख़ाक से ढक गया है , आईना देखता क्यों नहीं
तुझे ख़ुद की ख़बर नहीं,किसी से पूछता क्यों नहीं
तुझे देख कर , नम हो जाती हैं , आँखें मेरी
तुझे अपनी बदहाली पे रहम आता क्यों नहीं।

फ़ातेह=victors. मुतमुइन=संतुष्ट।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, September 21, 2020

सच कहूँ

कभी मीरा बिलखती थी, कभी कबिरा बिलखता था
कभी रबिया बिलखती थी, कभी रूमी बिलखता था
ये दौलत मुहब्बत की , बेशुबह: नायाब होती है
सुदामा के ज़ख्म धो धो , कन्हैया बिलखता था।

मुझे डर है तुम मुझे फ़िर से लूट मत लेना
ये छिटकी हुई चाँदनी भी , छीन मत लेना
मैंने इबादत करी है , सनद तो नहीं माँगी
तुम मुझसे मेरी आवाज़ भी माँग मत लेना।

ज़ख़्म मुझको मिले बेहद, ये कैसे भूल मैं जाऊँ
ज़ख्म मेरे करम परवर , ये कैसे भूल मैं जाऊँ
ज़ख्मों की बदौलत ही तो तुमको याद रखता हूँ 
ज़ख्म नायाब दौलत हें , ये कैसे भूल मैं जाऊँ।

मैं किसी का हो नहीं सकता, मैं तेरा हो के बैठा हूँ 
कोई बहला नहीं सकता, मैं फ़ैसला करके बैठा हूँ 
कोई माने या न माने , मगर यह तो हक़ीक़त है
मैं तुझे खो नहीं सकता, मैं सबकुछ खो के बैठा हूँ ।

दौलत कमाने में , जिस्म को गँवा दिया
फ़िर ग़ैरत बचाने में,ज़र को गँवा दिया 
ज़िंदगी चुकती चली , जीना आया नहीं
मुहब्बत बाँटने का , मौका गँवा दिया।

ग़ैरत =लाज। ज़र=धन।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

मुनव्वर

भुला न देना यों दिल से मुझको
कि जैसे तुमको ख़बर ही नहीं है।
तुम्हारी ही ख़ातिर दिल की पूजा
मसल्सल, मुनव्वर, चलती रही है।

मुझको है तुमसे ही नूर मिलता
बिना तुम्हारे तो ज़फ़र नहीं है। 
भला मैं क्या कर सकूँगा तुम बिन
क्या तुमको ये भी ख़बर नहीं है?

मैं तुमको आख़िर क्या दे सकूँगा
फ़क़ीरी मुझको रास आ रही है।
ख़याल मेरा तुम को ही रखना
कि आख़िरी सफ़ पास आ रही है।

दिलों से मिलने हैं दिल ही आते
ये ही रवायत चलती रही है।
अगर जो कोई , दिल हार जाये
फ़तह उसी को , मिलती रही है।

मसल्सल = लगातार। मुनव्वर= प्रकाशमान।
ज़फ़र = विजय। सफ़ = क़तार।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Friday, September 18, 2020

सैविन सिस्टर्स

शाम का वक्त है और हम बैल्कनी में शाद बैठे हैं
मैं, मेरी अहलिया, साझा कर रहे किस्से अनूठे हैं।

सूरज ढलने वाला है , सेमल के दरख़्त के पीछे
फागुन में सेमल पर होते हैं लाल फूलों के गुच्छे।

आजकल इस पर सैविन सिस्टर्स का, नशेमन है
अभी उनके गुल से गुलज़ार हो जायेगा , सहन है।

सैविन सिस्टर्स को मायूसी , सन्नाटा नहीं है पसंद
रात काबिज़ होने से पहले, ख़ूब मचाती हैं हुड़दंग।

कभी मैं अकेला ही बैठा हुआ होता हूँ, बैल्कनी में
सहसा घिरा पाता हूँ, सात जोड़ी आँखों के घेरे में।

मेरे अकेलेपन पर शायद उनको तरस हो आता है
जिसे बेइंतिहा चिल्लाकर उनको भगाना पड़ता है।

आख़िर सिस्टर्स ही जगह जगह ख़िदमात करतीं हैं
यहाँ पे सैविन सिस्टर्स मेरी ख़िदमत किया करती हैं।

शाद = ख़ुश। अहलिया= जीवन साथी।
नशेमन = बसेरा।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Wednesday, September 16, 2020

अब कैसा झगड़ा

जिस्म पर भरोसा करने वाले ख़ूब मिलते हैं
रूह पर करने वाले मगर , नदारद मिलते हैं
मुश्किल है समझ पाना कि वक्त की मार से
जिस्म गिरते हैं, रूह के तोहफ़े बचे रहते हैं।

किसी को चाँद ख़ूबसूरत, दिखाई पड़ता है
किसी को मगर वो, दाग़दार दीख पड़ता है।
कोई चाहे या न चाहे, मगर ऐसा देखा गया
एक इंसान को भी चाँद तो, बनना पड़ता है।

ख़याल आता है तो उसे रोका नहीं जाता है
ख़याल आने पर ख़याल को, देखा जाता है।
ख़याल चलता रहता है, और चला जाता है
मगर देखने वाला, वहीं पे रुका रह जाता है।

जब देखने वाला , ऐसा , मुकम्मल होता है
वह देखा करता है, काम भी होता रहता है।
काम होता रहता है, फ़िर झगड़ना किससे ?
‘मैं’  करता हूँ, बस तभी तो झगड़ा होता है।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, September 13, 2020

बुलबुल का जोड़ा

कुछ लोग कहते हैं , मुर्गा बोलने पर सुबह आती है
उनके पास मुर्गा होगा, शायद इसलिए वह आती है।

अक्सर तो लोगों की सुबह अलार्म बजने पै आती है
लोग बटन दबा देते हैं तो सुबह रफ़ा भी हो जाती है।

कुछ लोग मुझसे भी पूछते हैं, मैं कैसे उठा करता हूँ 
उनकी तसल्ली के लिए ये क़िस्सा सुनाया करता हूँ ।

मेरे पड़ोस के पेड़ पै एक बुलबुल का जोड़ा रहता है
उसमें से कोई एक है जो अलस्सबाह गाने लगता है।

कुछ देर बाद, दूसरे के गाने की भी, आवाज़ आती है
पहिली दूसरी, पहली दूसरी, बराबर आवाज़ आती है।

ये दोनों आवाज़ें, एक दिलकश, नग़मे में ढलती हैं
अदल बदल की मधुर संगत, मेरी सुबह, बनती है।

उस बुलबुल के जोड़े को , बारहा शुक्राना देता हूँ 
तू देता है वही, जो दरकार है, रब को कह देता हूँ ।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, September 12, 2020

रियोकैन टाइगू

एक फ़कीर था जापान में, नाम था रियोकैन टाइगू
बा-सटोरी था , हाइकू  में किया करता था  गुफ़्तगू।

वह रहता था, गाँव से दूर, एक पहाड़ की तलहटी में
घास के बिछौने के सिवा, कुछ न था उसकी कुटी में।

फ़ज्र का वक्त था, वह गया था नहाने एक तालाब में
एक कूचागर आया, और दाख़िल हुआ पनाहगाह में।

कुटी में कुछ था नहीं, निकला तो टकराया टाइगू से
भागने लगा तो फ़कीर ने रोक के कहा, जजमान से।

मेरी कुटी में कुछ भी नहीं है , आपको देने के लिए
मेहरबान , मेरे कपड़े लेकर मुझ पर करम कीजिए।

रियोकैन ने कपड़े उतार कर , अजनबी को दे दिए
कूचागर हैरतअंगेज, भागने लगा , होश थे उड़े हुए।

बरहना खड़ा था रियोकैन, कहा, काश वो रुकजाता
मैं अपनी खिड़की में उतरता चाँद , तोहफ़े में दे देता।

बा-सटोरी= समाधिप्राप्त। हाइकू= haiku. 
गुफ़्तगू=बातचीत। फ़ज्र=early morning. 
कूचागर= prowler. पनाहगाह=शरणस्थली।
करम=क्रपा। हैरतअंगेज़=stunned. बरहना=nude.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि। 

Friday, September 11, 2020

मक़सद

तुम्हें मंज़ूर होता है , मुझे मक़बूल होता है
तुम्हारा फ़ैसला जोभी, मेरे माकूल होता है
हर बात में किनाया भी , मख़फ़ी , होता है
तहक़ीक़ात करने में, मन मशगूल होता है। 

मेंने तो तिजारत नहीं की, इबादत  ही की है
पूछलो इन आँखों से जिन्होंने सदारत की है
शिकस्त खाई है , हिम्मतपस्त नहीं हुआ हूँ 
मेंने हर दरख़्वास्त के साथ,  ज़ियारत की है।

    मंज़िल मिले ही , ये न मक़सद था मेरा
    तुमको भूल जाऊँ, ये न मक़सद है मेरा
    दोराहे पर आकर के , खड़ा ही रहूँ मैं
    ये भी तो अभी तक, न मक़सद है मेरा ।

मेरा काम है मरना, मैं मरके देखा करता हूँ 
हर मरना नई मंज़िल, मंज़र देखा करता हूँ 
कभी नीला कभी पीला तुझे देखा करता हूँ 
रंगों के पार रंग तेरे , तमाशा देखा करता हूँ ।

किनाया=इशारा। मख़फ़ी=छुपा हुआ।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, September 10, 2020

जंग

लोग सजधज कर जाते हैं जंग करने , उनसे   
मिले भी न होंगे ज़िन्दग़ी में कभी भी, जिनसे 
पहली बार मिलने पर, तो मुस्कुराते हैं न सब?
कितना भारी होगा गोला दागना, भारी मन से?

कुछ लोग टीवी पर जंग करते हैं, हर शाम को
हम सोचते हैं कैसे रोकें अब इस कोहराम को
हमने पूछा किसी से जो जानकार थे, वो बोले
आन-बान की लड़ाई है, बचाना है निज़ाम को।

         कहीं अगड़े और पिछड़े की जंग
         कहीं  पै गोरे और काले की जंग
         जब झाँका अपने अन्दर तो पाया
         चल रही ख़ुद की ख़ुद से ही जंग।

जीतनी है ग़र जंग, ख़ुद को जीत लो, साँईं
नफ़स पर नज़र, अपनी ही , रख लो , साँईं
अगर कोई करे हंगामा , चुपचाप सह लेना
मौका इबादत का ,  इबादत कर लो , साँईं।

नफ़स=साँस।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि

Wednesday, September 9, 2020

दुआ

इबादत मेरे अरमानों की मुकद्दस कहानी है
ये तो गंगा के बहते हुए जल की र वानी है
न समझना किसी किस्साख्वाँ की ज़ुबानी है
ये तो बिस्मिल हुए दिल की पहली निशानी है।

बख़्तर है मेरा नूरी, झिलमिल ओ अब्क़री
मुसल्लस में बैठ कर के, तेरी करूँ हुज़ूरी
तेरी इनायतों से, मुकम्मल है मेरा मसकन 
तू ही मेरा मुकद्दर, सदा तू ही तो है ज़रूरी।

तू ने बचा लिया , दिखला कर मुझे उम्मीद
तेरा न बनू तो किसका, जाकर बनू  मुरीद
जब भी हुआ हूँ रूबरू, तूफ़ानों के रेलों से
तूने हटा के बादल, दिखलाया था ख़ुरशीद।

तू रुक नहीं सकता, मैं तुझे खो नहीं सकता
तू हँस नहीं सकता, मैं तुझ पै रो नहीं सकता
कशमकश बढ़ रही है, कुछ कर नहीं सकता
दीवानगी मेरी हक़ीक़त, इसे खो नहीं सकता।

मुकद्दस=पवित्र। अब्क़री=genius, unique.
मुसल्लस=त्रिकोण। मसकन=घर। ख़ुरशीद=सूर्य।

Note: to understand त्रिकोण, please go to
my blog ' Tertius Oculus or the third eye'.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि

Tuesday, September 8, 2020

आपका क्या ख़याल है?

मेरे सामने वाली छत पै, एक झंडा फ़हराता है
उसे देख के मुझको, इक ख्य़ाल उभर आता है।

क्या वो आसमान से मिलने की, तमन्ना करता है
या अपने अकेले अंदाज़ को, मुकम्मल करता है?

कभी तो वो ख़ुश होकर, ज़ोरों से फ़ड़फ़ड़ाता है
कभी मायूसियों के बीच, शिकस्ता नज़र आता है।

लोग कहते हैं , वह हवाओं का रुख़ समझता है
हमें अपना रुख़ समझने का, तरीक़ा बताता है।

मेरा ख़याल है कि वह इबादत, किया करता है
नाज़रीन को परस्तिश की दावत दिया करता है।

मुकम्मल=पक्का। शिकस्ता=हारा हुआ।
नाज़रीन=दर्शक। परस्तिश=पूजा।      
आपका क्या ख़याल है?

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि

Monday, September 7, 2020

आख़िर क्यों?

उस चोटी पै ज़मीं, आसमाँ आते हैं, मिलने के लिए
ऐसा न हुआ, एक आए दूसरा न हो, मिलने के लिए।

कभी मैं जाता हूँ उस चोटी पै, उनसे मिलने के लिए
पाता हूँ, वो चले गए दूर की चोटी पै, मिलने के लिए।

        ज़ख्म भर जाते हैं, चोट मिलने के बाद
        दिल नहीं भरते, बारहा मिलने के बाद।

मिलने के बाद भी बाकी है मिलना, शायद इसलिए
जज़्बा बनाए रखते हैं, आख़िरी बार मिलने के लिए?

    असल में मिलना तो तभी न कहा जाता है
     जब दो की जगह सिर्फ़ एक नज़र आता है।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि

Sunday, September 6, 2020

ख़ामोशी

कहते हैं ख़ामोशी में दुआऐं कुबूल होती हैं
रोते रहने से तो बस आँखें फ़ुज़ूल होती हैं।

कोई तो होगी आरज़ू, धरती ख़ामोश रहती है
ख़्वाबों और ख़ाक़ में , इक यारबाशी रहती है।

घुमड़ती घटाऐं देख, बिजली कड़कने लगती है
धरती का तहम्मुल देख, बारिश बरसने लगती है।

ख़ामोश निगाहों में जो इक सुकून रहता है
इक ख़ामोश दिल ही उसे सम्हाल सकता है।

ख़ामोश भर रह पाने की नेमत, तू बख़्श दे
ख़ुद ब ख़ुद तेरी क़राबत में होंगे, तेरे ये बंदे।

यारबाशी=याराना। तहम्मुल=सब्र।
नेमत=वरदान। क़राबत=क़रीब में।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, September 3, 2020

नील फ़ाम

दिल से आवाज़ देना, मैं चला आऊँगा
तुम्हारा नसीब हूँ , मैं फ़र्ज़ निभाऊँगा ।

परचम की तरह मैं, लहराता रहता हूँ 
मुसल्लस के दरम्याँ आबाद रहता हूँ । 

दायम ताज़ातरीन हूँ , मैं ग़ैर फ़ानी हूँ 
ग़ैर जिस्मानी, लासानी, आसमानी हूँ ।

इख़्तियार करने की कोशिश न करना
मुझ पै यक़ीन कर, मेरे पास बने रहना।

अन्दर में  रहना, मुब्तसिर होके रहना
मैं फ़ुरोज़ हूँ , फ़ुरोज़ाँ होके रमे रहना।

नील फ़ाम = नील बिन्दु।परचम = झण्डा।
मुसल्लस=त्रिकोण। दायम=सर्वदा। ग़ैर फ़ानी = अमर।
ग़ैर जिस्मानी = बिना शरीर का।लासानी=unique. 
इख़्तियार= overtake.मुब्तसिर=तसल्ली से। 
फ़ुरोज़=प्रकाश।फ़ुरोज़ाँ=resplendent. 

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि

Monday, August 31, 2020

मुहब्बत

मुहब्बत में सिर्फ दीवानगी की ज़रूरत होती है
बाकी चीज़ो की तो जनाज़े में ज़रूरत होती है।

मुहब्बत एक बार होती है, ऐसा जानकार कहते हैं
बाकी तो उम्र भर, सब में वही सूरत ढूँढते रहते हैं।

ज़िंदगी तो गुज़र जाती पर उसके होने से ऐसा होता
तपती धरती पै बारिश की बूँदें गिरते ही, जैसा होता।

वो सिखाता रहता और मैं चुपचाप सीखता रहता
हारते हुए भी मैं ज़िंदगी को बराबर जीतता रहता।

मुझे ग़म नहीं है कि उसने यूँ भुला दिया है मुझको
जो दे दिया है अब तक, वही सम्हाल लेगा मुझको।

मुझे और क्या चाहिए भला, उसकी यादों के सिवा
एक एक लफ्ज़ ज़ुबाँ पर है, जो बन गया है सिला।

सिला=इनाम।

ओम् शांति:
अजित सम्बोधि

Sunday, August 30, 2020

तू ही तू है

ये सुबह का वक्त और, आसमाँ में तायरों का गुलोरेज़
तेरा है करिश्मा, मगर तेरा न दिखाई देना, हैरतअंगेज़।

उधर देखो परिन्दे उड़ रहे हैं आसमान में , लहर बनकर
मुझे लगता है वो झूलते हैं हवा में तेरी अंगुली पकड़कर।

पलक गिरते ही अंदर खिलता है गोशा गोशा मुस्कुराकर
तेरी बे-इंतिहा शक्लें दिखती हैं , पहिचान  एक  बनकर।

सच कहूँ , मुझे इस बात का डर सताता रहता है हरदम
तेरा नाम मेरे चेहरे पै न पढ़ ले, कोई पहरेदार, गजरदम।

      खयालों की दुनिया को तू ही आबाद रखता है
      झलक पाने को तेरी, ये दिल मुश्ताक़ रहता है 
      मुहब्बत करने को एक उमर काफ़ी नहीं होती
      तेरी खा़तिर ऐ कामिल, ये आमदोरफ्त़ रहता है।

तायर=पक्षी। गुलोरेज़=चहचहाहट। हैरतअंगेज=amazing.
गोशा-गोशा=अंग-अंग। गजरदम=early morning.
मुश्ताक=desirous. कामिल=पूर्ण।आमदोरफ़्त=आना जाना।

ओम् शान्ति:
अजित संबोधि

Saturday, August 29, 2020

ठीक है

तुम आए मेरी ज़िन्दगी में और चुप रहते हो, बिला वजह
जब कि मैं मुंतजि़र हूँ तुम्हारी आवाज़ का, हर इक सुबह।

 जि़ंन्दगी का शुक्रिया, ज़िंदा हूँ तुम्हें याद करने के लिए
मुश्किल होती, याद न होती जो तुम्हें याद करने के लिए।

तुम्हारी यादों के दिये , मेरी आँखों में जला करते हैं
तुम्हें शायद ख़बर न हो, ये आँसुओं से जला करते हैं।

         तुम अपनी ज़िद पै क़ायम रहो
          कि जैसे मुझसे मिले न थे तुम
          भुला दो मन से यादें भी मेरी
           कि जैसे सपने भुला देते हें हम।

जिस्म को तो मैं खो दूँगा इक दिन, कोई भी हो वजह
महक मेरी मिल जायेगी मगर, उड़ती हुई जगह जगह।

मुंतज़िर= इन्तिज़ार में।

ओम् शान्ति:
अजित संबोधि

Friday, August 28, 2020

तू तो है न

दर्द भी तू है और दवा भी तू ही है
 क्या कुछ ऐसा भी है जो तू नहीं है?

अब थक गया हूँ तुझको ढूँँढते ढूँँढते
अगर बता देते तो हम कुछ और करते।

रात भर बारिश की आवाज़ सुनता रहा हूँ, नींद में
ज़िंदगी की शाम है, शायद तुम मिल जाओ नींद में।

लोगों को पता नहीं रात में फ़ुरसत कैसे मिलती है
मुझे तो तेरा एक करिश्मा देखने में रात बीतती है।

कितने लोग हैं जो तेरे चाँद सितारों को देखते हैं
हाँ तेरे चाँद और सितारे ज़रुर सबको देखते हैं।

तुझसे मुहब्बत करना कोई गुनाह तो नहीं है
आखिर ज़िंदगी जीना कोई आसान तो नहीं है।

ओम् शान्ति:
अजित संबोधि

Sunday, August 16, 2020

KRISHNA JANMASHTAMI. 2020

Today marks the day of the birth of the unborn
We celebrate it so nobody is left to feel forlorn
Basically invisible, He allows Himself to be seen
Being adorable, everyone desires, Him to adorn.

His name is Krishna, which means: He attracts!
As a friend, philosopher, and guide, He adapts
Himself; so as to fulfill every wish of His acolytes.
With His lovable pranks, everyone He enchants !

I adore Him because He runs to help the needy
If you call Him intensely, His help is ever ready
Even if you forget Him, He doesn't forget you
In fact He cautions you, if ever, you're unsteady.

Whenever I was disturbed, He gave me solace
I didn't ever feel desolate, because of His grace
Whenever I close my eyes, to remember Him
His soft blue light fills my whole inner space !

Om Shantih
Ajit Sambodhi

R A K S H A B A N D H A N 2020

Rakshabandhan is no bondage, but a band of bonding
Tied to the wrists of loved ones, for love ponding.
It has been in vogue since the ancient times, when
To the thunder of clouds, valleys began responding.

Try to remember when the moment of moments comes
And holds out the wrist, well before, it succumbs
To the charms of the overwhelming singularity
Of love that flows out silently, before it benumbs.

What is life, if not love, light, and laughter ?
It is always welcome: thereafter, as well as, hereafter.
Let it come from the hills and dales and hails and gales
As well as from the screenwriter and the underwriter !

But come it must, so as the moon shines all the brighter
The hills look greener and the grass feels softer.
It is the magic of love, light, and laughter that makes
The morning breeze fragrant and the bulbul sing sweeter.

Let this Rakshabandhan bring hope to every blighter
And a yearning for home and hearth, to the fighter.
Our earth can be much more lovable and livable
If only we stop imitating Hector, and factor in factor !

Om Shantih
Ajit Sambodhi