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Wednesday, October 27, 2021

E= Love.C^2

I notice an aeroplane making a beeline
Across the sky, displaying a  white trail.
It lugs on its flight a timeline of people
From different lands, on the same  trail.

Is not earth a  galactic plane orbiting in
Space, carting people of diverse climes?
Nonstop rhythmic, it keeps on chugging
In its orbit,humming the diurnal chimes!

We happen to be on joyride, all the time
Grooving and savouring, till the last day.
Let's look for some reason, some rhyme
Some rationale, for this  persistent play.

Einstein's letter to Lieseri, his  daughter
Says that science as yet knows nothing
About the powerful force that can alter
The wellbeing of earth, with its upswing.

He wrote, that puissant force was LOVE
That could blast all hate to smithereens.
If 'M' in his equation is replaced by Love
That shall be the death knell of screams!

Love is quintessence.It's the prime mover
It's behind every phenomenon of cosmos.
He asked his daughter to shield the letter
Till society doesn't discard it as brumous.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.


Sunday, October 24, 2021

The Thin Air

The air is so thin, it's invisible
It displays shimmering colors!
Tad kaleidoscopic and  visible
A panaroma of rainbow colors!

They pop up in front of my eyes
Begin to scintillate; what magic!
They are friendly like good guys
The scenario is quite mesmeric!

They hang about without strings!
I'm amazed how they keep afloat
As I don't notice any water wings.
At times they melt & then  refloat!

The air is thin but full of wonders
Life exists, with the aid of thin air.
Wonder we don't see its wonders!
High time to add prayer to thin air.

Wonder how one can be unhappy!
How do we manage to pick fights?
Planet is designed all time  zappy
The Invisible displays, elfin sights!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Thursday, October 21, 2021

Sitting By The Window

The  sky is grand, bright, and blue
Spread all over, in its glorious hue.
I don't know if it has a bordor to it
But it keeps all, intact with its glue.

Oft I sit by the window to watch it
I try to go deeper, &, deeper into it.
I raise my eye balls upwards and I
Find myself burrowing deep into it.

The sky begins to swirl like an eddy
Surprisingly I find, I'm not unsteady
I get into it, without any reservation
I am wonderstruck but it isn't heady.

It grows deeper. When shall it stop?
My eyelids are heavy, begin to drop.
The scene  doesn't suffer, a change
A  soft glow looms, in the backdrop.

It's comforting like the moon's light
It is deeper but still within my sight.
The sky looks like a home to riches
 Aplenty, & it bestows them outright.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Monday, October 18, 2021

प्यार की दौलत

तड़पती धरती पे बारिश गिरती है

धरती फ़ौरन से महकने लगती है
किसी के लिए दो आँसू गिरा देना
फ़िर देखो फ़िज़ा कैसी महकती है।

प्यार में होती है इक ऐसी कशिश
मिटा के रख देती है सारी ख़लिश
अपने दामन में सभी को समेट ले
बस यही होती है उसकी ख़्वाहिश।

चाहे किसी को भी परख के देख लो
अन्दर से अच्छे से झाँक के देख लो
किसी भी इन्सान को बुरा न पाओगे
इक बार पूरा सा प्यार देकर देख लो।

हर इंसान में इक दरिया बहा करता है
बिला नागा वो हर वक़्त बहा करता है
उसको पास से सुनना वो जो कहता है 
वह प्यार पाने और देने को  तड़पता है।

प्यार का दस्तूर बड़ा ग़ज़ब हुआ करता है
सीधा और सच्चा, बस ऐसा हुआ करता है
देने पर दुगना होकर वापस मिला करता है
दिल में भरा रहता है, आला हुआ करता है।

प्यार में ख़ालिक़ की ही झलक होती है
प्यार में उसे ही पाने की, ललक होती है
एक राज़ की बात बता देता हूँ आज, मैं
प्यार ख़ालिक़ की  भेजी मलक होती है।

कशिश=आकर्षण।ख़लिश=चुभन।
 ख़ालिक़ = creator. मलक= fairy.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Friday, October 15, 2021

ख़ामोशी

ऐसा मत न समझने  लगना
ग़लतफ़हमी में मत न रहना
कि आवाजों की आवाज़ में
शोर ओ ग़ुल के शोरोग़ुल में
ख़ामोशी  ख़ामोश  होती  है
उसकी कुव्वत ज़ार होती है।

मेरी बातको ग़ौर से सुनना
दिलो ओ दिमाग़ से सुनना
जब आवाज़ ख़त्म होती है
ना  होने पर ग़म में होती है
ख़ामोशी बरक़रार रहती है
वह हमेशा मौसूफ़ रहती है।

जब कुछ न था, ख़ामोशी थी
कुछ न होगा , ख़ामोशी होगी
काइनात ए ख़ामोशी दाइम है
अज़ल से आक़बत, क़ायम है
ख़ामोशी की दास्तान जानिए
और ख़ुद को ख़ामोश राखिए।

आप जो यह जिद्दोजहद देखते हैं
हरेक जानिब जंगोजदल देखते हैं
क़त्लेआम, ये ख़ूनख़राबा देखते हैं
बहसमुबाहसा,शोरशराबा देखते हैं
ये बेहोश हें ये ख़ामोशी नहीं जानते
अनाड़ी, ख़ामोश रहना नहीं जानते।

कुव्वत= शक्ति। ज़ार= क्षीण।
मौसूफ़= प्रशंसनीय। दाइम= शाश्वत।
काइनाते ख़ामोशी= सन्नाटे का जगत।
अज़ल से आक़बत= प्रारंभ से प्रलय।
जानिब= दिशा में। जंगोजदल= युद्धोन्माद।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Tuesday, October 12, 2021

उजाला भर दे।

ऐ मालिक इतनी इनायत कर दे
सब के दिलों में उजाला भर दे।

बड़े नादाँ हैं ये कुछ नहीं समझते
इनमें अपने फ़ज़ल का रंग भर दे।

कोई ग़ैर ज़बान का या ग़ैर ज़ात का
इन्हें भाता नहीं, इनमें समझ भर दे।

ग़ैर मज़हब के लिए तेग़ा निकालते हैं
ये अँधेरों में भटकते हें, रोशनी भर दे।

आदमी मिलना  बड़ा दुश्वार हो गया
अपने इंसान में ज़रा इंसानियत भर दे।

ज़मीं आसमाँ दिए, शम्सो क़मर दिए
आबोहवा दी, दिलों में प्यार भी भर दे।

हमने शादमानी माँगी थी यहाँ पे, मगर
जीना मुहाल हो गया, अब रहम कर दे।

बहुत हो गया, अब तो ये फ़र्क़ मिटा दे
दिलोजाँ में ज़रा कोई शबाहत भर दे।

वैसे तेरी आदत से अच्छे से वाक़िफ़ हूँ 
ऐसा कर दे मुझे तू बेनियाज़ी भर दे दे।

ज़र्रे ज़र्रे में बिखरी तेरी महक, गुंबदों के
नीचे समेट रहे जो, उन्हें अक़्ल भर दे दे।

फ़ज़ल= कृपा।तेग़ा= शस्त्र।दुश्वार= कठिन।
शम्सो क़मर= सूरज चाँद। शादमानी= ख़ुशी। 
मुहाल= नामुमकिन। शबाहत= समरसता।
बेनियाज़ी= उदासीनता। 

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, October 9, 2021

4.30 A.M, October 4, 2021.

I heard the bulbul chanting
It was early in the morning
I sat up, & then went down, 
And saw the moon shining.

I kept looking at the moon
It  was a  crescentic moon
Hanging high up in the sky
It was no less than a boon!

I stood there & kept looking
A bird flew past me singing
I could see dark silhouettes
of trees across the morning.

Now the moon looked at me
Crescent arms encircled me
My breathing stopped & I felt
The cosmos had engulfed me.

It endured I know not how long
Then the milkman came  along
Unwillingly I pulled me out of it
For the experience  was a song!

Was I on a trip to hallucination?
Was it a figment of imagination?
What then was the ocean of love
I dipped in? It was a benediction!

Sky loves with its sun in the day
At night its moon and stars play
We tread the earth in iron boots
She lovingly provides a field day!

The fact is, every thing loves us
Trees give food,fuel,shade to us
Birds provide sweet songs to us
Air and water gift life to all of us.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.




Wednesday, October 6, 2021

Do We Need A Poet's Heart To Pray?

The sun rises aptly every day
It doesn't ever take a holiday.
It gives us light
It gives us heat
It gives  us  life
So we may live from day to day.
Am I right, in a way, as of today?

The breath rises in us , every instant
It doesn't take a break for a moment.
It makes us laugh
It makes us dance
It  makes  us  live
So we may live each & every moment
Am I right on the spur of the moment?

There is an invisible hand at play
That does it for us, without delay.
Whose hand is That?
Do we not miss That?
Must we not find That?
Yes, we can find THAT, if we pray.
Do we need a poet's heart to pray?

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Sunday, October 3, 2021

LIFE SPEAKS !

I cherish lazing around, in my balcony

Here hangs around, a mystic harmony 
With Existence. It is spacious & open,
Chaproned by tall trees & the blue sky.

Here it's a bulbul in this nook, chanting
There're those seven sisters chattering.
I can hear a parrot squawking feelingly
And in that trove, a lone dove is cooing.

            Birds make good company.
            They hop about ebbuliently
            And they are'nt afraid of me.
            They are, so to say, cousinly.

There comes in, a scarlet cloud floating
Below it is a flock of sparrows chirping.
The sun is shedding its few last shafts
To their nests, all the birds are heading.

A light breeze caresses both my cheeks
A flying grus flapping its wings, squeaks.
The evening has arrived. The rendezvous
Is over. It's time to go home. Life speaks!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Tuesday, September 28, 2021

पता लगा

रब का इरादा क्या था, मुझे पता न लगा

जब मंज़िल चल के आई, तो पता लगा।

घौंसले को मानता था, यही सब कुछ है
पर निकले तो हैरतकदा का पता लगा।

जिनको याद करते हैं, उनसे बात नहीं करते
बात करना फ़ालतू है, अब जाके पता लगा।

एक गद्दे ढोके थका, एक गद्दे पे सो के थका
ग़ुरबत और कसरत का फ़र्क़, तब पता लगा।

घर, बीबी, नौकरी, सब बदल दिया, कुछ न हुआ
ख़ुद को बदला करिश्मा होगया, देर से पता लगा।

लोग ऐसी बातें करते हैं कि अपना माथा ठोक लें
मगर गाँठके पक्के होते हैं, ठगे जाने पे पता लगा।

जब तक पास में थी, ज़िंदगी का एहसास न हुआ
अब जब साँस लेने में दिक्कत हुई, तब पता लगा।

वफ़ात बज़ाहिरा सच है, कभी ग़लत साबित न हुआ
इसका नाम लेने से लोग कतराते हैं, अब पता लगा।

दिल अकेला होता है , उसको रुलाया नहीं करते
हम ख़ुद पे सितम ढाते रहे, अब जाके पता लगा।

आज काम में मसरूफ़ रहा, सोचा अब बताऊँगा
किसको बताओगे, दीवारों ने पूछा, तब पता लगा।

हैरतकदा= आश्चर्यजनक विश्व। कसरत= अमीरी।
ग़ुरबत= ग़रीबी। वफ़ात= अंत। मसरूफ़= व्यस्त।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, September 25, 2021

कई बार

कुछ किस्सों से मन नहीं भरता, सुनते हैं, कई बार
कुछ दामन पकड़ लेते हैं, सुनने पड़ते है, कई बार।

मुस्कुराना कोई आसान नहीं होता है बारहा, जनाब
मुस्कुराहट में आँसू निकल आया करते हैं, कई बार।

बड़ी उम्मीद से हाथ पकड़ कर निकलते हैं सफ़र में
सफ़र पूरा होने से पहले हाथ छूट जाता है, कई बार।

ज़िंदगी के हर पन्ने पर कुछ तो लिखा होता है, जनाब
हम हैं कि बिना पढ़े ही पन्ना पलट देते हैं , कई बार।

ख़ामोशी तो रूह की पसंदीदा हुआ करती है, साहिब
लोग हैं , अपने होंठों को सीं लिया करते हैं, कई बार।

मैं नहीं पहिचान पाया हूँ अपने को अभी तक, जनाब
लोग मेरी तस्वीर को मेरी पहिचान बताते हैं, कई बार।

मैं बड़ा खुशगवार हूँ कि इतनी महंगाई के दौर में भी
मुझे दुआऐं मिल जाती हैं बिल्कुल मुफ़्त में, कई बार।

कभी कोई बोला था तो मैं भीग गया था , अचानक से
लफ़्ज़ भी बारिश की बूँद बन जाया करते हैं, कई बार।

एक दोस्त ने पूछ लिया , कैसे रह लेते हो तन्हाई में
यादों की बस्ती से ये रहगुज़र नहीं  जाती, कई बार।

ख़्वाबों को तो मोतियों से ही पिरोया करते हैं, जनाब
गलती ये होती है धागा कच्चा रह जाता है, कई बार।

समंदर में डूबने की ज़रूरत किसको महसूस होती है
आँखों का पानी ही बहुत है डुबाने के लिए , कई बार।

सारे ग़म झोली में आ गए एकबारगी, किस सफ़ाई से
मिलके उठाऐंगे हर बोझ, वायदा ये हुआ था, कई बार।

कौन चाहता है अपने शिकस्ता दिल को उजागर करना
हारा हुआ इन्सान भी मुस्कुराता मिल जाएगा, कई बार।

सारी उम्र निकल गई है , बस अदाकारी करते करते
अब ज़िंदगी सादगी से बिता लूँ, सोचता हूँ, कई बार।

कितनी भी ऊँची उड़ान भर लो, हश्र तो एक ही होगा
ज़मीं पर आना होगा, दुहरा लो कोशिश, कई कई बार।

रब की मेहरबानी है ऐसा हमसफ़र दिया, कई कई बार
ज़िंदगी चुलिस्ताँ हो जाती, ग़र सब्र न मिलता, कई बार।

ज़िन्दगी के फ़लसफ़े पर हँस लिया करता हूँ, बार बार
किरदार मैं भी हूँ, ख़ुद पे भी हँस देता हूँ, कई कई बार।

सच चेहरे पर लिखा रहता है साफ़ साफ़ उस छोर तक
झूठ सफ़ाई देता है मुस्कुरा मुस्कुरा कर, कई कई बार।

वो चालाकियाँ करते रहते हैं और इतराते हैं हर बार
क्या नज़रों से गिरना कम सज़ा होती है? कई बार?

बीमार होने पर ज़रूरी नहीं आपकी ख़ता हो, हर बार
लोग पूछ पूछ कर बीमार कर दिया करते हैं, कई बार।

मुलायम बिस्तर पर भी नींद नहीं आती है, कई बार
ख्वाहिशें न हों, पत्थर पे नींद आजाती है, कई बार।

ख़ूब बोले वो ज़िन्दगी भर, शोहरत पाई, दौलत पाई
मगर कुछ ऐसा खो दिया, जाते वक़्त रोये  कई बार।

मैं ख़ामोश था और सामने जलता दिया भी ख़ामोश था
ख़ामोशी को ख़ामोशी से जवाब मिल जाता है, कई बार।

बारहा= अक्सर। रहगुज़र= डगर। चुलिस्ताँ= a desert devoid of oases.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Tuesday, September 21, 2021

Looking for Peace?

Who is there who does not want peace?
Who'll raise hand against golden fleece?
A raised hand would be flabbergasting
Yet, one thing that is in deficit, is peace!

People want peace, all of us want peace
In our heart of hearts we crave for peace
We go places, we go to the highest peaks
To caves in the wilderness, to seek peace.

We seek the grace of yogis and saints
We go to temples and offer our plaints
We take a dip in all the hallowed rivers
Hoping it will wash all the varied taints.

Yet peace deludes us, wherever we look
Earth is strife ridden to its farthest nook
Man fights man, trounces him, kills him
Be he friend or foe, gentleman or crook.

We look for peace where it doesn't exist
We're always playing the game of whist
We are outward-facing and hence never
Look inside where peace awaits its tryst!

Today is The International Day Of Peace
Time to, pent up misconceptions, release
The only way is to look inside and become
A peacenik and a member of Greenpeace!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Sunday, September 19, 2021

पूछा

दुलहन ससुराल आई, क्या लाई, सब ने पूछा
कितनों को रोता छोड़के आई, किसीने न पूछा।

सोचा मिलता चलूँ दिल हलका ही हो जाएगा
कहाँ को जा रहे हो, उन्होंने तो ये तक न पूछा।

लोग बड़ा ख़्याल रखते हैं , हरेक बदहाली का
टूटने पर भी कैसे मुस्कुरा लेते हो, उन्होंने पूछा।

जैसे अँधेरों में जुगनू मुस्कुराते हैं, मैंने कहा था
कितनों का भला किया था , उन्होंने फ़िर पूछा।

अच्छे होने पे क़ीमत तो चुकानी ही पड़ जाती है
आपकी दुआ है, बोल देता हूँ, जिसने जब पूछा।

किस के हक़ में दुआऐं किया करते हैं आजकल
किस के दिल पे हुकूमत करनी है? उन्होंने पूछा।

बदसलूकी करने की मेरी फ़ितरत नहीं है, साहिब
मेरे दिल पे किसकी हुकूमत है, आपने नहीं पूछा।

ज़िन्दगी भर की कमाई गँवा कर आये हो क्या?
मुझको मालूम पड़ा जब आईने ने सवाल पूछा।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, September 16, 2021

उड़ गया

तोड़ कर के बन्दिशें सारी, परिन्दा उड़ गया
छोड़ करके महफ़िलें सारी, परिंदा उड़ गया।

सफ़र तै न हो सका, सफ़रनामा लिख गया
छोड़ कर सहन, दिल का परिन्दा उड़ गया।
 
मंज़िल मिली नहीं, नश्तर मगर, जड़ गया।
करके वीरान चमनिस्तान, परिंदा उड़ गया।

वक़्त बहलाता रहा, हम बहलते रह गये
ऐसे चली हवाऐं, बादबान सारा उड़ गया।

हाथ कुछ आया नहीं, फ़ैसला भी हो गया
कूच का फ़रमान था और परिंदा उड़ गया।

रगे जाँ को क्या, यह ख़बर न थी मिल सकी
तहफ़्फ़ुज़ दिलाने का, वसीला ही उड़ गया?

ऐ आसमाँ आबाद रह, तुझको तो है सारी ख़बर
हर बार का किस्सा यही, जो भी आया उड़ गया।

सहन=आँगन।बादबान= पाल।तहफ़्फ़ुज़= सुरक्षा।
रगे जाँ= main nerve. वसीला= ज़रिया।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, September 11, 2021

Lest I Should Forget!

Trees bear fruit when the season comes
All things happen when their turn comes.

Watch the breath, and see how it expands
On its expansion, life's extension depends.

The tongue is light, do not take it lightly
After making a mess , it retracts rapidly.

Greed breeds anger, which is a stranger
It's compassion that is a game changer. 

Remain cautious, speech is precious
Before going public, make it gracious.

Remember each breath as benediction
Who knows, this might be the last one.

Trees stand all their life to undo our strife
By giving shade, fruit, fuel, & breath of life.

 Dance to the pan-music of humming
See the overt and the covert merging.

Only love is, resonate with it
Be ecstatic  and  click  with it.

Seek cosmic essence with love  & patience
Never be tense, sit silently and experience.

Without cosmic essence , one goes tense
And loses patience and takes to pretense.

Let one  stop  fighting
Life will start flowing.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Thursday, September 2, 2021

THE SEER IS THE SEEN

Rather than lying on sides, lie supine
It will help put spine, in a straight line.
Straight spine is strong.The pathway
to godhood passes through the spine.

Close your eyes and watch your belly
Feel how it goes up & down, the belly!
It moves on its own. You only watch!
With closed eyes you can easily tally!

Keep it going till you slide into sleep
You'll find you got a very good sleep.
It may be long or short but one thing
Is sure: you will be crazy about sleep!

One day the impossible shall happen
You will see that the Seer is the Seen!
Call it The Game of Cosmic Bo-Peep!
The outer shell falls, only One is seen!

You find you aren't inhaling or exhaling!
Which shows that you aren't breathing!
But how can one live without breathing?
Is it a high, potentised dose of breathing?

Yes, it is a form of microscopic breathing
Your breath does exponential expanding
It is stretched out thin to unknown limits
Your breath rate is in a free fall, dropping!

In your sleep, you see you aren't asleep
But an accessory of the cosmic sweep.
The heaving belly is the cosmic energy
In action. Listen to loyal cosmic cheep!

You would be on an unknown bandwidth
Blissfully one with the cosmic tunesmith
Frolicking amongst the luminous clouds
Scintillating on numberless wavelengths.

You won't be waking, sleeping, dreaming
Friends, you will be in satori, meditating!
When in deep sleep, you encounter it but
Forget on waking up. Keep up meditating!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Monday, August 30, 2021

Happy Birthday KK !

On this day, the unborn had been born
From his mother to be right away torn.
Although born within the prison walls
Vasudeva took him away, head-borne.

The unmanifest had become manifest
As if in answer to the relentless quest
of the yearning hearts, over the aeons.
His arrival put the eager hearts to rest.

Sire became son; impalpable , palpable.
What was impossible, became possible.
It was the most apocalyptic of all times.
Amity of the enchanter became feasible.

He was a darling of all, opulent or poor
Cowboy or a gopi, classmate or a ruler.
But there were few who could'nt grasp
The significance of Krishna's grandeur.

He lived amongst humans as a human
Underwent tribulations like any human
Suffered indignity & vituperation galore
He lived as the commonest of common.

What makes him look apart from the rest?
He being equal & yet quite above the rest?
It's his benign smile that played on his lips
Its enigma that made everyone feel, blest!

With Krishna in hearts, we can wish away
All the vicissitudes of life, in an easy way.
Everything passes in this transient world
With Kanhaai, we can smile hurdles away.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Thursday, August 26, 2021

Will You Come......Pollyanna?

Here's not a pair of eyes awaiting
Nor any husky voice admonishing:
'You never carry your phone along
How to reach you, if it's alarming?'

The door stands ajar, way I had left
Here lies my book, upturned, bereft.
The living space bears...a stamp of
Soliloquy & its emptied warp & weft.

Oh my happenstance, o my solitude!
Where's gone thine benign beatitude?
The only thing that beckons me here
Is the ubiquitous silence of Infinitude.

This house used to be a home once
Inviting, loving, caring...every ounce.
Full of tranquility & balmy fragrance
Of unbroken elegance at first glance.

Now it is.. a pile of stones and bricks
And a bundle of multitudinous flicks.
Pollyanna.. it's not any longer a home
Will you come......to charm the matrix?

Ref: Pollyanna chapter xix 
Pendleton: “ It takes a woman’s hand and heart, or a child’s presence to make a home, Pollyanna; and I have not had either. Will you come Pollyanna?”
Pollyanna was a young orphaned girl, irrepressibly cheerful and unwaveringly optimistic.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Saturday, August 14, 2021

मालूम न था

सब कुछ होगा, मगर ऐसा होगा, हमें मालूम न था
ज़िन्दगी इतनी नामेहरबां होगी , हमें मालूम न था।

दिल था हमारा सीने में, धड़कता भी था हर शै पर
बेदस्तोपा हो जायेगा इस क़दर , हमें मालूम न था।

आसमां नीलफ़ाम था, चमकता था चांद भी उसमें
यकायक तूफ़ान से भर जायेगा, हमें मालूम न था।

गुल थे शाख पे, गुंचे भी थे, परिन्दे भी थे ख़ुशगुलू
शजर ही गिर पड़ेगा भरभराकर, हमें मालूम न था।

जहां भी क़दम रखते थे , चमन आबाद दिखते थे
ख़ुद का रोपा ही उजड़ जायेगा, हमें मालूम न था।

एक पुल होता था, बरवक़्त, दरिया पार करने को
वही बह जायेगा, बेवक़्त ऐसे , हमें मालूम न था।

कैसे उजड़ता है बसा घर, यह तो किस्सों में होता था
हमही बन जाएंगे किस्सा एक दिन, हमें मालूम न था।

जीते जी मर जाना किसको कहते हैं, हमें मालूम न था
सांस आती रहेगी, जान जाती रहेगी, हमें मालूम न था।

ख़्वाब बहुत ख़ुशदिल होते हैं, और हक़ीक़त संगदिल
जो चला गया वोह ख़्वाब था क्या? हमें मालूम न था।

नसीहत देने वाले ख़ूब मिलते हैं, साथ देने वाले नहीं
दोनों मिले थे एक में, छूट जाऐंगे, हमें मालूम न था।

सोचता था मुहब्बत में दर्द, फ़र्क़, और फ़र्ज़ रुलाते हैं
यादें भी रुलाया करती हैं, यह तो, हमें मालूम न था।

कुछ कह लेना, कुछ सुन लेना, यही तो करता था मैं
यह दस्तूर भी अधूरा रह जाएगा, हमें मालूम न था।

जिनकी ताउम्र ज़रूरत थी, उन्हें खो दिया है आज
अब खोने को कुछ बचा ही नहीं, हमें मालूम न था।

मैंने उनको वक़्त दिया, उन्होंने मुझको वक़्त दिया
यह साझेदारी ख़त्म हो जाएगी, हमें मालूम न था।

हम कद्र करते थे मिल कर, ज़िन्दग़ानी के अहद की
ज़िन्दगानी उधार की बन जाएगी, हमें मालूम न था।

कितने भी क़रीब हों, हर बात का पता नहीं चलता
इतनी चाहत होगी कि टूट जाएंगे, हमें मालूम न था।

लोग दिल में दिमाग़ को रखते हैं, मैं दिमाग़ में दिल को
दिल की सुनने में फ़कीर हो जाते हैं, हमें मालूम न था।

क्या दौर है, लोग समझते नहीं, समझा देते हैं, क़सम से
अपनी मुहिम में इतना क़ामयाब होंगे, हमें मालूम न था।

बुरा करने पर बुरा लगे यह तो लाज़िमी है ही, होना
अच्छा करने वाले भी नहीं भाते हैं, हमें मालूम न था।

चलती रहती है ज़िन्दगी सफ़र में बिला किसी हिचक के
वो भी तो थक जाती है एक वक्त पर, हमें मालूम न था।

कितने मसरूफ़ रहे थे हम तवक्कुल में साथ साथ
कौकब की भी एक उम्र होती है, हमें मालूम न था।

बेदस्तोपा= मजबूर। नीलफ़ाम= नीले रंग का।
शजर= पेड़। गुंचे= कलियां। संगदिल= पत्थर दिल।
बरवक़्त= हरवक़्त। ख़ुशगुलू= मीठी आवाज़ वाले।
अहद= paramountcy. मसरूफ़= busy.
तवक्कुल= total surrender to God.
कौकब= a very big and bright star.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Wednesday, August 11, 2021

ले चल यहाँ से।

चल रे मनवा चल तू यहाँ से
ले ले बिदाई ले चल यहाँ से
मन नहीं लगता अब है यहाँ पे
मेरा सहारा गुम है यहाँ से।

सूना है आँगन, सूना बिछावन
सूनी दुपहरी, सूनी है चिलमन
सूने कँगूरे, सूने झरोखे
बिरही के जैसे बिलखे है दरपन।
किसके सहारे अब मैं रहूँगा
ले चल मुझको ले चल यहाँ से।

किसको सुनाऊँ मैं अपनी कथा
किसको दिखाऊँ मैं मन की व्यथा
जिसको हुआ है तजरबा ए ग़म
वो ही जाने ग़म की प्रथा।
मुश्किल ही लगता अब तो है जीना
जाना ही होगा मुझको यहाँ से।

कहाँ से लाऊँ अब वो सफ़ीना
कहाँ पे पाऊँगा अब वो नगीना
ऐ रब क्या तूने ये कर दिया
छीना है मुझसे मेरा ख़ज़ीना।
मुझको है तुझ पे बड़ा एतमाद
रहम कर उठा ले मुझे भी यहाँ से
रहम कर उठा ले मुझे भी यहाँ से।

चिलमन=पर्दा। सफ़ीना=कश्ती।
ख़ज़ीना=ख़ज़ाना।एतमाद=भरोसा।

तमामशुद।
क़दमबोस
अजित सम्बोधि।

Sunday, August 8, 2021

6 अगस्त 2021, शाम 5 बजे लगभग।

मैं बैल्कनी में बैठा था
मौसम बिल्कुल सूखा था
कुछ कुछ गर्मी सी भी थी
मैं असमंजस में डूबा था।

मैंने पलकें झपकी थीं
या जम्हाई सी ले ली थी
मुझको ठीक से याद नहीं
पर कुछ तो बात हुई सी थी।

वह मेरे ऊपर बरस रहा था
सावन बनके बरस रहा था
मैं भौंचक्का सा देख रहा था
औचक बादल बरस रहा था।

इतना बरसा, इतना बरसा
जितना तरसा, उतना बरसा
गरमी तो काफ़ूर हो गई
मन हरसा और तन हरसा।

छत पर बच्चे नाच रहे थे
संग संग छाते नाच रहे थे
बादल घड़घड़ सी करते थे
या डांस पे वो भी थिरक रहे थे?

अब सब कुछ है ठहर गया
सड़क पे पानी जमा हो गया
पेड़ खड़े हें धुले धुले से
बादल वादा निभा गया।

बादल क्या था बदल गया
पल में मौसम बदल गया
मैं सोच रहा क्या मसला है
क्या और भी कुछ है बदल गया?

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, August 5, 2021

सावन का महीना

बादलों का सफ़ीना है, सब कुछ बाक़रीना है
तैरते हैं हवाओं पर, ये सावन का महीना है।
              पानी की छमाछम है
               लहराता परचम है
               देखें जिधर भी, उधर
               मस्ती का आलम है।
               बजती है हर तरफ़ में
               खुशनुमाई की बीना है।
रिमझिम बरसता है बादल कि जैसे पशमीना है।

                 परिन्दे करते किलोलें
                 हवाऐं गाती हैं ग़ज़लें
                 पेड़ों की शाख़ें भी
                 मनचलों के जैसे झूलें।
                 मचलते हैं लख़्ते बादल
                 खोल करके सीना हैं।
    बादलों से झरती फुहारें, कि जैसे नगीना हैं।

                   दूर मैं जो झाँकता हूँ 
                   हरी चादर ही देखता हूँ 
                   आसमाँ से ज़मीं तक बस
                   ख़ुशनुमाई देखता हूँ।
                   नज़रों को हर छोर पर
                   दिखता ख़ज़ीना है।
     महकता है सारा गुलशन, समा रसभीना है।

                   मन की किताब में
                   दिल के इंतिख़ाब में
                   चुनने में है मुश्किल
                   जो कुछ है ख़्वाब में।
                   दुआओं की बरसात है
                  गुलाबी आबगीना है।
     फ़ीरोज़ी रोशनी में, परदा झीना झीना है।

सफ़ीना= कश्ती। बाक़रीना= in sync.
लख़्ते बादल=बादलों के टुकड़े। ख़ज़ीना=ख़ज़ाना।
इंतिखाब=choice. आबगीना=गुलाब जल की शीशी।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Friday, July 30, 2021

Utopia

Utopia is where everyone is all smiles
You go to anywhere for miles & miles
You won't see a sad face, big or small
It is a land free from all sorts of guiles.

Here doors remain open like the skies
Hearts are open,there are no bad guys.
You won't sight any maiden in despair
Your ears won't hear any distress cries.

No one falls sick, everyone hits century
There are no hospitals, it's a sanctuary
Against every sin, banditry and warfare
There is neither money nor any poverty.

The trees bestow fruits, the whole year
Streams gurgle with crystal clear water
People dance, play, work,& make merry
There is love and laughter everywhere!!

Utopia unreal? no, it's overt on the earth
Sir Thomas More mentioned it first, but
Places like Hunza, Bama, Symi, existed.
Man loves to recreate paradise on earth!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Tuesday, July 27, 2021

ठीक है। पुनश्च ।

अजनबी बन कर के रहना अब ठीक है
किसी को तक़लीफ न हो, वही ठीक है।

बातें तो बेइंतहा हैं करने के लिए, ज़ेहन में
जिससे कर सकता, वो चला गया, ठीक है?

दीवानगी को समझने को दीवाना चाहिए
दुनियादारी में तो सभी माहिर हैं, ठीक है?

दुआओं में भी बरकत होती है, साहिब
दिल से दुआऐं मिल जाऐं वही ठीक है।

ख़ामियाँ भी कुछ कम तो नहीं हैं मुझमें
ख़ुदा का बंदा ही हूँ, ख़ुदा नहीं, ठीक है?

कुछ हैं समझ नहीं पाते , कुछ भुला नहीं पाते
वैसे सब कुछ ज़रूरत के मुताबिक है, ठीक है?

बतरस और समरस की अच्छी जुगलबंदी है
सीमा पार हुई, समरस घट जाता है, ठीक है?

मध्यम मार्ग ठीक है जो बुद्ध ने बताया हुआ है
कब मध्य रेखा लाँघ दी, इसमें पेच है, ठीक है?

लोग सवाल दाग देते हैं, बड़े एतमाद के साथ
मैं शरमा जाता हूँ, जैसे ख़तावार हूँ , ठीक है?

मैं तो ग़लतियाँ करता रहता हूँ अक्सर, ठीक है?
तेरी तो फ़ितरत में है माफ़ करते रहना, ठीक है?

ये बादल हैं, गोया आसमान में झूले लटके हैं
आख़िर महीना सावन का जो ठहरा, ठीक है?

चाहता हूँ ऐसे चलूँ, कोई पीछे न छूट जाए
अगर कोई आगे निकल जाए तो, ठीक है।

मैंने कब वक़्त का साथ निभाया था कभी
अब वक़्त ने मेरा साथ नही दिया, ठीक है।

कभी भी गले लगा लेता हूँ रूठे हुओं को
बचपन अभी बदस्तूर क़ायम है, ठीक है?

मैं तो एक ज़र्रा हूँ, ख़ुद से उड़ नहीं पाता
मर्ज़ी है हवा की, जिधर ले जाए, ठीक है?

यहाँ नफ़रत का काम नहीं, ज़िंदगी मुहब्बत
से शुरू हुई, मुहब्बत पे ख़त्म होगी, ठीक है?

पेड़ के मुरीद हो जाऐं, न गुरू न गीता और
न ही तीर्थयात्रा की दरकार होगी, ठीक है?  

सच से बोलना नहीं आता, तड़ातड़ बोल देता है
झूठ में भूमिका बोलती है, मुस्कुरा कर, ठीक है?

एतमाद= विश्वास। मुरीद= अनुगामी।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, July 24, 2021

Pegasus Unbound!

Prominent like Milkha, the flying sikh
Once it was a flying horse , Pegasus.
Milkha was Indian; Pegasus, a Greek
the one was real, the other allegorical!

To let in Pegasus, Medusa had to go
For Good to enter, Evil had had to go.
Pegasus was hostile to sinful forces
But helped anyone who called, Hello!

Try to imagine a strikingly white steed
So endowed with wings, to fly in need.
Strapping, alluring, ever willing to help.
You got the picture of Pegasus, indeed!

Pegasus helped Perseus, son of Zeus
Rescue the jittery Aethiopian princess,
Andromeda, from sea monster Cetus.
Andromeda became queen of Greece.

Perseus wed her, took her to Greece.
Next Pegasus aided Bellerophontes, 
the Corinthian, kill the fire-breathing
demon Chimera in a duel, like geese.

Pegasus is visible now in a new avtar
It is capturing headlines, near and far.
Old one sits snugly as a constellation.
Is avtar anywhere near its progenitor?

What is in a name? Said Shakespeare
A rose will be a rose sans any fanfare.
Hope Pegasus remains Pegasus, even
If, a software is made to do a malware!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.


Wednesday, July 21, 2021

Poetry? Eh, Poetry?

What use is poetry? What does it do?
A penman was asked to look through.
Homes are bereft of poetry sessions.
They want hissab, of all that it can do!

They say poetry can't solve equations
like math does, nor can do cesareans
like science does; true too can't make
guns to be mounted on to Centurions!

Nor can it manage a nuclear holocaust
to blast people to pieces to the utmost,
to welter in the aftermath of a tragedy
scripted by a real mathematical ghost!

Poetry can't toss off battle lines where
none exist. It can't array canons where
skies are romancing with hills & dales.
O, no,no, poetry is for love everywhere.

Poetry begins in prayer. It gushes forth,
from the heart, as gratitude pours forth
for all that cosmos showers on us sans
begging or hissab, so we blossom forth!

Without poetry,  heart is gonna run dry,
at the end of a manic day, awaits to cry.
Poetry and prayer are sisters twin who
swim in an ocean of love, flowing high!

One who is prayerful, is honestly a man.
Poetry is the vehicle to convey it to man
Poetry is the alter ego of prayerfulness.
Poetry is a manifestation of prayer, man!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Sunday, July 18, 2021

आज बरसे बादरिया

आई घुमड़ घुमड़
करती घरड़ घरड़
बरसे सरड़ सरड़, ये बादरिया।

मेरे मन में उमंग
दिल में छाई है उचंग
बाजे जैसे सरचंग, ये बादरिया।

धरती हरषित है
लता झूमत है
हवा चूमत है, ये बादरिया।

आज आई बरसात
बिछी ख़ुशी की बिसात
लेके आई सौगात, ये बादरिया।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।


कोयल

ये जो उड़के आई है कोयल, मेरी हबीब है
मेरे मर्ज़ का जवाब है वह , मेरी मुजीब है।

वो शबरंग है मगर उसका दिल शफ़्फ़ाफ़ है
वो कहीं पर भी हो, मगर होती मेरे क़रीब है।

वह मेरे दर्द को जानती है , दुहराती रहती है
मानो उसका ख़ुद का दर्द है, बेहद नजीब है।

उसकी कुहू कुहू से एक हूक सी उठा करती है
जिससे दिल की हालत होती अजीबो-गरीब है।

ऐसेमें उसका तराना, मेरे मन से मेल खाता है
लगता है मेरे लिए गाती है, मेरा ज़हेनसीब है।

वो मेरे क़रीब बनी रहे, यही दुआ मैं करता हूँ
उसकी क़राबत पे मैं उसको सलाम करता हूँ।

हबीब= प्रिय। मुजीब= हूँकारा भरने वाला।
शबरंग= काली। शफ़्फ़ाफ़= निर्मल।
नजीब= कुलीन। ज़हेनसीब= अहो भाग्य।
क़राबत=निकटता।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, July 15, 2021

Meditate! Eh, is that Easy?

There are as many avenues to meditate
as there are seekers willing to meditate.
See! Cranes for Ramakrishna, & fear of
death for Raman, led them to meditate!

To meditate, you got to rotate your gaze
by 180 degrees, and revoke your visage 
from the likes of sweat, sound, sickness
To waltz in the pastures of aurorean haze!

A cooing koel, or a frolicsome flycatcher!
Rustling wind, or a bulbul so very dapper!
Floating clouds, and roaring waterfronts!
Eh, go in, meditate, seek abiding rapture!

As you turn in, a vista opens, of silence
and luminosity, the nectarean essence
of life that sustains the whole cosmos.
All it needs is, your meditative presence!

World is deprived of one thing, innocence!
That is a big loss. After losing innocence, 
man grew hoshiyaar, rich. Poetry left him.
& meditation became, high-end pretense!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Tuesday, July 13, 2021

Sleep vs Meditation

Let me begin by fashioning a question. 
What happens after sleep deprivation?
You might have faced it , many a time
As if you were a victim of combustion.

 Now fancy a morning, after a deep sleep
When you felt, the experience was unique.
You did not know, where you had been to
But it looked like you had been to a retreat!

In sleep, your body remained lying here
& you went places, you know not where.
You talked and did many things in a body
Of a make other than the one lying here.

After dreams, you went into a deep trance
& you remember not of the happenstance.
All that you recall , after coming out of it
Is a feeling of renewal , at the first glance.

Unlike sleep, in meditation, you are aware
And the whole journey looks like a prayer.
You go to your abode where silence reigns
As a vast shimmering mass of divine fare.

In your sleep you visit this place every day
In a body that is nonidentical in every way.
It is meditation that shows that you come
From silence's & light's beatific interplay.

So let us tap this seraphic meditative fare
To access our ever abiding inner treasure.
Let us give our dear material body its due,
But we are always, and angelic, to be sure.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Saturday, July 10, 2021

चंद अशआर

जो इतना क़रीब था , अब इतना दूर है
क़रीब आते डर लगता है जैसे कुसूर है।

वक़्त कभी भी लौट कर नहीं आता 
यादें हैं कि उन्हें बुलाना नहीं पड़ता।

पूछा कैसे हैं?बोला, जैसा पहले था
आपको पता ही है, पहले कैसा था।

अब क्या बताऊं ज़ख़्मो हालात , ख़ुद के
ज़िंदगी गुज़री है, जवाब देते सवालात के।

जो ख़ुद नहीं समझते , मुझे समझा देते हैं
ज़रूरत है दुआ की, कोई दवा थमा देते हैं।

बोलते इतना हैं , अंदर का सुन नहीं पाते हैं
कमाई के अलावा कुछ भी देख नहीं पाते हैं।

क्या कोई बता देगा मुझको , सनद रखने के लिए
कितना कमाना चाहिए, खाली हाथ जाने के लिए?

ज़ुबान हल्की होती है, इसे हल्के में न लें , साहिब
बड़ा भारी होता है इसे सम्हाल के रखना, साहिब।

किस किस के सामने सही साबित करूं ख़ुद को
ज़ाहिर है, लोग तो बतायेंगे सही हमेशा, ख़ुद को।

फ़र्क़ नहीं पड़ता , क्या हादसा होता है
कुसूर हर मर्तबा, नक़दख़ां का होता है।

ख़ामोशी से बड़ा कोई सहीफ़ा नहीं होता है
उसमें हर सवाल का जवाब, लिखा होता है।

मालिक, तेरा नूर ज़हूर है, पर बड़ा दूर है
मैं तो मज़बूर हूं, पर क्या तू भी मज़बूर है?

कोई तुझ जैसा तो अभी तक मिला नहीं
हक़ीक़त ये कि, तू भी अभी मिला नहीं।

 नक़दख़ां= स्वयं। सहीफ़ा= किताब। ज़हूर= प्रकट।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।




Wednesday, July 7, 2021

ठीक है

लोग वफ़ात से घबराते हैं , ठीक है
अज़ल से घबराते आये हैं, ठीक है।

जो मखनी हैं या फ़िर  मिस्कीन हैं 
जो दबे हुए हैं, उनके लिए ठीक है।

मगर उनके लिए जो तवंगर या फ़िर
तनावर हैं, क्या उनके लिए ठीक है?  

ये कहते हैं इन्हें किसी का ख़ौफ़ नहीं
हाँ, मौत का भी नहीं, है न ? ठीक है?

क्या मौत से कह सकते हैं , तुम ग़ैर हो
तुम्हारी जगह तो कहीं और है, ठीक है? 

साहिब, मौत किसी को नहीं बख़्शती है
मौत के आगे सब कोई बौने हैं, ठीक है?

अगर जो एकसा हश्र है तो क्यों न बोलें
आओ, मिलकर जीऐं हम तुम, ठीक है?

वफ़ात= मृत्यु। अज़ल= प्रारंभ से।
मखनी= बलहीन। मिस्कीन= धनहीन।
तवंगर= धनवान। तनावर= बलवान।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।     ं 

Sunday, July 4, 2021

Who Am I ?

Let anybody ask
What is the task
That's global. Eh!
Wearing a mask!

The task is not glorious
Nor in anyway notorious.
But everyone knows it.
Because it is so obvious!

Gosh! we always wore masks
While doing or undoing tasks.
But they are so very invisible
We never knew we wore masks!

Once, it so happened
A king had a diamond.
He came to Buddha to gift it 
Buddha just smiled.

And asked him to drop it.
King unwillingly dropped it.
He stood empty handed.
Buddha again said, drop it.

Flabbergasted, he said,
I don't understand.
I don't have anything.
What do I drop, he asked.

A monk began to explain:-
What Buddha says is plain
He asks you to drop masks
That you wear again & again.

Here no one is emperor
Nor is anyone a beggar.
Everyone is one's own self
Neither inferior nor superior.

If we drop all masks that we wear--
masks of titles, lineage, valour, 
that we flaunt so flamboyantly--
answer to 'who am I' becomes easier.

We are not what we appear
to be--sad, glad, or sombre
wearing countless masks--
but a dot of light, soft & clear!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Thursday, July 1, 2021

बैठें दमकशी में?

उन्होंने पूछा कैसे हैं, मैंने कहा मुश्किल में डाल दिया
अभी तक पहिले सवाल का जवाब हमने नहीं दिया।
आपने दूसरा दाग दिया। एक बच्ची ने पूछा था कभी
आप कौन हैं? देखिए न, अब तक जवाब नहीं दिया।

अब मैं न पूछ पाऊँगा कि आप कैसे हैं
क्योंकि चेहरे से आप पहले ही जैसे हैं
अंदर का हाल जानने के लिए मुझको
बनना पड़ेगा वैसा ही कि आप जैसे हैं।

मेरे ख़्याल में अच्छा हो ख़ामोश हो जाऐं
पुरसकून होकर के दमकशी में बैठ जाऐं
इस तरह कुछ अच्छी गुफ़्तगू हो जायेगी
मुमकिन है कि नज़ात ए ख़्याल हो जाऐं।

अगर ख़्यालात से नज़ात मिल गई
तो लगेगा कि एक सौगात मिल गई
सभी कुछ तो ख़ुद ब ख़ुद हो रहा है
समझिए हमें अना से छुट्टी मिल गई।

पुरसकून= शांति से परिपूर्ण। दमकशी= मौन।
गुफ्तगू= बातचीत। नज़ात ए ख़्याल= विचार मुक्ति। 
अना= अहं भाव ( कर्ता भाव) 

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, June 28, 2021

Hi, Aspire For This!

Isn't there too much of mechanicality?
Which is not too good for workability.
Some awareness is needed to pitch in
& swap mechanicality with religiosity.

Mechanicality turns man into machine
Wherein he acts as a matter of routine
It's not congenial for man's real growth
It sustains him on robotized adrenaline.

If you do so much as close your eyes
And feel the dancing of breath pixies
And keep it going for a period of time
You shall be sensing it with open eyes.

That is when you do things relaxedly
Feeling scintilatingly, matter of factly.
The idea of doership won't touch you.
Work will happen by itself, ingeniously.

This is a state of mind worth attaining
If one can do it , it is worth bargaining!
People give high sounding words to it.
But I would say , it is quite fascinating!

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Wednesday, June 23, 2021

Want To Be Religious?

Want to be religious? Let go of religion.
There is a lot of baggage , with religion.
Religiosity makes you feel light & open.
Do you feel so, holding fast to Religion? 

Be religious, sans adherence to religion.
Religion is Managed! That is the reason.
To be religious, you don't need ritualism.
Your devoir is to connect to inner region.

There is religiosity , in the flight of a bird
In breaking of dawn, in opening of a bud
In the rainbow, set against skies , curved
In nature's wizardry, in melodies unheard.

Religiosity ferries you to your inner core
It connects you to your elemental nature
Believe me, you are very compassionate!
Religiosity but just mirrors your true color.

There's only one temple. Nature's temple.
You'll find God everywhere in this temple.
To be fair, temple's in God, God in temple.
Wonder of wonders! You are your temple! 

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Tuesday, June 22, 2021

20 जून 2021की पूर्व संध्या, हरिद्वार

थे आसमान में, बादल छाए हुए
कुछ नीला सा भूरा रंग लिए हुए
हवा भी धीरे से, सरसरा रही थी
इक ग़मग़ीन सा अंदाज़ लिए हुए।

गंगा मंत्रमुग्ध सी बहे जा रही थी
न शांत न बेचैन, बढ़े जा रही थी
लगता था जाना है कहीं दूर उसे
मिलने किसी से, चले जा रही थी।

मैं पैड़ियों पे ख़ुद को, सम्हाले हुए
खड़ा था पोटली हाथ में लिए हुए।
निरख रहा था, गंगा को बहते हुए
और आसमाँ को , भेद समेटे हुए।

ये मूक दर्शक हैं सदियों से यहाँ पे
देखा है तार तार दिलों को यहाँ पे
देखा है अपनों को जुदा होते यहाँ
जो सोचे थे साथ आने को यहाँ पे।

बादल को मुझ पर , तरस आ गया
वो आकर मुझ पर बरसने लग गया
पुजारी ने कहा , अब न देर कीजिए
पोटली को बहाने का वक्त आ गया।

वही जो कभी मेरी क़िस्मत रही थी
मैं ख़ुदा था, वो नाख़ुदा मेरी रही थी
वो सिमट कर, आज इस पोटली में
गंगा के हाथों में ,  सुपुर्द हो रही थी।

नाख़ुदा= नाव खेने वाली/ वाला।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, June 21, 2021

ON THE EVE OF JUNE 20, 2021

On that fateful day , on the 20th of June
A knot was tied, a precursor to the boon
That life was destined to be; a great gift! 
54 years on, curtain falls, this afternoon.

Fire was witness on that day; sacred fire
That lit the fire of love to heart's desire.
Yes, the fire that burnt the dross of life
And turned the Span into a song on lyre.

Today, ever pure Ganga is the witness.
Ganga, who flows , in all her kindness
With the steadiness of consciousness
Breathing on the altar of timelessness.

Flow is not only of the masses of water
But especially of the spirit of the author
Of the beauty and charm of the cosmos.
Whatever goes to it's bosom is , Kocher!

One might say, we come from the stars
And from there we bring all that cheers.
So be it ! If there be a grain of truth to it
After sojourn , one goes home , to stars! 

Om Shantih
Ajit Sambodhi.





Wednesday, June 16, 2021

क्या हाल है?

मिलते ही उन्होंने पूछ ही लिया: क्या हाल है?
मैं सोचता ही रह गया, क्या कहूँ क्या हाल है?

क्या जवाब इतना आसान है, जितना सवाल है?
क्या सवाल में छिपा नहीं है कोई और सवाल है?

आप चाहें तो, अंदाज़े ख़ुशफ़हमी में रह सकते हैं
और बड़े बड़े माकूल ए मौका जवाब दे सकते हैं।

पर दिल के अन्दर की बात तो और हुआ करती है
जो होंठों पर आ आ कर भी, रुक जाया करती है।

सुख दुख के धागों से बना ज़िंदगी का आशियाना
ताने बाने से ही बुना जाया करता हर शामियाना।

चाहे सिकन्दर हो या कलन्दर, वही एक कहानी है
ख़ुशी में ग़म, ग़म में ख़ुशी, एक तयशुदा रवानी है।

अंदाजे ख़ुशफ़हमी= सब बढ़िया है, ऐसा दिखाना।
माकूले मौका= मौके के मुताबिक।
आशियाना= घर। रवानी= flow.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, June 13, 2021

नहीं आता

कुदरत का दस्तूर है , गया लौट कर नहीं आता
दिल को समझा दूँ, मुझे वो सलीका नहीं आता।

दर्द से बढ़कर कोई रहनुमाा बन कर नहीं आता
पहुँच जाता वहाँ भी जहाँ से बुलावा नहीं आता।

वह क्या समझेगा किसी के दिल का, इज़्तिराब
जिसको आँख का एक आँसू बहाना नहीं आता।

आँसू बड़ी नियामत हैं , इस जहान में, साहिबान
जो आँसू टपकता है, अजनबी बन के नहीं आता।

समन्दर को लिए फिरते हैं दामन में ये जो बादल
बरसते हैं वहाँ भी ये, जहाँ कोई रहने नहीं आता।

दिल में न भरा हो, जब तक, रोशनी का समन्दर
ज़िन्दगानी में मुहब्बत का वो सेलाब नहीं आता।

इज़्तिराब= बेचेनी का सेलाब

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, June 10, 2021

गोशा

ये बैल्कनी का कोना भी ख़ूब लुभाया करता है
ये जामुन का पेड़ इसे गोदी खिलाया करता है।

सोचते होंगे तमाशाई हूँ, इसलिए बैठा करता हूँ?
यह गोशा मेरा चारागर है इसलिए बैठा करता हूँ।

कितने अफ़सानों का गवाह रह चुका है ये कोना
इसे ख़बर रहती है सारी, इसलिए, बैठा करता हूँ।

था तो मैं बंजारा मगर बाशिंदा बना दिया था मुझे
फ़िर से बन्जारा बन जाऊँ  क्या? सोचा करता  हूँ।

हर लम्हा मेरे माथे पे उम्र का टीका लगा जाता है
मैं यादों का पुलिंदा खोल कर उसे सूँघा करता हूँ।

वक़्त का झोला बख़ूबी कंधे पे लटकाए रखता हूँ 
रात में रात के कंधे पे सिर रखके सोया करता  हूँ।

तमाशाई= तमाशा देखने वाला। गोशा= कोना
चारागर= हकीम। अफ़सानों = किस्सों।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, June 7, 2021

चंद रुबाइयाँ

लोभोलाभ की पट्टी पर दौड़ता इंजन
हवा हवाई हुआ सरपट, उड़ता इंजन
ज़िन्दगी गोया, तख़्ते सुलेमान हो गई
शेखचिल्ली जैसे सीटी बजाता इंजन।

इस भागमभाग की ज़िन्दगानी में
बदहवासी और क़सीदाख़्वानी में
आदमी है ये समझता , नायक तो
एक वही , इस तूफ़ानी कहानी में।

आदमी ख़ुद को अमर समझता है
आख़िर तक, पकड़ पूरी रखता है
क़फ़न पे ख़र्च होगा , इसके सिवा
हरेक दमड़ी, का हिसाब रखता है।

दौलत कमाने में जिस्म को गँवा दिया
उसे दुरुस्त करने में ज़रको लुटा दिया
ज़िंदगी चुकती चली जीना आया नहीं
उल्फ़त लुटाने का, अवसर गँवा दिया।

किसी के चाहने से सब कुछ हो नहीं सकता
ज़िंदगी दरिया बहता हुआ, रुक नहीं सकता
किसी को रोना, किसी को हँसना नहीं आता
रंग बिरंगा है गुलशन, एकका हो नहीं सकता।

कहीं इल्हाम होता है, कहीं एहसास होता है
बड़ी मुश्किल से कभी, ऐसा ऐजाज़ होता है
कहीं फ़ासले घटते हैं, दूरियाँ कम नहीं होती
कहीं जुदा राहोंपे सायोंका इत्तिफ़ाक होता है।

लोग मुझे दीवाना समझते हैं
मेरे दामन से उलझते रहते हैं
अपनी तलाश में, भटकता हूँ 
मेरे साथ वो क्यों, भटकते हैं?

ग़लत सोचते हैं मुझे भीड़ की ज़रूरत है
मुझे, भीड़ की नहीं , ग़ैरत की ज़रूरत है
मेरी महफ़िल, भीड़ से नहीं, सजा करती 
मुझे तो एक अदद इन्सान की ज़रूरत है।

है अँधेरी अमावस मगर चुभती नहीं
धूप, खिलती यहाँ, मगर चुभती नहीं
ये जो खुला आसमाँ, राज़दाँ, है मेरा
हर तरफ़ है यकीं, कोई बेवफ़ा, नहीं।

लोभोलाभ= लोभ और लाभ।
तख़्ते सुलेमान= mythical aeroplane.
क़सीदाख़्वानी= बढ़ा-चढ़ाकर दिखाना।
ज़र= स्वर्ण। उल्फ़त= प्यार।
इलहाम= divine intuition. ऐजाज़= चमत्कार।
इत्तिफ़ाक= अचानक, मिलना। ग़ैरत= ख़ुद्दारी।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Friday, June 4, 2021

रक्खा है

भला दुनियाँ में क्या रक्खा है
सब कुछ तो दिल में रक्खा है।

जोभी दुनियाँ से कह नहीं पाते
उसको दिल में छिपा रक्खा है।

दिल से बढ़ कर, दोस्त कौन है
सब कुछ इसे ही बता रक्खा है।

हर कोई अपना फ़ायदा ढूँढता है
सब को बताने में क्या रक्खा है?

आसमाँ से बड़ा निगहबाँ कौन
सभी कुछ उसे दिखा रक्खा है।

लोग मरने पर धोते हैं, सजाते हैं
मैंने ज़िंदा दिल में सजा रक्खा है।

आहोदर्द कहीं बाहर रिस न जाऐं
मुँह पे इक ढक्कन लगा रक्खा है।

निगाहबाँ = देखने वाला। आहोदर्द = आह 
और दर्द।


ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Tuesday, June 1, 2021

एक दर्जी (ओशो की कहानी के मुताबिक)

एक दर्जी था बड़ा नेक इन्सान
छोटी सी दुकान, थोड़ा सामान
बस एक ख़्वाहिश थी, दिल में
लौटरी मिले, जीना हो आसान।

एक दिन लौटरी निकल भी गई
उस रात उसकी नींद, भाग गई
रोज़ सोता था बेफ़िक्री की नींद
वह रात करवट बदलने में, गई।

सुबह में दुकान में ताला लगाया
चाबी को कुँए में फेंक के आया
सुख के साधन जुटाने लग गया
पहली दफ़ा दारू कवाब लाया।

यारई की महफ़िलें शुरू हो गईं
रातें भी रंगीन सी होने लग गई
ताश पत्ते और दाँव शुरू हो गये
दिन में रात, रात में दिन हो गए।

इधर एक साल बस ख़त्म सी हुई
उधर रकम भी सब, ख़त्म हो गई
अभी तक जिनसे , वाक़िफ़ न था
वही बीमारियाँ अब, अंग लग गई।

कुँए में घुस के, चाबी ढूँढ के लाया
ताला खोल के, दुकान को जमाया
ख़ुशी के दिन थे या, ख़्वाब था यह
सोचा तो करता, समझ में न आया।

एक बार फ़िर से लौटरी खुल जाए
तो सचमुच में ख़ुशी लौट कर आए
कुछ पैसा ग़र, हाथ में आ जाए तो
इन बीमारियों का , इलाज हो जाए।

एक दिन फ़िरसे लौटरी खुल भी गई
दुकान बंद हो गई , चाबी कुँए में गई
अब तो रातों में जगने से वाक़िफ था
इसलिए रात प्लानिंग में गुज़रती गई।

अब दोस्ती का पायदान ऊँचा हो गया
रम की जगह शैम्पेन का जाम हो गया
अब दाँव भी कुछ ऊँचे लगने लग गये
दोस्ती में अब ज़न का आग़ाज़ होगया।

मर्ज़ बढ़ते गए ज्यों-ज्यों दवा किया करे
दाँव बढ़ते गए ज्यों-ज्यों मना किया करे
वो हुआ हश्र जिसका अंदेशा था शुरू से
जेब खाली हो गई ख़ूब मिन्नतें किया करे।

फ़िर कुँए में उतरा, चाबी को ढूँढने के लिए
वापस न आया गया दुकान चलाने के लिए
मर्ज़ इतने गहरे हो चुके थे इस दौरान , कि
तीसरी लौटरी भी होती बेमानी, उसके लिए।

ओशो का कहना मुतवातिर यही होता है
माना कि दुःख वाकेई में ही दुःख होता है
सुख अलहदा किस्म का दुःख ही होता है
सुकूँ  सिर्फ़ और सिर्फ़  अम्न  में  होता है।

ज़न= औरतें। आगाज़=प्रारम्भ।
मुतवातिर= निरंतर।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, May 29, 2021

और क्या चाहिए

सुबह से शाम होती है, और क्या चाहिए
शाम से सहर होती है, और क्या चाहिए।

चराग़ जलाते हैं, अँधेरा सम्हालने के लिए
बस सम्हल जाए, फ़िर, और क्या चाहिए।

आवाज़ दे, इसके पेशतर कोई हलचल हो
पास ऐसा हवाख़्वाह तो, और क्या चाहिए।

चेहरे से सब वाक़िफ़ हैं, दिल रहता निहाँ है
बस चेहरे को सजाना है, और क्या चाहिए।

वक्त को सुनानी हैं, कुछ बातें भी कर लेते हैं
वक्त बख़ूबी याद रखता है, और क्या चाहिए।

दिल की बातें हैं, कोई दिल मिलेगा, कर लेंगे
अभी तो हाथ मिला लेते हैं, और क्या चाहिए।

सहर = सुबह। पेशतर = पहिले।

हवाख़्वाह= शुभचिंतक। निहाँ = छुपा हुआ।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Wednesday, May 26, 2021

हो गया

अब्र बरसा किया है, मौसम सुहाना हो गया
आज पूरनमासी है, और, चाँद गोल हो गया।

चाँद तारों को झाँका, लगा रिसाला खुल गया
देखते देखते सारा, आसमान मकतब हो गया।

बोधिधर्म देखा किया दीवार को नौ साल तक
कोरा देखते देखते, सचमुच वो कोरा हो गया।

चुप साधन चुप साध्य है , चुप रह बोली भूरी
जिसने जो चाहा सही, वह वैसा ही हो गया।

लोग घबराते हैं, आँखें  न बन्द हो जाऐं कहीं
जब भी बन्द हुई आँखें, तभी उजाला हो गया।

इब्तिदाई मुश्किलें आती हैं सफ़र में सभी को
जैसे अना ग़ायब हुई तो, अंदर आना हो गया।

अब्र= बादल
मकतब= पाठशाला
इब्तिदाई= शुरू में
अना= ego

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Tuesday, May 25, 2021

मुस्कुरा लें ?

हवा में ख़ौफ़ घुस आया है; तो चलो मुस्कुरा लें?
लोग  मुँह छिपाते हैं, मास्क में; आँखें मुस्कुरा लें?

हम बुलाते हैं पास उनको , वो दूर हटते जाते हैं
कहते हैं दूर रहो ; हमने कहा आओ, मुस्कुरा लें?

वो कहते हैं कोई छुपा रुस्तम आगया है शहर में
चुपके से चिपक जाता है; मौका है , मुस्कुरा लें?

बड़ा चालाक है, शक्ल बदलता रहता है हर दिन।
लगता है कोई मसखरा है , अपुन भी मुस्कुरा लें?

हमने कहा ऐसे डरने लगेंगे, तो और डरायेगा वो।
पूछा दवा क्या है ? हमने कहा क्यों न मुस्कुरा लें?

ज़िन्दादिली तो जी भरकर, मुस्कुराने का नाम है।
बोले कब मुस्कुराऐं ? हम बोले अभी मुस्कुरा लें?

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, May 23, 2021

क़तील शिफ़ाई के चंद अशआर

खुला है झूँठ का बाज़ार, आओ सच बोलें
न हो बला से खरीदार, आओ सच बोलें।

सुकूत छाया है इंसानियत की कद्रों पर
यही है मौका ए इज़हार, आओ सच बोलें।

हमें गवाह बनाया है वक़्त ने अपना
बनाम ए अज़्मत ए किरदार, आओ सच बोलें।

सुना है वक़्त का हाकिम बड़ा ही मुंसिफ है
पुकार कर सर ए दरबार, आओ सच बोलें।

छुपाए से कहीं छिपते हैं दाग़ चेहरे के
नज़र है आईना बरदार, आओ सच बोलें।

सुकूत = ख़ामोशी
बनाम ए अज़्मत ए किरदार= किरदार की इज़्ज़त के नाम पर
सर ए दरबार= महफ़िल में
नज़र है आईना बरदार= ख़िदमत में आईना लिए खड़ा है ख़ाकसार।

ओम् शान्ति:

बोलता हूँ

जब भी बोलना होता है, बेबाक बोलता हूँ 
ख़ामोशी रहे इसलिए  लिख के बोलता हूँ।

बाज़ार में मिलती ख़ामोशी, सब ख़रीद लेते
ख़ामोशी बिकती नहीं, बताने को बोलता हूँ।

कोई खंजर भी चलाए तो भला क्या होना है
ख़ामोशी के सिवा कुछ नहीं, यही बोलता हूँ।

आवाज़ करने के लिए, कोई दूसरा दरकार है
ख़ामोश ख़ुद को होना होता है, यह बोलता हूँ।

मैं जिस्म की बाबत तो कुछ कम ही बोलता हूँ।
ख़ामोशी हम-ज़ुबाँ है रूह की, वही बोलता हूँ।

लब सीं लेने से कभी ख़ामोशी नहीं आपाती है 
साँस तानदेन से लें तो आती है, यह बोलता हूँ।

बेबाक = बिना डर या संकोच के।
ख़ामोशी हम-ज़ुबाँ है रूह की = ख़ामोशी और रूह 
एक ही बोली बोलते हैं।
तानदेन = नाभि से दो इंच नीचे एक बिन्दु।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, May 20, 2021

मिल गई

गरमी के मौसम में बरसात आ गई
इतना बरसा कि हर शाख धुल गई।

बारिश में परिंदों के पर गीले हो गए
आज पंख सुखाने को धूप खिल गई।

हर तरफ़ में चहचहाहट होने लग गई
हवा में उड़ने की छूट, फ़िर मिल गई।
 
कोयल है गा रही, ज़िंदादिली के साथ
लगता है गले को, नई ताकत मिल गई।

दो दिन की बिना माँगी बंदिश के बाद
इन्सान को गरमी से, राहत मिल गई।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

जैसे

अभी साँस निकली एक जैसे
इंतिज़ार कर , थकी हो जैसे।

बादल कल से बरसा किया है
कहीं से तूफ़ान आया हो जैसे।

बौछारें कुछ उड़ उड़ कर आईं
हवा ने एहसान कर दिया जैसे।

एक बुलबुल यहाँ दुबक के बैठा
किसी ने हवा बंद करदी है जैसे।

खुली आँख से ख़्वाब क्या देखा
ख़ुशबू उड़ कर आ गई हो जैसे।

तसव्वुर में डूब गया है दिल ऐसे
चाँदनी में डूब गया हो ग़म जैसे।

एक ख़्वाब अभी आया है ऐसे
बादल से चाँद निकला हो जैसे।

अब्र आलूद मौसम चला गया
कोई बिन बुलाया मेहमान जैसे।

अब्र आलूद= घटाओं से भरा

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।




Monday, May 17, 2021

तन्हा हो गया

हम थे बेकरार सुनने को, सुनाने वाला ही सो गया
दास्तान ख़त्म भी हुई न थी, बीच में ही सो गया।

हम तो रहते थे बेख़बर, ख़बर रखने वाला खो गया
क्या रही मज़बूरी ऐसी, ख़ामोश कैसे हो गया?

यक़ीन था इतना उस पे, हम आँखें बंद कर चलते रहे
जब खोली आँखें तो देखा, रहबर रवाना हो गया।

समझा था उम्र भर के लिए, मिल गया हमदम हमें
वो उम्र कम करता रहा और, बिस्मिल हो गया।

थे तो हम हमसफ़र, रहगुज़र भी अब तक एक था
मुहताज हो मैं, देखा किया और, वो रफ़ू हो गया।

ख़ूब बहलाया है दिल को, नाकामियाँ ही मिल सकीं
क्या करूँ इस ज़िन्दगी का, दिल ही तन्हा हो गया?

तन्हा = अकेला।बेकरार = आतुर।दास्तान = कहानी।
रहबर = पथ प्रदर्शक। हमदम = निकटतम मित्र।
बिस्मिल = बलि होने वाला।हमसफ़र = साथ यात्रा करने वाला।
रहगुज़र = रास्ता। मुहताज = ज़रूरतमंद। रफ़ू = ग़ायब।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, May 15, 2021

बोकूजू

एक बार एक ज़ेन फ़क़ीर थे, नाम था बोकूजू
कुछ लोगों के लिए मगर वो थे महज़, जूजू।

वो कभी कभी चिल्लाते थे, बोकूजू! बोकूजू!
फ़िर ख़ुद ही जवाब देते : हाँ, यहीं है बोकूजू।

किसी ने पूछा: आप क्यों चिल्लाते हैं, बोकूजू?
जवाब मिला: मुझे हर वक्त है अपनी जुस्तजू।

फ़िर बोले: अकेलापन सताने लगता है उसको
जो नहीं रखता है हरदम, ख़ुद को आजू-बाजू।

ख़ुद से क़राबत बनाये रखना है इंतिहाई लाज़िमी
अगर जो दिल में बसा रखी है बसीरत की आरजू।

जूजू= हौआ। क़राबत= निकटता। जुस्तजू= तलाश।
बसीरत= insight.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Friday, May 14, 2021

भूल गये

वो आये हमसे मिलने को, हम बातें करना भूल गए
गले लगाना भूल गए , हम मुस्काना भी भूल गए।

एक नन्हीं चिड़िया आई थी, गीत सुना, परवाज़ हुई
उसके ख़ुशरंग में खोकर हम, हाथ हिलाना भूल गए।

दूज का चाँद भी आया था, भोली सी मुस्कान लिए
वो शर्म के मारे भाग गया, या शीशनमन, हम भूल गए।

एक कोयल उड़ के आई है, डाली पर आकर बैठी है
वह गीत सुनाना भूल गई, याहम, उसे मनाना भूल गए।

आज तृतीया आई है, फ़िर अक्षय पात्र को साथ लिए
रिक्त कर दिया पात्र मगर, एक अक्षत को हम भूल गए।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Wednesday, May 12, 2021

नींद चुरा रहा था

कभी यहाँ पर , समाँ  रहा था
किसी का मैं भी ख़ुदा रहा था।

चराग़ जब तक जलता रहा था
वक्त भी आकर, थमा रहा था।

वो मुझको येभी दिखा रहा था
कभी यहाँ , घौंसला रहा था।

काली घटाऐं, जब जब भी छाईं
पेड़ों पे सावन का झूला रहा था।

मैं ख़्वाब अपने , सुना रहा था
वो पलकों से नींद चुरा रहा था।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Tuesday, May 11, 2021

रस्में निभा रहा हूँ

मौसम ले रहा है साँस, मैं भी ले रहा हूँ
बाकी बची हें कुछ, इसलिए ले रहा हूँ।

ज़ुल्फ़ें सम्हाले कोई, मैं दर्द सम्हाले हूँ
जीने के लिए दर्द का सहारा ले रहा हूँ।

सन्नाटा बोलता है गोकि ज़ुबाँ अलग है
उसी से कर के बातें, रातें बिता रहा हूँ।

चाँद ने जब भी उड़ेली, चाँदनी मेरे वास्ते
साझा दर्दे निहाँ उसीसे, मैं करता रहा हूँ।

कहाँ से लाऊँ उसे, नेमुल बदल है नहीं
हारे हुए इन्सान की, रस्में निभा रहा हूँ।

दर्दे निहाँ=छुपा हुआ दर्द
नेमुल बदल= सानी

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।


Sunday, May 9, 2021

कश्ती उजड़ के रह गई

पत्ते तो सब झड़ गये, अब सूनी शाख़ें ही रह गईं
परिन्दो यहाँ न आना, सिर्फ़ वीरानियाँ ही रह गईं।

तारों का कहकशाँ था, थी चाँदनी छिटकी हुई
घटाऐं पन्ने पलटती गईं, मजबूरियाँ ही रह गईं।

बड़ी शिद्दत से जी ज़िंदगी, बनी थी इक किताब
ज़लज़ला बहाकर ले गया उसे , यादें ही रह गईं।

क्या सलीका था रहगुज़र निकालने का, उलझन में
उस सलीके की बस अब आँखों में, तस्वीर रह गई।

सबकुछ था मेरी कश्ती में, मालिक का बख़्शा हुआ
मेरा नाख़ुदा चला गया, मेरी कश्ती उजड़ के रह गई।

कहकशाँ = milky way.शिद्दत = जुनून, intensity.
ज़लज़ला = भूचाल।रहगुज़र = राह।नाख़ुदा = नाविक।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, May 8, 2021

जिसे मैं ढूँढता हूँ।

न ख़ुदा मिलता, न वो नाख़ुदा जिसे मैं ढूँढता हूँ
सब कुछ मिलता सिवा उसके जिसे मैं ढूँढता हूँ ।

हर रोज़ मिलता है एक खोया खोया सा आसमाँ
नहीं मिलता अब वो आसमान जिसे मैं ढूँढता हूँ ।

चेहरों का दरिया, गुज़रता रहता है मेरे सामने से
नहीं आता है नज़र वह चेहरा, जिसे मैं ढूँढता हूँ ।

हर दरीचे में जाकर, सूँघता हूँ, हवा के झोंकों को
नहीं मिलता महक का झोंका, जिसे मैं ढूँढता हूँ ।

लगता है खड़ा हूँ मैं, ज़ुबानों के एक समन्दर में
वह हम-ज़ुबाँ नहीं है मिलता, जिसे मैं ढूँढता हूँ ।

एक थी निगाह जिसमें इन्तिज़ार हुआ करता था
अब वो दिखती नहीं है, हज़ारहा उसे मैं ढूँढता हूँ ।

नाख़ुदा= नाविक।हम-ज़ुबाँ=एकसी बोली 
बोलने वाला!हज़ारहा = हज़ार बार।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Wednesday, May 5, 2021

STAY FIT

People are scared of Covid, quite a bit
In a way though, it has been quite a hit
Time was they didn't bother about body
Now almost everyone wants to stay fit.

I suggest you keep three items in your kit
I am sure you can then, keep yourself fit
They are : water, oxygen, and humming
I will explain all of them to you , bit by bit.

You know body is seventy percent water
In no case please, allow this level to falter
So the first thing for you to remember is
To hydrate your body with enough water.

The next unavoidable thing is , oxygen
Like water , every cell runs on oxygen.
Unfortunately, people do chest breathing
Switch over to belly breathing, for oxygen.

There is a nerve called the vagus nerve
Very many organs are linked to this nerve
One can tone them by toning this nerve
And humming is a way to tone this nerve!

It's so easy! Wish you all good health!
chest breathing = shallow breathing.
belly breathing = diaphragmatic breathing
= deep breathing.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.



Friday, April 30, 2021

ये रिश्ता

मेरा उनका रिश्ता है क्या
दिलों के सिवा कोई जानेगा क्या
जन्मों से जो चला आ रहा
अब जाके वो बदलेगा क्या?

उन्होंने ही माना था सब कुछ मुझे
उन्होंने ही पहिचान दी थी मुझे
मैं तो अकेला गुमसुम सा था
उन्होंने ही मुस्कान दी थी मुझे।
अचानक ही अब ये क्या हो गया
ज़माने ने बदली है रफ़्तार क्या?

उनका जो साथ मुझको न मिलता
मुश्किल में हाथ मुझको न मिलता
अकेला कहाँ तक मैं ज़ुल्मत को सहता
उनका सहारा जो मुझको न मिलता।
लाकर यहाँ तक क्यों छोड़ा मुझको
मुझको बता दो मेरी ख़ता क्या?

सौंपूँ मैं ख़ुद को हाथों में तेरे
उनके ही अल्फ़ाज़ मैं कह रहा हूँ 
मुझको ज़रूरत है हरदम तुम्हारी
अपने ही अल्फ़ाज़ दुहरा रहा हूँ।
कहीं ऐसा ना हो रब ही ये पूँछे
रज़ा उससे पहले ले ली थी क्या?

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, April 29, 2021

दिखता नहीं है

वही सितारा, वही नज़ारा, पहले जैसा दिखता नहीं है
नज़र का फ़र्क़ है या कुछ और है वैसा दिखता नहीं है।

यह आँखों के आगे जो पर्दा रहता है एक, शबनमी
यह धुंधे गर्द है या कुछ और है, वैसा दिखता नहीं है।

चाँद तो अब भी चमकता है, अपने उसी हिसाब से
मगर कुछ था उसमें जो अब, वैसा दिखता नहीं है।

वो शाम, वो गुफ़्तगू, वो अफ़साने और सरगोशियाँ !
शाम तो अब भी आती है, बाकी वैसा दिखता नहीं है।

ज़िन्दगी तो अब भी गुज़र जाती है, अपनी रफ़्तार से
मगर ज़िन्दादिली का नुक़्ता, अब वैसा दिखता नहीं है।

शबनमी=जालीदार। गुफ़्तगू=बातचीत। अफ़साने=किस्से।
सरगोशियाँ = मुँह को कान के पास लाकर बात करना।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Tuesday, April 27, 2021

हुआ करे

आज बद्र का चाँद है, वह भी चैत का, हुआ करे
सभी कहते हैं, बड़ा ख़ूबसूरत होता है, हुआ करे।

कोई इससे मेरी क़ुर्ब निकाल के ख़ुश है, हुआ करे
बक़ौले नुजूमी ये मेरी यौम ए पैदाइश है, हुआ करे।

बहुत उड़ती थीं ख़्वाहिशें हवाओं में, आसमानों में
मैंने उनके पर कतर दिए हैं, नाराज़ हैं, हुआ करें।

बहुत कुछ होता रहता है यहाँ, हर वक्त, हुआ करे
रातें अगरचे  तवील वा ख़ुर्द  होती हैं , हुआ  करें।

हाथ की लकीरें भी बोलती हैं, ऐसा लोग कहते हैं
आँखें भी राज़ छुपाने में माहिर होती हैं, हुआ करें।

बेताब रहते थे सुनने सुनाने को, अफ़साने, हरदम
मुहब्बत करने में भी तक़लीफ़ होती है, हुआ करे।

रूठना ज़रूरी है शायद, मन तरसता है कई बार
मनाने वाला तो है नहीं, हश्र जो होगा, हुआ करे।

यहाँ तो अना की भी जंग न थी, मगर जुदाई हो गई
हाँ मौत ने यह बता दिया वो क्या चीज़ है, हुआ करे।

बद्र=पूनम का चाँद। क़ुर्ब=नज़दीकी रिश्ता।
बकौले नुजूमी=ज्योतिषी के मुताबिक।
यौम ए पैदाइश=सालगिरह। तवील वा ख़ुर्द= लम्बा या छोटा।
हश्र=परिणाम। अना=ego.

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Friday, April 23, 2021

देखा करता हूँ!

सहर से शम्मा जलने तक मुसल्सल देखा करता हूँ 
कभी ख़ुद की, कभी उसकी, फ़िज़ा देखा करता हूँ।

है अजब, मगर यह दौर, भी, मैं, आज़माया करता हूँ 
मेरे ख़्वाबों को नया जामा, पहनाकर, देखा करता हूँ।

थोड़ी दूर तक, चलकर साथ, बराबर देखा करता हूँ 
वो नहीं,  अफ़वाह, चेहरों पे चिपकी, देखा करता हूँ ।

हर सिम्त की जानिब, वही तस्वीर, मैं, देखा करता हूँ 
हवा से पूछ कर, फ़िर उसको उड़ाकर, देखा करता हूँ ।

ऐ आसमाँ तू तो गवाह है, हर पहलू ए वाक़िआत का
क्या तू भी ऐसे देखता उसको, जैसे मैं, देखा करता हूँ ? 

सहर=सुबह।शम्मा=मोमबत्ती।मुसल्सल=लगातार।
सिम्त=दिशा।ज़ानिब=की ओर, की तरफ़।
पहलू ए वाक़ियात= घटनाक्रम का पहलू।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, April 22, 2021

सिरहाने से

तुमने कहा था, न छोड़ोगे अकेले उसे, अपने जाने से
अब क्यों हो रहे हो इतने लाचार, उसके चले जाने से।

देख, जाने से पहले उसने बहुत कुछ दे दिया है तुझको
वही सम्हालता रहेगा हरदम तुझको, हर नये फ़साने से।

न हो परीशाँ इतना तू, तौफ़ीक को मुसीबत न समझ तू
कोशिश तो कर, मान जायेगा एक दिन मन, मनाने से।

ख़ुदा ने करम कर के, बख़्शा है तुम को ऐसा नाख़ुदा
जो जाकर भी तेरे पास, आता रहता है, हर बहाने से।

कौन निभाता है साथ इतना, एक बार बिछड़ने पे ऐसे
जैसे वो तुझे हरदम, झाँकता रहता है, तेरे सिरहाने से।

तौफ़ीक= सामर्थ्य। नाख़ुदा= नाव खिवैया।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, April 19, 2021

फ़र्क़ होता नहीं है

बहुत कुछ होता यहाँ , मगर लगता कुछ होता नहीं है
दिल चाहता है बयाँ करना, ज़ुबाँ से बयाँ होता नहीं है।

सच लगता है जो यहाँ पर, वो सच मगर होता नहीं है
क्या ख़ूब खेल है ज़ुबाँ का, सच नुमाया होता नहीं है।

झूठ के पैबन्दों से रच जाता है सच्चाई का ऐसा जामा
जिसमें पैबन्दों का कोई ज़िक्र , कहीं पर होता नहीं है।

एक घर बनाने में कितनों की, सारी उम्र खप जाती है
बस्तियाँ जल जाती हैं, जलानेवाला कोई होता नहीं है।

लोग चलते पैदल हज़ार मील, कोई रोके, होता नहीं है
मंज़िल पहुचने से पहले गिरते, कोई रोदे, होता नहीं है।

भूख से तड़पते हैं लोग, मगर कहीं शोर, होता नहीं है
तस्वीरें दिखाती चमचमाता  सूरज, फ़ज्र होता नहीं है।

एक बेटे को जवान करने में एक माँ बूढ़ी हो जाती है 
बेटा ग़ायब हो जाता है, किसी को फ़र्क़ होता नहीं है।

 नुमाया = प्रकट। फ़ज्र =  अलस सुबह।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Friday, April 2, 2021

GOOD FRIDAY

"Father, forgive them", implored Jesus.
Nailed to the Cross, He thought of us;
"for they know not what they do", He
Continued in great compassion for us.

He bestowed upon us, inner awareness
By elevating our physical consciousness
To the heights of spiritual consciousness
At the crucial time of extreme hardness.

"Let thy will be done", He knelt on his knee
Knowing well, "one of you shall betray me".
He unveiled "the kingdom of God" within
Of which He happened to be the trustee.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Monday, March 29, 2021

एक किसान

एक किसान था बड़ा सरल ह्रदय
उसका घोड़ा था सुंदर हिरण्यमय
एक दिन उसका घोड़ा भाग गया
उसके पड़ोसी जो थे बड़े सहृदय।
आये जताने को उससे सहानुभूति
किसान था शान्त, बिना अनुभूति।

दूसरे दिन घोड़ा उसका लौट आया
साथ में एक घोड़ा भी लेकर आया
पड़ोसी भाग के आये, ख़ुशी जताने
बड़ा उम्दा घोड़ा है, साथी ले आया।
किसान के लिए जैसे कुछ हुआ नहीं
वह ख़ामोश रहा, कुछ बोला ही नहीं।

नया घोड़ा किसान के बेटे को भा गया
एक दिन वह उसकी पीठ पर चढ़ गया
घोड़ा उसको लेकर जंगल में भाग गया
वहाँ उसे गिरा दिया,बेटे का पैर टूट गया।
गाँव वाले फ़िर आये, भारी दुःख मनाया
किसान शाँत था,पैरपे मरहम लगा दिया।

अगले दिन कुछ सैनिक अधिकारी आये
हर घर से जवान लड़कों को उठा ले गये
किसान के बेटे का पैर टूटा हुआ देखकर
उसको वहीं छोड़कर अधिकारी चले गये।
गाँव वाले आये, बोले, तुम अच्छे बच गये
उसने कुछ न कहा और तब वो चले गये।

आगे क्या होगा, किसी को कुछ पता नहीं
अच्छा होगा अथवा बुरा, यह भी पता नहीं
वक़्त के हाथों में रहती है जीवन की चाबी
जैसे घुमाए, जो परोसे, उसको नकारें नहीं।
शान्त रहकर आगे ही आगे को चलते चलें
शान्ति से शान्ति  के सब्र को सँजोते  चलें।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, March 28, 2021

आँसू

ये जो आँखों में छलकता है पानी
न समझ लेना इसको, कोरा पानी
समझने के लिए कोई भी, कहानी
मिलेगा नहीं कहीं भी इसका सानी।
इसकी तासीर में जो होती है रवानी
सूखने पर भी बनती है एक कहानी।

हर आँसू में छिपा रहता कोई राज़ है
ज़िन्दगी से जुड़ा रहता , कोई राज़ है
ज़िन्दगी होती जो है इतनी ख़ूबसूरत
क्योंकि हर राज़ होता इसका साज़ है।
राज़ का जब टूटने लग जाता है साज़
ज़िन्दगी बनने लगती है फ़िर, नासाज़।

एक क़तरा आँसू में समन्दर , छिपा है
जहाँ की आग बुझाने का सामाँ छिपा है
जिसको कोई तूफ़ान हटा नहीं सकता
उसको बहा ले जाने का सैलाब छिपा है।
दर्द उठने पर जो आँसू छलक पड़ते हैं
वो यादों का समन्दर लिए फ़िरा करते हैं।

कुछ हैं जो आँसू बहाते नहीं,  पी जाते हैं
जब आँसू आते हैं वे होंठों से मुस्कुराते हैं
आँसू खोलते हैं राज़, वो छुपाया करते हैं
मुझको तरस आता है, वो सो नहीं पाते हैं।
आँखों में लिए फिरता हूँ मैं हर दम दरिया
प्यासा न लौटे कोई , क़िस्मत का सताया।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।





Wednesday, March 24, 2021

कश्ती

मुझको मिली थी कश्ती सुहानी
जिसकी है सुन्दर सी एक कहानी
गाँव था छोटा सा गुमसुम सा एक
जिसमें मिली थी मुझको निशानी
बाक़रीना सब होता गया, घर मेरा सफ़ीना बनता गया
ऐसा रहा कुछ तेरा करम, सफ़ीना नगीना बनता गया।

बग़ीचा था फ़िर एक हमने लगाया
खिला फूल जो भी दिल से लगाया
बख़्शीश तेरी झड़ी बन गई
भर के जी सब कोई उसमें नहाया
सहारा जो तेरा मिलता गया, तेरा नाम बहाना बनता गया
तेरे साये में मैं चलता गया, रास्ता ख़ुद ब ख़ुद बनता गया।

सरहदें पार करते चलते गये
सफ़र में आगे को बढ़ते गये
हम तो रहे बेख़बर ख़ुद से लेकिन
तेरी ख़बर उसूलन रखते गये
किनारा नज़र से दिखता रहा, सफ़र ये बराबर चलता गया
रहम था तेरा, करम था तेरा, दरिया भी साथ चलता गया।

सब कुछ सदा यकसाँ रहता नहीं
जो आज है वो कल रहता नहीं
ये दस्तूर अज़ल से चलता रहा है
यहाँ मुस्तकिल कोई रहता नहीं
कश्ती में मेरी छेद हो गया , नगीना मेरा जुदा हो गया
कश्ती यहीं पे पड़ी रह गई , नाख़ुदा मेरा बिदा हो गया।

बाक़रीना = सलीक़े से।सफ़ीना = कश्ती।बख़्शीश = gift.
उसूलन = as a rule. करम = कृपा।यकसाँ = एक जैसा।
दस्तूर = रिवाज़।अज़ल = प्रारंभ।मुस्तक़िल = स्थायी।
नाख़ुदा = कश्ती चलाने वाला।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, March 20, 2021

वादा

मिलते रहे हैं, और मिलते रहेंगे , हम आप , बार बार
मिलने बिछड़ने का सिलसिला चलता रहेगा बार बार।

हम जब मिलेंगे तो आमने सामने होंगे हम, बहुत बार 
पहिचान न सकेंगे, क़बा ए जिस्म होगा अलग हर बार 

दिल की धड़कनें खींच कर ले आयेंगी पास, बार बार
एहसास हुआ करेगा, पहिले भी मिले चुके हैं, कई बार।

बहार आती है ख़ुशी लाती है, मगर जाती भी है हर बार
आख़िरकार जो आएगा बारबार,तो जाएगा भी बार बार।

ग़म की अंधेरी रातें आती हैं तो आया करें, मर्ज़ी उनकी
रात के बाद दिन तो बिला नागा आया करेगा, हर बार।

आपकी आवाज़ सुनाई पड़ेगी मुझको, जितनी भी बार
ये वादा है मिलने की जुस्तजू करूँगा मैं, उतनी ही बार।

क़बा ए जिस्म = जिस्म की ओढ़नी।
जुस्तजू = तलाश।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, March 15, 2021

फुटकर!

जो है ना-काफ़ी, वही है काफ़ी, मेरे लिए
जो है प्राप्त, वही सब है पर्याप्त मेरे लिए
और-और बढ़ाता है कीमत बेचने के लिए
जबकि ज़ब्त बढ़ाता है सब्र, ख़ुशी के लिए।

दरख़्त ने पत्ते से कहा, मेरी बात को ग़ौर से सुनना
यहाँ एक आता एक जाता, ये हक़ीक़त पहिचानना।

पेड़ कहत है पात से , तू सुनले मेरी  बात
इस घर की रीति ये, इक आवत इक जात।

ज़िद्दी है वो , बिना बुलाए भी आएगी
आख़िर वफ़ात है, वफ़ा तो दिखाएगी।

जिस्म को तो मौत से हार जाऊँगा, अब नहीं तो फ़िर सही
ख़ुशबू के मानिंद बिखरा मिल जाऊँगा मैं , कहीं ना कहीं।

ग़म नहीं ग़र कोई मुझको दग़ा दे दे
मैं ना करूँ दगा, ऐसा करम कर दे।

वक्त को वो सभी कुछ याद है
जो कभी रही तेरी फ़रियाद है
तू फ़िक्र ना कर , रख भरोसा
काम होने की होती, मियाद है।

मैंने कहा मौत से , मैं तैयार हूं , क्या तुम भी तैयार हो?
चुप मत रहो,ये तुम्हारा इख़्तियार है,तुम मेरी मैयार हो
मुझे तुम्हारे जवाब का इंतिज़ार है , हर रोज़ , हर पहर
ताकि तुम्हारे इस्तक़बाल को मेरा , रेज़ा रेज़ा तैयार हो।

भोजन नहीं है कोई ज़रूरी
मगर है ज़रूर इक मज़बूरी
चाहता हूँ इसी जिस्म से मैं
पा जाऊँ वह जो है ज़रूरी।

सुनो मेरी ये जो अहलिया है
जिसका सादा सा हुलिया है
मैं सबको बाख़बर कर दूँ कि
वह अस्ल में एक औलिया है।

कहते हैं , हद हद चले सो औलिया
और ये कि जो अनहद चले सो पीर
हद अनहद दोऊ चले,एकल रंग रचे
सब कोई बोले कि होगा कोई फ़क़ीर।

इस मीज़ान से नापलें वो औलिया हैं, हद जो लाँघी नहीं
हद अनहद के परे का फ़क़ीर हूँ मैं , मगर लकीर का नहीं।

उठने के लिए पहिले बैठना ज़रूरी है
जैसे भरने के लिए ख़ालीपन ज़रूरी है
यह सब लाओत्से ने सिखाया था कि
आने की ख़ातिर जाना होता ज़रूरी है।

जाना लाज़िमी है, इसको मुकर्रम बनाएं
मुलाकात ए मर्ग को क्यों न ख़ुर्रम बनाएं
जिस्म के परे में जो पोशीदा बनी रहती है
उस ग़ैबी तवानाई से मौका,मुकर्रम बनाएं।

जीवन नदिया बहती जाइ, छूटे कितने पाट
एकहि रट मन में लगी, कब पाये निज घाट।

हक़ीक़त की फ़ितरत पोशीदा हुआ करती है
जैसी वह दिखती है, वैसी हुआ नहीं करती है
वह तो बोई हुई है ज़िन्दगी के हर इक धागे में
जब फ़सल कटती है,तो मालूम हुआ करती है।

हक़ीक़त के कई नाम हैं जैसे हक़,माबूद,बख़्त
एक नाम जो अक्सर सुना जाता है,वह है वक्त
वक्त आहट नहीं करता पर हुक्म देता हर वक्त
अपील नहीं है, होता कभी मीठा कभी करख़्त।

ज़िन्दगी तो गुज़ार दूँगा पर तुम होते तो कुछ ऐसा होता
जैसे तड़पती धरती पे बारिश होने से हाल उसका होता।

तुम अगर जाते हो, ठीक है, पर इतना तो करना
साँस के मानिंद जा कर, फ़िर लौट आया करना।

मुझे क्या चाहिए तुम्हारी याद के सिवा
एक एक लफ़्ज़ याद है जो बना सिला।

क्यों ग़म करूँ अगर छोड़ते हो मुझको ?
जो दे दिया है वही सम्हाल लेगा मुझको।

वफ़ात= मौत। मैयार= कसौटी।
इस्तक़बाल= स्वागत।रेज़ा रेज़ा= कण कण।
अहलिया= जीवन संगिनी।मीज़ान= तराज़ू।
मुकर्रम= पूज्य।मर्ग = मौत।ख़ुर्रम= ख़ुश।
ग़ैबी= पार लौकिक।तवानाई= ताक़त।
पोशीदा= छिपी हुई।हक़=रब।माबूद= पूज्य।
बख़्त= भाग्य।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, March 8, 2021

मुसाफ़िरख़ाना

जो मुसाफ़रत करता है, उसको मुसाफ़िर कहते हैं
जो सफ़र में साथ रहता है, उसे हमसफ़र कहते हैं
जो रहगुज़र पे मिलता है, उसको राहगीर कहते हैं
मगर जिससे दिल मिलता, उसे हमसफ़ीर कहते हैं।

दानिशमंद इस जहान को, मुसाफ़िरख़ाना कहते हैं
मुसाफ़िरान का ये ख़ानाख़्वाह है, इसलिए कहते हैं
यहाँ पर हर किस्म के मुसाफ़िरों की आमद होती है
कोई मुस्तक़िल होकर नहीं रहता, ऐसा सब कहते हैं।

कुछ लोग यहाँ मुसाफ़ात तो कुछ मुसारअत करते हैं
वहीं , कुछ मुसाअदत तो कुछ मुसादमत भी करते हैं
मगर कुछ ऐसे भी हुआ करते, जो मुसाबरत करते हैं
और, मुसाफ़िरख़ाने के ख़ालिक का, दीदार करते हैं।

और तब ये मुसाफ़िरख़ाना एक दौलतख़ाना बनता है
जहाँ पे जुस्तजू ख़त्म होती और फ़िर क़स्द मिलता है
ज़र्रा ज़र्रा इस ख़िल्कत का रौशनी से लबरेज़ होता है
सफ़र बन्द होता जब सुकूत ओ सुकून भरपूर होता है।

मुसाफ़रत= यात्रा। रहगुज़र= रास्ता। दानिशमंद= ज्ञानी।
खानाख़्वाह= पड़ाव। मुसाफ़ात= दोस्ती।मुसारअत= रंजिश।
मुसाअदत= मदद। मुसादमत= कष्ट। मुसाबरत= सब्र।
ख़ालिक़= स्रष्टा। जुस्तजू= तलाश। क़स्द= संकल्प। 
ख़िल्कत= स्रष्टि। लबरेज़= लबालब। 
सुकूत ओ सुकून= सन्नाटा और शान्ति।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Thursday, March 4, 2021

मुंतज़िर

मेरी आंखों में जो लिखा है, सभी पढ़ नहीं पाते
वो मुह को ताकते हैं, ख़ामोशी समझ नहीं पाते
यह जो इबारत है, ग़ैबी मनकों से बना करती है
जो जुनूनी नहीं हें, वो मनकों को पिरो नहीं पाते।

कोई लम्हा होता है , आँखों में नक्श हो जाता है
कोई होता है , जो आँसू बनकर छलक जाता  है
दामन से पोंछने से वह , कोई पुछ नहीं जाता  है
हक़ीक़त में  वो नक्श ए फ़िल हजर बन जाता है।

धूप और चांदनी एक हैं , बस सीरत का फ़र्क़  है
आबो यख़ भी एक ही हें , बस सूरत का फ़र्क़ है
सिक्का एक होता है, गोकि पहलू दो हुआ करते 
वफ़ात और हयात में,सिर्फ़ एक साँस का फ़र्क़ है।

इस ख़िलक़त में हरदम, बहुत कुछ हुआ करता है
कुछ माक़ूल तो कुछ नामाक़ूल भी हुआ करता  है
जो हुआ करता है उससे बेख़बर रहें तो कैसा रहे ?
लगता नहीं हमारे न होने से , फ़र्क़ हुआ करता है।

मुन्तज़िर= इंतिज़ार करने वाला। ग़ैबी= supernatural
नक्श= print. आबो यख़= पानी और बर्फ़।
नक्श ए फ़िल हजर= engraved in stone.
वफ़ात और हयात= मृत्यु और जीवन।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, February 27, 2021

एक दिन

वीराना, महक से तुम्हारी, चमन बनता गया हर दिन
साथ की ज़िद न थी मेरी, कारवाँ बनता गया हर दिन
रहनुमाई थी तेरी, तेरे साये में मैं, चलता गया हर दिन
दुआ मिलती गई सबकी, मुकद्दर बनता गया हर दिन।

शम्स खिलता रहा हर दिन, ऐजाज़ बनता गया हर दिन
हम थे बेख़बर मगर जीना, ख़ुशरंग बनता गया हर दिन
वक्त चलता रहा, रास्ता ख़ुद ब ख़ुद बनता गया हर दिन
हदफ़ को न ढूँढा , मगर ख़ुद ब ख़ुद आता गया हर दिन।

हमने माँगा नहीं, दूरियाँ थीं,बनगईं नज़दीकियाँ हर दिन
ख़ुद से जब हुए रूबरू हम,हमसाया बनते गए हर दिन
सुबह जो उठता हूँ बुलबुल का बुलावा मिलता, हर दिन
कुछ तो ऐसा है ख़ुद को सम्हालता जाता हूँ मैं, हर दिन।

मुकद्दस हों इरादे तो गिर कर सम्हलते रहते हैं, हर दिन
तन्हा नहीं मगर तन्हाइयों में पैवस्त रहे आते हैं हर दिन
जहाँ से आगे और भी हैं जहाँ,नहीं होती है कभी इंतिहा
गुलशन महकते रहते हैं आपकी ख़ातिर ही तो, हर दिन।

सुनिए यह जो हमारा इत्तिफ़ाक़ चला करता है, हर दिन
कोई तो है ही जो करम करता रहता है हम पर, हर दिन
जो आपको यों वो रिफ़ाह मुसल्सल देता रहा , हर दिन
वो ही तो मुझको भी बिना माँगे शिफ़ा देता रहा हर दिन।

वक्त की तौहीन न कर बैठना कभी भी, किसी भी दिन
मिलने से पेशतर बिछड़ जाते हैं, ऐसे होते हैं कई दिन
ज़रा यह भी सुनलें अगर जो सुनना वाजिब समझते हैं
अपना साया भी पहिचानना मुश्किल होता है एक दिन।

दुनिया का रवाज है, कूच करना होता है सबको एक दिन
सभी हार जाते हैं, ज़िंदगी की बाज़ी तो मौत से एक दिन
हारी हुई बाज़ी को पलट दिया करता है कभी कोई बशर
ख़ुशबू बिखरी हुई पा लेता है जब वह कहीं पर एक दिन।

शम्स=सूर्य।ऐजाज़=चमत्कार। हदफ़=target.
हमसाया=क़रीबी। मुकद्दस=पवित्र। पैवस्त=संलग्न।
रिफ़ाह=हितकारिता। मुसल्सल=लगातार। शिफ़ा=दवा।
बशर=इन्सान।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Monday, February 8, 2021

एहसास

मुझको भरोसा है पूरा , अपने एहसास पर
क्योंकि मेरा हक जो है, अपने एहसास पर।
ये एहसास कोई छीन नहीं सकता है मुझसे
न तुम्हारा न किसी और का हक है इस पर।

तुम सामने नहीं आते , ठीक है तुम्हारी मर्ज़ी
मैं बुरा मानू या न मानू, यह भी तो मेरी मर्ज़ी।
तुम्हारे एहसास से चेहरे पर जो आती रौनक
तुम चाहो तंज कस दो , यह मेरी है ख़ुदग़र्ज़ी।

सच तो यह है तुम बिन बोले मुझसे बोलते हो
और बिना छुए भी मुझे हरदम छुआ करते हो।
अब मुझे ख़ौफ़ नहीं लगता है इन तन्हाइयों से
तुम दूर रह करके भी मेरे पास जो बने रहते हो।

पहले ख़ौफ़ था मुझे, तुम्हें कोई चुरा ले जाएगा
धड़कनें बढ़ जातीं, लगता कि दिल टूट जाएगा।
अब मुझे डर नहीं सताता, तुम्हारी बेवफ़ाई का
मेरा एहसास शदीद है, मुझे छोड़ के न जाएगा।

शदीद = प्रबल।

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Saturday, January 30, 2021

CAVE MEN

Some say we are all cave men
living on a different time scale,
assembled here on purpose
to release an urge against obscurity.

if what they say is true,
true too, here is where,
the mind commits suicide
to recoil from tyranny of thought.

looking back over the shoulder
progress appears a sad affair---
past catches up with us to reveal
a false front--- surely we believe

living on underbellies and bosoms,
sucklings ever, getting sucked
incessantly into the womb, seeking
vomit of eternity in endless embrace.

we move on knees, head buried
populate the planet, driving god
into backwoods, scare him
shouting messages into the moon.

we have made up our mind
to shove what is left of sanity
into the void, words conspiring
with thought to frame half-echoes.

Reprinted from YOUTH TIMES (defunct)1978 January 20-- February 2.

Om Shantih
Ajit Sambodhi.

Wednesday, January 27, 2021

लौ !

जो बीत गया, वह गत है
जो बचा, वह अनागत है।
दोनों के मध्य में गमत है
उसे पा लेना, अज़मत है।
वहीं पर गति को विराम
मन को अविरत विश्राम।
इंसान की जो हिक्मत है
उसी से , ख़ुशकिस्मत है।

मध्य में मख़्फ़ी ख़ते अमूद
उसी में मौजूद है वो ख़ुलूद
उस ख़त के सहारे उतरें तो 
मिला करेगी मंज़िले मक़्सूद
वहाँ न तेल न बाती न दीपक
बस 'लौ' है , देखिए अपलक !
'लौ' से जैसी होएगी , निस्बत
वैसी रब से हो जाएगी रग़बत।

गमत= रास्ता। अज़मत= गौरव।अविरत = nonstop.
हिक्मत = कौशल।मख़्फ़ी= अद्रष्य। ख़ते अमूद= खड़ी रेखा।
ख़ुलूद= नित्यता।ख़त = रेखा।मंज़िले मक़्सूद= goal.
निस्बत= निकटता।रग़बत= लगाव। 

ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।

Sunday, January 24, 2021

इज़हार ए तौफ़ीक़

तुझे अपने दिल में बसाए चला हूँ
तुझी से ये दुनिया सजाए चला हूँ।
जो दिल में सदा ही छिपाए रहा हूँ
ख़ुद अपनी ज़िद से बताने चला हूँ।

तेरी याद जब से , लेकर  चला हूँ
हरदम नया कुछ , पाता चला हूँ
रिश्ता जो तुमसे , पुराना रहा है
उसे जग में ज़ाहिर करने चला हूँ।

मैं मरज़ी से तेरे , माफ़िक चला हूँ
जो तूने है चाहा वो करता चला हूँ।
जो तेरी रज़ा थी , वो मेरी रही है
यही बात सबको , बताने चला हूँ।

घबरा के मैं महफ़िलों से चला हूँ
दुनियावी बातें बिदा कर चला हूँ।
मेरे हाल पर ही मुझे छोड़ दें सब
गुज़रा हुआ छोड़ कर के चला हूँ।

इज़हार ए तौफ़ीक़=ईश्वर की इच्छा
और उसके हिसाब से चलना।



ओम् शान्ति:
अजित सम्बोधि।